TYBA-Sem-VI-Paper-No.-IV-History-of-Hindi-Literature-Modern-Age-munotes

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आधुननक कालीन पररवेश
इकाई की रूपरेखा
१.० ाआकााइ का ाईद्देश्य
१.१ प्रस्तावना
१.२ ाअधुननक काली पररवेश
१.२.१ राजनीनतक पररवेश
१.२.२ सामानजक पररवेश
१.२.३ ाअनथिक पररवेश
१.२.४ साांस्कृनतक धानमिक पररवेश
१.२.५ सानहनययक पररवेश
१.३ साराांश
१.४ वैकनपपक प्रभ
१.५ लघुत्तरीय प्रश्न
१.६ बोध प्रश्न
१.७ सांदभि ग्रांथ
१.० इकाई का उद्देश्य ाआस ाआकााइ के ाऄध्ययन के पश्चात् नवद्याथी ननम्ननलनखत नबन्दुओां से पररनित होगे ।
 ाअधुननक काल का सांनिप्त पररिय प्राप्त करेंगे।
 ाअधुननक कालीन राजनीनतक पररवेश का ाऄध्ययन करेंगे।
 ाअधुननक कालीन सामानजक पररवेश का नवस्तार से ाऄध्ययन करेंगे।
 ाअधुननक कालीन ाअनथिक पररवेश का ाऄध्ययन करेंगे।
 ाअधुननक कालीन धानमिक-साांस्कृनतक पररवेश को देखेंगे।
 ाअधुननक कालीन सानहनययक पररवेश का ाऄध्ययन करेगे।
१.१ प्रस्तावना नहांदी सानहयय के ाआनतहास में सवािनधक जनिल समस्या सीमाओां का ननधािरण करना रहा है।
क्योंनक हर कालखांड में समय व पररनस्थनत ाऄलग-ाऄलग रही है। यही कारण है नक हर
कालखांड के सानहयय में बदलाव नदखााइ देता है। यह बदलाव की प्रनिया प्रािीन काल से munotes.in

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
2 िलती ाअ रही है। हमारे सानहनययक नवद्वान ाअ. रामिांद्र शुक्ल, जाजि नग्रयसिन, नमश्र बन्धु
नवनोद, ाअ. नवश्वनाथ प्रसाद नमश्र, बाबू श्यामसुांदर दास, ाअ. हजारीप्रसाद नद्ववेदी, डॉ.
रामकुमार ाअनद नवद्वानों ने नहांदी सानहयय के नवनवध काल िम को लेकर ििाि की है।
मुख्यताः ाअनदकाल भनिकाल, रीनतकाल और ाअधुननक काल ाअनद कालों में नवद्वानों ने
ाआसे नवभानजत नकया है। ाआन्ही कालों में एक काल ाअधुननक काल है। ाअधुननक काल
ाऄथाित ाअधुननक शब्द एक नवशेष कालखांड को दशािता है और मध्ययुगीन नविार पद्धनत से
एक नाइ नविारधारा तथा एक नाइ जीवन दृनि की ओर सांकेत करता है। यहााँ पर ाआनतहास के
साथ तत्र और श्रम, शासन व्यवस्था, कला, सानहयय एवां सौन्दयिशास्त्र ाअनद के साथ बहुत
सारी िीजें बदल जाती है। ाआस नये बोध के कारण यहााँ पुरानी रूनियों के प्रनत नवद्रोह की
भावना ननमािण होती है। यह नवीनता बाह्य नविारो से ही सबांनधत न रहते हुए वैिाररक स्तर
भी मनुष्य का सांस्कार करती है। ाआसे ही सानहयय के ाआनतहास में 'ाअधुननक काल के नाम से
ाऄनभनहत नकया गया है।
१.२ आधुननक कालीन पररवेश सानहयय पुणिताः मानव और समाज से जुड़ा हुाअ है ाआसीनलए नकसी भी काल के ाऄध्ययन के
पूवि ाईस काल के पररवेश ाऄथवा पृष्ठभूनम का ाऄध्ययन करना ाऄननवायि हो जाता है नहांदी
सानहयय के ाअधुननक काल में काइ सानहनययक नवधाओां का ननमािण हुाअ । ाआन नवधाओां के
ननमािण में तयकालीन समय की पररनस्थनत का ाऄमूपय योगदान ाऄनदेखा नही नकया जा
सकता क्योंनक समाज सानहयय की गनतनवनधयों का प्रारूप है और पररवेशजन्य नस्थनतयों का
सानहयय में महयवपूणि स्थान होता है। पररवेश को ननमािण करने में राजनीनतक, ाअनथिक,
धानमिक सास्कृनतक और सानहनययक पररवेश से पररपूणि होता है जो सानहयय के पूवि पीनिका
के स्वरूप में ाईपनस्थत होता है। ाआसीनलए ाअधुननक से पररनित होना बहुताअवश्यक है।
१.२.१ राजनीनतक पररवेश:
नहांदी सानहयय में ाअधुननक काल को नवयुग की िेतना के नवकास का युग कहा जाता है ।
यह काल राजनीनतक ाईथल -पुथल का काल रहा है । ाआसी काल मे राजनीनतक पररवेश से
समाज में ाऄनेक नव - नवीन नविारों का ाअनवभािव होने लगा । राजनीनतक िेत्र में सन्
१७५७ ाइ. में प्लासी के युद्ध में ाऄांग्रेजों ने नवाब नसराजुद्दौला को हराया था । नवाब
नसराजुदौला की हार के कारण सांपूणि बांगाल पर ाऄांग्रेजो का ाऄनधकार हो गया । ाईसके बाद
धीरे-धीरे ाऄांग्रेजों का प्रभाव पुरे भारत देश में बिता ही िला गया । कांपनी का प्रभुयव बिने के
कारण समाज के ाउपर ाऄन्याय और ाऄययािार बिने लगे । सन १७६४ ाइ. में बक्सर के
युद्ध में मुगल सम्राि शाहाअलम भी ाऄांग्रेजों के हाथों से परानजत हुाअ । सन १७६५ ाइ. में
कड़ा के युद्ध में देश के भीतर जो शिी बिी थी वो भी समाप्त हो गयी । ाईसके बाद बांगाल,
नबहार और ाईनड़सा की दीवानी ाऄांग्रेजों के हवाले हो गाइ । निर भी सपुणि देश में ाऄांग्रेजो को
ाऄपना ाऄनधपयय स्थानपत करने के नलए ाऄन्य दो शनियों को पराभूत करना बाकी था । ये
शनिया थी मरािा और नसक्ख । ाआसमें मरािो का प्रभाव भारत देश के व्यापक िेत्र पर था ।
परांतु नसक्ख तो पांजाब िेत्र तक ही सीनमत थे । दोनों ही ाऄपने पारस्पररक िूि के कारण
सन् १८०३ और लासवारी सन् १८०३ के युद्ध में परानजत हो गये । ाआसी के साथ देश में
बिी हुाइ शनि कुछ ही समय के बाद समाप्त हो गाइ । सन् १८४९ में नसक्खो के साथ ाऄांग्रेजों munotes.in

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ाअधुननक कालीन पररवेश
3 का निर से युद्ध हुाअ और नसख निर से परानजत हो गए । ाआसी तरह सांपुणि भारत देश
ाऄांग्रेजों के ाऄधीन हो गया । ाईसके बाद सन् १८५६ में ाऄवध भी ाऄांग्रेजों के हाथों में िला
गया । ाआसी तरह ऐसे ाऄनेक नवजय नमलने के बाद ाऄांग्रेज ाऄपनी सत्ता मे मदोमन्त होने लगी ।
सन् १८५७ का प्रथम स्वतांत्रता युद्ध ाआस काल की एक महयवपूणि तथा प्रमुख घिना है ।
कांपनी की राज्य स्थापना के समय ाऄनेक नीनतयों से देश के राजा और प्रजा ाऄसांतुि होने
लगे । भारत में ाऄांग्रेजों के नवरूद्ध नवद्रोह की ाअग भड़क ाईिी और एकजुि होकर सन्
१८५७ में पूरे देश में व्यापक स्तर पर नवद्रोह हुाअ । लगभग एक वषि तक यह नवद्रोह िलता
रहा । ाऄांग्रेज ाआस नवद्रोह को निर से दबाने में सिल हुए । ाऄांग्रेजों की दमन नननतयों के कारण
और भारतीयों में सांगिन के ाऄभाव से यह नवद्रोह ाऄसिल रहा परांतु ाआस िाांनत से पूरे भारत
देश के लोगों में ाअजादी के प्रनत जागरूकता ननमािण हुाइ । ाआसी का नतीजा ाऄांग्रेजों की ाइस्ि
ाआांनडया कांपनी समाप्त कर दी जाती है और निनिश साम्राज्य का ाऄनधपयय पूरे भारत देश में
शुरू हो जाता है । यही से भारत देश में ाअधुननक काल के नवीनीकरण की शुरुवात हो
जाती है ।
सन् १८८५ मे भारतीय राष्रीय काांग्रेस की स्थापना हो जाने से राजनैनतक घिनाओां में
महयवपूणि बदल होने लगे ाऄांग्रेजों की ाअनथिक नीनत से भारत देश की जनता तथा ग्रामीण
लोगों का शोषण होने लगा । ाऄांग्रेजों ने ाऄपनी प्रशासननक, शैिनणक नीनतयों को ाऄवलांबन
करके देश के ाऄांतगित कािी बदलाव देश में देखने को नमलता है सानहयय में भी ाअधुननक
सानहयय भी नवनभन्न पनत्रकाओ के माध्यम से प्रकानशत होने लगा । ाअधुननक सानहयय ऐसा
सानहयय था जो मनुष्य के सुख-दुख के साथ पहली बार जुड़ा वह भी गद्य के माध्यम से ,
सानहयय में भारतेन्दु काल से ाअधुननक सानहयय का ाईगम माना जाता है ाआस सानहयय में
ाअधुननक जीवन का ाअनवभािव गद्द में नदखााइ देता है । ाआस नये युग में ाऄपनी ाऄनभव्यनि के
नलए नाइ भाषा की खोज करना सुधारको, नविारको तथा नवद्वानों के नलए पररश्रम भरा कायि
था क्योंनक नयी व्यवस्था के नलए नसिि भाषा ही ाईपयुि नहीं थी। वरन ाआसके नलए
ाअधुननक काल में काव्य के माध्यम से पुरानी सांवेदना की ाऄनभव्यनि का भी सामने ाअना
जरूरी था । क्योंनक नयापन प्रािीन की व्याख्या के नबना ाऄधूरा है और ाईसे छोड़ देना सांभव
नहीं यही कारण है नक खड़ी बोली गद्य सानहयय में ाअधुननक िेतना के रूप में ाऄपनी
ाऄनभव्यनि करने का नया माध्यम बना ।
ाअधुननक कालीन राजनीनतक पृष्ठभूनम में ाइस्ि ाआांनडया कम्पनी की स्थापना, प्रथम स्वतांत्रता
सांग्राम, भारत में नवक्िोररया शासन की प्रनतष्ठा, भारतीय काांग्रेस की स्थापना, माले-नमण्िों
सुधार द्वारा साम्प्रदानयक ननवाििन प्रणाली, प्रथम महायुद्ध, रौलेि एक्ि जानलयाांवाल बाग
हययाकाड, गाांधीजी का ाऄसहयोग ाअांदोलन, स्वराज्य पािी की स्थापना, नजन्ना का काांग्रेस
से पृथक होना और मुनस्लम लोग की स्थापना करना ाअनद महयवपूणि घिनाएाँ राजनीनतक
पररवेश से जुडी है और ाईि सभी घिनाओां ने राजनीनतक पृष्ठभूनम पर गहरा ाऄसर डाला है
। ाआसी का नतीजा राजनीनतक पररवेश का ाअधुननक काल के नवकास में महयवपूणि योगदान
रहा है ।

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
4 १.२.२ सामानजक पररवेश:
ाअधुननक काल में यनद समाज पर दृनि डाले तो ाआस िेत्र में देश निर से एक नया रूप धारण
करने के नलए प्रययनशील था । ाऄांग्रेजो ने देश के ाऄांतगित नये-नये प्रयोग करके समाज को
ाअधुननकता की ओर प्रवृत्त होने के नलए ाऄग्रसर कर नदया । ाआस मुहीम में काइ नवद्वान
पाश्चायय समाज और नशिा पद्धनत ग्रहण करके ाआससे प्रभानवत हुए । यही कारण है नक भारत
में ाऄांग्रेजी शासन की सत्ता एक महयवपूणि घिना सानबत होती हुाइ नदखााइ देती है। भारत के
सामानजक जीवन में ाअधुननक काल में जो नाइ िेतना ाअयी ाईसका प्रमुख कारण ाअांग्ल
भारतीय सांपकि है। सामानजक पररवेश के िेत्र में परम्पराओां एवां रूनियों पर ाअांग्ल के सांपकि
के माध्यम से ाअघात हुाअ जो भारतीय दृनिकोण में पररवतिन के कारण ही सम्भव था ।
मध्यकालीन नहन्दू-धमि का कट्टरपन ाऄब धीरे-धीरे दूर होने लगा। मुगलों के पतन से नहांदू की
नस्थनत और सुरनित हो गाइ थी। ऐसे में स्वामी दयानन्द ने ाअयि समाज की स्थापना की।
ाईन्होंने ाअयि समाज के ाअन्दोलन के माध्यम से नहांदू समाज को जागृत करने का प्रयास
नकया। यनद ाअयि समाज िाांनत नहीं करता तो नहांदू समाज नपछड़ जाता और दुबिल बन
जाता। ाआसका कारण स्पि है नक भारतीय समाज ने पाश्चायय सांस्कृनत का स्वीकार नकया
और साथ ही ाआसााइ धमि के प्रभाव में ाअकर ाईसे भी ाऄपनाया । ाआसी को लेकर ाअयि समाज
ने ाअांदोलन को और तीव्र कर नदया। पनश्चमी सांस्कृनत का प्रभाव पुरे भारत देश के सामानजक
जीवन पर छाने लगा। ाऄांग्रेजों की ाऄांग्रेजी नशिा नवशेषत नवकास के नलए सहयोगी बनी हुाइ
थी। परांतु प्रािीन वैनदक प्रेरणा को लेकर स्वामी दयानन्द ने ाअयिसमाज के माध्यम से
समाज में शाांनत ननमािण की सामानजक जीवन से सबांनधत रूनियों का नतरस्कार होने से
लोगों के जीवन के मूपय बदल गए कही ना कही नहांदी सानहयय के ाअधुननक काल के प्रथम
ाईयथान में सामानजक जीवन से सांबांनधत यह द्रव का स्वरूप व्यि हुाअ । दूसरी और नवधवा
नववाह के पि में थे तो ाऄन्य जगहों पर ाआसे 'ाऄनहोनी' कहने वाले भी मौजूद थे। ाआसी प्रकार
से एक और जानत- पनत के नवरोधी थे तो दूसरी ओर ाआसे जगत नवनदत िुलवा नविार
धाराओां के बीि एक ाऄन्य नविारधारा सामने ाअयी जो कपयाणकारी सामानजक ाअदोलन
की दाद देने के नलए हमेशा तयपर थे।
ाअधुननक काल में समाज सुधारक, नविारक तथा नवद्वान ाऄांधनवश्वास, जानतभेद तथा जानत
का बनहष्कार, नवधवा नववाह, बाल नववाह, धानमिक नववाद, स्त्री-नशिा का ननषेध ाअनद
सामानजक दोषों से बिने के नलए दि रहने लगे और ाआन दोषो से नकस तरह से सुलझा
सकते है ाआसके बारे में नविारों का ाअदान-प्रदान करके सुझावों को प्रस्तुत करते थे। ाअयि
समाज की नविारधारा से सांबांनधत व्यनियों ने ाआसका नवरोध नकया और प्रािीन परम्पराओां
एवां रूनियों को 'पोप लीला' में मानकर ाईसकी किू ाअलोिना भी की। ाआसी कारण ाईनकी
सामानजक व्यवस्था का स्वरूप बड़ा ही धूनमल हो गया । नकांतु यही नवद्वान ाआस वाद-नववाद
को छोड़कर समाज सुधार तथा देश के नवकास के नलए योजनाएाँ प्रस्तुत करते है तब ाईनकी
प्रशांसा भी की जाती थी । यही पररवतिन हमे भारतेन्दु युग में देखने को नमलता है । ाईसके
बाद सामानजक पररनस्थनतयों में बड़ी ाऄशाांनत ननमािण हुाइ ।
नहांदी सानहयय के ाअधुननक काल ाऄथाित सन् १९०० से सन् १९५८ के समय में सामानजक
िेत्र में ननमािण हुाइ ाऄशाांनत दूर हुाइ और व्यापक दृनिकोण के साथ जीवन के नवीन मूपय
स्थानपत हो गए ाआस युग के नविारकों तथा नवद्वानों ने समाज सुधार की ाअवश्यकता को munotes.in

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ाअधुननक कालीन पररवेश
5 बहुत महयव देने के साथ बड़े शान्त नित्त से सामानजक कुरीनतयों को दूर करने के सुझावों
को प्रस्तुत नकया गया। ाआसमें नशिा के साथ बाल नवधवाओां के प्रनत व्यापक सहानुभूनतपूणि
दृनिकोण रहा है। ाआसी प्रकार ाऄछूतों के प्रनत सद्व्यवहार, रृदय की नवशालता, दहेज की
कुप्रथा को दूर करने का प्रययन समाज-सुधारकों में नवशेष रूप से नदखााइ पड़ता है। लेनकन
पनश्चमी सभ्यता के ाऄांधानुकरण का भी नवरोध स्पि रूप से पररलनित होता हुाअ यहााँ पर
नदखााइ देता है। यहीं से एक नवीन युग के प्रवृनत्त का दशिन होता है। वह है मानवतावादी की
प्रवृनत्त देश के महान नविारको में मानवता के प्रनत एक नवस्तृत दृनिकोण बदलता हुाअ
नदखााइ देता है। नविारधाराओां से सांबांनधत देश के महान नविारको ने ननधिन और शोनषत
समाज के प्रनत सांवेदना और नारी की नस्थनत के प्रनत करुणा व्यि की।
ाअधुननक काल में मानवतावादी दृनिकोण को लेकर सामानजक िेत्र में ाऄनधक से ाऄनधक
नवकास होने लगा और ाआसी नवकासग्राम के कारण मानवतावादी दृनिकोण का महयव बिने
लगा। ाआस समय गाांधीजी की मानवतावादी भावना सामानजक ाईयथान के नलए बड़ी ही
शनिशाली नसद्ध हुाइ सामानजक िेत्र में बड़ा पररवतिन हुाअ जैसे नक राजनीनतकता,
ाऄछुतोद्धार नहन्दु- मुनस्लम एकता, ाऄनहांसा, सययाग्रह, जमींदारी का नवरोध धानमिक समय
ाअनद। धीरे -धीरे देश की जनता पनश्चमी सांस्कृनत का नवरोध करने लगी और दूसरी और
खादी को भारतीय सांस्कृनत की ाऄथाित समानजक भावनाओां का प्रतीका बनाया गया। ाअयि
समाज के ाअधार पर वैनदक युग का पुनरुयथान हुाअ ाआसी वैनदक ाईयथान काल में
ाअध्यानयमक भावनाओां का नवकास हुाअ और मानव सेवा के साथ ाइश्वर प्रानप्त की ाऄवधारणा
भी समाज में जागृत होने लगी । दूसरी और महायमा गाांधी ने ग्रामोद्वार को महयवपूणि बताकर
पूाँजीपती का नवरोध नकया । ाआसी मशीनीकरण से नकसान के जीवन पर बड़ा व्यापक प्रभाव
पड़ा । यही ाऄनभशाप को दूर करने के नलए देश में कृषक वगि की जागृनत के प्रनत महान
सुधारको तथा नविारकों का ाऄनुमोदन रहा। जानत-भेद और ाऄछूतो के प्रनत देश में
ाऄययािार बिता ही जा रहा था। ाईन्हें भगवान के मनन्दरों से दूर रखने की माननसकता
समाज के ाऄांतगित ननमािण होने लगी। ाआसी कारण ाअध्यानमकता के महयव का भी ाअधुननक
काल में प्रनतपादन नकया गया है । यही ाअध्यानमकता भारतीय समाज के जनभावनाओां मे
प्रनतष्ठानपत हो िुकी थी ।
ाअधुननक काल के सामानजक पररवेश में मानवतावाद का समथिन करने वाले महान
नविारक, समाज सुधारक नवश्व कनव रवींद्रनाथ िैगोर का नाम ले सकते है । ाआन्होने ाऄपनी
कनवताओां में मानवतावाद के दशिन को प्रस्तुत नकया है। ाईसमे ाअध्यानयमकता , मानव दुाःख
ननवारण, नवश्व-सांस्कृनत और जानत-भेद को नमिाने में तयपरता ाअनद मानवतावादी भावना
कनवताओां में नदखााइ देती है। ाआसीनलए ये नवश्वक के रूप में पहिाने जाते है। साथ ही िह्म
समाज को नस्थरता देने में ाईनका सबसे बड़ा योगदान रहा है । ाआन पर नववेकानन्द का गहरा
प्रभाव था । मानवता की ाईपासना में नववेकानन्द का स्पि रूप से प्रभाव नदखााइ देता है ।
दुाःख को मानवता की एकसूत्रता के सूत्र में स्वीकारते हुए ाईसे साधनायमक रूप प्रदान नकया
। रृदय की करुण भावनाएाँ समाज को लक्ष्य बनाकर ाऄनभव्यनि की गाइ । मानवता का
नवकास यही एकमात्र सबका लक्ष्य है और नवश्व शाांनत के माध्यम से ाऄांतरािष्रीयता की
भावना नवकनसत होने पर ही ाआसे प्राप्त नकया जा सकता है । ाअधुननक काल के युग में ाआसी
नविारधारा को मानने वाला और प्रभानवत करने वाला महान व्यनि है । श्री. योनगराज
ाऄरनवन्द श्री. योनगराज ाऄरनवन्द मानव जानत के नवकास के नलए योग साधना करने में तयपर munotes.in

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
6 थे। ाईन्होंने ाऄपना जीवन नसिि मानव की सेवा करने में ही समनपित नकया था । मानवतावाद
में ही ाऄध्यायमवाद की ाऄनुभूनत होती है । ाआसी को लेकर ाईनका साधनायमक जीवन और
ाआच्छाशनि की ाऄध्यायमवाद की ाऄनुभूनत होती है । ाआसी को लेकर ाईनका साधनायमक
जीवन और ाआच्छाशनि की दृिता मानव को पूणि मानव बनाने में सलग्न थी।
ाअधुननक युग में समाज-सुधारक तथा नविारकों के माध्यम से समाज और सामानजक
व्यवस्था में कािी हद तक पररवतिन हुाअ था । समाज के साथ-साथ सानहयय पर भी ाआसका
प्रभाव पड़ रहा था । सामानजक ाऄवस्था में भारतेन्दु युग और नद्ववेदी युग दोनों में सामानजक
व्यवस्था का ाऄांतर नदखााइ देता है । ाआसी कारण भारतेन्दु युग में नवयुग िेतना का नवकास
हुाअ और सामानजक व्यवस्था में पररवतिन लाने के नलए बड़ी ाऄशाांनत ननमािण हुाइ । यह सब
कुछ नद्ववेदी युग में शाांत हो गया । समाज सुधारक सामानजक कुरीनतयों और रूनियों का
खण्डन करते हुए सामानजक समस्याओां को सुलझाने के नलए तयपर थे । धीरे-धीरे
मानवतावादी भावनाओां का नवकास हो रहा था । नवधवा नववाह, एक नववाह, नराः नारी की
समानता ाअनद समाज से सांबांनधत भावनाओां का नवकास पनश्चमी नविाराधारा के प्रभाव
ाअधुननक काल में सांभव हुाअ ।
१.२.३ आनथिक पररवेश:
ाअधुननक काल की सामानजक पररवेश के बाद हमे ाअनथिक पररवेश का ाऄध्ययन करना
ाअवश्यक है । यहााँ पर देख सकते है नक सानहयय बदलती हुाइ सांवेदनाओ की ाऄनभरुनि
बनकर हमारे सामने ाअया, नजसका सीधा सांबांध ाअनथिक और निन्तनायमक पररवतिन से है
क्योंनक ाअनथिक पररवतिनों के साथ सानहनययक पररवतिन का तालमेल बैिा देना सानहयय के
ाआनतहास की गवाही से हमे ज्ञात होता है । ाअधुननक काल के पूवि भारतीय गावों का ाअनथिक
ढााँिा और नस्थर रहा । गााँव में ही ाअनथिक व्यवहार िल रहे थे ाऄपनी ाअवश्यकताएाँ ाऄपने
ही गााँव में पूरी हो रही थी । ाईनका बाहरी दुननया से कोाइ लेना-देना नहीं था ।लेनकन
ाअधुननक काल में यह पररनस्थनत कुछ ाऄलग थी । ाअधुननक काल का समय सन् १८५०
से माना जाता है । परांतु ाईसी समय भारत देश में ाऄांग्रेजो ने सत्ता स्थानपत की थी । ाआसनलए
भारत देश तथा समाज की ाअनथिक नस्थनत का नववेिन करना ाअवश्यक है । देश के समाज
सुधारक तथा नवद्वानों को लग रहा था नक ाऄब ाऄांग्रेजों की सत्ता ाअने से देश की ाअनथिक
नस्थनत में बदलाव ाअ जाएगा । परांतु यह ाअशा करना देश की जनता के नलए िीक नहीं था ।
प्रारांभ में देश की नस्थनत को देखते हुए ाऄांग्रेजों की औद्योनगक नवकास में नबलकुल रुनि नहीं
थी । निर भी देश का धन पूरी तरह नवदेश में िला जा रहा था । ाआसी सदभि भारतेन्दु कहते
है-
"ाऄांग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी
पै धन नवदेश िनल जात यहै ाऄनतख्यारी ।"
देश का धन नवदेश जाने से समाज सुधारक, नवद्वान तथा नविारकों के नलए यह निन्ता का
नवषय बन गया । ाअनथिक नस्थनत के पररवतिन के साथ ाऄन्य ढाांिे में भी बदलाव करने की
जरूरत बनी । ाऄांग्रेजी राज्य की स्थापना से देश की सामानजक सांघिना में नवघिन और
पररवतिन लनित होने लगा ाऄांग्रेजों के नवजय की नजम्मेदारी यहााँ की नस्थर ाअनथिक व्यवस्था munotes.in

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ाअधुननक कालीन पररवेश
7 पर ही नहीं है ।बनपक देश की ाऄनेक जानतयों-ाईपजानतयों में एकता का ाऄभाव था । ाआसी
कारण नवदेशी मुसलमानों को युद्ध में सिलता नमलती गयी और ाऄांग्रेजो को भी नवजय की
सिलता नमली । ाअज भी देश में ाअधुननकरण हो गया निर भी नस्थनत यही रही है। पुरातन
ाअनथिक व्यवस्था के नछन्न-नभन्न होने पर भी जानत प्रथा। नशनथल तो हो गाइ परांतु नि नहीं
हुाइ । ाअधुननक सानहयय के भीतर ाआसके ाउपर करारा व्यांग्य नकया गया। है। जो ाअनथिक
पररवतिन ाऄांग्रेजो के द्वारा हुाअ और ाईसमें सिलता भी हानसल की । परांतु यही ाअनथिक
पररवतिन मुसलमानों के द्वारा सम्भव नहीं था । मुसलमानों के ाअगमन से सामानजक रीनत-
नीनतयों में सांकोि नदखााइ नदया और कही ाऄपनी नीनतयों का नवस्तार नदखााइ पडा।
मुसलमान सामानजक नवकास की दृनि से नपछड़े रहे । ाईनकी पूवि की सामांतीय नस्थनत
शनिशाली थी । निर भी देश की व्यवस्था, ाईन्ननत, जनता तथा समाज में कोाइ पररवतिन
नहीं ला सके ाअज सामांतीय व्यवस्था से ाअगे बिकर ाऄपनी स्वतांत्र पूजीवादी व्यवस्था को
ाऄपना िुके ाईनके सामानजक नवकास की दृनि देश के लोगों से ाअगे थी । ाआसी कारण ाईनके
द्वारा ाऄपनायी गाइ ाअनथिक व्यवस्था सिल हो गाइ कही न कही ाआसमे ाईनका स्वाथि नछपा
था । ाईसी स्वाथि को पूरा करने के नलए ाऄांग्रेजो ने धीरे-धीरे कदम ाईिाना प्रारांभ नकया व
नए-नए तरीके ाऄपनाने लगे ।
ाऄांग्रेजों के द्वारा गाांव के जमीन का बांदोबस्त करने के बाद ाईन्हें लोगों से थोड़ी-सी
मालगुजारी नमलती थी। ाआसी में जमीदार और बड़े-बड़े जोतदारों का एक ऐसा वगि ननमािण
हुाअ जो हर समय सहायता करने में तयपर था । ाऄांग्रेजों ने ाऄपने स्वाथि को साधने के नलए
ाआस देश को लूिा और देश के भीतर स्थानपत हुए व्यापार को भी नि नकया । सबसे पहले
लॉडि कॉनिवानलस ने देश के भीतर १७९३ में बांगाल, नबहार और ाईनड़सा में जमीदारी की
प्रथा लागू की थी। ाईसके बाद मुांबाइ, ाईत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश ाअनद के कुछ भागों में
जमींदारी की प्रथा ाअरांभी की गयी । यही प्रथा सन् १८२० िॉमस मुनरो ने 'ाआस्तमरारी
बदोबस्त' लागू करके जमीन को व्यनिगत सांपनत्त के रूप में बदलना प्रारांभ। नकया। ाआसी का
नतीजा जमीदार और जोतदार दोनों ही जमीन का िय-नविय नकया करते थे। ाआसके पहले
जमींन को खरीदा नहीं जाता था और ना ही बेिा जाता था। क्योंनक ाईसके ाउपर व्यनि का
ाऄनधकार नहीं था। ाआसी का िायदा यह हुाअ नक खेत व्यनिगत सांपनत्त हो जाने पर खेती का
व्यावसानयक हो जाना स्वाभानवक हुाअ। खेतों में से ाईयपादन ननकालकर ाऄब बाजारों में
ाअने लगा। यातायात नक सुनवधा बिने से ाईयपादन की नकस्म पर प्रभाव पड़ा नजसका
ज्यादा िायदा हो ाईसका ाईयपादन ाऄनधक नकया जाने लगा। ाआसी का नतीजा रूपयों के
िलन से व्यावसानयकता की वृनद्ध हुाइ। परांतु नकसानों की नस्थनत वैसी ही रही। क्योंनक ाईन्हें
एक तरि से सरकारी मालगुजारी ाऄदा करने की परेशानी रहती थी तो दूसरी तरि से
महाजन की ाऊण ाऄदायगी की। नकसान बेिारा दो पािों के बीि में नपसता जा रहा था और
ाउपर से ाऄांग्रेज भी समय-समय पर मालगुजारी का दर बिा नदया करते थे। ाआसी कारण
नकसान महाजनों के िांगुल में बुरी तरह से िस जाते थे और यह सभ्यता ाऄांग्रेजों की
कूिनीनत का ही नतीजा है। ाईसी समय ाऄकाल भी पड़ता रहता था। परांतु ाआस ाऄकाल की
नस्थनत में ाऄांग्रेज ाऄनधकारी ाऄकाल पीनड़तों की रिा करने में ाऄसमथि हो गए कर का बोझ,
ाऄकाल और महामारी ाअनद की वजह से देश की जनता त्रस्त हो िुकी थी ाआसका ाईपलेख
भारतेन्दु और ाईनके समसामानयक । लेखकों के सानहयय में नमलता है । munotes.in

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
8 देश के नवनभन्न प्राांतों में गााँवों की पांिायत होती थी । ाआसी पांिायतों में झगड़ों का ननपिारा
नकया जाता था परांतु ाअधुननक काल में ाऄांग्रेजों के द्वारा नयी व्यवस्था लागु होने के कारण
लोगों में एक-दूसरे से सांबांध जनिल हो गए। ाऄब पांिायातों में िैसला नहीं हो रहा है। ऐसी
नस्थनत में नयी सांस्थाओां का जन्म होना तय था । पांिायतो में किहररयों को स्थानपत नकया
गया । ाऄांग्रेजो की नयी व्यवस्था के प्रनत जनता को घोर सांकि का सामना करना पड़ा।
ाऄनेक नकसानों के खेत िुकड़ों-िुकड़ों में बि गए। खेतों की सांख्या कम होने लगी । नकसान
और सरकार के बीि में मध्यस्थों की सांख्या बिती ही गयी । ाआसी कारण नकसानों का
ाईयपादन घिता ही गया। देश के सभी नकसानों के जीवन का गुजारा खेती पर ननभिर था गााँव
और शहर में स्थानपत नकए ाईद्योग वे भी ाऄांग्रेजों की कृपा से काल-कवनलत हो गए
ाऄथिव्यवस्था के स्थान पर ाऄांग्रेजों ने नाइ ाऄथिव्यवस्था लागू की। ाईससे ाऄनजाने में ही
भारतीय नवकास की ओर ाऄसर हुाअ गााँव-गााँव की जड़ता िूिने लगी । गााँव और शहर एक-
दूसरे के सम्पकि में ाअने लगे ।गााँव को एकसूत्रता में बााँधने वाली ाऄथिव्यवस्था पुरे देश में ाऄब
राष्रीय एकता में ाअधुननक युग में देश धानमिक एकता में बांधा हुाअ था यही देश बाद में
जानत प्रथा के कारण ाऄलग-ाऄलग पुिों में बाँिने लगा । ाआसी का नतीजा जानत ाअनथिक गुिों
में बदलने लगी । परांतु जानत प्रथा की जड़ता को तोड़ना ाअधुननक काल में सांभव नहीं हुाअ।
ाअनथिक वगों का ाईदय होने से ाईसमें ाईच्ि वगि तथा ाईच्ि जाती के लोगों का समावेश हुाअ ।
ाऄांग्रेजो के द्वारा दी गाइ सुनवधाओां का लाभ ाईच्ि जानत के लोगों ने ही नलया। ाईस समय
राष्रीय ाअांदोलन भी ाईन्हीं के हाथ में था । राजनीनतक दलों के सुधार भी वहीं रहे ाउाँि-नीि
का भेदभाव होने लगा । ाआसी का िायदा ाऄांग्रेजों के द्वारा ाईिाया गया। बेरोजगारी, महांगााइ.
पूांजी का कुछ लोगों के पास जमा होना और देश में िैली हुाइ दररद्रता से नस्थनत और नबगड़ी
हुाइ थी। पूाँजीवाद ने मानव समाज में शुद्ध ाअनथिक सांबांध स्थानपत कर नदए थे। ाआसी कारण
श्रनमक वगि की िेतना का ाअधार भी शुद्ध ाअनथिक स्वाथि था । धीरे-धीरे ाआस ाअधुननक युग
के नविारको का ध्यान पुरी तरह से ननमािण हुाइ किोर पररनस्थनतयों एवां ननम्न वगि दारुण
दशा ने पूणि रूप ाऄपनी ओर केनन्द्रत कर नलया । वगि सांघषि से व्यापक जागृनत हुाइ और
दनलत वगि नवद्रोह करने के नलए तयपर हुाअ । ाअनथिक सांबांधों में कपपना और भावुकता का
स्थान न्युनतम हो गया और यथाथिवाद को महयव नमला ।
१.२.४ साांस्कृनतक धानमिक पररवेश:
ाअधुननक काल की ाअनथिक नस्थनत के बाद साांस्कृनतक और धानमिक पररवेश का नववेिन
करना महयवपूणि है। भारत में ाऄांग्रेजों के ाअगमन से साांस्कृनतक और धमि को लेकर देश के
ाऄनेक भागों में िाांनतकारी के रूप में बदलाव हुए। ाऄथिव्यवस्था, औद्योनगकता, सांिार
सुनवधा, प्रेस ाअनद को ाऄांग्रेजों ने ाऄपने नीजी स्वाथि के नलए स्थानपत नकया। परन्तु
ाअधुननक युग में ाआससे देश का नहत ही साध्य होने लगा । समाज ाऄपने नए तरीके से खुद
को ढालने लगा । पररनस्थनतयााँ बदलने लगी । परम्पराएाँ िूिने लगी । ाआसके पूवि धमि
पारलौनकक ाअकाांिाओां से सबांनधत था नकन्तु ाआस ाअधुननक काल के युग में धमि
ाआहलौनकक ाअकाांिाओां का वाहक बना हुाअ है। पूाँजीवादी समाज की भौनतकता के
िलस्वरूप धमि- सुधारकों को ाआस तरह का बाना धारण करना पड़ा था या यह कह सकते है
नक ाआसके नलए ाईन्हें बाध्य होना पड़ा। munotes.in

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ाअधुननक कालीन पररवेश
9 ाअधुननक काल में धमि और सांस्कृनत के सांबांध में ाऄांग्रेजो को ाइसााइ नमशनररयों के ाअिमक
रूख के कारण नविारकों तथा समाज सुधारको को ाआस धारदार मागि से गुजरना ाअवश्यक
हुाअ । ाईन्हें ाऄांग्रेजों के सामने ाऄपनी सांस्कृनत की वकालत करनी पड़ी और दूसरी ओर देश
की जनता के सामने धमि का नया ाऄथािपन करना ाअवश्यक हुाअ। यह ाआस ाअधुननक काल
में जो पहल िली थी वह नकसी हद तक नसद्ध भी हुाइ । धानमिकता कहीं ना कहीं समाज
सुधारकों के साथ जुड़ी हुाइ थी । पुराणपन्थी और सुधारक दोनों ही ाऄपने-ाऄपने मत के
प्रिाराथि धमिशास्त्र को शरण नलया था । ाआस काल में राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा को
ाईन्मूनलत करने के नलए धमिशास्त्र का ाअधार नलया था । दयानांद सरस्वती ने सामानजक
सुधारों को वैधता देने के नलए भी वेदों की ओर िलने के नलए कहा था और वेदों का नया
ाऄथि भी प्रस्तुत नकया था धीरे-धीरे ाआस देश में तकि की सांगनत पर नवशेष बल नदयाली
रूनियों से कािी नवधा हुाइ ाआसााइ और धमि सुधार सभी ाऄतीत के गौर देश के लोगों को
सम्मान का बोध होने लगा। नवदेशी सांस्कृनत के स्वतांत्रता की मााँग करने का नवश्वास जनता में
प्राप्त हुाअ। डा. नगेन्द्र कहते है 'ाआनके दो और व्यवहारों में एकरूपता नमलती है ।
ाईदाहरणाथि, िैगोर पररवार िाह्म था । िह्म समाज में मूनतिपूजा के नलए कोाइ स्थान नहीं है.
पर िैगोर-पररवार खूब धूमधाम के साथ दुगािाईयसव मनाता था समाज में वणि व्यवस्था
जन्मना नही कमिणा मानी जाती है, पर ाअयेानजयों में ऐसे बहुत कम लोग नमलेंगे, जो जानत
के बाहर नववाह सांबांध स्थानपत करने में सांकोि का ाऄनुभव न करते रहे हो। दूसरा
ाऄांतनविरोध यह था नक राजा राममोहन राय, रानाडे ाअनद बहुत से लोग निनिश राज्य को देश
के नलए वरदान समझते थे, लेनकन प्रजा के दोहन, शोषण ाअनद का नवरोध करते थे । समाज
में एक और सांस्कृतीकरण बि रहा था तो दूसरी और लौनककीकरण" ाऄांग्रेजो के सामने सभी
नवद्वानों तथा समाज सुधारको को ाऄपने देश की सांस्कृनत और धमि का समथिन करना पड़ा
ाआसीनलए देश की जनता के सामने एक नए धमि का बोध होने लगा।।
ाअधुननक काल मे मानवतावाद का महयव बिने लगा था। नवशेषताः धमि को लेकर
मानवतावाद को ाअधार बनाया गया। ाआसनलए ाआसकी मान्यता ाऄनधक बि गाइ। मानवतावाद
ाइश्वरवाद से सांबांनधत है, क्योंनक मानवतावाद सांस्कृत के शास्त्र और मध्यकालीन सांतो भिो
की बाननयों में भी नमलता है। कबीर नहन्दू-मुसलमान को लेकर यह प्रहार करते हैं नक सभी
ाइश्वर के सांतान है। कमिकाण्ड की ननांदा वे ाआसनलए करते है नक वह ाइश्वर प्रानप्त के बािक है।
वैसे तुलसीदास की भी स्पिोनि है नाते सबै राम का माननयता ाअधुननक युग में मनुष्य-
मनुष्य की समता, स्वतन्त्रता ाअनद को सामानजक न्याय के ाअधार पर समनथित नकया गया
है। मानवतावाद को लेकर गाांधीजी में धानमिक समन्वय का रूप नदखााइ देता है । वे
मानवतावाद को ाऄपनाते है । गाांधीजी ने कहा है "वैष्णव जन तो जेने कनहए पीर परााइ जाने
रे" ाईनके ाऄनुसार वही वैष्णव जन है जो भगवान का भि है जो परााइ पीर को जानता है
और भगवान के नवनभन्न नाम धमों का ाअधार बने हुए है।
ाअधुननक युग में िह्म समाज, प्राथिना समाज और ाअयि समाज ाअनद ने पुराने धमि को लेकर
नये तरीके से समाज को ढालने का प्रयास नकया है। ाआसमें िह्म समाज और प्राथिना समाज
ने ाअधुननक युग के ाऄनुसार खुद को स्वीकार कर नलया, लेनकन ाअयि समाज वैनदक धमि के
मूल स्वरूप को बनाये रखना िाहता था। परांतु पुराने रीनत-नीनतयों में लौिना नहीं िाहता
था। ाईस समय की पररनस्थनतयों की वजह से ाअयि समाज पर कािी प्रभाव पड़ा । ाआसमें िह्म munotes.in

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
10 समाज', 'प्राथिना समाज', 'रामकृष्ण नमशन', 'ाअयि समाज और नथयोसोनिकल सोसााआिी
ाअनद का सहयोग प्रमुखताः देखने को नमलता है ।
१.२.५ सानिनययक पररवेश:
नहांदी सानहयय के ाआनतहास में ाअधुननक काल का नवशेष महयव है । ाआसी ाअधुननक काल के
पररवेशों के ाऄांतगित राजनीनतक, सामानजक, ाअनथिक, धानमिक और साांस्कृनतक ाअनद सभी
पररवेश ाअते हैं । ाआसी के साथ सानहनययक पररवेश में ाऄन्य सानहययों का प्रभाव भी महयवपूणि
है। ाअधुननक काल की पृष्ठभूनम में नहांदी सानहयय का श्रृांगारकाल है। ाआस श्रृांगारकाल में
सानहयय का नवकास नवशेषताः राजदरबारों में तथा सौन्दयिपूणि वातावरण में नननमित हुाअ था ।
कलाकार तथा कनवयों को ाऄपना जीवनयापन िलाने के नलए राजदरबारों का ाअश्रय लेना
पड़ा। ाऄपने ाअश्रयदाता को प्रसन्न करके ाईनसे पुरस्कार पाना तथा सौन्दयि-नित्रण करना
ाईस काल के कनवयों का मुख्य ाईद्देश्य था। राजदरबार में रहने वाले कनव श्रृांगारी काव्य करते
हुए रीनत और ाऄलांकार को प्राधान्य देते थे । ाआसमें जो कनव दरबारी सांस्कृनत से दूर रहावे
"प्रेम की पुकार के स्वरूप रीनत से मुि है । ाआसीका नतीजा श्रृांगारकाल का सानहयय
मध्यकालीन दरबारी सांस्कृनत का प्रतीक है। यहााँ श्रृांगार रस का प्राधान्य, ाऄलांकरण का
प्राधान्य, मुिक शैली, िजभाषा, नारी के प्रनत प्रेनमका का स्वरूप, लिण ग्रांथों की प्रधानता,
प्रकृनत के ाईद्दीपन का नित्रण और वीर रस की कनवता ाअनद श्रृांगार कालीन सानहयय रहा है ।
रीनतकालीन काव्य परांपरा ाअधुननक पररवेश के ाऄनुकूल खुद को स्थानपत करने में पुरी
तरह से ाऄसमथि रहा सानहयय के िेत्र में भाषा का पररवतिन भी दृनिगोिर होता है । ाआसी का
पररणाम रीनतकालीन परांपराओां की रिा करते हुए सानहयय के िेत्र में नवीन नदशा और
नवधाओां का जन्म हुाअ ाआसके के साथ-साथ काव्य के नलए खड़ीबोली गद्य का प्रयोग करना
ाअरांभ हुाअ । ाआसी के साथ िम्पू काव्य का भी ननमािण हुाअ। ाईपन्यास कहानी नािक की
ननबांध एवां ाअलोिना ाअनद सभी का ननमािण हुाअ ाआस काल में नया नया सानहयय सामने
ाअने लगा पत्र-पनत्रकाएाँ प्रकानशत होने लगी यह ाआसी युग की देन है । देश के ाऄनेक भागों में
छापखाने खुलने लगे । सानहयय का ाऄनेक नवधाओां में नवकास होने लगा। सानहयय ाआन बहुत-
सी नवधाओां का रूप नवधान पाश्चायय सानहयय के ाऄनुकरण पर हुाअ वण्यि सामग्री की दृनि से
न सही पर नवनभन्न काव्य रूपों के नलए नजस प्रकार से नहांदी सानहयय गुजराती और मरािी
भाषाओां के सानहयय का ाऊणी है ाईसी प्रकार से ाऄांग्रेजी सानहयय का भी ाऊणी है ।
ाअधुननक काल में 'भारतेंदु युग' ाअधुननक नहांदी सानहयय प्रवेश द्वार के रूप में पहिाना जाता
है । क्य ाआसी युग में कािी सीमा तक सांनध-सानहयय का ननमािण हुाअ है । भारतेंदु युग में नहांदी
सानहयय का प्रसार कािी हुाअ । नद्ववेदी के युग में भाषा का पररमाजिन हुाअ । ाईसके बाद
नहांदी सानहयय के ाअधुननक काल में छायावाद को स्वणि युग' के रूप में पहिान प्राप्त हुाइ ।
छायावादी युग के सानहयय को ाऄपने पूविवती सानहनययक परम्पराओां के प्रनतनियायमकता
एक निरस्मरणीय महान ाअदोलन ही समझना िानहए प्रगनतवादी सानहयय में नवश्व-मानवता
का स्वर नवशेष रूप से मुखररत हुाअ है। ाईसके बाद नाइ कनवता, समकालीन कनवता,
कहानी-समाांतर कहानी के दौर महयवपूणि रहे है।
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ाअधुननक कालीन पररवेश
11 १.४ साराांश नहांदी सानहयय के ाआनतहास में ाअधुननक काल की युग नस्थनतयों तथा पररवेशों का नवकास की
दृनि से महयवपूणि स्थान है। ाआस काल में ाऄनेक नवद्वानों ने कालिम को लेकर ििाि की है।
परांतु ाआसमें रामिांद्र शुक्ल जी के कालिम को बहुत सारे नवद्वानों ने माना है। ाआसी समय पर
काइ पररवेशों का ननमािण होना तय था। जैसे नक राजनीनतक, सामानजक, ाअनथिक, धानमिक-
साांस्कृनतक और सानहनययक पररवेशों के माध्यम से ाअधुननक काल के नवकास को दशािया
है। ाआस नवकास िम में ाऄांग्रेजों की सत्ता का भारतीय लोगों को सामना करना पड़ा । ाऄपने
ाऄनधकारों के नलए लड़ना पड़ा । ाऄताः हम कह सकते हैं नक सानहयय केवल रृदय की
ाऄनुभूनत की ाऄनभव्यनि मात्र नहीं है। बनपक नविारों और नसद्धाांतो की ाऄनभव्यनि की भी
ाअवश्यकता सानहयय के ाऄांतगित हुाइ है और ाआसी नविारों की सिल व्यांजना गद्द मे
नवकनसत होती गाइ । यह कहीं ना कही ाअधुननक काल के नवकास के नलए ाऄननवायि था ।
ाआसमे सुधारक, नविारक और नवद्वानों तथा सांगिनों के माध्यम से ाअधुननक काल के
नवकास को दशािया है ।
१.५ वैकनपपक प्रश्न १. "ाऄांग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी ।
पै धन नवदेश िनल जात यहै ाऄनतख्यारी ।।" ाऄांग्रेजी शासन के नवषय में ाईि पांनियााँ
नकस नवद्वान ने कही है ?
ाईत्तर - 'भारतेंदु हररश्चन्द्र'
२ . ाअधुननक काल में िजभाषा की बदले में नकस भाषा का ननमािण हुाअ?
ाईत्तर - खड़ी बोली
३. रामिांद्र शुक्ल ने ाअधुननक काल को क्या नाम नदया?
ाईत्तर - गद्द काल
४. सांपूणि देश में ाऄांग्रेजों को ाऄपनी सत्ता स्थानपत करने के नलए नकन दो शनियों को
पराभूत करना बाकी था?
ाईत्तर - मरािा और नसख
५. भारतीय राष्रीय काांग्रेस की स्थापना कब हुाइ?
ाईत्तर - सन १८८५
१.७ बोध प्रश्न १. ाअधुननक काल को स्पि करते हुए ाईसके पररवेश पर नवस्तार से प्रकाश डानलए? munotes.in

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ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास
12 १.८ सांदर्ि ग्रांथ  नहांदी सानहयय का ाआनतहास - डॉ. नगेंद्र
 नहांदी सानहयय का ाआनतहास - ाअिायि रामिांद्र शुक्ल
 नहांदी सानहयय ाईद्भव और नवकास - हजारीप्रसाद नद्ववेदी
 नहांदी सानहयय का ाअलोिनायमक ाआनतहास- डॉ. रामकुमार वमाि
 नहांदी सानहयय की प्रवृनत्तयााँ - डॉ. जयनकशनप्रसाद खण्डेलवाल
 ाअधुननक नहांदी सानहयय का ाआनतहास - बच्िन नसांह

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13 २
भारतेÆदु युग
इकाई कì łपरेखा
२.० इकाई का उĥेÔय
२.१ ÿÖतावना
२.२ भारतेÆदु युग
२.३ भारतेÆदु युग के काÓय कì ÿवृि°याँ
२.४ भारतेÆदु युग के किव और उनकì रचनाएँ
२.५ भारतेÆदु युग का सािहिÂयक महÂव
२.६ सारांश
२.७ बोध ÿij
२.८ अितलघु°रीय ÿij / वÖतुिनķ ÿij
२.९ संदभª úंथ
२.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई के अंतगªत हम भारतेÆदु युग का िवÖतार से अÅययन कर¤गे। यह इस ÿकार से
होगा:
 भारतेÆदु युग कì ÿवृि°यŌ को जान¤गे।
 भारतेÆदु युग के किव और उनकì रचनाओं का अÅययन कर¤गे।
 िहÆदी सािहÂय म¤ भारतेÆदु काल का महÂव जान सक¤गे।
२.१ ÿÖतावना िकसी भी सािहÂय का िवभाजन अÂयंत किठन है । आधुिनक िहÆदी सािहÂय भी दीघªकालीन
सािहÂय धारा है । िहÆदी सािहÂय के इितहास म¤ आधुिनक काल का सूýपात (आरÌभ) कब
से माना जाये, यह िवĬानŌ म¤ पयाªĮ मतभेद का िवषय है । आचायª रामचंþ शु³ल, आधुिनक
काल का आरंभ सÌवत १९०० से मानते ह§ । आचायª हजारीÿसाद िĬवेदी १९ वé शताÊदी
के आरंभ से इसे Öवीकार करते ह§ । िहÆदी सािहÂय मे आधुिनक जीवन चेतना के ÿवतªन का
®ेय भारतेÆदु बाबू हåरशचंþ को िदया जाता ह§, अतः कुछ इितहासकार उनकì जÆम ितिथ
अथाªत सन १८५० से आधुिनक िहÆदी सािहÂय का आरंभ मानते है । सािहÂय के ±ेý म¤
नई िवचारधारा का आरंभ भारतेÆदु के रचनाकार अथाªत सन १८६८ से होने के कारण कुछ
िवĬान इसे ही आधुिनक काल का आरंभ वषª मानने का ÿÖताव करते है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
14 २.२ भारतेÆदु युग (१८५०-१९००) आधुिनक िहंदी काÓय के ÿथम चरण को 'भारतेÆदु युग' कì सं²ा ÿदान कì गई है । भारतेÆदु
हåरĵंþ को िहÆदी सािहÂय के आधुिनक युग का ÿितिनिध माना जाता है । उÆहŌने 'किववचन
सुधा', 'हåरĵÆþ मैगजीन' और “हåरĵंþ पिýका'भी िनकाली । इसके साथ ही अनेक नाटकŌ
आिद कì रचना भी कì । भारतेÆदु युग म¤ िनबंध, नाटक, उपÆयास तथा कहािनयŌ कì रचना
हòई । भारत¤दु काल को “नवजागरण काल' भी कहा गया है । िहंदी सािहÂय के आधुिनक
काल के संøाित काल के दो प± ह§ । इस समय के दरÌयान एक और ÿाचीन पåरपाटी म¤
काÓय रचना होती रही और दूसरी ओर सामािजक राजनीितक ±ेýŌ म¤ जो सिøयता बढ़ रही
थी और पåरिÖथितयŌ के बदलाव के कारण िजन नये िवचारŌ का ÿसार हो रहा था, उनका
भी धीरे-धीरे सािहÂय पर ÿभाव पड़ने लगा था । ÿारंभ के २५ वषŎ (१८४३ से १८६९)
तक सािहÂय पर यह ÿभाव बहòत कम पड़ा, िकÆतु सन १८६८ के बाद नवजागरण के ल±ण
अिधक ÖपĶ łप से िदखाई देने लगे थे । िवचारŌ म¤ इस पåरवतªन का ®ेय भारतेÆदु हåरIJÆþ
को है । इसिलए इस युग को 'भारतेÆदु युग' भी कहते ह§ । भारतेÆदु के पहले āजभाषा म¤ भिĉ
और ®ृंगार परक रचनाएँ होती थé और ल±ण úंथ भी िलखे जाते थे । भारतेÆदु के समय से
काÓय के िवषय चयन म¤ Óयापकता और िविवधता आयी । ®ृंगाåरकता, रीितबĦता म¤ कमी
आई । राÕů-ÿेम, भाषा-ÿेम और Öवदेशी वÖतुओं के ÿित ÿेम किवयŌ के मन म¤ भी पैदा होने
लगा । उनका Åयान सामािजक समÖयाओं और उनके समाधान कì ओर भी गया । इस
ÿकार उÆहŌने सामािजक राजनीितक ±ेýŌ म¤ गितशील नवजागरण को अपनी रचनाओं के
Ĭारा ÿोÂसािहत िकया । भारतेÆदु युग के किवयŌ कì सबसे बड़ी सािहिÂयक देन केवल यही
मानी जा सकती है िक उÆहŌने किवता को रीितकालीन पåरवेश से मुĉ करके समसामियक
जीवन से जोड़ िदया । भारतेÆदु युग म¤ परंपरागत धािमªकता और भिĉ भावना को अपे±ातः
गौण Öथान ÿाĮ हòआ । भारतेÆदु ने काÓय ±ेý को आधुिनक िवषयŌ से सÌपÆन िकया और
रीित कì बँधी-बँधायी पåरपाटी से किवता-सुÆदरी को मुĉ करके ताजी हवा म¤ साँस लेने का
सुअवसर ÿदान िकया ।
२.३ भारतेÆदु युग के काÓय कì ÿवृि°याँ भारत¤दु युग ने िहंदी किवता को रीितकाल के ®ृंगारपूणª और राज-आ®य के वातावरण से
िनकाल कर राÕůÿेम, समाज-सुधार आिद कì ÖवÖथ भावनाओं से ओत-ÿेत कर उसे
सामाÆय जन से जोड़ िदया । इस युग कì काÓय ÿवृि°याँ िनÌनानुसार ह§:
१. देशÿेम कì Óयंजना:
अंúेजŌ के दमन चø के आतंक म¤ इस युग के किव पहले तो िवदेशी शासन का गुणगान
करते नजर आते ह§:
परम दुखमय ितिमर जबै भारत म¤ छायो,
तबिहं कृपा कåर ईश िāिटश सूरज ÿकटायो ॥
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भारतेÆदु युग
15 िकंतु शीŅ ही यह ÿवृि° जाती रही । मननशील किव समाज राÕů कì वाÖतिवक पुकार को
शीŅ ही समझ गया और उसने Öवदेश ÿेम के गीत गाने ÿारÌभ कर िदए:
बहòत िदन बीते राम, ÿभु खोयो अपनो देस ।
खोवत है अब बैठ के, भाषा भोजन भेष ॥
- (बालमुकुÆद गुĮ)
िवदेशी वÖतुओं के बिहÕकार, ईĵर से Öवतंýता कì ÿाथªना आिद łपŌ म¤ भी यह भावना
Óयĉ हòई । इस युग कì राÕůीयता सांÖकृितक राÕůीयता है, िजसम¤ िहंदू राÕůीयता का Öवर
ÿधान है ।
देश-ÿेम कì भावना के कारण इन किवयŌ ने एक ओर तो अपने देश कì अवनित का वणªन
करके आंसू बहाए तो दूसरी ओर अंúेज सरकार कì आलोचना करके देशवािसयŌ के मन म¤
Öवराºय कì भावना जगाई । अंúेजŌ कì कूटनीित का पदाª फाश करते हòए भारत¤दु हåरĵंþ ने
िलखा:
सýु सýु लड़वाइ दूर रिह लिखय तमाशा ।
ÿबल देिखए जािह तािह िमिल दीजै आसा ॥
इसी ÿकार जब काबुल पर अंúेजŌ कì िवजय होने पर भारत म¤ िदवाली मनाई गई तो
भारत¤दु ने उसका िवरोध करते हòए िलखा:
आÍयª गनन को िमलयौ, जो अित ÿफुिलत गात ।
सबै कहत जै आजु क्यŌ, यह निहं जाÆयौ जात ॥
सुजस िमलै अंúेज को, होय łस कì रोक ।
बढ़े िāिटश वािणºय पै, हमको केवल सोक ॥
२. सामािजक चेतना और जन-काÓय:
समाज-सुधार इस युग कì किवता का ÿमुख Öवर रहा । इÆहŌने िकसी राजा या आ®यदाता
को संतुĶ करने के िलए काÓय-रचना नहé कì, बिÐक अपने Ńदय कì ÿेरणा से एकता तक
अपनी भावना पहòंचाने के िलए काÓय रचना कì । ये किव पराधीन भारत को जगाना चाहते
थे, इसिलए समाज-सुधार के िविभÆन मुĥŌ जैसे ľी-िश±ा, िवधवा-िववाह, िवदेश-याýा का
ÿचार, समाज का आिथªक उÂथान और समाज म¤ एक दूसरे कì सहायता आिद को मुखåरत
िकया; यथा:
िनज धमª भली िविध जान¤, िनज गौरव को पिहचान¤ ।
ľी-गण को िवīा देव¤, कåर पितāता य² लेव¤ ॥
- (ÿताप नारायण िम®)
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
16 ३. भिĉ-भावना:
इस युग के किवयŌ म¤ भी भिĉ-भावना िदखाई पड़ती है, लेिकन इनकì भिĉ-भावना का
लàय अवÔय बदल गया । अब वे मुिĉ के िलए नहé, अिपतु देश-कÐयाण के िलए भिĉ
करते िदखाई देते ह§:
कहाँ कŁणािनिध केशव सोए ।
जगत नािहं अनेक जतन कåर भारतवासी रोए ।
- (भारत¤दु हåरIJंþ)
४. िहंदू-संÖकृित से Èयार:
िपछले युगŌ कì ÿितिøया Öवłप इस युग के किव-मानस म¤ अपनी संÖकृित के अनुराग का
भाव जाग उठा । यथा:
सदा रख¤ ŀढ़ िहय मूँह िनज साँचा िहÆदूपन ।
घोर िवपत हóँ परे िदगे निहं आन और मन ॥
- (बालमुकुÆद गुĮ)
५. ÿाचीनता और नवीनता का समÆवय:
इन किवयŌ ने एक ओर तो िहंदी-काÓय कì पुरानी परÌपरा के सुंदर łप को अपनाया, तो
दूसरी ओर नयी परÌपरा कì Öथापना कì । इन किवयŌ के िलए ÿाचीनता वंदनीय थी तो
नवीनता अिभनंदनीय । अतः ये ÿाचीनता और नवीनता का समÆवय अपनी रचनाओं म¤
करते रहे । भारत¤दु अपनी ÿबोिधनी शीषªक किवता म¤ Öÿभातीर के łप म¤ ÿाचीन पåरपाटी
के अनुसार कृÕण को जगाते ह§ और नवीनता का अिभनंदन करते हòए उसम¤ राÕůीयता का
समÆवय करके कहते ह§ :
डूबत भारत नाथ बेिग जागो अब जागो.
६. िनज भाषा ÿेम:
इस काल के किवयŌ ने अंúेजŌ के ÿित िवþोह के łप म¤ िहंदी-ÿचार को िवशेष महßव िदया
और कहा:
क) िनज-भाषा उÆनित अहै, सब उÆनित को मूल ।
- (भारत¤दु)
ख) जपो िनरंतर एक जबान, िहंदी, िहंदू, िहंदुÖतान ।
- (ÿताप नारायण िम®)
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भारतेÆदु युग
17 यīिप इस काल का अिधकतर सािहÂय āजभाषा म¤ ही है, िकंतु इन किवयŌ ने āजभाषा को
भी सरल और सुÓयविÖथत बनाने का ÿयास िकया । खड़ी बोली म¤ भी कुछ रचनाएँ कì गई,
िकंतु वे कथाÂमकता और Ł±ता से युĉ ह§ ।
७. ®ृंगार और सŏदयª वणªन:
इस युग के किवयŌ ने सŏदयª और ÿेम का वणªन भी िकया है, िकंतु उसम¤ कहé भी कामुकता
और वासना का रंग िदखाई नहé पड़ता । इनके ÿेम-वणªन म¤ सवªý Öव¸छता एवं गंभीरता है ।
भारत¤दु हåरĵंþ के काÓय से एक उदाहरण ŀĶÓय हैः
हम कौन उपाय करै इनको हåरचÆद महा हठ ठानती ह§ ।
िपय Èयारे ितहारे िनहारे िबना अँिकयाँ दुिखयाँ निहं मानती ह§ ॥
८. हाÖय-Óयंµय:
भारत¤दु हåरĵंþ एवं उनके सहयोगी किवयŌ ने हाÖय-Óयंµय कì ÿवृि° भी िमलती है । उÆहŌने
अपने समय कì िविभÆन बुराइयŌ पर Óयंµय-बाण छोड़े ह§ । भारत¤दु कì किवता से दो
उदाहरण ÿÖतुत ह§:
क) भीतर भीतर सब रस चूसे
हंिस-हंिस कै तन-मन-धन मूसे
जािहर बातन म¤ अित तेज,
³यŌ सिख सºजन निहं अंगरेज ॥
ख) इनकì उनकì िखदमत करो,
Łपया देते-देते मरो ।
तब आव¤ मोिहं करन खराब,
³यŌ सिख सºजन नहé िखताब ॥
९. ÿकृित-िचýण:
इस युग के किवयŌ ने पूवªवतê युगŌ कì अपे±ा ÿकृित के Öवतंý ŁपŌ का िवशेष िचýण िकया
है । भारत¤दु के “गंगा-वणªन” और “यमुना-वणªन” इसके िनदशªन ह§ । ठाकुर जगमोहन िसंह के
Öवतंý ÿकृित के वणªन भी उÂकृĶ बन पड़े ह§ । ÿकृित के उĥीपन łपŌ का वणªन भी इस
काल कì ÿवृि° के łप जीिवत रहा ।
१०. रस:
इस काल म¤ ®ृंगार, वीर और कŁण रसŌ कì अिभÓयिĉ कì ÿवृि° ÿबल रही, िकंतु इस
काल का ®ृंगार रीितकाल के ®ृंगार जैसा नµन ®ृंगार न होकर पåरÕकृत Łिच का ®ृंगार है
देश कì दयनीय दशा के िचýण म¤ कŁण रस ÿधान रहा है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
18 ११. भाषा और काÓय-łप:
इन किवयŌ ने किवता म¤ ÿायः सरल āजभाषा तथा मुĉक शैली का ही ÿयोग अिधक िकया
ये किव पī तक ही सीिमत नहé रहे बिÐक गīकार भी बने । इÆहŌने अपनी कलम िनबंध,
उपÆयास और नाटक के ±ेý म¤ भी चलाई । इस काल के किव मंडल म¤ किव न केवल किव
था बिÐक वह संपादक और पýकार भी था ।
इस ÿकार भारत¤दु-युग सािहÂय के नव जागरण का युग था, िजसम¤ शतािÊदयŌ से सोये हòए
भारत ने अपनी आँख¤ खोलकर अंगड़ाई ली और किवता को राजमहलŌ से िनकालकर
जनता से उसका नाता जोड़ा । उसे कृिýमता से मुĉ कर Öवाभािवक बनाया, ®ृंगार को
पåरमािजªत łप ÿदान िकया और किवता के पथ को ÿशÖत िकया ।भारत¤दु और उनके
सहयोगी लेखकŌ के सािहÂय म¤ िजन नये िवषयŌ का समावेश हòआ, उसने आधुिनक काल
कì ÿवृि°यŌ को जÆम िदया । इस ÿकार भारत¤दु युग आधुिनक युग का ÿवेशĬार िसĦ होता
है ।
२.४ भारतेÆदु युग के किव और उनकì रचनाएँ भारत¤दु युग (सन १८६८ से १९०२) आधुिनक किवता का ÿवेश Ĭार है । भारत¤दु हåरIJंþ
ने किवता को रीितकालीन दरबारी तथा ®ृंगार-ÿधान वातावरण से िनकाल कर उसका
जनता से नाता जोड़ा । इस युग के किवमंडल पर भारत¤दु जी के महान ÓयिĉÂव कì गहरी
एवं ÖपĶ छाप है । इस समय का काÓय चø भारत¤दु के ÓयिĉÂव łपी धुरी पर ही घुम रहा
है। उÆहŌने किवयŌ को दान व मान, दोनŌ तरह से ÿोÂसाहन िदया । उÆहŌने बहòत से किव-
समाज Öथािपत िकए,िजनम¤ उपिÖथत कì हòई समÖयाओं कì पूितª म¤ बड़ी उÂकृĶ किवता
कì सृिĶ हòई । भारत¤दु युग कì किवता म¤ ÿाचीन और आधुिनक काÓय-ÿवृि°यŌ का समÆवय
िमलता है उसम¤ भिĉ-कालीन भिĉ भावना और रीितकालीन ®ृंगार-भावना के साथ-साथ
राजनीितक चेतना, सामािजक ÓयवÖथा, धािमªक एवं आिथªक शिĉयाँ, काÓय कì िवषय
सामúी को ÿभािवत करने लगी। राजभिĉ, देश-ÿेम, सामािजक ÓयवÖथा के ÿित दुख
ÿकाश, सामािजक कुरीितयŌ का खंडन, आिथªक अवनित के ÿित ±ोभ, धन का िवदेश कì
ओर ÿवाह, िवधवा िववाह, िवधवा-अवनित, बालिववाह, Łिढ़यŌ का खंडन एवं सामािजक
आÆदोलनŌ एवं ľी-ÖवातंÞय कì िहमायत आिद आधुिनक काÓय-ÿवृि°यŌ के दशªन हòए ।
हाÖय और Óयंµय तथा ÿकृित िचýण म¤ भी इस युग कì किवता म¤ िवकास िदखाई पड़ता है ।
इस युग कì किवता म¤ देश और जनता कì भावनाओं और समÖयाओं को पहली बार
अिभÓयिĉ िमली । किवयŌ ने सांÖकृितक गौरव का िचý ÿÖतुत कर लोगŌ म¤ आÂम-सÌमान
कì भावना भरने का ÿयÂन िकया ।बहòत से संÖकृत महाकाÓयŌ का अनुवाद हòआ इस युग म¤
काÓय कì भाषा āजभाषा ही रही यīिप खड़ी बोली म¤ भी छुट-पुट ÿयÂन हòए, पर वे नगÁय
ही थे ।
युग के मु´य किव थे- भारत¤दु हåरĵंþ, बदरीनारायण चौधरी 'ÿेमघन', ÿतापनारायण िम®,
बालमुकुंद गुĮ, ठाकुर जगमोहन िसंह, अिÌबकाद° Óयास, नवनीत लाल चतुव¥दी, बाबू
राधाकृÕणदास, लाला सीताराम बी.ए., िम®बंधु, इस जगÆननाथदास 'रÂनाकर', राय munotes.in

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भारतेÆदु युग
19 देवीÿसाद पूणª, िवयोगी हåर, सÂयनारायण 'किवरÂन', ®ीिनवास दास, राधाचरण गोÖवामी,
बालकृÕण भĘ आिद ।
१. भारत¤दु हåरĵंþ कì रचनाएँ (१८५० १८५५ ई.):
भारत¤दु के काÓय úंथŌ कì सं´या ७० है । काशी-नागरी-ÿचाåरणी सभा ने इनका संकलन
भारत¤दु úंथावली (दो खंडŌ म¤) म¤ िकया है इसम¤ से कुछ ÿमुख रचनाओं के नाम इस ÿकार
ह§ : भĉ सवªÖव, ÿेम-सरोवर, ÿेम-माधुरी, ÿेम-तरंग, सतसई-®ृंगार, होली, वषाª-िवनोद,
िवजय-वÐलरी, मधुमुकुल, उ°राधª, भĉमाल, ÿेम- फुलवारी, दानलीला ।
नाटक:
१. रÂनावली (१८६८), संÖकृत से अनुवाद,
२. िवīा सुÆदर (१८६८), बंगला से छायानुवाद,
३. पाखंड िवडÌबन (१८७२) कृÕण िम® रिचत ÿबोध चÆþोदय के तृतीय अंक का
अनुवाद,
४. धनंजय िवजय (१८७३), कांचन किव के संÖकृत नाटक का अनुवाद ।,
५. वैिदकì िहंसा िहंसा न भवित (१८७३),
६. ÿेमयोिगनी (१८७५ ),
७. सÂयहåरĵÆþ (१८७५),
८. कपूªर मंजरी (१८७५), ÿाकृत म¤ राजशेखर रिचत सĘक का अनुवाद
९. िवषÖय िवषमौषधम? (१८७६),
१०. चÆþावली (१८७६),
११. मुþा रा±स (१८७८), संÖकृत के िव´यात नाटककार िवशाखद° के मुþारा±स का
अनुवाद,
१२. दुलªभ बÆधु (१८८०) शे³सिपयरके नाटक ĺमच¥Áट आफ वेिनसĹ का अनुवाद ।,
१३. भारत दुदªशा (१८८०),
१४. अंधेर नगरी (१८८४),
१५. नील देवी (१८८१), गीित łपक,
१६. भारत जननी (१८७७),
बंगला नाटक ĻभारतमाताĹ का भारतेÆदु जी के िमý ने अनुवाद िकया था िजसे उÆहŌने
संशोिधत िकया । चूंिक संशोिधत नाटक का सÌपूणª łप ही बदल गया था, इसिलए उसने munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
20 अपना नाम इसके मु´य पृķ पर देना उिचत नहé समझा । कुछ िवĬान इसे भारतेÆदु जी कì
मौिलक रचना मानते ह§ ।
१७. सती ÿताप (१८८४) ।
२. बþी नारायण चौधरी 'ÿेमघन' कì मु´य काÓय रचनाएँ (१८८५-१९२२ ई.):
जीणª जनपद, शुभ सिÌमलन काÓय, वषाª िबंदुगान, संगीत सुधाकर, हािदªक हषाªदशªकाÓय ।
(१) भारत सौभाµय
(२) ÿयाग रामागमन, संगीत सुधासरोवर, भारत भाµयोदय काÓय ।
गī पī के अलावा आपने लोकगीताÂमक कजली, होली, चैता आिद कì रचना भी कì है
जो ठेठ भावÿवण मीरजापुरी भाषा के अ¸छे नमूने ह§ और संभवतः आज तक बेजोड़ भी ।
कजली कादंिबनी म¤ कजिलयŌ का संúह है ।
३. अिÌबका द° Óयास कì मु´य काÓय रचनाएँ (१९५८-१९०० ई.):
पावन पचासा, िबहारीिबहार, चांद कì रात ।
४. जगÆनाथदास रÂनाकर कì मु´य रचनाएँ:
हåरIJंþ, गंगालहरी, कलकाशी, उĦवशतक, गंगावतरण ।
५. ÿतापनारायण िम® (िसतंबर, १८५६ - जुलाई, १८९४):
नाटक:
भारत दुदªशा, गोसंकट, किलकौतुक, किलÿभाव, हठी हÌमीर, जुआरी खुआरी । सांगीत
शाकुंतल ( अनुवाद) । मौिलक गī कृितयाँ : चåरताĶक, पंचामृत, सुचाल िश±ा, बोधोदय,
शैव सवªÖव ।
अनूिदत गī कृितयाँ:
नीितरतावली, कथामाला, सेनवंश का इितहास, सूबे बंगाल का भूगोल, वणªपåरचय,
िशशुिव²ान, राजिसंह, इंिदरा, राधारानी, युगलांगुलीय ।
किवता:
ÿेमपुÕपावली, मन कì लहर, āैडला Öवागत, दंगल खंड, कानपुर महाÂÌय ®ृंगारिवलास,
लोकोिĉशतक , दीवो बरहमन (उदूª) ।
६. पंिडत बालकृÕण भĘ (३ जून १८४४ - २० जुलाई १९१४):
'सौ अजान एक सुजान', 'रेल का िवकट खेल', “नूतन āĺचारी', 'बाल िववाह' तथा “भाµय
कì परख' । मौिलक नाटक दमयंती, Öवयंवर, बाल-िववाह, चंþसेन, रेल का िवकट खेल,
आिद । munotes.in

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भारतेÆदु युग
21 ७. राधाचरण गोÖवामी (२५ फरवरी १८५९ - १२ िदसÌबर १९२५):
बाल िवधवा (१८८३-८४ ई. ), सवªनाश (१८८३-८४ ई.), अलकचÆद (अपूणª १८८४-
८५ ई.) िवधवा िवपि° (१८८८ ई.) जािवý (१८८८ ई.) आिद । वे िहÆदी म¤ ÿथम
समÖयामूलक उपÆयासकार थे, ÿेमचÆद नहé । वीरबाला उनका ऐितहािसक उपÆयास है ।
इसकì रचना १८८३-८४ ई. म¤ उÆहŌने कì थी । िहÆदी म¤ ऐितहािसक उपÆयास का आरÌभ
उÆहŌने ही िकया । ऐितहािसक उपÆयास दीप िनवाªण (१८७८-८० ई.) और सामािजक
उपÆयास िवरजा (१८७८ ई.) उनके Ĭारा अनूिदत उपÆयास है । लघु उपÆयासŌ को वे
नवÆयास कहते थे । कÐपलता (१८८४-८५ ई.) और सौदािमनी (१८९०-९४ ई.) उनके
मौिलक सामािजक नवÆयास ह§ ।
८. ठाकुर जगमोहन िसंह (१८५७-१९९९ ई.):
(१) ÿेम-संपि°-लता (सं. १९४२ िव.),
(२) Ôयामालता, और
(३) Ôयामासरोिजनी (सं. १९४३), देवयानी, ऋतुसंहार ।
इसके अितåरĉ इÆहŌने कािलदास के मेघदूत का बड़ा ही लिलत अनुवाद भी āजभाषा के
किब° सवैयŌ म¤ िकया है । िहंदी िनबंधŌ के ÿथम उÂथान काल के िनबंधकारŌ म¤ उनका
महÂवपूणª Öथान है ।
९. बालमुकुंद गुĮ (१८६५ १९०७ ई.):
हåरदास, िखलौना, खेलतमाशा, Öफुट किवता, िशवशंभु का िचęा, बालमुकुंद गुĮ
िनबंधावली ।
१०. बþीनारायण चौधरी “ÿेमघन' (भाþ कृÕण षķी, संवत १९९२ - फाÐगुन शु³ल
१४, संवत १९७८):
(१) भारत सौभाµय
(२) ÿयाग रामागमन, संगीत सुधासरोवर, भारत भाµयोदय काÓय, िजणª जनपद, आनंद
अŁणोदय, हािदªक हषªदशª, मयंक मिहमा, अलौिकक लीला, बदरी, वषाª-िबंदु, लािलÂय
लहरी, बृजचंद पंचकý ।
गī पī के अलावा आपने लोकगीताÂमक कजली, होली, चैता आिद कì रचना भी कì है
जो ठेठ भावÿवण मीरजापुरी भाषा के अ¸छे नमूने ह§ और संभवतः आज तक बेजोड़ भी ।
कजली कादंिबनी म¤ कजिलयŌ का संúह है ।
११. अिÌबका द° Óयास (१८४८ ई. - १९०० ई.):
पावस पचासा, सुकिव सतसई, हो हो होरी, िबहारी िबहार (१८९८ ई.), लिलता (नािटका)
१८८४ ई. गोसंकट (१८८७ ई.), आIJयª वृताÆत १८९३ ई. गī काÓय मीमांसा १८९७
ई., munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
22 १२. राधा कृÕण दास (१८६५- २ अÿैल १९०७):
दुःिखनी बाला' (łपक), 'िनÖसहाय िहंदू' (सामािजक उपÆयास), 'आयªचåरतामृत' (बाÈपा
रावल कì जीवनी),'महारानी पĪावती' (łपक ), 'दुःिखनी बाला', 'पĪावती' तथा 'महाराणा
ÿताप’ (नाटक ), कंस वध, भारत बारहमासा, देश दशा ।
२.५ भारतेÆदु युग के सािहिÂयक महÂव आधुिनक िहंदी काÓय के ÿथम चरण को भारतेÆदु युग कì सं²ा ÿदान कì गई है । यह
नामकरण सुकिव भारतेÆदु बाबू हåरĵÆþ के मिहमा मिÁडत ÓयिĉÂव को Åयान म¤ रखकर
िकया गया । भारतेÆदु युग के पूवª किवता म¤ रीितकालीन ÿवृि°याँ िवīमान थé । अितशय
®ंगाåरकता, अलंकार मोह, रीित िनŁपण एवं चमÂकारिÿयता के कारण किवता जन-जीवन
से कट गई थी । देशी åरयासतŌ के संर±ण म¤ रहने वाले किवगण रीतीकाल के Óयामोह से न
तो उबरना चाहते थे और न ही उबरने का ÿयास कर रहे थे । ऐसी पåरिÖथितयŌ म¤ भारतेÆदु
जी का काÓय-द्षेý म¤ पदापªण वÖतुतः आधुिनक िहÆदी काÓय के िलये वरदान िसÅद हòआ ।
उÆहŌने काÓय ±ेý को आधुिनक िवषयŌ से संपÆन िकया और रीित कì बँधी-बँधायी पåरपाटी
से किवता-सुÆदरी को मुĉ करके ताजी हवा म¤ साँस लेने का सुअवसर ÿदान िकया ।
भारतेÆदु युग म¤ परंपरागत धािमªकता और भिĉ भावना को अपे±तया गौण Öथान ÿाĮ हòआ,
िफर भी इस काल के भिĉ काÓय को तीन वगŎ म¤ िवभािजत िकया जा सकता ह§ - िनगुªण
भिĉ, वैÕणव भिĉ और Öवदेशानुराग-समिÆवत ईĵर-भिĉ । इस युग म¤ हाÖय-ÓयंµयाÂमक
किवताओं कì भी ÿचुर पåरणाम म¤ रचना हòई ।
काÓय-łप कì ŀिĶ से भारतेÆदुयुगीन किवयŌ ने ÿधानतः मुĉक काÓय कì रचना कì है ।
खडी बोली कì किवताओं म¤ Óयावहाåरकता पर बल होने के फलÖवŁप āजभाषा के किव
अÆय भाषाओं से शÊद चयन के िवषय म¤ øमशः अिधक उदार होते गए, अतः भोजपुरी,
बुंदेलखंडी, अवधी आिद ÿांतीय भाषाओं के अितåरĉ उदूª और अंúेजी कì ÿचिलत
शÊदावली को भी अपना िलया गया । दोहा, चौपाई, सोरठा, कुंडिलया, रोला, हåरगीितका
आिद मािýक छंद और किव°, सवैया, मंदाøांता, िशखåरणी, वंशÖथ, वसंतितलका आिद
विणªक छंद किव-समुदाय म¤ िवशेष ÿचिलत रहे ।
भारतेÆदु युग के किवयŌ कì सबसे बडी सािहिÂयक देन केवल यही मानी जा सकती है िक
इÆहŌने किवता को रीितकालीन पåरवेश से मुĉ करके समसामियक जीवन से जोड िदया ।
भारतेÆदु आधुिनक काल के जनक थे और भारतेÆदु युग के अÆय किव उनके ÿभामंडल म¤
िवचरण करने वाले ऐसे न±ý थे िजÆहŌने अपनी खुली आँखŌ से जन-जीवन को देखकर उसे
अपनी किवता का िवषय बनाया । इस काल म¤ किवता और जीवन के िनकट का संबंध
Öथािपत हòआ और यही इस किवता का महÂव है ।

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भारतेÆदु युग
23 २.६ सारांश इस इकाई के अÅययन से हमने जाना िक भारतेÆदु युग सािहÂयकारŌ कì ÿितभा और
उनकì रचनाओं से ÿभािवत रहा। छंद, भाषा और अिभÓयंजना म¤ ÿाचीनता को अपनाते हòए
भाषा गत ŀिĶ से āज भाषा का ÿयोग हòआ। इस समय खड़ी बोली का ÿयोग भी चरम सीमा
पर था इस कारण सािहÂय खड़ी बोली से भी ओत-ÿोत रहा। देश भिĉ, राÕůीय भावना
और सामािजक मुĥŌ को लेकर भारतेÆदु युग फला-फूला। इस इकाई म¤ हमने भारतेÆदु युग
कì ÿवृि°याँ, किव, रचनाएँ और महÂव आिद मुĥŌ का अÅययन िकया है?
२.७ बोध ÿij १. भारतेÆदु युग कì ÿवृि°यŌ को सउदाहरण समझाइए।
२. भारतेÆदु युग के ÿमुख किव व उनकì रचनाओं का वणªन कìिजए।
३. भारतेÆदु युग का महÂव उदाहरण सिहत रेखांिकत कìिजए।
२.८ अितलघु°रीय ÿij / वÖतुिनķ ÿij १. भारतेÆदु युग कब से कब तक माना जाता है?
उ°र: १८५०-१९००
२. भारतेÆदु जी ने िहÆदी कì कौनसी पिýकाओं का संपादन िकया?
उ°र: ‘किव वचन सुधा’ और हåरIJंþ मैगजीन
३. भारतेÆदु काल को और िकस नाम से अभीिहत िकया गया है?
उ°र: ‘नवजागरण काल’
४. बहòत िदन बीते राम, ÿभु खोयो अपनो देस ।
खोवत है अब बैठ के, भाषा भोजन भेष ॥ उĉ किवता िकस किव कì है?
उ°र: बालमुकुÆद गुĮ
५. ‘िनज भाषा उÆनित अहै, सब उÆनित को मूल ।’ भाषा के संबंध म¤ यह पिĉयाँ िकस
किव ने कही है?
उ°र: ‘भारतेÆदु हरीशचंþ’
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
24 २.९ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह



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25 ३
िĬवेदी युग
इकाई कì łपरेखा
३.० इकाई का उĥेÔय
३.१ ÿÖतावना
३.२ िĬवेदी युग
३.३ िĬवेदी युग के किव और उनकì रचनाएँ
३.४ िĬवेदी युग कì ÿवृि°याँ
३.५ सारांश
३.६ दीघō°री ÿij
३.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij
३.८ संदभª úंथ
३.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई का मूल उĥेÔय िĬवेदी युग, िĬवेदी युग कì मूल ÿवृि°यŌ व िĬवेदी काल के किव
व उनकì रचनाओं का िवÖतार से अÅययन करना है।
३.१ ÿÖतावना १९ वी सदी के उ°राधª म¤ नवचेतना के उदय से जीवन के ÿायः सभी ±ेýŌ म¤ Óयापक
पåरवतªन हòआ है। महावीर ÿसाद िĬवेदी ऐसे पहले सािहÂयकार थे िजÆहे आचायª कì पदवी
िमली। गंभीर सािहिÂयक िवषयŌ का िववेचन िĬवेदी युग म¤ हòआ। खड़ी बोली का िवकास और
नये-नये िवषय इस काल के सािहÂय म¤ संजोये हòए थे िजनसे सािहÂय सुखद और संपÆन
हòआ।
आधुिनक किवता के दूसरे पड़ाव को िĬवेदी-युग के नाम से जाना जाता है । यह आधुिनक
किवता के उÂथान व िवकास का काल है | िĬवेदी युग का समय सन १९०० से १९२०
तक माना जाता है । बीसवé शताÊदी के पहले दो दशक के पथ-ÿदशªक, िवचारक और
सािहÂय नेता आचायª महावीर ÿसाद िĬवेदी के नाम पर ही इस काल का नाम “िĬवेदी युग”
पड़ा । इसे "जागरण सुधारकाल” भी कहा जाता है । महावीर ÿसाद िĬवेदी िहÆदी के ऐसे
पहले लेखक थे, िजÆहŌने अपनी जातीय परंपरा का गहन अÅययन ही नहé िकया था, अिपतु
उसे आलोचकìय ŀिĶ से भी देखा । उÆहŌने वेदŌ से लेकर पंिडतराज जगÆनाथ तक के
संÖकृत सािहÂय कì िनरंतर ÿवाहमान धारा का अवगाहन िकया एवं उपयोिगता तथा
कलाÂमक योगदान के ÿित एक वै²ािनक नजåरया अपनाया । इस समय िāिटश दमन-चø
बहòत बढ़ गया था । जनता म¤ असंतोष और ±ोभ कì भावना ÿबल थी । िāिटश शासकŌ Ĭारा munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
26 लोगŌ का अिथªक- शोषण भी चरम पर था । देश के Öवाधीनता संúाम के नेताओं Ĭारा पूणª-
Öवराºय कì मांग कì जा रही थी । गोपालकृÕण गोखले और लोकमाÆय गंगाधर ितलक जैसे
नेता देश के Öवतंýता संúाम का नेतृÂव कर रहे थे । इस काल के सािहÂयकारŌ ने न िसफª
देश कì दुदªशा का िचýण िकया, बिÐक देशवािसयŌ को आजादी कì ÿािĮ कì ÿेरणा भी दी ।
राजनीितक चेतना के साथ-साथ इस काल म¤ भारत कì आिथªक चेतना भी िवकिसत हòई ।
किवता कì ŀिĶ से िĬवेदी युग 'इितवृ°ाÂमक युग' था । इस समय आदशªवाद का बोलबाला
रहा । भारत का उºवल अतीत, देश-भिĉ, सामािजक सुधार, Öवभाषा-ÿेम आिद किवता के
मु´य िवषय थे । नीितवादी िवचारधारा के कारण ®ृंगार का वणªन मयाªिदत हो गया । कथा-
काÓय का िवकास इस युग कì िवशेषता है । मैिथलीशरण गुĮ, अयोÅयािसंह उपाÅयाय
'हåरऔध', ®ीधर पाठक, रामनरेश िýपाठी आिद इस युग के यशÖवी किव थे ।
जगÆनाथदास 'रÂनाकर'ने इसी युग म¤ āजभाषा म¤ सरस रचनाएँ ÿÖतुत कé ।
३.२ िĬवेदी युग सन १९०३ म¤ महावीर ÿसाद िĬवेदी ने 'सरÖवती' पिýका के संपादन का भार संभाला ।
उÆहŌने खड़ी बोली गī के Öवłप को िÖथर िकया और पिýका के माÅयम से रचनाकारŌ के
एक बड़े समुदाय को खड़ी बोली म¤ िलखने को ÿेåरत िकया । जाित-िहत कì अपे±ा देशिहत
को महßव िदया । िहंदू होते हòए भी भारतीय कहलाने कì गौरवमयी भावना को जागृत िकया ।
अतीत के गौरव को Åयान म¤ रखते हòए भी वतªमान को न भूलने कì ÿेरणा दी । खड़ीबोली
को शुĦ Óयाकरण-सÌमत और ÓयविÖथत बना कर सािहÂय के िसंहासन पर बैठने योµय
बनाया । अब वह āजभाषा रानी कì युवरा²ी न रहकर Öवयं सािहिÂयक जगत कì साăा²ी
बन गई । यह कायª िĬवेदी जी के महान ÓयिĉÂव से ही सÌपÆन हòआ और इस काल का
किव-मंडल उनके ÓयिĉÂव से ÿभािवत होकर उनके बताए मागª पर चला । इसिलए इस युग
को िĬवेदी-युग का नाम िदया गया । इस काल म¤ िनबंध, उपÆयास, कहानी, नाटक एवं
समालोचना का अ¸छा िवकास हòआ । इस युग के िनबंधकारŌ म¤ महावीर ÿसाद िĬवेदी,
माधव ÿसाद िम®, Ôयामसुंदर दास, चंþधर शमाª गुलेरी, बालमुकंद गुĮ और अÅयापक
पूणªिसंह आिद उÐलेखनीय ह§ । इनके िनबंध गंभीर, लिलत एवं िवचाराÂमक ह§, िकशोरीलाल
गोÖवामी और बाबू गोपाल राम गहमरी के उपÆयासŌ म¤ मनोरंजन और घटनाओं कì
रोचकता है । िहÆदी कहानी का वाÖतिवक िवकास “िĬवेदी युग' से ही शुł हòआ । िकशोरी
लाल गोÖवामी कì 'इंदुमती' कहानी को कुछ िवĬान िहÆदी कì पहली कहानी मानते ह§ ।
अÆय कहािनयŌ म¤ बंग मिहला कì 'दुलाई वाली', रामचÆþ शु³ल कì “µयारह वषª का समय',
जयशंकर ÿसाद कì 'úाम' और चंþधर शमाª गुलेरी कì 'उसने कहा था' आिद महßवपूणª ह§ ।
समालोचना के ±ेý म¤ पĪिसंह शमाª उÐलेखनीय ह§ । अयोÅयािसंह उपाÅयाय 'हåरऔध',
िशवनंदन सहाय तथा राय देवीÿसाद पूणª Ĭारा भी कुछ नाटक िलखे गए ।
३.३ िĬवेदी युग के किव और उनकì रचनाएँ इस काल के ÿमुख किव ह§ – सवª ®ी मैिथलीशरण गुĮ, अयोÅया िसंह उपाÅयाय 'हåरऔध',
®ीधर पाठक, गया ÿसाद शु³ल 'सनेही, 'रामनरेश िýपाठी, नाथूराम शमाª 'शंकर',
सÂयनारायण 'किवरÂन', गोपालशरण िसंह, मुकुटधर पाÁडेय और िसयारामशरण गुĮ,
रामचåरत उपाÅयाय, जगÆनाथ दास रÂनाकर,लोचन ÿसाद पाÁडेय,łपनारायण पाÁडेय munotes.in

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िĬवेदी युग
27 आिद ।
इन किवयŌ कì ÿमुख काÓय - रचनाएँ इस ÿकार ह§:
१. मैिथलीशरण गुĮ (१८८६-१९६५ ई.):
१. रंग म¤ भंग
२. यशोधरा
३. साकेत
४. पंचवटी
५. Ĭापर
६. जयþथ वध
७. जयभारत
८. गुŁकुल
९. शकुंतला
१०. चंþहास
११. भारत-भारती ।
२. अयोÅया िसंह उपाÅयाय हåरऔī (१८६५-१९४१ ई.):
१. िÿयÿवास
२. वैदेही
३. बनवास
४. चौखे-चौपदे
५. चुभते-चौपदे
६. पåरजात
७. काÓयोपवन
८. ÿेम-ÿपंच
९. पīÿसून ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
28 ३. ®ीधर पाठक (१८५९- १९२८ ई.):
१. एकांतवासी योगी
२. उजड़ा úाम
३. ®ांत-पिथक ।
४. महावीर ÿसाद िĬवेदी (१८६४-१९३८ ई.):
१. काÓय-मंजूषा
२. किवता कलम
३. सुमन ।
५. रामचåरत उपाÅयाय (१८७२-१९४३ ई.):
१. राÕůभारती
२. देवदूत
३. भारतभिĉ
४. मेघदूत
५. सÂय हåरĵंþ
६. रामचåरत
७. िचंतामिण (ÿबंध-काÓय )
६. रामनरेश िýपाठी (१८८९-१९६२ ई.):
१. पिथक
२. ÖवÈन
३. िमलन
४. मानसी ।
७. िसयाराम शरण गुĮ (१८९५-१९६३ ई.):
१. मौयª-िवजय
२. नकुल
३. अनाथ
४. आÂमोÂसगª
५. बापू munotes.in

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िĬवेदी युग
29 ६. िवषाद
७. आþō
८. पाथेय
९. पाथेय
१०. मृÁमयी
११. दैिनकì |
८. लोचन ÿसाद पाÁडेय:
१. मेवाड़ ÿेम ।
इन किवयŌ म¤ से मैिथलीशरण गुĮ इस युग के ÿितिनिध किव ठहरते ह§ ।
३.४ िĬवेदी युग कì ÿवृि°याँ िपछली पोÖट म¤ हमने िĬवेदी युग कì ÿÖतावना को जाना । इस पोÖट म¤ हम िĬवेदी युग कì
ÿवृि°यŌ पर चचाª कर¤गे:
१. राÕůीय-भावना या राÕů-ÿेम:
इस समय भारत कì राजनीित म¤ एक महान पåरवतªन ŀिĶगोचर होता है । Öवतंýता ÿािĮ के
ÿयÂन तेज और बलवान हो गए । भारत¤दु युग म¤ जागृत राÕůीय चेतना िøयाÂमक łप धारण
करने लगी । उसका Óयापक ÿभाव सािहÂय पर भी पड़ा और किव समाज राÕů-ÿेम का
वैतािलक बनकर राÕů-ÿेम के गीत गाने लगा ।
जय जय Èयारा भारत देश
- ®ीधर पाठक
संदेश नहé म§ यहां Öवगª लाया
इस भूतल को ही Öवगª बनाने आया
- मैिथलीशरण गुĮ
लोक-ÿचिलत पौरािणक आ´यानŌ,इितहास वृ°Ō और देश कì राजनीितक घटनाओं म¤
इÆहŌने अपने काÓय कì िवषय वÖतु को सजाया । इन आ´यानŌ,वृ°Ō और घटनाओं के
चयन म¤ उपेि±तŌ के ÿित सहानुभूित, देशानुराग और स°ा के ÿित िवþोह का Öवर मुखर है।
२. Łिढ़-िवþोह:
पाIJाÂय िश±ा के ÿभाव एवं जन जागृित के कारण इस काल के किव म¤ बौिĦक जागरण
हòआ और वह सांÖकृितक भावनाओं के मूल िसĦांतŌ को ÿकािशत कर बाहरी आडÌबरŌ का
िवरोध करने लगा । ľी-िश±ा, बालिववाह, अनमेल िववाह, िवधवा-िववाह, दहेज-ÿथा, munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
30 अंधिवĵास आिद िवषयŌ पर िĬवेदी युग के किवयŌ ने रचनाएं िलखी ह§ । किवयŌ ने समाज
कì सवा«ग उÆनित को लàय बनाकर इन सभी िवषयŌ पर अपने िवचार Óयĉ िकए ह§ ।
है ईश, दयामय, इस देश को उबारो ।
कुिÂसत कुरीितयŌ के वश से इसे उबारो ॥
अनय राज िनदªय समाज से होकर जूझो ।
- (मैिथलीशरण गुĮ)
इस युग के किवयŌ कì धािमªक चेतना भी उदार और Óयापक हòई । धािमªक भावना केवल
ईĵर के गुण-गान तक सीिमत नहé रही, बिÐक उसम¤ मानवता के आदशŎ कì ÿितķा है ।
िवĵ-ÿेम तथा जनसेवा कì भावना इस युग कì धािमªक भावना का मु´य अंग है । गोपाल
शरण िसंह कì किवता से एक उदाहरण देिखए:
जग कì सेवा करना ही बस है सब सारŌ का सार |
िवĵÿेम के बंधन ही म¤ मुझको िमला मुिĉ का Ĭार ॥
३. मानवतावाद:
इस काल का किव संकìणªताओं से ऊपर उठ गया है । वह मानव-मानव म¤ Ăातृ-भाव कì
Öथापना करने के िलए किटबĦ है । अतः वह कहता है:
जैन बोĦ पारसी यहóदी,मुसलमान िस³ख ईसाई ।
कोिट कंठ से िमलकर कह दो हम ह§ भाई-भाई ॥
मानवता का मूÐयांकन इस युग के किवयŌ कì ÿखर बुिĦ ने ही िकया । उनकì ŀिĶ म¤:
म§ मानवता को सुरÂव कì जननी भी कह सकता हóं
नर को ईĵरता ÿाĮ कराने आया ।
४. ®ृंगार कì जगह आदशªवािदता:
इस युग कì किवता ÿाचीन सांÖकृितक आदशŎ से युĉ आदशªवादी किवता है । इस युग के
किव कì चेतना नैितक आदशō को िवशेष माÆयता दे रही थी,³यŌिक उÆहŌने वीरगाथा काल
तथा रीितकाल कì ®ृंगाåरकता के दुÕपåरणाम देखे थे । अतः वह इस ÿवृि° का उÆमूलन
कर देश को वीर-धीर बनाना चाहता है-
रित के पित! तू ÿेतŌ से बढ़कर है संदेह नहé,
िजसके िसर पर तू चढ़ता है उसको Łचता गेह नहé ।
मरघट उसको नंदन वन है, सुखद अंधेरी रात उसे
कुश कंटक ह§ फूल सेज से,उÂसव है बरसात उसे ॥
- (रामचåरत उपाÅयाय) munotes.in

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िĬवेदी युग
31 इस काल का किव सŏदयª के ÿित उतना आकृĶ नहé,िजतना िक वह िशव कì ओर आकृĶ
है ।
५. नारी का उÂथान:
इस काल के किवयŌ ने नारी के महßव को समझा,उस पर होने वाले अÂयाचारŌ का िवरोध
िकया और उसको जागृत करते हòए कहा-
आयª जगत म¤ पुन: जनिन िनज जीवन ºयोित जगाओ ।
- (®ीधर पाठक)
अब नारी भी लोक-िहत कì आराधना करने वाली बन गई । अतः िÿय-ÿवास कì राधा
कहती है:
Èयारे जीव¤ जग-िहत कर¤, गेह चाहे न आवै ।
- अयोÅया िसंह उपाÅयाय हåरऔī
जहां किवयŌ ने नारी के दयनीय łप देख¤,वहां उसके दुःख पर आंसू बहाते हòए कहा:
अबला जीवन हाय! तुÌहारी यही कहानी ।
आँचल म¤ है दूध और आंखŌ म¤ पानी ॥
- (यशोधरा म¤ मैिथलीशरण गुĮ)
६. ÿकृित-िचýण:
िĬवेदी युग के किव का Åयान ÿकृित के यथा-तÃय िचýण कì ओर गया । ÿकृित िचýण किव
के ÿकृित-ÿेम Öवłप िविवध łपŌ म¤ ÿकट हòआ । ®ीधर पाठक, रामनरेश िýपाठी, हåरऔī
तथा मैिथलीशरण गुĮ कì रचनाओं म¤ ÿकृित आलंबन, मानवीकरण तथा उĥीपन आिद
łपŌ म¤ िचिýत िकया गया है । ®ीधर पाठक ने काÔमीर कì सुषमा का रमणीय वणªन करते
हòए िलखा:
ÿकृित जहां एकांत बैिठ िनज łप संवारित ।
पल-पल पलटित भेष छिनक छिव िछन-िछन धारित ॥
आचायª शु³ल ÿकृित के िविभन्न अंगŌ के साथ मानवीय संबंध Öथािपत करते ह§ । रामनरेश
िýपाठी के 'पिथक', 'ÖवÈन' जैसे खंडकाÓयŌ म¤, हåरऔī के 'िÿयÿवास' म¤, मैिथलीशरण गुĮ
के 'साकेत', 'पंचवटी' आिद काÓयŌ म¤ ÿकृित के िविवध िचý ह§ । उपाÅयाय जी व गुĮ जी
आिद किवयŌ कì काÓय-भूिम ही ÿकृित का Öव¸छंद ÿांगण है:
सुंदर सर है लहर मनोरथ सी उठ िमट जाती ।
तट पर है कदÌब कì िवÖतृत छाया सुखद सुहाती ॥ munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
32 ७. इितवृ°ाÂमकता:
इितवृ°ाÂमकता का अथª है - वÖतु वणªन या आ´यान कì ÿधानता । आदशªवाद और
बौिĦकता कì ÿधानता के कारण िĬवेदी युग के किवयŌ ने वणªन-ÿधान इितवृ°ाÂमकता को
अपनाया इस युग के अिधकांश किव एक ओर तो ÿाचीन úंथŌ कì मिहमा, ÿेम कì मिहमा,
मेघ के गुण-दोष, कुनैन, म¸छर,खटमल आिद शीषªकŌ से वÖतु-वणªन-ÿधान किवताओं को
रच रहे थे और दूसरी ओर ÿाचीन आ´यानŌ को नवीनता का पुट देकर उपिÖथत िकया जा
रहा था; यīिप इस ÿकार कì कुछ किवताएं मनोहारी ह§,हाÖय-िवनोदाÂमक ह§, िकंतु
अिधकतर िनरस ह§ । इितवृ°ाÂमकता के कारण इस काÓय म¤ नीरसता और शुÕकता है,
कÐपना और अनुभूित कì गहराई कम है, रसाÂमकता एवं कोमल कांत पदावली का उसम¤
अभाव है ।
८. Öव¸छंदतावाद:
ÿाचीन Łिढ़यŌ को तोड़कर नई शैिलयŌ म¤ नए काÓय िवषयŌ को लेकर सािहÂय-सजªना कì
ÿवृि° को Öव¸छंदता कहा जाता है । िहंदी म¤ Öव¸छंदतावादी काÓय का पूणª िवकास
छायावादी युग म¤ हòआ । परंतु िĬवेदी युग म¤ ®ीधर पाठक और रामनरेश िýपाठी म¤
Öव¸छंदतावादी ÿवृि°यां देखी जा सकती ह§ । ÿकृित-िचýण और नए िवषयŌ को अपनाने के
कारण रामचंþ शु³ल ने ®ीधर पाठक को िहंदी का पहला Öव¸छंदतावादी किव कहा है ।
९. भाषा संÖकार:
िĬवेदी जी के ÿयासŌ के पåरणामÖवłप इस समय म¤ सािहÂय के समÖत łपŌ म¤ खड़ी बोली
का एकछý राºय Öथािपत हो गया । उसका łखापन जाता रहा, उसम¤ एकłपता Öथािपत
हो गई और वह अपने शुĦ łप म¤ ÿकट हòई । ®ी हरदेव बाहरी के शÊदŌ म¤ - 'मैिथलीशरण
गुĮ ने भाषा को ला±िणकता ÿदान कì, ठाकुर गोपालशरण िसंह ने ÿवाह िदया, Öनेही ने
उसे ÿभावशािलनी बनाया और łपनारायण पांडेय,मनन िĬवेदी, रामचåरत उपाÅयाय आिद
ने उसका पåरÕकार तथा ÿचार करके आधुिनक िहंदी काÓय को सुŀढ़ िकया ।'
१०. काÓय łप म¤ िविवधता:
इस युग म¤ ÿबंध और मुĉक, दोनŌ ही łपŌ म¤ काÓय रचनाएं हòई । ÿबंध रचना के ±ेý म¤ इस
युग के किवयŌ को अित सफलता िमली । 'िÿय-ÿवास', 'वेदही-बनवास', 'साकेत', तथा
'राचåरत-िचंतामिण' इस काल के ÿिसĦ महाकाÓय ह§ । 'जयþथ-वध', 'पंचवटी', 'पिथक',
'Öवपन' आिद ÿमुख खंडकाÓय ह§ । मुĉक और गीत भी िलखे गए, परंतु अिधक सफलता
ÿबंध काÓय ÿणयन म¤ ही िमली ।
११. िविवध छंद:
इस काल-खंड म¤ िविवध छंदŌ को अपनाने कì ÿवृि° ŀिĶगोचर होती है,िफर भी पुराने छंदŌ
और माýा-छंदŌ कì ही ÿधानता रही । ®ीधर पाठक ने कुछ नए छंदŌ तथा मुĉ-छंदŌ का भी
ÿयोग िकया ।
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िĬवेदी युग
33 १२. शैली:
शैली कì ŀिĶ से इस युग का काÓय िविवधमुखी है । गोपालशरण िसंह आिद पुराने ढ़ंग के
और नई शैली के मुĉक िलख रहे थे तथा उपाÅयाय एवं गुĮ जी ÿबंध शैली को महÂव दे रहे
थे । गीित-शैली के काÓयŌ का सृजन भी होने लगा था ।काÓय के कलेबर के िनमाªण म¤
Öव¸छंदता से काम िलया गया ।
१३. अनुवाद कायª:
इन सबके अितåरĉ अंúेजी और बंगला से अनुवाद करने कì ÿवृि°, भिĉवाद कì ओर
झुकाव आिद अÆय नाना गौण ÿवृि°यां भी इसी काल म¤ देखी जाने लगी थी ।
इस ÿकार, हम कह सकते ह§ िक िĬवेदी युग आधुिनक काÓय धारा का रमणीय तट है,जो
उसे िनिIJत और समुिचत िदशा कì ओर ले जा रहा है । उस समय ÿयोगाÂमक काÓय जैसे
भावी युगŌ के काÓय को िवकिसत होने का अवसर ÿाĮ हòआ है ।
३.५ सारांश इस ÿकार हम कह सकते है िक िĬवेदी युग नव िवचार के साथ उिदत हòआ। िĬवेदी युग के
अंितम वषŎ म¤ छायावाद, रहÖयवाद और ÿगितवाद कì ÿवृि°यŌ से संबंिधत रचनाएँ हमे
देखने को िमलती है। िĬवेदी युग कì किवताएँ समाज के िलए ÿेरणादायी तो थी ही सािहÂय
के िलए अनुपम łप देने वाली थी। जो आज कì पåरिÖथित और समय के िलए भी ÿासंिगक
है।
३.६ दीघō°री ÿij १. िĬवेदी युग कì ÿवृि°यŌ को रेखांिकत कìिजए।
२. िĬवेदी युग के किव और उनकì रचनाओं का उदाहरण सिहत िववरण दीिजए।
३. िĬवेदी युगीन काÓय समाज सुधार का काÓय है िवÖतार से समझाइए।
३.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij १. िĬवेदी युग कì कालाविध कब से कब तक मानी गयी है?
उ°र: सन् १९०० से १९२० तक
२. ‘सरÖवती पिýका ’ का कायªभार िĬवेदीजी ने कब संभाला?
उ°र: सन् १९०३
३. िहÆदी कहानी का वाÖतिवक िवकास िकस युग से माना जाता है?
उ°र: िĬवेदी युग munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
34 ४. ‘आयª जगत म¤ पुनः जनिन िनज जीवन ºयोित जगाओ ।’ नारी उÂथान के संबंध म¤
उĉ पंिĉयाँ िकस किव कì है/
उ°र: ®ी धर पाठक
५. ‘रंग म¤ भंग’ काÓय संúह के रचियता है?
उ°र: मैिथली शरण गुĮ
३.८ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह

*****
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35 ४
छायावाद
इकाई कì łपरेखा
४.० इकाई का उĥेÔय
४.१ ÿÖतावना
४.२ छायावाद
४.३ छायावाद के ÿमुख किव व रचनाएँ
४.४ छायावाद कì ÿवृि°याँ
४.५ सारांश
४.६ दीघō°री ÿij
४.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij
४.८ संदभª úंथ
४.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई म¤ छायावाद पर चचाª कì जायगी। छायावाद का अथª, पåरभाषा छायावाद के किव
व उनकì रचनाओं और छायावाद कì ÿवृि°यŌ का िवÖतार से अÅययन कर¤गे।
४.१ ÿÖतावना िहÆदी सािहÂय का आधुिनक काल नयी सोच, नये ŀिĶकोण के उÂकषª से हमारे सामने
उिदत हòआ है। यह पåरवतªन ÿÂय± और अÿÂय± łप से समाज, सािहÂय, पयाªवरण और
ÿवृित वणªन के संदभª म¤ रहा। छायावाद युग ने सािहÂय को नया मंजर िदखाया। सुख कì
अÿÂय± सŌधी अनुभूित दी। इस काल कì रचनाएँ सीधे Óयिĉ के आÆतåरक सŏदयª से जुड़ी
जो जीवन म¤ गहरी संवेदना का ÿसार करने वाली है।
४.२ छायावाद िĬवेदी युग के पIJात िहंदी सािहÂय म¤ जो किवता-धारा ÿवािहत हòई, वह छायावादी किवता
के नाम से ÿिसĦ हòई । छायावाद कì कालाविध सन १९४७ से १९३६ तक मानी गई है ।
वÖतुतः इस कालाविध म¤ छायावाद इतनी ÿमुख ÿवृि° रही है िक सभी किव इससे
ÿभािवत हòए और इसके नाम पर ही इस युग को छायावादी युग कहा जाने लगा । छायावाद
के Öवłप को समझने के िलए उस पृķभूिम को समझ लेना आवÔयक है, िजसने उसे जÆम
िदया । सािहÂय के ±ेý म¤ ÿायः एक िनयम देखा जाता है िक पूवªवतê युग के अभावŌ को दूर
करने के िलए परवतê युग का जÆम होता है । छायावाद के मूल म¤ भी यही िनयम काम कर
रहा है । इससे पूवª िĬवेदी युग म¤ िहंदी किवता कोरी उपदेश माý बन गई थी । उसम¤ समाज munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
36 सुधार कì चचाª Óयापक łप से कì जाती थी और कुछ आ´यानŌ का वणªन िकया जाता था
। उपदेशाÂमकता और नैितकता कì ÿधानता के कारण किवता म¤ नीरसता आ गई । किव
का Ńदय उस िनरसता से ऊब गया और किवता म¤ सरसता लाने के िलए वह छटपटा उठा ।
इसके िलए उसने ÿकृित को माÅयम बनाया । ÿकृित के माÅयम से जब मानव-भावनाओं का
िचýण होने लगा,तभी छायावाद का जÆम हòआ और किवता इितवृ°ाÂमकता को छोड़कर
कÐपना लोक म¤ िवचरण करने लगी । छायावाद कì पåरभाषा छायावाद अपने युग कì अÂयंत
Óयापक ÿवृि° रही है । िफर भी यह देख कर आIJयª होता है िक उसकì पåरभाषा के संबंध म¤
िवचारकŌ और समालोचकŌ म¤ एकमत नहé हो सका । िविभÆन िवĬानŌ ने छायावाद कì
िभÆन-िभÆन पåरभाषाएं कì ह§ । आचायª रामचंþ शु³ल ने छायावाद को ÖपĶ करते हòए िलखा
है- 'छायावाद शÊद का ÿयोग दो अथŎ म¤ समझना चािहए । एक तो रहÖयवाद के अथª म¤,
जहां उसका संबंध काÓय-वÖतु से होता है अथाªत् जहां किव उस अनंत और अ²ात िÿयतम
को आलÌबन बनाकर अÂयंत िचýमयी भाषा म¤ ÿेम कì अनेक ÿकार से Óयंजना करता है ।
छायावाद शÊद का दूसरा ÿयोग काÓय शैली या पĦित- िवशेष के Óयापक अथª म¤ है ।...
“छायावाद एक शैली िवशेष है, जो ला±िणक ÿयोगŌ, अÿÖतुत िवधानŌ और अमूतª उपमानŌ
को लेकर चलती है । ''दूसरे अथª म¤ उÆहŌने छायावाद को िचý-भाषा-शैली कहा है ।
महादेवी वमाª ने छायावाद का मूल सवाªÂमवाद दशªन म¤ माना है । उÆहŌने िलखा है िक
'“छायावाद का किव धमª के अÅयाÂम से अिधक दशªन के āĺ का ऋणी है, जो मूतª और
अमूतª िवĵ को िमलाकर पूणªता पाता है ।' ... अÆयý वे िलखती ह§ िक “'छायावाद ÿकृित के
बीच जीवन का उद्-गीथ है ।''
डॉ. राम कुमार वमाª ने छायावाद और रहÖयवाद म¤ कोई अंतर नहé माना है । छायावाद के
िवषय म¤ उनके शÊद ह§- “आÂमा और परमाÂमा का गुĮ वािµवलास रहÖयवाद है और वही
छायावाद है ।'” एक अÆय Öथल पर वे िलखते ह§ - “छायावाद या रहÖयवाद जीवाÂमा कì
उस अंतिनªिहत ÿवृि° का ÿकाशन है िजसम¤ वह िदÓय और अलौिकक स°ा से अपना शांत
और िनIJल संबंध जोड़ना चाहती है और यह संबंध इतना बढ़ जाता है िक दोनŌ म¤ कुछ
अंतर ही नहé रह जाता है ।... परमाÂमा कì छाया आÂमा पर पड़ने लगती है और आÂमा कì
छाया परमाÂमा पर । यही छायावाद है ।''
आचायª नंददुलारे वाजपेयी का मंतÓय है: “मानव अथवा ÿकृित के सूàम िकंतु Óयĉ सŏदयª
म¤ आÅयािÂमक छाया का भान मेरे िवचार से छायावाद कì एक सवªमाÆय Óया´या हो सकती
है । छायावाद कì Óयिĉगत िवशेषता दो łपŌ म¤ दीख पड़ती है- एक सूàम और काÐपिनक
अनुभूित के ÿकाश म¤ और दूसरी ला±िणक और ÿतीकाÂमक शÊदŌ के ÿयोग म¤ । और इस
आधार पर तो यह कहा ही जा सकता है िक छायावाद आधुिनक िहंदी-किवता कì वह शैली
है िजसम¤ सूàम और काÐपिनक सहानुभूित को ला±िणक एवं ÿतीकाÂमक ढ़ंग पर ÿकािशत
करते ह§ ।''
शांितिÿय िĬवेदी ने छायावाद और रहÖयवाद म¤ गहरा संबंध Öथािपत करते हòए कहा है:
“िजस ÿकार मैटर ऑफ फै³ट (इितवृ°ाÂमक) के आगे कì चीज छायावाद है उसी ÿकार
छायावाद के आगे कì चीज रहÖयवाद है ।'' munotes.in

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छायावाद
37 गंगाÿसाद पांडेय ने छायावाद पर इस ÿकार ÿकाश डाला है: “छायावाद नाम से ही उसकì
छायाÂमकता ÖपĶ है । िवĵ कì िकसी वÖतु म¤ एक अ²ात सÿाण छाया कì झांकì पाना
अथवा उसका आरोप करना ही छायावाद है । ... िजस ÿकार छाया Öथूल वÖतुवाद के आगे
कì चीज है, उसी ÿकार रहÖयवाद छायावाद के आगे कì चीज है ।''
जयशंकर ÿसाद ने छायावाद को अपने ढ़ंग से पåरभािषत करते हòए कहा है: “किवता के ±ेý
म¤ पौरािणक युग कì िकसी घटना अथवा देश-िवदेश कì सुंदरी के बाĻ वणªन से िभÆन जब
वेदना के आधार पर Öवानुभूितमयी अिभÓयिĉ होने लगी तब िहंदी म¤ उसे छायावाद के नाम
से अिभिहत िकया गया ।
डॉ. देवराज “छायावाद को आधुिनक पौरािणक धािमªक चेतना के िवŁĦ आधुिनक लौिकक
चेतना का िवþोह Öवीकार करते ह§ ।
डॉ. नगेÆþ छायावाद को Öथूल के ÿित सूàम का िवþोह मानते ह§ और साथ ही यह भी
Öवीकार करते ह§ िक “छायावाद एक िवशेष ÿकार कì भाव-पĦित है । जीवन के ÿित एक
िवशेष ÿकार का भावाÂमक ŀिĶकोण है । उÆहŌने इसकì मूल ÿवृि° के िवषय म¤ िलखा है िक
वाÖतव पर अंतमुखê ŀिĶ डालते हòए, उसको वायवी अथवा अतीÆþीय łप देने कì ÿवृि°
ही मूल वृि° है । उनके िवचार से, युग कì उĩुत चेतना ने बाĻ अिभÓयिĉ से िनराश होकर
जो आÂमबĦ अंतमुखê साधना आरंभ कì वह काÓय म¤ छायावाद के łप म¤ अिभÓयĉ हòई ।
वे छायावाद को अतृĮ वासना और मानिसक कुंठाओं का पåरणाम Öवीकार करते ह§ ।''
डॉ. नामवर िसंह ने अपनी पुÖतक 'छायावाद' म¤ िवĵसनीय तौर पर िदखाया िक छायावाद
वÖतुतः कई काÓय ÿवृि°यŌ का सामूिहक नाम है और वह उस "राÕůीय जागरण कì
काÓयाÂमक अिभÓयिĉ' है जो एक ओर पुरानी Łिढ़यŌ से मुिĉ पाना चाहता था और दूसरी
ओर िवदेशी पराधीनता से ।
उपयुªĉ पåरभाषाओं से छायावाद कì अनेक पåरभाषाएं ÖपĶ होती ह§, िकंतु एक सवªसÌमत
पåरभाषा नहé बन सकì । उĉिलिखत पåरभाषाओं से यह भी Óयĉ होता है िक छायावाद
Öव¸छंदतावाद (रोमांिटिसºम) के काफì समीप है ।
उपयुªĉ पåरभाषाओं को समिÆवत करते हòए हम कह सकते ह§ िक “संसार के ÿÂयेक पदाथª
म¤ आÂमा के दशªन करके तथा ÿÂयेक ÿाण म¤ एक ही आÂमा कì अनुभूित करके इस दशªन
और अनुभूित को ला±िणक और ÿतीक शैली Ĭारा Óयĉ करना ही छायावाद है ।''
आधुिनक काल के छायावाद का िनमाªण भारतीय और यूरोपीय भावनाओं के मेल से हòआ
है, ³यŌिक उसम¤ एक ओर तो सवªý एक ही आÂमा के दशªन कì भारतीय भावना है और
दूसरी ओर उस बाहरी Öथूल जगत के ÿित िवþोह है, जो पिIJमी िव²ान कì ÿगित के कारण
अशांत एवं दुःखी है ।
४.३ छायावाद के ÿमुख किव व रचनाएँ सवª®ी जयशंकर ÿसाद, सुिमýानंदन पंत, सूयªकांत िýपाठी 'िनराला' तथा महादेवी वमाª ।
अÆय किवयŌ म¤ डॉ.रामकुमार वमाª, हåरकृÕण 'ÿेमी', जानकì वÐलभ शाľी, भगवतीचरण munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
38 वमाª, उदयशंकर भĘ, नरेÆþ शमाª, रामेĵर शु³ल 'अंचल' के नाम उÐलेखनीय ह§ | इनकì
रचनाएं िनÌनानुसार ह§:
१. जय शंकर ÿसाद (१८८९-१९३६ ई.) के काÓय संúह:
१. िचýाधार (āज भाषा म¤ रिचत किवताएं);
२. कानन-कुसुम;
३. महाराणा का महßव ;
४. कŁणालय;
५. झरना;
६. आंसू;
७. लहर;
८. कामायनी ।
२. सुिमýानंदन पंत (1900 -1977 ई.) के काÓय संúह:
१. वीणा;
२. úिÆथ;
३. पÐलव;
४. गुंजन;
५. युगाÆत;
६. युगवाणी;
७. úाÌया;
८. Öवणª-िकरण;
९. Öवणª-धूिल;
१०. युगाÆतर;
११. उ°रा ;
१२. रजत-िशखर;
१३. िशÐपी;
१४. ÿितमा; munotes.in

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छायावाद
39 १५. सौवणª;
१६. वाणी ;
१७. िचदंबर;
१८. रिÔमबंध;
१९. कला और बूढ़ा चांद;
२०. अिभषेिकत;
२१. हरीश सुरी सुनहरी टेर;
२२. लोकायतन;
२३. िकरण वीणा ।
३. सूयªकांत िýपाठी 'िनराला'(१८९८-१९६४ ई.) के काÓय-संúह:
१. अनािमका;
२. पåरमल;
३. गीितका ;
४. तुलसीदास;
५. आराधना;
६. कुकुरमु°ा;
७. अिणमा;
८. नए प°े;
९. बेला;
१०. अचªना ।
४. महादेवी वमाª (१९०७-१९८८ ई.) कì काÓय रचनाएं:
१. रिÔम;
२. िनहार;
३. नीरजा;
४. सांÅयगीत; munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
40 ५. दीपिशखा;
६. यामा ।
५. डॉ.रामकुमार वमाª (१९०५- )कì काÓय रचनाएं:
१. अंजिल;
२. łपरािश;
३. िचतौड़ कì िचता ;
४. चंþिकरण;
५. अिभशाप;
६. िनशीथ;
७. िचýरेखा;
८. वीर हमीर;
९. एकलÓय ।
६. हåरकृÕण'ÿेमी' (१९०८- ) कì काÓय रचनाएं:
१. आखŌ म¤;
२. अनंत के पथ पर;
३. łपदशªन;
४. जादूगरनी;
५. अिµनगान;
६. Öवणªिवहान ।
४.४ छायावाद कì ÿवृि°याँ छायावादी काÓय का िवĴेषण करने पर हम उसम¤ िनÌनांिकत ÿवृि°यां पाते ह§:
१. वैयिĉकता:
छायावादी काÓय म¤ वैयिĉकता का ÿाधाÆय है । किवता वैयिĉक िचंतन और अनुभूित कì
पåरिध म¤ सीिमत होने के कारण अंतमुखê हो गई, किव के अहम भाव म¤ िनबĦ हो गई ।
किवयŌ ने काÓय म¤ अपने सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव, आशा-िनराशा कì अिभÓयिĉ खुल कर
कì । उसने समú वÖतुजगत को अपनी भावनाओं म¤ रंग कर देखा । जयशंकर ÿसाद का
'आंसू' तथा सुिमýा नंदन पंत के 'उ¸छवास' और 'आंसू' Óयिĉवादी अिभÓयिĉ के सुंदर munotes.in

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छायावाद
41 िनदशªन ह§ । इसके Óयिĉवाद के Öव म¤ सवª सिÆनिहत है । डॉ. िशवदान िसंह चौहान इस
संबंध म¤ अÂयंत मािमªक शÊदŌ म¤ िलखते ह§ -''किव का म§ ÿÂयेक ÿबुĦ भारतवासी का म§ था,
इस कारण किव ने िवषयगत ŀिĶ से अपनी सूàमाितसूàम अनुभूितयŌ को Óयĉ करने के
िलए जो ला±िणक भाषा और अÿÖतुत रचना शैली अपनाई, उसके संकेत और ÿतीक हर
Óयिĉ के िलए सहज ÿेषणीय बन सके । "छायावादी किवयŌ कì भावनाएं यिद उनके िविशĶ
वैयिĉक दुःखŌ के रोने-धोने तक ही सीिमत रहती,उनके भाव यिद केवल आÂमक¤िþत ही
होते तो उनम¤ इतनी Óयापक ÿेषणीयता कदािप न आ पाती । िनराला ने िलखा है-
म§ने म§ शैली अपनाई,
देखा एक दुःखी िनज भाई
दुख कì छाया पड़ी Ńदय म¤
झट उमड़ वेदना आई
इससे ÖपĶ है िक Óयिĉगत सुख-दुःख कì अपे±ा अपने से अÆय के सुख-दुख कì अनूभूित
ने ही नए किवयŌ के भाव-ÿवण और कÐपनाशील ŃदयŌ को Öव¸छंदतावाद कì ओर ÿवृ°
िकया ।
२. ÿकृित-सŏदयª और ÿेम कì Óयंजना:
छायावादी किव का मन ÿकृित िचýण म¤ खूब रमा है और ÿकृित के सŏदयª और ÿेम कì
Óयंजना छायावादी किवता कì एक ÿमुख िवशेषता रही है । छायावादी किवयŌ ने ÿकृित को
काÓय म¤ सजीव बना िदया है । ÿकृित सŏदयª और ÿेम कì अÂयिधक Óयंजना के कारण ही
डॉ. देवराज ने छायावादी काÓय को 'ÿकृित-काÓय' कहा है । छायावादी काÓय म¤ ÿकृित-
सŏदयª के अनेक िचýण िमलते ह§; जैसे
१. आलÌबन łप म¤ ÿकृित िचýण
२. उĥीपन łप म¤ ÿकृित िचýण
३. ÿकृित का मानवीकरण
४. नारी łप म¤ ÿकृित के सŏदयª का वणªन
५. आलंकाåरक िचýण
६. ÿकृित का वातावरण और पृķभूिम के łप म¤ िचýण
७. रहÖयाÂमक अिभÓयिĉ के साधन के łप म¤ िचýण ।
ÿसाद, पंत, िनराला, महादेवी आिद छायावाद के सभी ÿमुख किवयŌ ने ÿकृित का नारी łप
म¤ िचýण िकया और सŏदयª व ÿेम कì अिभÓयिĉ कì । पंत कì किवता का एक उदाहरण
देिखए:
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
42 बांसŌ का झुरमुट
संÅया का झुटपुट
ह§ चहक रहé िचिड़यां
टीवीटी टुटू दुद्
छायावादी किव के िलए ÿकृित कì ÿÂयेक छिव िवÖमयोÂपादक बन जाती है । वह ÿाकृितक
सŏदयª पर िवमुµध होकर रहÖयाÂमकता कì ओर उÆमुख हो जाता है:
म§ भूल गया सीमाएं िजससे
वह छिव िमल गई मुझे
छायावादी किव ने िनजी अनुभूितयŌ का Óयिĉकरण ÿकृित के माÅयम से िकया है; जैसे- म§
नीर भरी दुख कì बदली छायावादी किव सŏदयानुªभूित से अिभभूत है । अपने आंतåरक
सŏदयª का उĤाटन ÿकृित के माÅयम से करता हòआ िदखाई पड़ता है:
शिश मुख पर घूंघट डाले, अंचल म¤ दीप िछपाए
जीवन कì गोधूिल म¤,कौतृहल से तुम आए
- जयशंकर ÿसाद
अिधकांश छायावादी किवयŌ ने ÿकृित के कोमल łप का िचýण िकया है,परंतु कहé-कहé
उसके उú łप का िचýण भी हòआ है ।
३. ®ृंगाåरकता:
छायावादी काÓय म¤ ®ृंगार-भावना कì ÿधानता है, परंतु यह ®ृंगार रीितकालीन Öथूल एवं
ऐिÆþय ®ृंगार से िभÆन है । छायावादी ®ृंगार-भावना मानिसक एवं अतीिÆþय है । यह ®ृंगार-
भावना दो łपŌ म¤ अिभÓयĉ हòई है:
१. नारी के अतीिÆþय सŏदयª िचýण Ĭारा
२. ÿकृित पर नारी-भावना के आरोप के माÅयम से िचýण ।
पंत और ÿसाद ने अछूती कÐपनाओं कì तूिलका से नारी के सŏदयª का िचýण िकया है ।
एक उदाहरण देिखए:
तुÌहारे छूने म¤ था ÿाण
संग म¤ पावन गंगा Öनान
तुÌहारी वाणी म¤ कÐयाणी
िýवेणी कì लहरŌ का गान
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छायावाद
43 नारी का अतीिÆþय सŏदयª िचýण ÿसाद जी Ĭारा ®Ħा के सŏदयª म¤ þĶÓय है:
नील पåरधान बीच सुकुमार,
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग ।
िखला हो ºयŌ िबजली का फूल,
मेघवन बीच गुलाबी रंग ।
िनराला कì 'जुही कì कली' किवता म¤ दूसरे ÿकार कì ®ृंगार-भावना का िचý है । ÿसाद ने
'कामायनी' म¤ सŏदयª को चेतना का उººवल वरदान माना है । इस ÿकार छायावादी ®ृंगार-
भावना और उसके सभी उपकरणŌ (नारी, सŏदयª, ÿेम) का िचýण सूàम एवं उदा° है ।
उसम¤ वासना कì गंध बहòत कम है ।
छायवादी किव को ÿेम के ±ेý म¤ जाित, वणª, सामािजक रीित-नीित, Łिढ़यां और िमÃया
माÆयताएं माÆय नहé ह§; िनराला जी िलखते ह§:
दोनŌ हम िभÆन वणª, िभÆन जाित, िभÆन łप ।
िभÆन धमª भाव, पर केवल अपनाव से ÿाणŌ से एक थे ॥
इनके ÿेम िचýण म¤ कोई लुकाव-िछपाव-दुराव नहé है । उसम¤ किव कì वैयिĉकता है ।
इनकì ÿणय गाथा का अंत ÿायःदुःख, िनराशा तथा असफलता म¤ होता है । अतः उसम¤
िमलन कì अनुभूितयŌ कì अपे±ा िवरहानुभूितयŌ का िचýण अिधक हòआ है
और इस िदशा म¤ उÆह¤ आशातीत सफलता भी िमली; पंत के शÊदŌ म¤:
शूÆय जीवन के अकेले पृķ पर
िवरह अहह कराहते इस शÊद को
िकसी कुिलश कì तीàण चुभती नŌक से
िनठुर िविध ने आंसुओं से है िलखा
४. रहÖयानुभूित:
छायावादी किव को अ²ात स°ा के ÿित एक िवशेष आकषªण रहा है । वह ÿकृित के ÿÂयेक
पदाथª म¤ इसी स°ा के दशªन करता है । उसका इस अंनत के ÿित ÿमुख łप से िवÖमय
तथा िज²ासा का भाव है । लेिकन उनका रहÖय िज²ासामूलक है, उसे कबीर और दादू के
रहÖयवाद के सम± खड़ा नहé िकया जा सकता । िनराला तÂव ²ान के कारण, तो पंत
ÿाकृितक सŏदयª से रहÖयोÆयुख हòए । ÿेम और वेदना ने महादेवी को रहÖयोÆयुख िकया तो
ÿसाद ने उस परमस°ा को अपने बाहर देखा । यīिप महादेवी म¤ अवÔय ही रहÖय-साधना
कì ŀढ़ता िदखाई पड़ती है । आचायª रामचंþ शु³ल के शÊदŌ म¤, "किव उस अनंत अ²ात
िÿयतम को आलंबन बनाकर अÂयंत िचýमयी भाषा म¤ ÿेम कì अनेक ÿकार से अिभÓयंजना
करते ह§ । ... तथा छायावाद का एक अथª रहÖयवाद भी है । अतः सुधी आलोचक रहÖयवाद
को छायावाद का ÿाण मानते ह§ । "छायावादी किवयŌ कì कुछ रहÖय अनुभूितयŌ के munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
44 उदाहरण देिखए:
हे अनंत रमणीय कौन तुम !
यह म§ कैसे कह सकता !
कैसे हो,³या हो इसका तो
भार िवचार न सह सकता ?
- जयशंकर ÿसाद
िÿय िचरÆतन है सजिन
±ण-±ण नवीन सुहािगनी म§
तुम मुझ म¤ िफर पåरचय ³या!
- महादेवी वमाª
ÿथम रिÔम का आना रंिगिण
तुने कैसे पहचाना ?
- सुिमýानंदन पंत
िकस अनंत का नीला अंचल िहला-िहलाकर आती तुम सजी मंडलाकर
- सूयªकांत िýपाठी 'िनराला'

तृणवीŁध लहलहे हो िकसके रस से िसंचे हòए
- जयशंकर ÿसाद
तोड़ दो यह ि±ितज म§ भी देख लूं उस ओर ³या है
- महादेवी वमाª
५. तßव िचंतन:
छायावादी किवता म¤ अĬैत-दशªन, योग-दशªन, िविशĶĬैत-दशªन, आनंदवाद आिद के अंतगªत
दाशªिनक िचंतन भी िमलता है । ÿसाद का मूल दशªन आनंदवाद है तो महादेवी ने अĬैत,
सां´य एवं योग दशªन का िववेचन अपने ढ़ंग से िकया है ।
६. वेदना और कŁणा कì िववृि°:
छायावादी किवता म¤ वेदना कì अिभÓयिĉ कŁणा और िनराशा के łप म¤ हòई है । हषª-शोक,
हास-Łदन, जÆम-मरण, िवरह-िमलन आिद से उÂपÆन िवषमताओं से िघरे हòए मानव-जीवन
को देखकर किव Ńदय म¤ वेदना और कŁणा उमड़ पड़ती है । जीवन म¤ मानव-मन कì munotes.in

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छायावाद
45 आकां±ाओं और अिभलाषाओं कì असफलता पर किव-Ńदय øÆदन करने लगता है ।
छायावादी किव सŏदयª ÿेमी होता है,िकंतु सŏदयª कì ±णभंगुरता को देख उसका Ńदय
आकुल हो उठता है । Ńदयगत भावŌ कì अिभÓयिĉ कì अपूणªता, अिभलाषाओं कì
िवफलता,सŏदयª कì नĵरता, ÿेयसी कì िनķòरता, मानवीय दुबªलताओं के ÿित
संवेदनशीलता और ÿकृित कì रहÖयमयता आिद अनेक कारणŌ से छायावादी किव के
काÓय म¤ वेदना और कŁणा कì अिधकता पाई जाती है । ÿसाद ने 'आंसू' म¤ वेदना को
साकार łप िदया है । पंत तो काÓय कì उßपि° ही वेदना को मानते ह§ -
िवयोगी होगा पहला किव, आह से िनकला होगा गान ।
उमड़ कर आंखŌ से चुपचाप, बही होगी किवता अजान ॥
महादेवी तो पीड़ा म¤ ही अपने िÿय को ढूंढ़ती ह§:
तुमको पीड़ा म¤ ढूंढ़ा, तुमम¤ ढूंढूंगी पीड़ा ।
और पंत जी कहते ह§:
िचर पूणª नहé कुछ जीवन म¤
अिÖथर है łप जगत का मद ।
संसार म¤ दुख और वेदना को देखकर छायावादी किव पलायनवादी भी हòआ । वह इस
संसार से ऊब चुका है और कहé ओर चला जाना चाहता है । इसका मु´य कारण यह है िक
वह इस संसार म¤ दुख ही दुख देखता है, यहां सवªý सुख का अभाव ŀिĶगोचर होता है । इस
िवषय म¤ किव पंत कì अिभÓयिĉ þĶÓय हैः
यहां सुख सरसŌ,शोक सुमेŁ
अरे जग है जग का कंकाल
वृथा रे,यह अरÁय चीÂकार
शांित, सुख है उस पार
िनराला भी जग के उस पार जाना चाहते ह§ । ÿसाद भी अÂयंत ÿिसĦ गीत म¤ नािवक से इस
कोलाहलपूणª संसार से दूर चलने का अनुरोध करते ह§ ।
७. मानवतावादी ŀिĶकोण:
छायावादी काÓय भारतीय सवाªÂमवाद तथा अĬैतवाद से गहरे łप से ÿभािवत हòआ । इस
काÓय पर रामकृÕण परमहंस, िववेकानंद, गांधी, टैगोर तथा अरिवंद के दशªन का भी काफì
ÿभाव रहा । Öव¸छंदतावादी ÿवृि° के कारण छायावादी किव को सािहÂय के समान धमª,
दशªन आिद म¤ भी Łिढ़यŌ एवं िमÃया परÌपराएं माÆय नहé ह§ । रिवंþनाथ ठाकुर, जो बंगला
सािहÂय म¤ मानवतावाद का उĩोष पहले ही कर चुके थे, का ÿभाव छायावादी किवयŌ पर भी
रहा छायावादी किव सारे संसार से ÿेम करता है । उसके िलए भारतीय और अभारतीय म¤
कोई भेद नहé ³यŌिक सवªý एक ही आÂमा ÓयाĮ है । िवĵमानवता कì ÿितķा उसका आदशª
है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
46 ८. नारी के ÿित नवीन ŀिĶकोण:
नारी के ÿित छायावाद ने सवªथा नवीन ŀिĶकोण अपनाया है । यहां नारी वासना कì पूितª
का साधन नहé है,यहां तो वह ÿेयसी, जीवन-सहचरी, मां आिद िविवध łपŌ म¤ उतरी है ।
उसका मु´य łप ÿेयसी का ही रहा है । यह ÿेयसी पािथªव जगत कì Öथूल नारी नहé
है,बरन कÐपना लोक कì सुकुमारी देवी है । नारी के संबंध म¤ ÿसाद जी कहते ह§:
नारी तुम केवल ®Ħा हो
िवĵास-रजत-नग-पगतल म¤
पीयूष-ąोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल म¤
छायावादी किव ने युग-युग से उपेि±त नारी को सिदयŌ कì कारागृह से मुĉ करने का Öवर
अलापा । छायावादी किव कह उठता है:
'मुĉ करो नारी को, युग-युग कì कारा से बंिदनी नारी को ।'
िनःसंदेह छायावाद ने नारी को मानवीय सहदयता के साथ अंिकत िकया है । पंत कì ÿिसĦ
पंिĉ है - 'देिव मां सहचåर ÿाण ! "ÿसाद ने नारी को आदशª ®Ħा के łप म¤ देखा जो
रागाÂमक वृि° कì ÿतीक है और मनुÕय को मंगल एवं ®ेय के पथ पर ले जानेवाली है ।
िनराला नारी कì यथाथª िÖथित को काफì पहचान कर उसे िचिýत करते ह§ । उÆहŌने िवधवा
को इĶ देव के मंिदर कì पूजा कहा । इलाहाबाद के पथ पर तोड़ती हòई मजदूरनी का िचý
खéचा, तुलसी कì पÂनी रÂनावली का िचýण रीितकालीन नारी िवषयक धारणा को
तोड़नेवाली के łप म¤ िकया ।
९. आदशªवाद:
छायावाद म¤ आंतåरकता कì ÿवृि° कì ÿधानता है । उसम¤ चीजŌ के बाĻ Öथूल łप िचýण
कì ÿवृि° नहé है । अपनी इस अंतªमुखी ÿवृि° के कारण उनका ŀिĶकोण काÓय के
भावजगत और शैली म¤ आदशªवादी रहा । उसे Öथूलता के िचýण कì बजाय अपनी
अनुभूितयाँ अिधक यथाथª लगी ह§ । यही कारण है िक उसका काÓय संबंधी ŀिĶकोण
कÐपनाÂमक रहा और उसम¤ सुंदर तßव कì ÿधानता बनी रही । छायावादी किव के इस
आदशªवादी, कÐपनाÂमक ŀिĶकोण को उसके कला प± म¤ भी सहज ही देखा जा सकता है।
१०. Öव¸छंदतावाद:
छायावादी किव ने अहंवादी होने के कारण िवषय, भाव, कला, धमª, दशªन और समाज के
सभी ±ेýŌ म¤ Öवछंदतावादी ÿवृि° को अपनाया । उसे अपने Ńदयोदगार को अिभÓयĉ
करने के िलए िकसी ÿकार का शाľीय बंधन और Łिढ़यां Öवीकार नहé ह§ । भाव-±ेý म¤ भी
उसने इसी øांित का ÿदशªन िकया । उसम¤ 'म§' कì शैली अपनाई, हालांिक उसके 'म§' म¤
समूचा समाज सिÆनिहत है । अब छायावादी किव के िलए ÿÂयेक ±ेý और ÿÂयेक िदशा का
मागª उÆमुĉ था । छायावादी किव के िलए कोई भी वÖतु काÓय-िवषय बनने के िलए उपयुĉ
थी । इसी Öव¸छंदतावादी ÿवृि° के फलÖवłप छायावादी काÓय म¤ सŏदयª और ÿेम िचýण, munotes.in

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छायावाद
47 ÿकृित-िचýण, राÕůÿेम, रहÖयाÂमकता, वेदना और कŁणा, वैयिĉक सुख-दुःख, अतीत
ÿेम, कलावाद, ÿतीकाÂमकता और ला±िणकता, अिभÓयंजना आिद सभी ÿवृि°यां िमलती
है । उसे पुरानी िपटी-िपटाई राहŌ पर चलना अिभÿेत नहé है । सं±ेप म¤ कह सकते ह§ िक
छायावाद वैयिĉक Łिच-ÖवातंÞय का युग है ।
११. देश-ÿेम एवं राÕůीय भावना:
राÕůीय जागरण कì øोड़ म¤ पलने-पनपने वाला Öव¸छंदतावादी छायावाद सािहÂय यिद
रहÖयाÂमकता और राÕů ÿेम कì भावनाओं को साथ-साथ लेकर चला है, तो इसम¤ कोई
आIJयª कì बात नहé है । सच तो यह है िक राÕůीय जागरण ने छायावाद के Óयिĉवाद को
असामािजक पथŌ पर भटकने से बचा िलया । छायावादी किव म¤ आंतåरकता कì िकतनी भी
ÿधानता ³यŌ न हो वह अपने युग से िनिIJत łप से ÿभािवत हòआ । यही कारण है िक
जयशंकर ÿसाद पुकार उठते ह§:
अŁण यह मधुमय देश हमारा ...
या
िहमािþ तुंग ®ंग से ÿबुĦ शुĦ भारती
माखन लाल चतुव¥दी कह उठते ह§:
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर तुम देना फ¤क ।
मातृभूिम पर शीश चढ़ाने
िजस पथ जाव¤ वीर अनेक ।
१२. ÿतीकाÂमकता:
ÿतीकाÂमकता छायावािदयŌ के काÓय कì कला प± कì ÿमुख िवशेषता है । ÿकृित पर सवªý
मानवीय भावनाओं का आरोप िकया गया और उसका संवेदनाÂमक łप म¤ िचýण िकया
गया, इससे यह Öवतंý अिÖतÂव और ÓयिĉÂव से िवहीन हो गई और उसम¤ ÿतीकाÂमकता
का Óयवहार िकया गया । उदाहरणाथª, फूल सुख के अथª म¤, शूल दुख के अथª म¤, उषा
ÿफुÐलता के अथª म¤, संÅया उदासी के अथª म¤, झंझा-झकोर गजªन मानिसक इÆþ के अथª
म¤, नीरद माला नाना भावनाओं के अथª म¤ ÿयुĉ हòए । दाशªिनक अनुभूितयŌ कì अिभÓयंजना
एवं ÿेम कì सूàमाितसूàम दशाओं के अंकन म¤ भी इस ÿतीकाÂमकता को देखा जा सकता
है ।
१३. िचýाÂमक भाषा एवं ला±िणक पदावली:
अÆय अनुपम िविशĶताओं के अितåरĉ केवल िचýाÂमक भाषा के कारण िहंदी वाड्मय म¤
छायावादी काÓय को Öवतंý काÓय धारा माना जा सकता है किवता के िलए िचýाÂमक भाषा
कì अपे±ा कì जाती है और इसी गुण के कारण उसम¤ िबÌब úािहता आती है । छायावादी
किव इस कला म¤ परम िवदµध ह§ । छायावादी काÓय म¤ ÿसाद ने यिद ÿकृित तßव को munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
48 िमलाया, िनराला ने उसे मुĉक छंद िदया,पंत ने शÊदŌ को खराद पर चढ़ाकर सुड़ौल और
सरस बनाया तो महादेवी ने उसम¤ ÿाण डाले,उसकì भावाÂमकता को समृĦ िकया । ÿसाद
कì िनÌनांिकत पंिĉयŌ म¤ भाषा कì िचýाÂमकता कì छटा देखते ही बनती है;-
शिश मुख पर घूंघट डाले,अंचल म¤ दीप िछपाए ।
जीवन कì गोधूिल म¤,कौतृहल से तुम आए ।
छायावादी किव ने सीधी सादी भाव संबंिधत भाषा से लेकर ला±िणक और अÿÖतुत-
िवधानŌ से युĉ िचýमयी भाषा तक का ÿयोग िकया और कदािचत इस ±ेý म¤ उसने
सवाªिधक मौिलकता का ÿदशªन िकया । छायावादी किव ने परÌपरा-ÿाĮ उपमानŌ से संतुĶ
न होकर नवीन उपमानŌ कì उĦावना कì । इसम¤ अÿÖतुत-िवधान और अिभÓयंजना-शैली
म¤ शतशः नवीन ÿयोग िकए । मूतª म¤ अमूतª का िवधान उसकì कला का िवशेष अंग बना ।
िनराला जी िवधवा का िचýण करते हòए िलखते ह§- “वह इĶदेव के मंिदर कì पूजा सी ।” यही
कारण है िक छायावादी काÓयधारा के पयाªĮ िवŁĦ िलखने वाले आलोचक रामचंþ शु³ल
को भी िलखना पड़ गया िक “छायावाद कì शाखा के भीतर धीरे-धीरे काÓय शैली का बहòत
अ¸छा िवकास हòआ, इसम¤ संदेह नहé ।” इसम¤ भावावेश कì आकुल Óयंजना, ला±िणक
वैिचÞय, मूतª-ÿÂय±ीकरण, भाषा कì वøता, िवरोध चमÂकार, कोमल पद िवÆयास इÂयािद
काÓय का Öवłप संगिठत करने वाली ÿचुर सामúी िदखाई पड़ी । उÆहŌने पंत काÓय के कुछ
उदाहरण भी उपÆयÖत िकए – “धूल कì ढ़ेरी म¤ अनजान । िछपे ह§ मेरे मधुमय गान । ममª
पीड़ा के हास । कौन तुम अतुल अłप अनाम ।”
१४. गेयता:
छायावादी किव केवल सािहिÂयक ही नहé वरन संगीत का भी कुशल ²ाता है । छायावाद का
काÓय छंद और संगीत दोनŌ ŀिĶयŌ से उ¸च कोिट का है । इसम¤ ÿाचीन छंदŌ के ÿयोग के
साथ-साथ नवीन छंदŌ का भी िनमाªण िकया गया । इसम¤ मुĉक छंद और अतुकांत किवताएँ
भी िलखी गई । छायावादी किव ÿणय, यौवन और सŏदयª का किव है । गीित-शैली उसके
गृहीत िवषय के िलए उपयुĉ थी । गीित-काÓय के सभी गुण-संि±Įता, तीĄता,
आÂमािभÓयंजना, भाषा कì मसृणता आिद उपलÊध होते ह§ गीित-काÓय के िलए सŏदयª-वृि°
और Öवानुभूित के गुणŌ का होना आवÔयक है, सौभाµय से सारी बात¤ छायावादी किवयŌ म¤
िमलती ह§ दूसरी एक और बात भी है िक आधुिनक युग गीित-काÓय के िलए िजतना उपयुĉ
है उतना ÿबंध-काÓयŌ के िलए नहé । छायावादी सािहÂय म¤, ÿगीत, खंड काÓय और ÿबंध
काÓय भी िलखे गए और वीर गीित, संबोध गीित, शोकगीित, Óयंµय गीित आिद काÓय के
अÆय łप िवधानŌ का ÿयोग िकया गया । छायावादी किवयŌ कì भाषा और छंद केवल
बुिĦिवलास, वचन भंिगमा, कौशल या कौतुक वृि° से ÿेåरत नहé रहा बिÐक उनकì किवता
म¤ भाषा भावŌ का अनुसरण करती िदखती है और अिभÓयंजना अनुभूित का ।
१५. अलंकार-िवधान:
अलंकार योजना म¤ ÿाचीन अलंकारŌ के अितåरĉ अंúेजी सािहÂय के दो नवीन अलंकारŌ-
मानवीकरण तथा िवशेषण िवपयªय का भी अ¸छा उपयोग िकया गया है । ÿाकृितक घटनाओं
ÿातः, संÅया, झंझा, बादल और ÿाकृितक चीजŌ सूयª, चंþमा आिद पर जहां मानवीय munotes.in

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छायावाद
49 भावनाओं का आरोप िकया गया है वहां मानवीकरण है । िवशेषण िवपयªय म¤ िवशेषण का जो
Öथान अिभधावृि° के अनुसार िनिIJत है,उसे हटाकर ल±णा Ĭारा दूसरी जगह आरोप
िकया जाता है । पंत ने ब¸चŌ के तुतले भय का ÿयोग उनकì तुतली बोली म¤ Óयंिजत भय के
िलए िकया है । इसी ÿकार तुÌहारी आंखŌ का बचपन खेलता जब अÐहड़ खेल ।' छायावादी
किव ने अमूतª को मूतª और मूतª को अमूतª łप म¤ िचिýत करने के िलए अनेक नवीन
उपमानŌ कì उĩावना कì है; जैसे -“कìितª िकरण सी नाच रही है'तथा िबखरी अलक¤ ºयŌ
तकª जाल ।” इसके अितåरĉ उपमा, łपक, उÐलेख, संदेह, िवरोधाभास, łपकाितशयोिĉ
तथा Óयितरेक आिद अलंकारŌ का भी सुंदर ÿयोग िकया गया है ।
१६. कला कला के िलए:
ÖवातÆýय तथा आÂमािभÓयिĉ के अिधकार कì भावना के पåरणामÖवłप छायावादी काÓय
म¤ “कला कला के िलए' के िसĦांत का अनुपालन रहा है । वÖतु-चयन तथा उसके ÿदशªन
कायª म¤ किव ने पूणª Öवतंýता से काम िलया है । उसे समाज तथा उसकì नैितकता कì
तिनक भी िचंता नहé है । यही कारण है िक उसके काÓय म¤ 'सÂय'और 'िशव' कì अपे±ा
'सुंदर' कì ÿधानता रही है । छायावादी काÓय इस कला कला के िलए के िसĦांत म¤ पलायन
और ÿगित दोनŌ सिÆनिहत ह§ । एक ओर अंतमुखê ÿवृि° के कारण जहां जन-जीवन से कुछ
उदासीनता है तो दूसरी ओर काÓय और समाज म¤ िमÃया łिढ़यŌ के ÿित सबल िवþोह भी ।
अतः छायावाद पर केवल पलायनवाद का दोष लगाना Æयाय संगत नहé होगा ।
अंततः डॉ. नगेÆþ ने इस सािहÂय कì समृिĦ कì समता भिĉ सािहÂय से कì है । 'इस तÃय
से कतई इनकार नहé िकया जा सकता िक भाषा, भावना एवं अिभÓयिĉ-िशÐप कì समृिĦ
कì ŀिĶ से छायावादी काÓय अजोड़ है । िवशुĦ अनुभूितपरक किवÂवमयता कì ŀिĶ से भी
इसकì तुलना अÆय िकसी युग के सािहÂय से नहé कì जा सकती । इस ŀिĶ से भिĉ काल
के बाद आधुिनक काल का यह तृतीय चरण िहंदी सािहÂय के इितहास का दूसरा Öवणª-युग
कहकर रेखांिकत िकया जा सकता है इस किवता का गौरव अ±य है, उसकì समृिĦ कì
समता केवल भिĉ काÓय ही कर सकता है ।'
४.५ सारांश छायावादी काÓय Óयिĉ और उसकì जीवन शैली से जुड़ा काÓय है। ³यŌिक यह जीवन कì
अनुभूित और संवेदना का काÓय है। इस इकाई म¤ हमने छायावाद, छायावाद के किव और
उनकì रचनाएँ, छायावाद कì ÿवृि°यŌ का अÅययन िवÖतार से िकया है। आशा है िवīाथê
इन सभी मुĥŌ को आसानी से समझ सक¤गे।
४.६ दीघō°री ÿij १. छायावाद का अथª, पåरभाषा ÖपĶ करते हòए इसकì िवशेषताओं पर ÿकाश डािलए।
२. छायावादी काÓय कì ÿवृि°यŌ को सौदाहरण समझाइए।
३. छायावाद के ÿमुख किव और उनकì रचनाओं का वणªन कìिजए।
४. छायावादी काÓय के संबंध म¤ िवĬानŌ के िवचार ÿÖतुत कìिजए। munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
50 ४.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij १. छायावाद का कायªकाल कब से कब तक है?
उ°र: सन् १९२० से १९३६ तक
२. छायावाद शÊद का सवªÿथम ÿयोग िकसने िकया?
उ°र: मुकुटधर पाÁडेय
३. छायावाद को ‘Öथूल के ÿित िवþोह’ िकस िवĬान ने कहा?
उ°र: डॉ. नगेÆþ
४. छायावादी किवयŌ ने अिधकांशतः कौनसी भाषा का ÿयोग िकया?
उ°र: खड़ी बोली
५. ‘रिÔम’ काÓय संúह के रचियता है?
उ°र: महादेवी वमाª
४.८ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह

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51 ५
ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
इकाई कì łपरेखा
५.० इकाई का उĥेÔय
५.१ ÿÖतावना
५.२ ÿगितवाद
५.३ ÿगितवादी किव और उनकì रचना एँ
५.४ ÿगितवादी किवता कì ÿवृि°याँ
५.५ सारांश
५.६ दीघō°री ÿij
५.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij
५.८ संदभª úंथ
५.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई का उĥेÔय आधुिनक िहÆदी सािहÂय म¤ ÿगितकालीन काÓय के िवषय म¤ जानना
है। इस इकाई के अÅययन से िवīाथê ÿगितकाल, ÿगितकाल के किव, उनकì रचनाएँ और
ÿगितकाल कì िवशेषताओं का अÅययन कर सक¤गे।
५.१ ÿÖतावना िजस ÿकार िĬवेदी युग कì इितवृ°ाÂमकता, उपदेशाÂमकता और Öथूलता के ÿित िवþोह म¤
छायावाद का जÆम हòआ, उसी ÿकार छायावाद कì सूàमता, कÐपनाÂमकता , Óयिĉवािदता
और समाज-िवमुखता कì ÿितिøया म¤ एक नई सािहिÂयक काÓय धारा का जÆम हòआ । इस
धारा ने किवता को कÐपना-लोक से िनकाल कर जीवन के वाÖतिवक धरातल पर खड़ा
करने का ÿयÂन िकया । जीवन का यथाथª और वÖतुवादी ŀिĶकोण इस किवता का आधार
बना । मनुÕय कì वाÖतिवक समÖयाओं का िचýण इस काÓय-धारा का िवषय बना । यह
धारा सािहÂय म¤ 'ÿगितवाद' के नाम से ÿितिķत हòई ।
५.२ ÿगितवाद 'ÿगित' का सामाÆय अथª है: 'आगे बढ़ना' और 'वाद' का अथª है-'िसĦांत' । इस ÿकार
ÿगितवाद का सामाÆय अथª है 'आगे बढ़ने का िसĦांत' । लेिकन ÿगितवाद म¤ इस आगे बढ़ने
का एक िवशेष ढंग है, िवशेष िदशा है जो उसे िविशĶ पåरभाषा देता है । इस अथª म¤ 'ÿाचीन
से नवीन कì ओर', 'आदशª से यथाथª कì ओर', 'पूंजीवाद से समाजवाद' कì ओर, 'łिढ़यŌ
से Öव¸छंद जीवन कì ओर', 'उ¸चवगª से िनÌनवगª कì ओर' तथा 'शांित से øांित कì ओर' munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
52 बढ़ना ही ÿगितवाद है ।
परंतु िहंदी सािहÂय म¤ ÿगितवाद िवशेष अथª म¤ łढ़ हो चुका है । िजसके अनुसार ÿगितवाद
को मा³सªवाद का सािहिÂयक łप कहा जाता है । जो िवचारधारा राजनीित म¤ साÌयवाद है,
दशªन म¤ ĬÆĬाÂमक भौितकवाद है, वही सािहÂय म¤ ÿगितवाद है । इसी ÿगितवाद को
'समाजवादी यथाथªवाद' (सोशेिलÖट åरयिलºम) भी कहते ह§ ।
उन िदनŌ यूरोप म¤ मा³सªवाद का ÿभाव िनरंतर बढ़ रहा था । १९१९ म¤ łस म¤ øांित हòई ।
जारशाही का अंत हòआ और मा³सªवाद से ÿेåरत बोÐशेिवक पाटê कì स°ा Öथािपत हòई
और साÌयवादी िवचारधारा ने जोर पकड़ा । िजसने सािहÂय म¤ भी एक नवीन ŀिĶकोण को
जÆम िदया । लोगŌ को यह समानतावादी/समतावादी िवचार खूब जँच रहा था ।
सन् १९३० म¤ भारतीय कÌयुिनÖट पाटê का जÆम हòआ और १९३४ म¤ कांúेस सोशिलÖट
पाटê का । धीरे-धीरे राजनीित म¤ वाम पंथी शिĉयŌ का जोर बढ़ा । कांúेस म¤ गांधी के
अिहंसाÂमक िसĦांत को न मानने वाले लोगŌ कì सं´या बढ़ रही थी । मजदूरŌ के आंदोलन
हो रहे थे । इस ÿकार तÂकालीन पåरिÖथितयां वैचाåरक उúता और समाजोÆमुखता को
बढ़ावा दे रही थी । सािहÂयकार समाज कì ºवलंत समÖयाओं से जूझ रहे थे ।
सन् १९३५ म¤ ई.एम. फाÖटªर के सभापितÂव म¤ 'ÿोúेिसव राइटसª एसोिशयन' नामक
अंतरराÕůीय संÖथा का पहला अिधवेशन पेåरस म¤ हòआ । सन १९३६ म¤ डॉ. मुÐकराज
आनंद और सºजाद जहीर के ÿयÂनŌ से इस संÖथा कì एक शाखा भारत म¤ खुली और
ÿेमचंद कì अÅय±ता म¤ लखनऊ म¤ उसका ÿथम अिधवेशन हòआ और तभी से 'ÿोúेिसव
िलटरेचर'के िलए िहंदी म¤ 'ÿगितशील सािहÂय' का ÿचलन शुł हòआ । कालांतर म¤ यही
ÿगितवाद हो गया । ÿेमचंद, रवीÆþनाथ ठाकुर, जोष इलाहाबादी जैसे अúणी लेखकŌ और
किवयŌ ने इस आंदोलन का Öवागत िकया । पंत, िनराला, िदनकर, नवीन ने इसम¤ सिøय
योगदान िदया ।
अथª कì ŀिĶ से ÿगितवाद के दो अथª ह§: एक Óयापक और दूसरा सीिमत या सांÿदाियक |
ÿगितशील Óयापक और उदार अथª म¤ ÿयुĉ होता है । िजसके अनुसार आिदकाल से लेकर
अब तक समÖत सािहÂय परÌपरा ÿगितशील है । लेिकन सीिमत अथª म¤ यह सािहÂय
ÿचाराÂमक है जो मा³सªवाद का सािहिÂयक मोचाª है िजसम¤ िपछले सÌपूणª सािहÂय को
सामंतवादी और ÿितिøयावादी कह कर नकार िदया गया । छायावाद ने जहां काÓय म¤ ही
Öथान बनाया वहां ÿगितवाद ने सािहÂय कì अÆय िवधाओं यथा उपÆयास, कहानी,
आलोचना आिद के ±ेý म¤ भी जगह बनाई ।
काÓय म¤ अपने łढ़ अथª म¤ ÿगितवाद १९३७ से १९४३ तक िशखर पर रहा उसके बाद
काÓय ने ÿयोगवाद, नई किवता जैसी नई धाराओं को िवकिसत िकया ।
५.३ ÿगितवादी किव और उनकì रचनाएँ ÿगितवादी किवयŌ को हम तीन ®ेिणयŌ म¤ रख सकते ह§: एक वे किव जो मूल łप से पूवªवतê
काÓयधारा छायावाद से संबĦ ह§, दूसरे वे जो मूल łप से ÿगितवादी किव ह§ और तीसरे वे
िजÆहŌने ÿगितवादी किवता से अपनी काÓय-याýा शुł कì लेिकन बाद म¤ ÿयोगवादी या नई munotes.in

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ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
53 किवता करने लगे । पहले वगª के किवयŌ म¤ सुिमýानंदन पंत, सूयªकांत िýपाठी
'िनराला'(िवशुĦ छायावादी), नरेÆþ शमाª, भगवती चरण वमाª, रामेĵर शु³ल 'अंचल', ब¸चन
कì कुछ किवताएं (हालावादी किव), बालकृÕण शमाª 'नवीन', माखन लाल चतुव¥दी, रामधारी
िसंह 'िदनकर', उदयशंकर भĘ, उपेÆþनाथ 'अÔक', जगÆनाथ ÿसाद 'िमिलंद' (राÕůीय काÓय
धारा) आिद ह§ । िजÆहŌने ÿगितवादी सािहÂय म¤ उÐलेखनीय योगदान िदया । मूल łप से
ÿगितवादी किवयŌ म¤ केदारनाथ अúवाल, रामिवलास शमाª, नागाजुªन, रांगेय राघव,
िशवमंगल िसंह 'सुमन', िýलोचन का नाम उÐलेखनीय है । गजानन माधव मुिĉबोध, अ²ेय,
भारत भूषण अúवाल, भवानी ÿसाद िम®, नरेश मेहता, शमशेर बहादुर िसंह, धमªवीर भारती
म¤ भी ÿगितवाद िकसी न िकसी łप म¤ मौजूद है, पर इÆह¤ ÿयोगवादी कहना ही उिचत होगा।
यहां हम सभी ÿमुख ÿगितवादी किवयŌ और उनकì ÿगितवादी कृितयŌ का नामोÐलेख
कर रह¤ ह§:
सुिमýानंदन पंत (१९००-१९७० ) ÿगितवादी रचना एँ:
१. युगांत
२. युगवाणी
३ úाÌया ।
सूयªकांत िýपाठी िनराला (१८९७-१९६२) ÿगितवादी रचनाएं:
१. कुकुरमु°ा
२. अिणमा
३. नए प°े
४. बेला
५. अचªना ।
नरेÆþ शमाª (१९४३-१९८९):
१. ÿवासी के गीत
२. पलाश-वन
३. िमĘी और फूल
४. अिµनशÖय ।
रामेĵर शु³ल अंचल (१९४५-१९९६):
१. िकरण-वेला
२. लाल चुनर । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
54 माखन लाल चतुव¥दी (१८८८-१९७०):
१. मानव
रामधारी िसंह िदनकर (१९०८-१९७४):
१ कुŁ±ेý
२. रिÔमरथी
३. परशुराम कì ÿती±ा ।
उदयशंकर भĘ (१८९८-१९६४):
१. अमृत और िवष ।
बालकृÕण शमाª नवीन (१८९७-१९६०):
१. कंकुम
२. अपलक
३. रिÔम-रेखा
४. ³वािस ।
जगÆनाथ ÿसाद िमिलंद (१९०७-१९८६):
१. बिलपथ के गीत
२. भूिम कì अनुभुित
३. पंखुåरयाँ ।
केदारनाथ अúवाल (१९४४-२०००)
१. युग कì गंगा
२. लोक तथा आलोक
३. फूल नहé रंग बोलते ह§
४. नéद के बादल ।
राम िवलास शमाª (१९४२-२०००) :
१. łप-तरंग munotes.in

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ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
55 नागाजुªन (१९१०-१९९८):
१. युगधारा
२. Èयासी पथराई
३. आँखे
४. सतरंगे पंखŌ वाली
५. तुमने कहा था
६. तालाब कì मछिलयां
७. हजार-हजार बाँहŌ वाली
८. पुरानी जूितयŌ का कोरस
९. भÖमासुर(खंडकाÓय) |
रांगेय-राघव (१९२३-१९६२):
१. अजेय खंडहर
२. मेधावी
३. पांचाली
४. राह के दीपक
५. िपघलते पÂथर ।
िशव-मंगल िसंह सुमन (१९४५-२००२):
१. िहÐलोल
२. जीवन के गान
३. ÿलय सृजन ।
िýलोचन (१९९७-२००७):
१. िमĘी कì बात
२. धरती
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
56 ५.४ ÿगितवादी किवता कì ÿवृि°याँ समाज और समाज से जुड़ी समÖयाओं यथा गरीबी, अकाल,Öवाधीनता,िकसान-मजदूर,
शोषक-शोिषत संबंध और इनसे उÂपÆन िवसंगितयŌ पर िजतनी Óयापक संवेदनशीलता इस
धारा कì किवता म¤ है, वह अÆयý नहé िमलती । यह काÓयधारा अपना संबंध एक ओर जहां
भारतीय परंपरा से जोड़ती है वहé दूसरी ओर भावी समाज से भी । वतªमान के ÿित वह
आलोचनाÂमक यथाथªवादी ŀिĶ अपनाती है । ÿगितवादी काÓयधारा कì ÿमुख ÿवृि°याँ इस
ÿकार ह§:-
१. सामािजक यथाथªवाद:
इस काÓयधारा के किवयŌ ने समाज और उसकì समÖयाओं का यथाथª िचýण िकया है ।
समाज म¤ ÓयाĮ सामािजक, आिथªक, धािमªक,राजनीितक िवषमता के कारण दीन-दåरþ वगª
के ÿित सहानुभूितपूणª ŀिĶ के ÿसारण को इस काÓयधारा के किवयŌ ने ÿमुख Öथान िदया
और मजदूर, क¸चे घर, गरीब को अपने काÓय का िवषय चुना ।
सड़े घूरे कì गोबर कì बदबू से दबकर
महक िजंदगी के गुलाब कì मर जाती है
- केदारनाथ अúवाल
ओ मजदूर । ओ मजदूर !
तू सब चीजŌ का क°ाª, तू हé सब चीजŌ से दूर
ओ मजदूर । ओ मजदूर !
ĵानŌ को िमलता वľ दूध, भूखे बालक अकुलाते ह§ ।
माँ कì हड्डी से िचपक िठठुर, जाड़Ō कì रात िबताते ह§
युवती कì लºजा बसन बेच, जब Êयाज चुकाये जाते ह§
मािलक जब तेल फुलेलŌ पर पानी सा þÓय बहाते है
पापी महलŌ का अहंकार देता मुझको तब आमंýण
- िदनकर
२. मानवतावाद का ÿकाशन:
वह मानवता कì अपåरिमत शिĉ म¤ िवĵास ÿकट करता है और ईĵर के ÿित अनाÖथा
ÿकट करता है; धमª उसके िलए अफìम का नशा है:
िजसे तुम कहते हो भगवान
जो बरसाता है जीवन म¤
रोग, शोक, दुःख दैÆय अपार
उसे सुनाने चले पुकार munotes.in

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ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
57 ३. øांित का आĽान:
ÿगितवादी किव समाज म¤ øांित कì ऐसी आग भड़काना चाहता है, िजसम¤ मानवता के
िवकास म¤ बाधक समÖत łिढ़याँ जलकर भÖम हो जाएं -
देखो मुęी भर दानŌ को, तड़प रही कृषकŌ कì काया ।
कब से सुĮ पड़े खेतŌ से, देखो 'इÆकलाब' िघर आया ॥
किव कुछ ऐसी तान सुनाओ
िजससे उथल पुथल मच जाए
४. शोषकŌ के ÿित आøोश:
ÿगितवाद दिलत एवं शोिषत समाज के 'खटमलŌ'-पूंजीवादी सेठŌ, साहóकारŌ और राजा-
महाराजाओं के शोषण के िचý उपिÖथत कर उनकì मानवता का पदाªफाश करता है-
ओ मदहोश बुरा फल हो, शूरŌ के शोिणत पीने का ।
देना होगा तुझे एक िदन, िगन-िगन मोल पसीने का ॥
५. शोिषतŌ को ÿेरणा:
ÿगितवादी किव शोिषत समाज को ÖवावलÌबी बनाकर अपना उĦार करने कì ÿेरणा देता
है:
न हाथ एक अľ हो, न साथ एक शľ हो ।
न अÆन नीर वľ हो, हटो नहé, डटो नहé, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
वह शोिषत म¤ शिĉ देखता है और उसे øांित म¤ पूरा िवĵास है । इस ÿकार ÿगितवादी किव
को शोिषत कì संगिठत शिĉ और अ¸छे भिवÕय पर आÖथा है:
म§ने उसको जब-जब देखा- लोहा देखा
लोहा जैसा तपते देखा,गलते देखा,ढ़लते देखा
म§ने उसको गोली जैसे चलते देखा ।
- केदारनाथ अúवाल
६. łिढ़यŌ का िवरोध:
इस धारा के किव बुिĦवाद का हथौड़ा लेकर सामािजक कुरीितयŌ पर तीखे ÿहार कर
उनको चकनाचूर कर देना चाहते ह§:
गा कोिकल । बरसा पावक कण
नĶ-ĂĶ हो जीणª पुरातन । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
58 - सुिमýानंदन पंत
७. तÂकालीन समÖयाओं का िचýण:
ÿगित का उपासक किव अपने समय कì समÖयाओं जैसे-बंगाल का अकाल आिद कì ओर
आंख¤ खोलकर देखता है और उनका यथाथª łप उपिÖथत कर समाज को जागृत करना
चाहता है:
बाप बेटा बेचता है
भूख से बेहाल होकर,
धमª धीरज ÿाण खोकर
हो रही अनरीित, राÕů सारा देखता है
एक िभ±ुक कì यथाथª िÖथित:
वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता
- सूयªकांत िýपाठी “िनराला”
८. मा³सªवाद का समथªन:
इस धारा के कुछ किवयŌ ने माý साÌयवाद के ÿवतªक कालª मा³सª का तथा उसके िसĦांतŌ
का समथªन करने हेतु ÿचाराÂमक काÓय ही िलखा है-
साÌयवाद के साथ Öवणª-युग करता मधुर पदापªण
और साथ ही साÌयवादी देशŌ का गुणगान भी िकया है:
लाल łस का दुÔमन साथी ! दुÔमन सब इंसानŌ का
९. नया सŏदयª बोध:
ÿगितवादी किव ®म म¤ सŏदयª देखते ह§ । उनका सŏदयª-बोध सामािजक मूÐयŌ और
नैितकता से रिहत नहé है । वे अलंकृत या असहज म¤ नहé, सहज सामाÆय जीवन और
िÖथितयŌ म¤ सŏदयª देखते ह§ । खेत म¤ काम करती हòई िकसान नारी का यह िचý इसी तरह
का है-
बीच-बीच म¤ सहसा उठकर खड़ी हòई वह युवती सुंदर
लगा रही थी पानी झुककर सीधी करे कमर वह पल भर
इधर-उधर वह पेड़ हटाती, Łकती जल कì धार बहाती
१०. Óयंµय:
सामािजक, आिथªक वैषÌय का िचýण करने से रचना म¤ Óयंµय आ जाना Öवाभािवक है ।
Óयंµय ऊपर-ऊपर हाÖय लगता है िकंतु वह अंततः कŁणा उÂपÆन करता है । इसीिलए munotes.in

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ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
59 सामािजक Óयंµय अमानवीय-शोषण स°ा का सदैव िवरोध करता है । ÿगितशील किवयŌ म¤
Óयंµय तो सबके यहां िमल जाएगा िकंतु नागाजुªन इस ±ेý म¤ सबसे आगे ह§ । एक देहाती
माÖटर दुखरन, उसके िशÕयŌ और मदरसे कì यह तÖवीर नागाजुªन ने इस ÿकार खéची है-
घुन खाए शहतीरŌ पर कì बारह खड़ी िवधाता बांचे
फटी भीत है,छत है चूती, आले पर िबÖतुइया नाचे
लगा-लगा बेबस ब¸चŌ पर िमनट-िमनट म¤ पांच तमाचे
इसी तरह से दुखरन माÖटर गढ़ता है आदम से सांचे ।
११. ÿकृित:
मानव समाज कì भांित ÿकृित के ±ेý म¤ भी ÿगितवादी किव सहज िÖथितयŌ म¤ सŏदयª
देखता है । उसका सŏदयª बोध चयनवादी नहé । ÿगितवादी किवयŌ ने ÿकृित और úाम
जीवन के अनुपम िचý खéचे ह§ िजनम¤ łप-रस-गंध-वणª के िबÌब उभरे ह§ । नागाजुªन का
'बादल को िघरते देखा है',केदारनाथ अúवाल का 'बसंती हवा'और िýलोचन का 'धूप म¤ जग-
łप सुंदर' उÂकृĶ किवताएं ह§ ।
१२. ÿेम:
ÿगितवादी किवयŌ ने ÿेम को सामािजक-पाåरवाåरक łप म¤ देखा है । वगª-िवभĉ समाज म¤
ÿेम सहज नहé हो पाता । ÿेम वगª-भेद, वणª-भेद को िमटाता है । ÿगितवादी किव ÿेम कì
पीड़ा का एकांितक िचý करते ह§ । िकंतु वह वाÖतिवक जीवन संदभŎ म¤ होता है ।अतः
उनका एकांत भी समाजोÆमुख होता है; जैसे िýलोचन का यह अकेलापन-
आज म§ अकेला हóं, अकेले रहा नहé जाता
जीवन िमला है यह, रतन िमला है यह
फूल म¤ िमला है या धूल म¤ िमला है यह
मोल-तोल इसका अकेले कहा नहé जाता
आज म§ अकेला हóं.
१३. नारी-िचýण:
ÿगितवादी किव के िलए मजदूर तथा िकसान के समान नारी भी शोिषत है, जो युग-युग से
सामंतवाद कì कारा म¤ पुŁष कì दासता कì लौहमयी जंजीरŌ से जकड़ी है । Öवतंý ÓयिĉÂव
खो चुकì है और केवल माý रह गई है पुŁष कì वासना तृिĮ का उपकरण । इसिलए वह
उसकì मुिĉ चाहता है-अपना Öवतंý ÓयिĉÂव खो चुकì है और केवल माý रह गई है पुŁष
कì वासना तृिĮ का उपकरण । इसिलए वह उसकì मुिĉ चाहता है-
योिन नहé है रे नारी ! वह भी मानवी ÿितिķत
उसे पूणª Öवाधीन करो, वह रहे न नर पर अविसत munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
60 अिधकांश ÿगितवािदयŌ का नारी-ÿेम उ¸छुंखल और Öवछंद है:
म§ अथª बताता þोहभरे यौवन का
म§ वासना नµन को गाता उ¸छुंखल
ÿगितवादी किव ने नारी के सुकोमल सŏदयª कì उपे±ा करके उसके Öथुल शारीåरक सŏदयª
को ही अिधक उकेरा है । उसने नारी कì कÐपना कृषक बालाओं व मजदूरिनयŌ म¤ कì है ।
१४. साधारण कला प±:
ÿगितवाद जनवादी है । अतः वह जन-भाषा का ÿयोग करता है । उसे Åयेय को Óयĉ करने
कì िचंता है । काÓय को अलंकृत करने कì िचंता नहé । अतः वह कहता है-
तुम वहन कर सको जन-जन म¤ मरते िवचार ।
वाणी ! मेरी चािहए ³या तुÌह¤ अलंकार ॥
छंदŌ म¤ भी अपने Öवछंद ŀिĶकोण के अनुसार उÆहŌने मुĉक छंद का ही ÿयोग िकया है ।
खुल गए छंद के बंध, ÿास के रजत पाश ...पंत
ÿगितवादी किवता म¤ नए उपमानŌ को िलया गया है और वे सामाÆय जन जीवन और लोक-
गीतŌ से úहण िकए गए ह§:
कोयल कì खान कì मजदूåरनी सी रात ।
बोझ ढ़ोती ितिमर का िव®ांत सी अवदात ॥
मशाल,जŌक,रĉ,तांडव, िवÈलव, ÿलय आिद नए ÿतीक ÿगितवादी सािहÂय कì अपनी
सृिĶ ह§ । ÿगितवादी किव का कला संबंधी ŀिĶकोण भाषा, छंद, अलंकार, ÿतीकŌ तथा
विणªत भावŌ से ÖपĶ हो जाता है । वह कला को Öवांतः सुखाय या कला कला के िलए नहé,
बिÐक जीवन के िलए, बहòजन के िलए अपनाता है । वह किवता को जन-जीवन का
ÿितिनिध मानता है ।
५.५ सारांश ÿगितवादी काÓय सामािजक यथाªथवादी सŏदयª ŀिĶ से पåरपूणª है। यह सािहÂय मानव
धरातल का सािहÂय है जो जन जागृित से ओत-ÿोत है। आशा है िक इस इकाई के अÅययन
से ÿगितवाद के सÌपूणª अÅययन से िवīाथê अवगत हòए है।
५.६ दीघō°री ÿij १. ÿगितवादी काÓय कì िवशेषताओं पर ÿकाश डािलए।
२. ÿगितवादी काÓय जनजागृित का काÓय है िसĦ कìिजए।
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ÿगितवाद (१९३६-१९४३)
61 ५.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij १. ÿगितवादी काÓय का ÿेरणा ľोत है?
उ°र: मा³सªवादी
२. ÿगितवादी काÓय का ÿमुख उĥेÔय था?
उ°र: यथाथªवाद कì Öथापना
३. ÿगितवाद कì कालाविध है?
उ°र: सन् १९३६ से सन् १९४३ तक
४. ÿगित का सामाÆय अथª है?
उ°र: आगे बढ़ना
५. सुिमýानंदन पंत कì िकÆही दो ÿगितवादी रचनाओं के नाम िलिखए?
उ°र: १. युगांत, २. युगवाणी
५.८ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह


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62 ६
ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
इकाई कì łपरेखा
६.० इकाई का उĥेÔय
६.१ ÿÖतावना
६.२ ÿयोगवाद
६.३ ÿयोगवाद के किव और उनकì रचनाएँ
६.४ ÿयोगवादी किवता कì ÿवृि°याँ
६.५ सारांश
६.६ दीघō°री ÿij
६.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij
६.८ संदभª úंथ
६.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई का ÿमुख उĥेÔय ÿयोगवाद का अÅययन करना है। इसके अंतगªत हम ÿयोगवाद,
ÿयोगवाद के किव व रचनाएँ और ÿयोगवाद कì ÿवृि°यŌ को िवÖतार से जान¤गे।
६.१ ÿÖतावना भारतेÆदु युग, िĬवेदी युग, छायावाद और ÿगितवाद के बाद ÿयोगवाद का आगमन हòआ। यह
काल गुलामी के अंत और Öवतंýता के उदय का काल था। जो समाज और सािहÂय के िलए
अÂयंत महÂव पूणª था। इस काल का सािहÂय िवदेशी िवचारधारा से भी जुड़ा मा³ąवादी
दशªन का खासा ÿभाव इस काल पर रहा।
६.२ ÿयोगवाद ÿयोग शÊद का सामाÆय अथª है, 'नई िदशा म¤ अÆवेषण का ÿयास ' । जीवन के ÿÂयेक ±ेý म¤
ÿयोग िनरंतर चलते रहते ह§ । काÓय के ±ेý म¤ भी पूवªवतê युग कì ÿितिøया Öवłप या
नवीन युग-सापे± चेतना कì अिभÓयिĉ हेतु ÿयोग होते रहे ह§ । सभी जागłक किवयŌ म¤
łिढ़यŌ को तोड़कर या सृिजत पथ को छोड़ कर नवीन पगडंिडयŌ पर चलने कì ÿवृि°
Æयूनािधक माýा म¤ िदखाई पड़ती है । चाहे यह पगडंडी राजपथ का łप úहण न कर सके ।
सन् १९४३ या इससे भी पांच-छः वषª पूवª िहंदी किवता म¤ ÿयोगवादी कही जाने वाली
किवता कì पग-Åविन सुनाई देने लगी थी । कुछ लोगŌ का मानना है िक १९३९ म¤ नरो°म
नागर के संपादकÂव म¤ िनकलने वाली पिýका 'उ¸छुंखल' म¤ इस ÿकार कì किवताएं छपने
लगी थी िजसम¤ 'अÖवीकार ', 'आÂयंितक िव¸छेद' और Óयापक 'मूितª-भंजन' का Öवर मुखर munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
63 था तो कुछ लोग िनराला कì 'नये प°े', 'बेला' और 'कुकुरमु°ा' म¤ इस नवीन काÓय-धारा के
ल±ण देखते ह§ । लेिकन १९४३ म¤ अ²ेय के संपादन म¤ 'तार-सĮक ' के ÿकाशन से
ÿयोगवादी किवता का आकार ÖपĶ होने लगा और दूसरे तार-सĮक के ÿकाशन वषª
१९५१ तक यह ÖपĶ हो गया ।
ÿयोगवाद का जÆम 'छायावाद ' और 'ÿगितवाद ' कì Łिढ़यŌ कì ÿितिøया म¤ हòआ । डॉ.
नगेÆþ ÿयोगवाद के उÂथान के िवषय म¤ िलखते ह§,- 'भाव ±ेý म¤ छायावाद कì अितिÆþयता
और वायवी सŏदयª चेतना के िवŁĦ एक वÖतुगत, मूतª और ऐिÆþय चेतना का िवकास हòआ
और सŏदयª कì पåरिध म¤ केवल मसृण और मधुर के अितåरĉ पŁष, अनगढ़ , भदेश का
समावेश हòआ । ' छायावादी किवता म¤ वैयिĉकता तो थी, िकंतु उस वैयिĉकता म¤ उदा°
भावना थी । इसके िवपरी त ÿगितवाद म¤ यथाथª का िचýण तो था, िकंतु उसका ÿितपाī
िवषय पूणªतः सामािजक समÖयाओं पर आधाåरत था और उसम¤ राजनीित कì बू थी । अतः
इन दोनŌ कì ÿितिøया Öवłप ÿयोगवाद का उĦव हòआ, जो 'घोर अहंमवादी', 'वैयिĉकता'
एवं 'नµन-यथाथªवाद' को लेकर चला ®ी लàमी कांत वमाª के शÊदŌ म¤, “ÿथम तो छायावाद
ने अपने शÊदाडÌबर म¤ बहòत से शÊदŌ और िबÌबŌ के गितशील तßवŌ को नĶ कर िदया था ।
दूसरे, ÿगितवाद ने सामािजकता के नाम पर िविभÆन भाव-ÖतरŌ एवं शÊद-संÖकार को
अिभधाÂमक बना िदया था । ऐसी िÖथित म¤ नए भाव-बोध को Óयĉ करने के िलए न तो
शÊदŌ म¤ सामÃयª था और न परÌपरा से िमली हòई शैली म¤ । पåरणामÖवłप उन किवयŌ को
जो इनसे पृथक थे, सवªथा नया Öवर और नये माÅयमŌ का ÿयोग करना पड़ा । ऐसा इसिलए
और भी करना पड़ा, ³यŌिक भाव-Öतर कì नई अनुभूितयाँ िवषय और संदभª म¤ इन दोनŌ से
सवªथा िभÆन थी । ÿयोगवाद नाम तारसĮक म¤ अ²ेय के इस वĉÓय से िलया गया, “ÿयोग
सभी कालŌ के किवयŌ ने िकए ह§ । िकंतु किव øमशः अनुभव करता आया है िक िजन ±ेýŌ
म¤ ÿयोग हòए ह§, आगे बढ़कर अब उन ±ेýŌ का अÆवेषण करना चािहए िजÆह¤ अभी छुआ नहé
गया था िजनको अभेī मान िलया गया है ।''
इन अÆवेषणकताª किवयŌ म¤ अ²ेय ने तार सĮक म¤ ऐसे सात-सात किवयŌ को अपनाया “जो
िकसी एक Öकूल के नहé ह§, िकसी एक िवचारधारा के नहé ह§, िकसी मंिजल पर पहòंचे हòए
नहé ह§, अभी राही ह§- राही नहé, राहŌ के अÆवेषी ।... काÓय के ÿित एक अÆवेषी का
ŀिĶकोण उÆह¤ समानता के सूý म¤ बांधता है ।...उनम¤ मतै³य नहé है, सभी महÂवपूणª िवषय
म¤ उनकì अलग-अलग राय है- जीवन के िवषय म¤, समाज और धमª और राजनीित के िवषय
म¤, काÓय-वÖतु और शैली के छंद और तुक म¤, किव के दाियÂवŌ के ÿÂयेक िवषय म¤ उनका
आपस म¤ मतभेद है । यहां तक िक हमारे जगत के ऐसे सवªमाÆय और Öवयं िसĦ मौिलक
सÂयŌ को भी वे Öवीकार नहé करते, जैसे- लोकतंý कì आवÔयकता , उīोगŌ का
समाजीकरण , यांिýक युĦ कì उपयोिगता , वनÖपित घी कì बुराई अथवा काननबाला और
सहगल के गानŌ कì उÂकृĶता इÂयािद । वे सब एक-दूसरे कì ŁिचयŌ , कृितयŌ और आशाओं
और िवĵासŌ पर एक-दूसरे कì जीवन -पåरपाटी पर और यहां तक िक एक-दूसरे के िमýŌ
और कु°Ō पर भी हंसते ह§ ।'” ÿयोगवादी किवयŌ का नए के ÿित यह आúह ही इÆह¤
ÿयोगवादी बनाता है ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
64 ÿयोगवाद के Öवłप को ÖपĶ करते हòए इस धारा के किवयŌ ने अपने िवचार Óयĉ िकए ह§,
जो इस ÿकार हैः
अ²ेय:
ÿयोगशील किवता म¤ नए सÂयŌ, नई यथाथªताओं का जीिवत बोध भी है,उन सÂयŌ के साथ
नए रागाÂमक संबंध भी और उनको पाठक या सŃदय तक पहòंचाने यानी साधारणीकरण कì
शिĉ भी है ।
डॉ. धमªवीर भारती:
ÿयोगवादी किवता म¤ भावना है, िकंतु हर भावना के आगे एक ÿij-िचĹ लगा है । इसी ÿij-
िचĹ को आप बौिĦकता कह सकते ह§ । सांÖकृितक ढ़ांचा चरमरा उठा है और यह ÿij िचĹ
उसी कì Åविन-माý है ।
®ी िगåरजाकुमार माथुर:
ÿयोगŌ का लàय है Óयापक सामािजक सÂय के खंड अनुभवŌ का साधारणीकरण करने म¤
किवता को नवानुकूल माÅयम देना, िजसम¤ Óयिĉ Ĭारा इस Óयापक सÂय का सवªबोधगÌय
ÿेषण संभव हो सके |
ÿयोगवाद को आकार देने म¤ जहां 'सĮकŌ ' कì भूिमका रही वहé अनेक पिýकाओं ने भी
इसकì राह को सरल बनाया । तार-सĮकŌ कì सं´या चार है । पहला सĮक १९१३ , दूसरा
१९५१ , तीसरा १९५९ और चौथा सĮक १९७९ म¤ ÿकािशत हòआ । पिýकाओं म¤
'ÿतीक ', 'पाटल ', 'ŀिĶकोण ', 'कÐपना ', 'अजंता', 'राÕůवाणी ', 'धमªयुग', 'नई किवता ',
'िनकष ', '²ानोदय ', 'कृित', 'लहर', 'िनķा', 'शताÊदी ', 'ºयोÂÖना ', 'आजकल ', 'कÐपना आिद
ह§ ।
ÿयोगवाद को ÿतीकŌ कì ÿधानता और नवीन ÿतीकŌ को अपनाने के कारण 'ÿतीकवाद '
नाम से भी अिभिहत िकया गया । ÿयोगवाद से कुछ लोगŌ का अिभÿाय 'łपवाद ' अथवा
'फामªिलºम' तक सीिमत है । लेिकन łपवाद ÿयोगवाद कì शाखा -माý है । ³यŌिक
ÿयोगवादी केवल łप-िवधान या तकनीक पर ही Åयान नहé देते; उसम¤ अÆय तÂव भी
मौजूद ह§ ।
ÿयोगवाद के भीतर ही 'ÿपīवाद ' या 'नकेनवाद' भी पनपा लेिकन वह ÿयोगवाद कì एक
छोटी शाखा -माý बन कर रह गया । “नकेनवाद' िबहार म¤ ÿचिलत हòआ । 'निलन िवलोचन
शमाª', 'केसरीकुमार' और 'नरेश' नामŌ के ÿथम अ±र से बना है नकेन । नकेनवादी तीनŌ
किवयŌ ने 'ÿयोग-दशसूýी' म¤ ÿयोगवाद और ÿयोगशीलता म¤ अंतर ÖपĶ िकया है । ये ÿयोग
को ही काÓय का एकमाý लàय मानते ह§ ।
डॉ जगदीश चंþ गुĮ और ®ी रामÖवłप चतुव¥दी ने १९५४ म¤ 'नई किवता ' नाम से एक
पिýका का ÿकाशन शुł िकया । इसने ÿयोगवादी किवता को नई किवता का नाम िदया ।
कुछ आलोचक नई किवता और ÿयोगवाद म¤ कोई अंतर नहé मानते जबिक कुछ का मानना
है िक दोनŌ को एक समझने कì भूल नहé करनी चािहए । हमारे ŀिĶकोण से नई किवता munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
65 ÿयोगवाद का ही िवकिसत या Öथािपत हòआ łप है । ÿयोगवादी किवता जब काÓय जगत म¤
Öवीकृत हो गई तो उसे नई किवता के नाम से अिभिहत िकया गया । जो लोग ÿयोगवाद
और नई किवता को अलग-अलग łप म¤ देखते ह§ वे दलगत राजनीित के िशकार ह§ ।
६.३ ÿयोगवाद के किव और उनकì रचनाएँ ÿयोगवाद के किवयŌ म¤ हम सवªÿथम तारसĮक के किवयŌ को िगनते ह§ और इसके ÿवतªक
किव सि¸चदानंद हीरानंद वाÂÖयायन अ²ेय ठहरते ह§ । जैसा िक हम पहले कहते आए ह§ िक
तारसĮक १९४३ ई. म¤ ÿकािशत हòआ । इसम¤ सातकिवयŌ को शािमल िकए जाने के कारण
इसका नाम तारसĮक रखा गया । इन किवयŌ को अ²ेय ने पथ के राही कहा । ये िकसी
मंिजल पर पहòंचे हòए नहé ह§, बिÐक अभी पथ के अÆवेषक ह§ । इसी संदभª म¤ अ²ेय ने ÿयोग
शÊद का ÿयोग िकया, जहां से ÿयोगवाद कì उÂपि° Öवीकार कì जाती है । इसके बाद
१९५४ ई. म¤ दूसरा, १९५९ ई. म¤ तीसरा और १९७९ म¤ चौथा तारसĮक ÿकािशत हòए ।
िजनका संपादन Öवयं अ²ेय ने िकया है ।
६.३.१ चारŌ तारसĮकŌ के किवयŌ के नाम िनÌनवत ह§:
१. ÿथम तारसĮक के किव:
अ²ेय, भारतभूषण अúवा ल, मुिĉबोध, ÿभाकर माचवे, िगåरजाकुमार माथुर, नेिमचंþ जैन,
रामिवलास शमाª ।
२. दूसरे तारसĮक के किव:
भवानीÿसाद िम®, शंकुत माथुर, नरेश मेह°ा, रघुवीर सहाय , शमशेर बहादुर िसंह,
हåरनारायण Óयास, धमªवीर भारती ।
३. तीसरे तारसĮक के किव:
ÿयागना रायण िýपाठी , कìितª चौधरी , मदन वाÂÖयायन , केदारनाथ िसंह, कुंवर नारायण ,
िवजयदेव नारायण साही, सव¥ĵर दयाल स³सेना ।
४. चौथे तारसĮक के किव:
अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज, Öवदेश भारती , नंद िकशोर आचायª, सुमन राजे, ®ीराम
शमाª, राजेÆþ िकशोर ।
“नकेनवाद' या 'ÿपīवाद' ÿयोगवाद म¤ ही शािमल है । नकेनवाद के किव ह§:
१. निलनिवलोचन शमाª
२. केसरी कुमार
३. नरेश ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
66 ६.३.२ ÿयोगवाद कì ÿमुख किवयŌ कì काÓय-रचनाएं िनÌनवत ह§:
१. सि¸चदानंद हीरानंद वाÂÖयायन अ²ेय (१९११-१९८७):
१. भµनदूत
२. िचंता
३. हरी घास पर ±ण भर
४. बावरा अहेरी
५. अरी ओ कŁणा ÿभामय
६. आंगन के पार Ĭार
७. इÂयलम
८. इंþ-धनुष रŏदे हòए थे
९. सुनहले शैवाल
१०. िकतनी नावŌ म¤ िकतनी बार
११. सागर-मुþा
१२. ³यŌिक म§ उसे जानता हóँ
१३. पहले सÆनाटा बुनता हóँ
१४. महावृ± के नीचे
१५. नदी कì बांक पर छाया ।
२. भारतभूषण अúवाल (१९४९-१९७५):
१. छिव के बंधन
२. जागते रहो
३. मुिĉ-मागª
४. एक उठा हòआ हाथ
५. ओ अÿÖतुत मन
६. कागज के फूल
७. अनुपिÖथत लोग
८. उतना वह सूरज है । munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
67 ३. गजानन माधव मुिĉबोध (१९१७-१९६४):
१. चाँद का मुँह टेढ़ा है
२. Ăी-भूरी खाक धूल ।
४. ÿभाकर माचवे (१९४७-१९९१):
१. ÖवÈन-भंग
२. अनु±ण
३. तेल कì पकोिड़याँ
४. मेपल ।
५. िगåरजाकुमार माथुर (१९४१-१९९१):
१. नाश और िनमाªण
२. धूप के धान
३. िशला पंख चमकìले
४. मंजीर
५. भीतरी नदी कì याýा
६. जो बंध नहé सका
७. छाया मत छूना मन
८. सा±ी रहे वतªमान
९. कÐपांतर ।
६. नेिमचंþ जैन (१९१९-२००५):
िविभÆन पý पिýकाओं म¤ किवताएँ ÿकािशत ।
७. राम िवलास शमाª (१९९२-२०००):
१. łप-तरंग (ये ÿयोगवादी से अिधक ÿगितवादी किव ह§ और मा³सªवादी समी±क व
आलोचक ह§)
८. भवानीÿसाद िम® (१९१४-१९८५):
१. गीत-फरोश
२. अंधेरी किवताएँ, munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
68 ३. चिकत ह§ दुःख
४. िýकाल संÅया
५. बुनी हòई रÖसी
६. गाँधी पंशशती
७. खुशबू के िशलालेख
८. िýकाल संÅया
९. अनाम तुम आते हो
१०. पåरवतªन िजए
११. मानसरो वर िदन
९. शकुंत माथुर (१९२२-... ):
१. चांदनी चूनर
२. सुहाग बेला
३. कूड़े से भरी गाड़ी ।
१०. नरेश मेहता (१९२७-२०००):
१. बोलने दो चीड़ को
२. मेरा समिपªत एकांत
३. वनपाùी सुनो
४. संशय कì एक रात
५. उÂसवा ।
११. रघुवीर सहाय(१९२९-१९९०):
१. सीिढ़यŌ पर धूप म¤
२. आÂमहÂया के िवŁĦ
३. हंसो हंसो जÐदी हंसो
४. लोग भूल गए ह§ ।
१२. शमशेर बहादुर िसंह (१९९१-१९९३):
१. चुका भी नहé हóं म§ munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
69 २. दिदता
३. बात बोलेगी हम नहé
४. कुछ किवताएँ
५. कुछ और किवताएँ
६. इतने पास अपने ।
१३. हåरनारायण Óयास( १९२३-२०१३)
१. मृग और तृÕणा
२. िýकोण पर सूयōदय ।
१४. धमªवीर भारती(१९२६-१९९७):
१. कनुिÿया
२. ठंडा लोहा
३. सात गीत वषª
४. अंधा-युग ।
१५. ÿयाग नारायण िýपाठी( ):
िविभÆन पý पिýकाओं म¤ किवताएँ ÿकािशत ।
१६. कìितं चौधरी(१९३४-२००८):
१. खुले हòए आसमान के नीचे
२. किवता एँ ।
१७. मदन वाÂÖयायन( १९२२-...)
१. अपथगा
२. शुøतारा ।
१८. केदारनाथ िसंह (१९३४- ):
१. अभी िबÐकुल अभी
२. जमीन पक रही है
३. यहाँ से देखो ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
70 १९. कुंबर नारायण(१९२७-२०१७):
१. चø-Óयूह
२. आÂमजयी
३. पåरवेश
४. हम-तुम
५. आमने-सामने ।
२०. िवजय देव नारायण साही(१९२४-१९८२) :
१. मछली -घर
२. साखी ।
२१. सव¥ĵर दयाल स³सेना(१९२७-१९८४):
१. काठ कì घंिटयाँ
२. एक सूनी नाव
३. गमª-हवाएँ
४. बांध का पुल
५. जंगल का ददª
६. कुआनो नदी
७. बांस के पुल
८. किवता एँ-४,
९. किवता एँ-२,
१०. खूंिटयŌ पर टंगे लोग ।
तार-सĮक परÌपरा के अितåरĉ कुछ अÆय भी ÿयोगवादी किव ह§: चँþकुंवर वÂवाªल, राजेÆþ
यादव, सूयªÿताप । तार सĮक परंपरा के सभी किव ÿयोगवादी हŌ, ऐसी बात भी नहé है ।
रामिवलास शमाª और भवानीÿसाद िम® पर ÿगितवाद का पयाªĮ ÿभाव है ।
इधर मुिĉबोध म¤ एक अलग ही तरह का िवÖफोटक तÂव मौजूद है ।
६.४ ÿयोगवादी किवता कì ÿवृि°याँ ÿयोगवादी किवता म¤ मु´य łप से िनÌनिलिखत ÿवृि°याँ देखी गई ह§:
१. समसामियक जीवन का यथाथª िचýण:
ÿयोगवादी किवता कì भाव -वÖतु समसामियक वÖतुओं और ÓयापारŌ से उपजी है । åर³शŌ munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
71 के भŌपू कì आवाज, लाउड Öपीकर का चीÂकार , मशीन के अलामª कì चीख, रेल के इंजन
कì सीटी आिद कì यथावत अिभÓयिĉ इस किवता म¤ िमलेगी । निलन िवलोचन शमाª ने
बसंत वणªन के ÿसंग म¤ लाउड Öपीकर को अंिकत िकया । ÿÂयुष-वणªन म¤ उÆहŌने åर³शŌ के
भŌपू कì आवाज का उÐलेख िकया । एक अÆय Öथल पर रेल के इंजन कì Åविन का
उÐलेख हòआ । मदन वाÂÖयायन ने कारखानŌ म¤ चलने वाली मशीनŌ कì Åविन का ºयŌ का
ÂयŌ उÐलेख िकया है । समसामियकता के ÿित इनका इतना अिधक मोह है िक इन किवयŌ
ने उपमान तथा िबÌबŌ का चयन भी समसामियक युग के िविभÆन उपकरणŌ से िकया है ।
भारत भूषण अúवाल ने लाउड Öपीकर तथा टाइपराइटर कì उपमान के łप ÿÖतुत िकया ।
रघुवीर सहाय ने भी पिहये और िसनेमा कì रील के उपमानŌ को úहण िकया है । केसरी
कुमार ने Óयवसाियक जीवन के उपमानŌ का ÿयोग िकया है । इसी ÿकार िचिकÂसा तथा
रसायन -शाľ से अनेकŌ उपमान ÿयोगवादी किवयŌ ने úहण िकए ह§ । िगåरजाकुमार माथुर
कì हÊश देश नामक किवता कì िनÌन पाªँĉयां देिखए िजनम¤ औīोिगक और रासायिनक युग
को वाणी ÿदान कì ग ई हैः
उगल रही ह§ खान¤ सोना,
अĂकतांबा, जÖत, øोिनयम
टीन, कोयला , लौह, Èलेिटनम
युरेिनयम, अनमोल रसायन
कोपेक, िसÐक , कपास , अÆन-धन
þÓय फोसफैटो से पूåरत !
२. घोर अहिनķ वैयिĉकता:
ÿयोगवादी किव समाज -िचýण कì अपे±ा वैयिĉक कुłपता का ÿकाशन करके समाज के
मÅयमवगêय मानव कì दुबªलता का ÿकाशन करता है । मन कì नµन एवं अĴील वृि°यŌ का
िचýण करता है । अपनी असामािजक एवं अहंवादी ÿकृित के अनुłप मानव जगत के लघु
और ®ुþ ÿािणयŌ को काÓय म¤ Öथान देता है । भावुकता के Öथान पर बौिĦकता कì ÿितķा
करता है । किव के मन कì िÖथित, अनुभूित, िवचारधारा तथा माÆयता इस किवता म¤ िवशेष
łप से अिभÓयĉ हòई है । Óयिĉ का केवल सामािजक अिÖतÂव ही नहé है,बिÐक उसकì
अपनी भावनाओं का भी एक संसार है । इसिलए इस किवता म¤ अिधक ईमानदारी के साथ
किव के िनजी ददª अिभÓयĉ हòए ह§ ।
मेरी अंतराÂमा का यह उĥेलन-
जो तुÌह¤ और तुÌह¤ और तुÌह¤ देखता है
और अिभÓयिĉ के िलए तड़प उठता है-
यही है मेरी िÖथित, यही मेरी शिĉ ।
चलो उठ¤ अब
अब तक हम थे बंधु munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
72 सैर को आए-
और रहे बैठे तो
लोग कह¤गे
धुंधले म¤ दुबके दो ÿेमी बैठे ह§
वह हम हŌ भी
तो यह हरी घास ही जाने
- अ²ेय
३. िवþोह का Öवर:
इस किवता म¤ िवþोह का Öवर एक ओर समाज और परÌपरा से अलग होने के łप म¤
िमलता है और दूसरी ओर आÂमशिĉ के उद्-घोष łप म¤ । परÌपरा और łिढ़ से मुिĉ पाने
के िलए भवानी ÿसाद िम® कहते ह§:-
ये िकसी िनिIJत िनयम, øम कì सरासर सीिढ़यां ह§
पांव रखकर बढ़ रहé िजस पर िक अपनी पीिढ़यां ह§
िबना सीढ़ी के चढ़¤गे तीर के जैसे बढ़¤गे ।
िवþोह का दूसरा łप चुनौती और Åवंस कì बलवती अिभÓयिĉ के łप म¤ िमलता है । भारत
भूषण अúवाल म¤ Öवयं का ²ान अिधक ÿबल हो उठा िक वे िनयित को संघषª कì चुनौती
देते हòए कहते ह§:
म§ छोड़कर पूजा
³यŌिक पूजा है पराजय का िवनत Öवीकार-
बांधकर मुęी तुझे ललकारता हóँ
सुन रही है तू?
म§ खड़ा यहां तुझको पुकारता हóँ ।
आततायी सामािजक पåर वेश को चुनौती देते हòए अ²ेय कहते ह§:
ठहर-ठहर आततायी ! जरा सुन ले
मेरे øुĦ वीयª कì पुकार आज सुन ले ।
वै²ािनक युग ने उसे पुराने चåरýŌ के ÿित शंिकत िकया है, इसिलए वह उनके ÿित कोई
®Ħा नहé रखता । इस किवता के किव को ईĵर, िनयित , मंिदर, दैवी-ÓयिĉयŌ एवं ÖथानŌ म¤
िवĵास नहé है । वह Öवगª और नरक का अिÖतÂव नहé मानता । भारत भूषण अúवाल कì
िनÌन पंिĉयां देिखए-
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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
73 रात म§ने एक ÖवÈन देखा
म§ने देखा
िक मेनका अÖपताल म¤ नसª हो गई
और िवĵािमý ट्यूशन कर रह¤ ह§
उवªशी ने डांस Öकूल खोल िलया है
गणेश टॉफì खा रहे ह§
४. लघु मानव कì ÿितķा:
ÿयोगवादी काÓय म¤ लघु मानव कì ऐसी धारणा को Öथािपत िकया गया है जो इितहास कì
गित को अÿÂयािशत मोड़ दे सकने कì ±मता रखता है; धमªवीर भारती कì ये पंिĉयां
देिखए:
म§ रथ का टूटा पिहया हóँ.
लेिकन मुझे फ¤को मत
इितहासŌ कì सामूिहक गित
सहसा झूठी पड़ जाने पर
³या जाने
स¸चाई टूटे हòए पिहयŌ का आ®य ले
इस किवता म¤ मानव के लघु ÓयिĉÂव कì उस शिĉ पर गौरव तथा अिभमान अिभÓयĉ
हòआ है जो Óयिĉ कì मह°ा कì चरम सीमा का Öपशª करती है ।
५. अनाÖथावादी तथा संशयाÂमक Öवर:
डॉ. शंभूनाथ चतुवेदê ने अनाÖथामूलक ÿयोगवादी काÓय के दो प± Öवीकार िकए ह§ । एक
आÖथा और अनाÖथा कì ĬंĬमयी अिभÓयिĉ , जो वÖतुतः िनराशा और संशयाÂमक
ŀिĶकोण का संकेत करती है । दूसरी, िनतांत हताशापूणª मनोवृि° कì अिभÓयिĉ ।
कुंठा एक अनाÖथामूलक वृि° है । ÿयोगवादी किव अपनी कुंठाओं और वासनाओं को
िछपाने म¤ िवĵास नहé रखता, इसिलए वह इनका नµन łप ÿÖतुत कर देता है । धमªवीर
भारती कì िनÌनांिकत पंिĉयां देिखए:
अपनी कुठाओं कì
दीवारŌ म¤ बंदी
म§ घुटता हóं
ÿयोगवादी किवता म¤ पÖती, पराजय और अिवĵास कì अिभÓयिĉ के łप म¤ भी अनाÖथा
को ÿमुख Öथान िमला है । िवजयदेव नारायण साही ने भी Óयिĉ या समाज को आøांत
करने वाली अनाÖथा का भी ÖपĶ ÿकाशन िकया है, और संपूणª समाज अथवा Óयिĉ िवशेष munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
74 से अनाÖथा के तÂवŌ को úहण करने का भी संदेश िदया है-
हर आंसू कायरता कì खीझ नहé होता
बाहर आओ
सब साथ िमलकर रोओ
६. आÖथा तथा भिवÕय के ÿित िवĵास:
जहाँ ÿयोगवाद के कुछ किवयŌ ने अनाÖथावादी और संशयाÂमकता को Öवर िदए वहé कुछ
अÆय किवयŌ ने जैसे नरेश मेहता तथा रघुवीर सहाय ने काÓय म¤ अनाÖथायूलक तÂवŌ को
अनावÔयक पाया । िगåरजाकुमार माथुर के काÓय म¤ आÖथा के बल पर नव-िनमाªण का Öवर
मुखåरत हòआ है । हåरनारायण Óयास तथा नरेश मेहता म¤ भी आÖथामूलक वृि°यŌ के ÿित
आúह है । आÖथा का पहला łप पुरोगामी संकÐप का सूचक है |अ²ेय कì कुछ किवताओं
म¤ भी आÖथा कì सफल अिभÓयिĉ हòई है:
म§ आÖथा हóँ
तो म§ िनरंतर उठते रहने कì शिĉ हóँ.
जो मेरा कमª है, उसम¤ मुझे संशय का नाम नहé
वह मेरी अपनी सांस-सा पहचाना है
आÖथा के दूसरे łप म¤ सजªन-शिĉ अथवा कमª-िनķा कì भावना र हती है । अÆयý अ²ेय ने
आÖथा के माÅयम से पूणªता के उ¸चतम धरातल पर ÿितिķत होने कì बात का संकेत
िकया है:
आÖथा न कांपे, मानव िफर िमĘी का भी देवता हो जाता है ।
७. वेदना कì अनुभूित का ÿयोग:
ÿयोगवादी किव वेदना से पालायन न करके, उसके सािÆनÅय कì अिभलाषा करते ह§ । इसे
उसने दो łपŌ म¤ Öवीकार िकया है-एक तो वेदना को सहन करने कì लालसा और दूसरे
वेदना या पीड़ा कì अतल गहराइयŌ म¤ बैठ कर नए अथª कì उपलिÊध के łप म¤ । भारत
भूषण अúवाल वेदना को उÂसाहविधªनी मानते ह§ :
पर न िहÌमत हार
ÿºविलत है ÿाण म¤ अब भी Óयथा का दीप
ढाल उसम¤ शिĉ अपनी
लौ उठा
मुिĉबोध कì माÆयता है िक वेदना अथवा पीड़ा के अवशेष मानव कì संघषª-शिĉ को
उभारते ह§ ।
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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
75 ८. समिĶ कÐयाण कì भावना:
इस किवता म¤ ÓयिĶ के सुख कì अपे±ा समªĶे के कÐयाण को अिधक महßव िदया गया है ।
रघुवीर सहाय सूयª से धरती के जीवन को मंगलमय बनाने कì ÿाथªना करते हòए कहते ह§:
आओ Öवीकार िनमंýण यह करो
तािक, ओ सूयª, ओ िपता जीवन के
तुम उसे Èयार से वरदान कोई दे जाओ
िजससे भर जाये दूध से पृÃवी का आंचल
िजससे इस िदन उनके पुýŌ के िलए मंगल हो
समिĶ िहत के िलए किव अपने Óयिĉवाद तथा अहं का िवसजªन करने को भी तÂपर है ।
अ²ेय का अकेला मदमाता दीपक अहं का ÿतीक है उसे वे पंिĉ को समिपªत करने के िलए
कहते ह§:
यह दीप अकेला Öनेह भरा
है गवª भरा मदमाता,पर
इसको भी पंिĉ को दे दो
९. वासना कì नµन अिभÓयिĉ:
छायावादी कÐपना म¤ ÿकृित के अनेक łप-रंगŌ का िचýण था, ÿगितवाद कì किवता म¤
सामािजक यथाथª कì ÿवृित रही तो ÿयोगवादी किवता म¤ Āायड के मनोिवĵेषण के ÿभाव
से नµन यथाथªवाद का िचýण इस किवता म¤ हòआ । इस म¤ साधनाÂमक ÿेम का अभाव है
मांसल ÿेम एवं दिमत वासना कì अिभÓयिĉ ही अिधक हòई है । ÿयोगवादी किव अपनी
ईमानदारी अपनी यौनवजªनाओं के िचýण म¤ ÿदिशªत करता है । जब वह ऐसा करता है तो
से³स को समÖत मानव ÿवृि°यŌ और ÿेरणाओं का क¤þ-िबंदु मानता है । कुंवरनारायण ने
यौनाशय को अÂयिधक महßव िदया :
आमाशय
यौनाशय
गभाªशय
िजसकì िजंदगी का यही आशय
यहé इतना भोµय
िकतना सुखी है वह
भाµय उसका ईÕयाª के योµय
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
76 धमªवीर भारती ने तो संभोग-दशा का ÖपĶ िचý ही उतार िदया है:
म§ने कसकर तुÌह¤ जकड़ िलया है
और जकड़ती जा रही हóंऔर िनकट ,और िनकट
और तुÌहारे कंधो पर,बांहŌ पर,होठŌ पर
नागवधू कì शुĂ दंत-पंिĉयŌ के
नीले-नीले िचĹ उभर आये ह§:
इसी ÿकार एक उदाहरण और देिखए--
नंगी धूप, चूमते पुĶ व±
दूिधया बांह¤ रसती केसर-फूल
चौड़े कपूरê कूÐहŌ से दबती
सोफे कì एसवगê चादर
रेशम जांघŌ से उकसé
टांगŌ कì चंदन डडाल¤ १
१०. ±ण कì अनुभूित:
ÿयोगवादी किवता म¤ ±ण िवशेष कì अनुभूित को यथाłप ÿÖतुत करने कì ÿवृि° है । इस
युग का किव ±ण म¤ ही संपूणªता के दशªन करता है:

एक ±ण: ±ण म¤ ÿवाहमान
ÓयाĮ संपूणªता
इस से कदािप बड़ा नहé था महबुिध जो:
िपया था अगÖÂय ने ।
जीवन के ये ±ण सुख-दुख,संयोग-िवयोग , आशा-िनराशा िकसी भी łप म¤ हो सकते ह§ । इस
िलए इस किवता म¤ िविवधता व िवरोधी ÿवृि°याँ एक साथ समािवĶ हो गई ह§ । धमªवीर
भारती कì किवता म¤ िवरोधी अनुभूितयŌ का (आÅयािÂमक एवं भौितक) सुंदर समÆवय हòआ
है ।
फूल झर गए ।
±ण भर कì ही तो देरी थी
अभी अभी तो ŀिĶ फेरी थी
इतने म¤ सौरभ के ÿाण हर गए,
फूल झर गए । munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
77 ११. भदेसपन:
ÿयोगवादी किवयŌ ने ÿयोग कì लालसा म¤ उन सभी कुŁितयŌ, िवकृितयŌ तथा भĥे ŀÔयŌ
को भी किवता म¤ िचिýत िकया है जो जीवन और समाज म¤ ÓयाĮ रह¤ ह§, लेिकन उपेि±त ।
इÆह¤ िचिýत करने के पीछे ÿयोगवादी किवयŌ का तकª है िक जीवन म¤ सभी कुछ सुंदर नहé
होता,बिÐक असुंदर और घृिणत वÖतु तथा ŀÔय भी जीवन से जुड़े रहते ह§ । इसिलए जीवन
कì पूणªता म¤ ये Âयाºय नहé ह§ और िघनौनी चीजŌ म¤ सŏदयª देखने के िलए िवशेष साधना
अपेि±त है । इससे किवता म¤ जुगुÈसा उÂपÆन होती है ।
अ²ेय कì किवता का एक उदाहरण देिखए:
िनकटतर धंसती हòई छत, आड़ म¤ िनव¥द
मृý-िसंिचत मृि°का के वृ° म¤
तीन टांगŌ पर खड़ा नत úीव
धैयª, धन, गदहा
१२. Óयंµय:
Óयंµय का गहरा पुट इस किवता कì िवशेषता रही है । आधुिनक जीवन कì िवसंगितयŌ पर,
लोगŌ के बदलते हòए łपŌ पर, सËयता के नाम पर फैले शोषण पर, राजनीित कì कुिटल
चालŌ पर , धमª के ÓयापारŌ पर, यह किवता Óयंµय करती है । आज के जीवन का
खोखलापन ,Öवाथªपरता का भाव किव के मन को खीझ से भर देता है । इसिलए वह इन पर
गहरा Óयंµय करता है ।
अ²ेय कì किवता सांप म¤ शहरी सËयता पर करारा Óयंµय है:
सांप तुम सËय तो हòए नहé, न होगे,
नगर म¤ बसना भी तुÌह¤ नहé आया
एक बात पूछुँ! उ°र दोगे ।
िफर कैसे सीखा डसना
िवष कहां पाया ।
१३. काÓय िशÐप म¤ नए ÿयोग:
िशÐप के ±ेý म¤ ÿयोगवादी किवयŌ के काÓय म¤ अपूवª øांित िदखाई पड़ती है । मुिĉबोध के
काÓय म¤ वøता से सरलता कì ओर जाने कì ÿवृि° संकेतŌ के माÅयम से अिभÓयĉ हòई है ।
िगåरजाकुमार माथुर ने काÓय म¤ िवषय कì अपे±ा टेकिनक पर अिधक Åयान िदया । भाषा,
Åविन तथा छंद-िवधान म¤ उÆहŌने नवीन ÿयोग िकए । ÿभाकर माचवे ने नई अलंकार-
योजना , िबÌब-िवधान और उपमानŌ के नए ÿयोग िकए । अ²ेय ने साधारणीकरण कì ŀिĶ
से भाषा संबंधी नवीनता को अिधक महßव िदया | शमशेर बहादुर िसंह ने Āांसीसी
ÿतीकवादी किवयŌ के ÿभाव म¤ पयाªĮ ÿयोग िकए, िजनके कारण उÆह¤ किवयŌ का किव कहा munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
78 जाने लगा । ÖपĶ है िक ÿयोगवादी किवयŌ ने भाषा, लय, शÊद, िबÌब तथा छंद-िवधान
संबंधी नए ÿयोगŌ पर बहòत Åयान िदया ।
१४. िबÌब योजना:
ÿयोगवादी किवता म¤ िबÌब-योजना बड़ी सफलता के साथ कì गई है । इस किवता से पूवª कì
िकसी किवता म¤ इतने अिधक ÖपĶ िबÌब उतर¤ ह§, इसम¤ संदेह है । िबÌब योजना के िवषय म¤
ÿयोगवािदयŌ कì बहòत बड़ी िवशेषता यह है िक इनके िबÌब िनताÆत सजीव ह§ | ÿाकृितक-
िबÌबŌ का एक उदाहरण þĶÓय है:
बूंद टपकì एक नभ से
िकसी ने झुककर झरोखे से
िक जैसे हंस िदया हो
यहां बूंद टपकने और झरोखे से झांककर हंसने म¤ साŀÔय िदखाया गया है । झरोखे से हँसी
देखने के िलए िनगाह ऊपर उठती है और टपकती बूंद भी आकाश कì ओर बरबस नेýŌ को
खéच लेती है । इस िबÌब म¤ अनुभूित कì सूàमता तथा गहराई दशªनीय है ।
१५. नए उपमान:
अÿÖतुत-योजना म¤ ÿयोगवादी किवयŌ ने पुराने उपमानŌ का पूणªतः पåरÂयाग कर िदया है ।
इनके उपमान एकदम नए ह§ । इनके अÿÖतुत-िवधान कì ÿमुख िवशेषता यह है िक वे जीवन
से गृहीत ह§,उनकì संयोजना के िलए कÐपना के पंखŌ पर नहé उड़ा गया है । उदाहरण के
िलए ÿभाकर माचवे कì ये दो पंिĉयां देिखए-
नोन-तेल लकड़ी कì िफø म¤ लगे घुन से
मकड़ी के जाले से, कोÐहó के बैल से ।
उपमान कì नवीनता मुिĉबोध कì इन पंिĉयŌ म¤ भी देखते ही बनती है,िजनम¤ उÆहŌने नेýŌ
के िलए लालटेन और पांवŌ के िलए ÖतÌभ के उपमानŌ को चुना है:
अंतªमनुÕय
åरĉ सा गेह
दो लालटेन से नयन
िनÕÿाण ÖतÌभ
दो खड़े पांव
कुछ और उदाहरण देिखए-
Èयार का नाम लेते ही
िबजली के Öटोव सी munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
79 जो एकदम सुखª हो जाती है
आपरेशन िथयेटर सी
जो हर काम करते हòए चुप है
१६. असंगत अनुषंग का ÿयोग:
इिलयट के काÓय-Öवłप ÿयोगवादी किवयŌ म¤ असंगत अनुषंगŌ (Āì एशोिसएशंस ) कì
भरमार िमलती है, िजससे इनका काÓय अÂयिधक दुŁह हो गया है । जहां पर ये किव
असंगत अनुषंगŌ का ÿयोग करने लग जाते ह§, वहां पर इनकì िवचारधारा म¤ पूवाªपर का
संबंध न होने के कारण िकसी एक िनिIJत अथª पर पहòंचना मुिÔकल हो जाता है । ÿयोगवादी
किवता म¤ सवªÿथम इस ÿवृि° का अवतरण अ²ेय ने िकया उसके बाद इसका बहòत अिधक
ÿयोग होने लगा । असंगत अनुषंग अथवा असंबĦता के िलए यहाँ नरेश कì कुछ पंिĉयां
उĦृत ह§:
ई से ईĵर
उ से उÐलू--
मांजी ?
नहé जी
वह पंछी
जो देखता है रात भर

ÿÖतुत पंिĉयŌ का बड़ी माथा -प¸ची करने पर ही यह अथª िनकाला जा सकता है िक किव
िकसी का यª म¤ ÓयÖत है िक इतने म¤ उसका ब¸चा ई से ईĵर, उ से उÐलू रटता हòआ उसके
पास आता है और सहसा किव से अपनी माँ जी के िवषय म¤ ÿij करता है । किव संभवतः
यह समझता है िक लड़का कदािचत यह पूछना चाहता है िक ³या माँ उÐलू ह§ ? किव ÿij
को जैसा समझता है,उसके अनुसार उ°र देता हòआ कहता है िक नहé माँ जी उÐलू नहé ह§
। उÐलू तो एक प±ी है जो रात भर देखता है । ÖपĶतः असंगत अनुषंग ÿयोगवादी किवता
को समझने म¤ बड़ी बाधा उÂपÆन करते ह§ । इसम¤ साधारणीकरण का सवªथा अभाव है ।
१७. नवीन शÊद-चयन:
एक ओर शÊद चयन म¤ ÿयोगवादी किव बहòत उदारता के साथ úामीण,देशज तथा ÿचिलत
शÊदŌ को अपनाता है वहé दूसरी ओर संÖकृत और अंúेजी का Óयापक ÿयोग भी करता है ।
Óयाकरण के िनयमŌ से िचपक कर रहना भी उसे सĻ नहé । अतः भाषा के एक नए ढ़ंग का
नयापन आ गया है । इसम¤ नए िøयापद भी बनते ह§ । नए शÊदŌ म¤ बितयाना, लÌबाियत ,
िबलमान , अिÖमता , ईÈसा, ि³लÆत , इय°ा , पारिमता आिद । इस ÿकार शÊदŌ को तोड़ा
मरोड़ा गया है । इसके अलावा इन किवयŌ ने िव²ान, दशªन, मनोिव²ान से भी शÊद úहण
िकए ह§ । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
80 १८. नवीन-ÿतीक:
आज के जीवन और जगत के साथ-साथ आम आदमी को , वै²ािनक िøयाओं को,शÊदŌ
और ÿभावŌ को ÿयोगवादी किवता म¤ Öथान िदया गया है । मनोिव²ान से भी ÿतीक चुने गए
ह§ । किवयŌ ने सवªथा पुराने ÿतीकŌ को Âयाग कर नवीन ÿतीकŌ को úहण िकया है ।
मुिĉबोध के ÿतीकŌ म¤ āĺरा±स, ओरांग-उटांग, गांधी, सुभाष, ितलक , रावण, वटवृ±
आिद ÿिसĦ ÿतीक ह§ । नए ÿतीक जैसे Èयार का बÐब Éयूज हो गया, भी देखे जाते ह§ ।
१९. छंद-िवधान:
ÿयोगवािदयŌ ने छंद-िवधान म¤ तो आमूल-चूल पåरवतªन कर िदया है । यहाँ िविभÆन तरह के
ÿयोग हòए ह§ । छंदŌ के परÌपरागत मािýक łपŌ से उसका कोई संबंध नहé रह गया है । इससे
किवता म¤ कभी लय और गित का अभाव उÂपÆन होता है और कभी उसम¤ काÓयाÂमकता के
Öथान पर गīाÂमकता आ जाती है । एक ओर लोकगीतŌ कì धुनŌ के आधार पर किवताओं
कì रचना हòई है वहé दूसरी ओर उदूª कì łबाइयŌ और गजलŌ का ÿभाव भी किवता पर पड़ा
है । अंúेजी के सॉनेट से िमलती-जुलती किवता भी इन किवयŌ ने िलखी । यह छंदहीन
किवता मुĉक छंद को अपनाती है ।
भारत भूषण अúवाल कì किवता का एक उदाहरण, िजसम¤ काÓय गīाÂमक हो गया है:
तुम अमीर थी
इसिलए हमारी शादी न हो सकì
पर मान लो , तुम गरीब होती--
तो भी ³या फकª पड़ता
³यŌिक तब
म§ अमीर होता
अ²ेय कì एक किवता का अंश िजसम¤ लोक-गीत के आधार पर सरल काÓय रचना कì
गई है:
मेरा िजया हरसा
जो िपया ,पानी बरसा
खड़-खड़ कर उठे पात
'फड़क उठे गात
इस ÿकार हम देखते ह§ िक ÿÂयेक ±ेý म¤ नवीनता का आúह ÿयोगवाद कì उपलिÊध है ।
इसी के चलते कहé-कहé यह किवता दुŁह भी हो गई है । इसके िलए डॉ. नगेÆþ ने पांच
कारणŌ को ÿमुख माना,
१. भावतßव और काÓयानुभूित के मÅय रागाÂमक के Öथान पर बुिĦगत संबंध munotes.in

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ÿयोगवाद (१९४३-१९५२)
81 २. साधारणीकरण का Âयाग
३. उपचेतन मन के खंड अनुभवŌ का यथावत िचýण
४. भाषा का एकांत एवं अनगªल ÿयोग तथा
५. नूतनता का सवªúाही मोह ।
६.५ सारांश ÿयोगवाद ने बौिĦक धारणा का अवलंबन िकया इन किवयŌ का ŀिĶकोण यथाथªवादी था
इसी कारण यह का Óय िनराशा, कुķा और वासना कì और कब िखच गया पता ही नहé चला।
आशा है िक िवīाथê इस इकाई के अÅययन से ÿयोग वाद और उनसे जुड़े सभी मुĥŌ का
अÅययन कर सक¤।
६.६ दीघō°री ÿij १. ÿयोगवाद कì िवशेषताओं का वणªन िकिजए।
२. ÿयोगवादी किवता म¤ पनप रही आधुिनक कुचंबनाओं को सौदाहरण समझाइए।
३. ÿयोग वादी ÿवृि°यŌ का सौदाहरण वणªन कìिजए।
६.७ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij १. ÿयोगवाद कì कालाविध कब से कब तक मानी गयी है?
उ°र: सन् १९४३ से १९५२ तक
२. तारसĮक का ÿथम संपादन िकसने िकया?
उ°र: अ²ेय
३. दूसरे तारसĮक का ÿकाशन कौनसे वषª म¤ हòआ?
उ°र: सन् १९५१
४. ÿथम तारसĮक के िकÆही चार किवयŌ के नाम लीिखए?
उ°र: अ²ेय, भारत भूषण अúवाल, मुिĉबोध, ÿभाकर माचवे।
५. ÿयोगवाद म¤ कौनसा वाद शािमल है?
उ°र: नकेनवाद, या ÿपīवाद
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
82 ६.८ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास - डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह


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83 ७
नई किवता (१९५२-१९६०)
इकाई कì łपरेखा
७.० इकाई का उĥेÔय
७.१ ÿÖतावना
७.२ नई किवता
७.३ नई किवता कì िवशेषताएँ
७.४ सारांश
७.५ दीघō°री ÿij
७.६ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij
७.७ संदभª úंथ
७.० इकाई का उĥेÔय इस इकाई म¤ नई किवता पर िवÖतृत अÅययन िकया जाएगा। नई किवता का अथª, पåरभाषा
और नई किवता कì ÿवृि°याँ को हम िवÖतार से जान सक¤गे।
७.१ ÿÖतावना ÿयोगवाद व नई किवता म¤ भेद रेखा ÖपĶ नहé है । एक ÿकार से ÿयोगवाद का िवकिसत
łप ही नई किवता है । ÿयोगवाद को इसके ÿणेता अ²ेय कोई वाद नहé मानते । वे तार-
सĮक (१९४३) कì भूिमका म¤ केवल इतना ही िलखते ह§ िक संगृहीत सभी किव ऐसे हŌगे
जो किवता को ÿयोग का िवषय मानते ह§ जो यह दावा नहé करते िक काÓय का सÂय उÆहŌने
पा िलया है । केवल अÆवेषी ही अपने को मानते ह§ । साथ ही अ²ेय ने यह भी ÖपĶ िकया िक
“वे िकसी एक Öकूल के नहé ह§, िकसी मंिजल पर पहòंचे हòए नहé ह§, अभी राही ह§-राही नहé ,
राहŌ के अÆवेषी । उनम¤ मतै³य नहé है, सभी महÂवपूणª िवषयŌ पर उनकì राय अलग-अलग
है ।'” इस ÿकार केवल काÓय के ÿित एक अÆवेषी का ŀिĶकोण उÆह¤ समानता के सूý म¤
बांधता है । ÿयोगवाद नाम इस काÓय-िवशेष के िवरोिधयŌ या आलोचकŌ Ĭारा िदया गया ।
अ²ेय ने ÿयोगवाद नाम का लगातार ÿितवाद िकया है । उनका कहना है िक “ÿयोग कोई
वाद नहé है-िफर भी आIJयª कì बात है िक यह नाम Óयापक Öवीकृित पा गया । ÿयोग शÊद
जैसे 'ए³सपेåरम¤ट का िहंदी पयाªय है वैसा ही 'ए³सपेåरम¤टिलºम जैसा कोई समानांतर
आधार नहé िमलता है । इस ÿकार का कोई वाद यूरोपीय सािहÂय म¤ भी नहé चला ।''
ÿगितवािदयŌ और नंददुलारे वाजपेयी ने अ²ेय और ÿयोग कì ŀिĶ पर जो आ±ेप लगाए,
उनका करारा जवाब अ²ेय ने दूसरा सĮक (१९५४) और तीसरा सĮक (१९५९) कì
भूिमकाओं म¤ िदए ह§ । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
84 ७.२ नई किवता दूसरा सĮक कì भूिमका म¤ यह ÖपĶ कहा गया िक ''ÿयोगवाद कोई बाद नहé है । इन किवयŌ
को ÿयोगवादी कहना इतना ही साथªक या िनथªक है िजतना इÆह¤ किवतावादी कहना । ''दूसरे
सĮक के अिधकांश किवयŌ के वĉÓयŌ म¤ नए किवयŌ का उÐलेख हòआ है और Öवयं अ²ेय
ने िलखा है िक “ÿयोग के िलए ÿयोग इन म¤ से भी िकसी ने नहé िकया है, पर नई समÖयाओं
और नए दाियÂवŌ का तकाजा सब ने अनुभव िकया है और उससे ÿेरणा सभी को िमली है ।
दूसरा सĮक नए िहंदी काÓय को िनिIJत łप से एक कदम आगे ले जाता है ।'' सन् १९५१
म¤ एक रेिडयो गोķी हòई थी, िजसम¤ सुिमýानंदन पंत, भगवती चरण वमाª, अ²ेय, धमªवीर
भारती और िशवमंगल िसंह सुमन जैसे किवयŌ ने भाग िलया । इस गोķी म¤ नवीन ÿवृि°
वाली किवता धारा के िलए ÿयोग शÊद का ÿयोग हòआ । लेिकन अ²ेय ने तारसĮकìय
किवता के िलए नई किवता नाम कì ÿÖतावना कì । इसी नाम को लेकर सन् १९५३ म¤
“नए प°े” नाम से और सन् १९५४ म¤ “नई किवता ” नाम से पिýकाओं का ÿकाशन शुł
हòआ । “नए प°े” का संपादन डॉ. रामÖवłप चतुव¥दी और डॉ. लàमीकांत वमाª ने संभाला ।
“नई किवता ” का संपादन दाियÂव डॉ. रामÖवłप चतुव¥दी और डॉ. जगदीश गुĮ ने उठाया ।
यहé से ÿयोगवादी कही जाने वाली किवता को एक नया नाम “नई किवता ' िमल गया । “नई
किवता ” १९५४ से १९६७ तक ÿकािशत होती रही । जो एक अधªवािषªक पिýका थी । इस
पिýका म¤ नए-नए किवयŌ को Öथान िमलने लगा । लàमीकांत वमाª, सव¥ĵर, कुंवर नारायण,
िविपन कुमार अúवाल और ®ीराम वमाª जैसे किव इस पिýका कì ही देन ह§ । इन किवयŌ कì
रचनाएँ रघुवंश, िवजयदेवनारायण साही, अ²ेय जैसे काÓय ममª²Ō के लेखŌ के साथ
ÿकािशत होती थी । िजसम¤ नवीन भावŌ को ÿमुखता के साथ ÿकािशत िकया जाता था ।
अंधा-युग और कनुिÿया के अंश सवªÿथम नई किवता म¤ ही ÿकािशत हòए, िजनम¤ आधुिनक
संवेदना कì एक िविशĶ पहचान मौजूद थी । संचयन Öतंभ के अंतगªत अनेक युवा किवयŌ
को Öथान िमला । उÐलेखनीय है िक नई किवता का नामकरण अ²ेय Ĭारा ही िकया गया है
और वे इस नाम के अंतगªत तार-सĮकŌ के किवयŌ या बाद म¤ पåरमल, ÿतीक , नए प°े, नई
किवता म¤ Öथान पाने वाले किवयŌ कì रचनाओं के िलए करना अिधक सही पाते ह§, बजाय
ÿयोगवाद के । इस नाम को अपनाने से जहाँ समसामियक युग बोध का बोध होता है वहé
पूवªवतê किवयŌ से िवषय-वÖतु और शैली कì िभÆनता भी ÖपĶ हो जाती है । वाÖतव म¤ यह
नाम सन् १९३० म¤ लंदन म¤ िúयसªन Ĭारा Æयू वसª (New Verse) नाम से संपािदत पिýका
का अ±रशः िहंदी अनुवाद है । दूसरे महायुĦ के कुछ वषª पूवª से ही यूरोपीय सािहÂय म¤,
िवशेषकर Ā¤च और अंúेजी म¤ परÌपरा से मुĉ, नए ढंग कì किवताओं का चलन शुł हो गया
था । इनम¤ जहाँ एक ओर बुिĦवाद का आधार िलया गया वहé दूसरी ओर वÖतुवाद पर
आधाåरत भावाÂमक ÿितिøया कì अिभÓयिĉ भी थी । अंúेजी के ÿिसĦ किव 'इिलयट '
तथा 'लार¤स' म¤ ये दोनŌ िवशेषताएं देखी जा सकती ह§ । अंúेजी के मा³सªवादी किव 'ओडेन'
का नाम भी इस नए आंदोलन के साथ जुड़ा है । सन् १९५० के आसपास िवदेशŌ म¤
समसा मियक किवता को नई किवता ( New Poetry) कहने का åरवाज चला । जी.एस.
फेजर ने समसामियक किवता को Æयूमूवम§टस कहा । डेनाÐड हाल ने अमरीका कì िवगत ५
वषŎ कì किवता म¤ ÿगित को "Æयू पोइůी” कहा । अÆय यूरोपीय व एिशयाई देशŌ म¤ भी नई
पीढ़ी कì काÓय रचना को नूतन नामŌ Ĭारा अिभिहत िकया गया । भारत म¤ भी यह हवा आई
और अब तक ÿयोगवादी नाम से बदनाम किवता नई किवता हो गई । munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
85 कुछ आलोचक नई किवता और ÿयोगवाद को अलग करने के िलए “नई किवता ' को
समाजोÆमुख मानते ह§, जबिक ÿयोगवाद को घोर अहंिनķ । उनके अनुसार नई किवता म¤
सामािजक तनावŌ , सामािजक मूÐयŌ, सामािजक वैषÌयŌ और कुंठाओं को ÖवÖथ
अिभÓयिĉ िमली है जबिक ÿयोगवाद म¤ यह पूणªतः वैयिĉक और नµन थी और समाज से
पूरी तरह कटी हòई थी । नई किवता समाज सापे± बनी है, जबिक ÿयोगवादी कही जाने
वाली किवता पूणªतः समाज-िनरपे± थी । डॉ. धमªवीर भारती ने िलखा है िक “ÿयोगवादी
किवता म¤ भावना है, िकंतु हर भावना के आगे ÿij िचĹ लगा है । इसी ÿij िचĹ को आप
बौिĦकता कह सकते ह§ ।'' परंतु नई किवता ÿयोगवाद कì अगली कड़ी इस अथª म¤ है िक
अब किवयŌ ने ÿij-िचļŌ के उस आवरण को उतार फ¤का है । अब यह किवता ÿij िचĹ माý
न रहकर समाज और जीवन के Óयापक सÂयŌ को खंड-खंड िचýŌ के łप म¤ ही सही
साधारणीकृत होकर समú ÿकार कì सÌÿेषणीयता से अिÆवत हो गई है । इसम¤
साधारणीकरण कì समÖया अब नहé रह गई है । किवता के पुराने आचायŎ और समी±कŌ व
आलोचकŌ ने नई किवता का बड़ा भारी िवरोध िकया । यह िवरोध छायावाद भी झेल चुका
था और ÿयोगवाद भी । लेिकन नई किवता ने मूÐयबोध कì जो समÖयाएं उठाई, उसके
सÌमुख पुरानी पीढ़ी को पÖत होना पड़ा । डॉ. लàमीकांत वमाª ने पुरने आलोचकŌ को जवाब
देने के िलए “नई किवता के ÿितमान' पुÖतक िलखी । िजस पर Óयापक चचाª हòई । 'अथª कì
लय', 'रसानुभूित और सहानुभूित', 'लघुमानव के बहाने िहंदी किवता पर एक बहस' जैसे
िनबंधŌ से आलोचना के ±ेý के िदगज आलोचक भी भौचका रह गए । रस िसĦांत को
चुनौती देकर कहा गया िक किवता का नया सŏदयª बोध अब रस ÿितमान से नहé समझा-
समझाया जा सकता है ³यŌिक रस का आधार है अĬंद्, समािहित , संिवद िव®ांित जबिक
नई किवता का आधार है इंþ, तनाव, िघराव , संघषª, बेचैनी, िच° कì Óयाकुलता, बौिĦक
तािकंक िÖथित । नई किवता भाव क¤िþत न होकर िवभाव या िवचार के तनाव कì किवता है
िजससे जीवन जगत के वाÖतिवक दुखते-कसकते अनुभवŌ को Öथान िमलता है । इस
ÿकार नई किवता आÆदोलन म¤ काÓय कì अंतवªÖतु, ÿयोग-परÌपरा -आधुिनकता,
समसामियकता , ÿतीक , काÓय-िबÌब, अथª कì लय, काÓय-याýा कì सजªनाÂमकता, िमथक
आिद पर नए ढ़ग से िवचार िकया गया । नई किवता के अिधकांश किव तार-सĮकŌ के ही
किव ह§ तथा ÿयोगवादी और नई किवता म¤ बहòत कुछ समतापरक होने पर भी साठो°री
किवयŌ ने नई किवता को ÿयोगवाद के पयाªयवाची के łप म¤ Öवीकार नहé िकया और उसे
अनेक नाम देकर ÿयोगवाद से अलग ठहराया ।
कुछ अÆय िवĬानŌ के अनुसार नई किवता कì पåरभाषा:
डॉ. रघुवंश:
नई किवता म¤ अÆवेषण कì िदशा म¤ नए ि±ितज उभर आए ह§, यथाथª को नई ŀिĶ िमली है,
संøमण के बीच नए मूÐयŌ कì संभावना आभािसत हòई है, साथ ही भाव -बोध के नए ÖतरŌ
और आयामŌ को उद्-घािटत करने के िलए उपयुĉ भाषा-शैली तथा िशÐप कì उपलिÊध भी
हòई है ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
86 डॉ. यश गुलाटी:
यह नया नाम वाÖतव म¤ उन किवताओं के िलए Łढ़ हो गया है जो आजादी के बाद बदले हòए
पåरवेश म¤ िजंदगी कì जिटल और चकरा देने वाली वाÖतिवकताओं को झेल रहे मानव कì
पåरवितªत संवेदनाओं को नए मुहावरŌ म¤ अिभÓयĉ करती ह§ ।
डॉ. रामदरश िम®:
नई किवता भारतीय Öवतंýता के बाद िलखी गई उन किवताओं को कहा गया िजनम¤
परÌपरागत किवता से आगे भावबोधŌ कì अिभÓयिĉ के साथ ही नए मूÐयŌ और नए िशÐप
िवधान का अÆवेषण िकया गया है ।
डॉ. गणपितचंþ गुĮ:
नई किवता नए समाज के, नए मानव कì , नई वृि°यŌ कì, नई अिभÓयिĉ , नई शÊदावली म¤
है, जो नए पाठकŌ के नए िदमाग पर नए ढंग से नया ÿभाव उÂपÆन करती है ।
डॉ. जगदीश गुĮ:
वह नई किवता उन ÿबुĦ िववेकशील आÖवादकŌ को लि±त करके िलखी जा रही
है,िजनकì मानिसक अवÖथा और बौिĦक -चेतना नए किव के समान है--बहòत अंशŌ म¤ किव
कì ÿगित ऐसे ÿबुĦ भावुक वगª पर आि®त रहती है ।
७.३ नई किवता कì िवशेषताएँ ÿयोगवाद और नई किवता कì ÿवृि°यŌ म¤ कोई िवशेष अंतर नहé िदखाई देता । नई किवता
ÿयोगवाद कì नéव पर ही खड़ी है । िफर भी कÃय कì Óयापकता और ŀिĶ कì उÆमुĉता,
ईमानदार अनुभूित का आúह, सामािजक एवं Óयिĉ प± का संĴेष, रोमांिटक भावबोध से
हटकर नवीन आधुिनकता से संपÆन भाव-बोध एक नए िशÐप को गढ़ता है । वादमुĉ
काÓय,Öवाधीन िचंतन कì Óयापक Öतर पर ÿितķा,±ण कì अनुभूितयŌ का िचýण, काÓय
मुिĉ, गī का काÓयाÂमक उपयोग , नए सŏदयªवोध कì अिभÓयिĉ, अनुभूितयŌ म¤ घनÂव
और तीĄता , राजनीितक िÖथितयŌ पर Óयंµय, नए ÿतीकŌ -िबÌबŌ-िमथकŌ के माÅयम से तथा
आदशªवाद से हटकर नए मनुÕय कì नई मानववादी वैचाåरक भूिम कì ÿितķा नई किवता कì
िवशेषताएँ रहé ह§ । नई किवता कì कुछ ÿमुख िवशेषताएँ िनÌनवत ह§ :-
१. अनुभूित कì स¸चाई तथा यथाथª बोध:
अनुभूित ±ण कì हो या समूचे काल कì,िकसी सामाÆय Óयिĉ (लघुमानव) कì हो या िविशĶ
पुŁष कì, आशा कì हो या िनराशा कì वह सब किवता का कÃय है । समाज कì अनुभूित
किव कì अनुभूित बन कर ही किवता म¤ Óयĉ हो सकती है । नई किवता इस वाÖतिवकता
को Öवीकार करती है और ईमानदारी से उसकì अिभÓयिĉ करती है । इसम¤ मानव को
उसके समÖत सुख-दुखŌ, िवसंगितयŌ और िवडंबनाओं को उसके पåरवेश सिहत Öवीकार
िकया गया है । इसम¤ न तो छायावाद कì तरह समाज से पलायन है और न ही ÿयोगवाद कì
तरह मनोúंिथयŌ का नµन बैयिĉक िचýण या घोर Óयिĉिनķ अहंभावना । यह किवता munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
87 ईमानदारी के साथ Óयिĉ कì ±िणक अनुभूितयŌ को,उसके ददª को संवेदनापूणª ढंग से
अिभÓयĉ करती है:
आज िफर शुł हòआ जीवन
आज म§ने एक छोटी सी सरस सी किवता पढ़ी
आज म§ने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर कर शीतल जल से Öनान िकया
आज एक छोटी सी ब¸ची आयी
िकलक मेरे कंधे पर चढ़ी
आज आिद से अंत तक एक पूरा गान िकया
आज जीवन िफर शुł हòआ
- रघुवीर सहाय
चेहरे थे असं´य
आँख¤ थé
ददª सभी म¤ था
जीवन का दंश सभी ने जाना था
पर दो
केवल दो
मेरे मन म¤ कŏध गयé
म§ नहé जानता िकसकì वे आँखे थी
नहé समझता िफर उनको देखूँगा
पåरचय मन ही मन चाहा तो उīम कोई नहé िकया
िकंतु उसी कì कŏध
मुझे िफर िफर िदखलाती है
वही पåरिचत दो आँख¤ ही
िचर माÅयम ह§
सब आँखŌ से सब ददŎ से
मेरे िचर पåरचय का
- अĵोय
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
88 २. कÃय कì Óयापकता और ŀिĶ कì उÆमुĉता:
नई किवता म¤ जीवन के ÿित आÖथा है । जीवन को इसके पूणª łप म¤ Öवीकार करके उसे
भोगने कì लालसा है । नई किवता ने जीवन को जीवन के łप म¤ देखा, इसम¤ कोई सीमा
रेखा िनधाªåरत नहé कì । नई किवता िकसी वाद म¤ बंध कर नहé चलती । इसिलए अपने
कÃय और ŀिĶ म¤ िवÖतार पाती है । नई किवता का धरातल पूवªवतê काÓय-धाराओं से
Óयापक है, इसिलए उसम¤ िवषयŌ कì िविवधता है । एक अथª म¤ वह पुराने मूÐयŌ और
ÿितमानŌ के ÿित िवþोही ÿतीत होती है और इनसे बाहर िनकलने के िलए Óयाकुल रहती है
। नई किवता ने धमª, दशªन,नीित, आचार सभी ÿकार के मूÐयŌ को चुनौती दी है, यिद ये
माý फारमुल¤ ह§, माý ओढ़े हòए ह§ और जीवन कì नवीन अनुभूित, नवीन िचंतन,नवीन गित
के मागª म¤ आते ह§ । इन माÆय फारमूलŌ को, मूÐयŌ कì िवधातक असंगितयŌ को अनावृत
करना सजªनाÂमकता से असंबĦ नहé है, वरन सजªन कì आकुलता ही है । नई किवता के
किवयŌ म¤ से अिधकांश ÿगितवाद और ÿयोगवाद के खेमŌ म¤ रह चुके थे । ÿगितवाद और
ÿयोगवाद कì अपे±ा अिधक Óयापक मानवीय संदभª, उसकì समÖयाएं और िव²ान के नए
आयाम से जुड़ कर नई किवता ने अपना िवषय िवÖतार िकया । आम आदमी िजस पीड़ा को
झेलता है, औसत आदमी (मÅय -वगêय) िजस जीवन को जीता है, वही लघु मानव इस
किवता का नायक बनता है । उसे इितहास ने अब तक अपने से अलग ही रखा है । इसिलए
नई किवता उसकì पीड़ा , अभाव और तनाव झेलती है:
तुम हमारा िजø इितहासŌ म¤ नहé पाओगे
और न उस कराह का
जो तुम ने उस रात सुनी
³यŌिक हमने अपने को इितहास के िवŁĦ दे िदया है
मनुÕय के भीतर मानवता का अंश शहर-दंश से कैसे नĶ हो जाता है और वह Öवाथª के
संकìणª संसार म¤ जीिवत रहने के िलए कैसे िववश कर िदया जाता है; अ²ेय ने इसी पीड़ा
को किवता म¤ यूं बयाँ िकया है:
बड़े शहर के ढंग और ह§, हम गोट¤ ह§ यहां
दाँव गहरे ह§ उस चोपड़ के
®ीकांत वमाª के शÊदŌ म¤ शहरी िजंदगी का सच:
िचमिनयŌ कì गंध म¤ डूबा शहर
शाम थककर आ रही है कारखानŌ म¤
३. मानवतावाद कì नईं पåरभाषा:
नई किवता मानवतावादी है पर इसका मानवतावाद िमÃया आदशª कì पåरकÐपनाओं पर
आधाåरत नहé है । उसकì यथाथª ŀिĶ मनुÕय को उसके पूरे पåरवेश म¤ समझने का बौिĦक
ÿयास करती है । उसकì उलझी हòईं संवेदना चेतना के िविभÆन ÖतरŌ तक अनुभूत पåरवेश
कì Óया´या करने कì कोिशश करती है । नई किवता मनुÕय को िकसी किÐपत सुंदरता और munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
89 मूÐयŌ के आधार पर नहé, बिÐक उसके तड़पते ददŎ और संवेदनाओं के आधार पर बड़ा
िसĦ करती है । यही उसकì लोक संपृĉ है । अ²ेय कì एक किवता-
अ¸छा
खंिडत सÂय
सुघर नीरÆ® मृषा से
अ¸छा
पीिड़त Èयार
अकंिपत िनमªमता से
अ¸छी कुंठा रिहत इकाई
सांचे ढले समाज से
अ¸छा
अपना ठाठ फकìरी
मंगनी के सुख साज से
अ¸छा साथªक मौन
Óयथª के ®वण मधुर छंद से
अ¸छा
िनधªन दानी का उघड़ा उवªर दुःख
धनी सूम के बंजर धुआं घुटे आनंद से
अ¸छे
अनुभव कì भĘी म¤ तपे हòए कण, दो कण
अंतŀªिĶ के
झूठे नुÖखे łिढ़ उपलिÊध परायी के ÿकाश से
łप िशव łप सÂय सृिĶ के
४. कुठाओं और वजªनाओं से मुिĉ का संदेश:
नई किवता Öवयं को िकसी िवषय से अछूता नहé समझती । नई किवता समाज कì
वजªनाओं और Óयिĉ कì कुंठाओं से िनकल कर ÖपĶ और कोमल अनुभूितयŌ को यथाथª
कì कसौटी पर कस कर अिभÓयिĉ देती है । उसम¤ यिद आदशª के ÿित लगाव नहé है तो
अनुभूित के ÿित ईमानदारी म¤ भी कोई कपट नहé है । नए किवयŌ ने आवाज उठाई िक हम
तो सारा का सारा ल¤गे जीवन कम से कम वाली बात हम से न किहए । रामÖवłप चतुवेदê ने
िहंदी सािहÂय और संवेदना का िवकास म¤ एक माक¥ कì बात कही िक नई किवता इस सारे
के सारे जीवन और गरबीली गरीबी का काÓय है । िजसम¤ Óयिĉ कì चेतना जीवन के सारे
ÓयापारŌ म¤, खेत-खिलहान म¤, नगर-गांव म¤ Óयापक धरातल पर Óयिĉ कì अनुभूितयŌ को munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
90 Öवर देती है । मयाªदा और आÖथा इस साधारण Óयिĉ के िलए कोई मायने नहé रखती-
²ान और मयाªदा
उसका ³या कर¤ हम
उनको ³या पीस¤गे ॥
या उनको खाएंगे ?
या उनको ओढ़ेगे ?
या उनको िबछाएंगे ॥
५. िववेक और िवचार कì किवता:
नई किवता म¤ केवल भाव-बोध कì अंधी ®Ħा नहé है बिÐक उसम¤ तकª बुिĦ, िववेक और
िवचार है । डॉ.लàमीकांत वमाª के शÊदŌ म¤ -उसकì ÿकृित है ÿÂयेक सÂय को िववेक से
देखना,उसके पåरÿेàय म¤ ÿयोग के माÅयम से िनÕकषª तक पहòँचना । बाĻ िÖथितयŌ के ÿित
सतकª और सचेत होकर किव मानिसक िवĴेषण कì ओर बढ़ता है-- म§ खुद को कुरेद रहा
था ।
अपने बहाने उन तमाम लोगŌ कì असफलताओं को
सोच रहा था जो मेरे नजदीक थे
इस तरह साबुत और सीधे िवचारŌ पर
जमी हòई काई और उगी हòई घास को
खरŌच रहा था , नोच रहा था
६. िवसंगितयŌ का बोध:
नई किवता मानव -िनयित को लेकर उसकì िवसंगितयŌ के ÿित जागŁक रहती है । भारतीय
राजनीित म¤ िनरंतर जो िवसंगितयां उभरी ह§, सामािजक और आिथªक धरातल पर जो
िवरोधाभास आया है,उसे यह किवता मोह भंग कì िÖथित म¤ उजागर करती है । यही कारण
है इसम¤ आøोश, नाराजगी , घृणा और िवþोह उभर आता है । आøोश के साथ िनषेध के
तेवर भी इसम¤ देखे गए ह§:
आदमी को तोड़ती नहé ह§
लोकतांिýक पĦितयाँ
केवल पेट के बल
उसे झुका देती ह§ धीरे-धीरे अपािहज
धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के िलए
उसे िशĶ राजभĉ देश-ÿेमी नागåरक
बना लेती ह§ munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
91 ७. ĬंĬ और संघषª:
नई किवता का आÂमसंघषª काÓयाÂमक बनावट म¤ सामािजक बुिनयादी मुĥŌ को उठाता है ।
आज कì ÓयवÖथा म¤ और उस ÓयवÖथा से जुड़े हòए ÿijŌ म¤ किवता संघषª का मागª ढूंढ़ती है ।
उसका धरातल भी Óयापक है । यह संघषª आÂमीय ÿसंगŌ म¤ भी उभरता है । उसम¤
सामािजक और मानवीय Óयापार ,संदभª उभरते ह§ । ये किवताएँ िवषमता से जूझती ह§ और
नया राÖता सुझाने का ÿयास करती ह§ । पåरिÖथितयŌ को बदलने और उनसे बाहर िनकलने
कì छटपटाहट इनम¤ देखी जाती है । वह समÖयाओं को पहचानती है--
जब भी म§ने उनसे कहा है िक देश शासन् और
राशन....उÆहŌने मुझे रोक िदया है
वे मुझे अपराध के असली मुकाम पर
उंगली रखने से मना करते ह§
८. पåरवेश संबंधी सÂयŌ का ÿकटन:
नई किवता ने समú जीवन कì ÿामािणक अनुभूितयŌ को उनके जीवंत पåरवेश म¤ Óयĉ
िकया,िवषय या अनुभूित के आिभजाÂय और िभÆन-िभÆन ŀिĶयŌ या वादŌ से बने हòए उनके
घेरŌ को तोड़कर Óयĉ Ĭारा भोगे हòए जीवन के हर छोटे-बड़े सÂय को ÿतीकŌ और िबंबŌ के
माÅयम से उभारने म¤ ही किवता कì साथªकता समझी । बदलते हòए संदभŌ म¤ पåरवेशगत
पåरवतªन केवल नगर के जीवन म¤ ही नहé आए,बिÐक इस नगरीय यांिýकता का दबाव गांव
के जीवन पर भी पड़ा । उस ओर भी मूÐयŌ का िवखंडन हòआ और िजंदगी म¤ तनाव बढ़ा ।
पåरवेश के परायेपन से उपजी पीड़ा नाÖटेलिजया के łप म¤ ÿकट हòई । नई सËयता ने
केवल शहर के आदमी को ही नहé तोड़ा, बिÐक गांव के आदमी को भी गांव से बेगाना कर
िदया:
याद आते घर
गली चौपाल , कु°े, मेमने, मुग¥, कबूतर
नीम तŁ पर
सूख कर लटकì हòई कड़वी तुरई कì बेल
टूटा चŏतरा
उखड़े ईंट पÂथर
बेधुली पोशाक पहने गांव के भगवान मंिदर
आज कì शहरी रोजमराª िजंदगी कì अनुभूितयŌ को बड़ी सहजता से अिभÓयिĉ नई किवता
म¤ िमली है । उन अिभÓयिĉयŌ को जो पल-पल के अंतिवªरोधŌ कì उपज ह§ । ऊपर से रंगीन
िदखाई देने वाली शहरी िजंदगी Óयिĉ को िकतना िवदेह कर देती है और िवदेह होकर भी
आज का आदमी ददª से छुटकारा नहé पाता और वह केवल ददª बनकर रह जाता है, भारत
भूषण अúवाल कì एक किवता कì कुछ पिĉंयाँ देिखए- munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
92 और तब धीरे-धीरे ²ान हòआ
भूल से म§ िसर छोड़ आया हóं दÉतर म¤
हाथ बस म¤ ही टँगे रह गए
आँख¤ जłर फाइलŌ म¤ ही समा गई
मुँह टेिलफोन से ही िचपटा-सटा होगा
और पैर, हो-न-हो
³यू म¤ रह गए ह§
तभी तो म§ आज
घर आया हóँ िवदेह ही
देह हीन जीवन कì कÐपना तो
भारतीय परंपरा का सार है
पर उसम¤ ³या यह थकान भी शािमल है
जो मुझ अंगहीन को दबोचे ही जाती है
९. यथाथª कì पीड़ा का िचýण:
नई किवता वाÖतव म¤ Óयिĉ कì पीड़ा कì किवता है । ÿयोगवादी किवता म¤ जहाँ Óयिĉ के
आंतåरक तनाव और दुंĬŌ को उकेरा गया है वहé नई किवता म¤ वह Óयापक सामािजक
यथाथª से जुड़ता है । िजंदगी कì मारक िÖथितयŌ को, उसकì ठोस स¸चाइयŌ को और
राजनीितक सरोकारŌ को यह किवता भुलाती नहé है; पर यह न तो उ°ेजना बढ़ाती है और
न ही किव भावुकता का िशकार होता है । अपने अनुभव के सÂय को किव बाहर के संसार के
सÂय से भी जोड़ता है । इससे नई किवता का काÓयानुभव पुरानी किवता के काÓयानुभव से
अलग तरह का हो जाता है:
एकाएक मुझे भान होता है जग का
अखबारी दुिनया का फैलाव
फंसाव, िघराव , तनाव है सब ओर
प°े न खड़के
सेना ने घेर ली ह§ सड़क¤
१०. Óयंµय के तेवर:
नई किवता ने Óयंµय के तेवर को अिधक पैना और धारदार बनाया । समÖयाओं को
समझकर उसने उस पर Óया´यान करने कì अपे±ा उसे कसे हòए सीधे शÊदŌ म¤ ÿकट िकया
। यह Óयंµय भी िविभÆन łपŌ म¤ अिभÓयिĉ पाता है और इसका ±ेý भी Óयापक हो जाता है ।
िकसी भी ±ेý म¤ हो रहे शोषण िफर चाहे वह राजनीितक हो या धािमªक Óयिĉ, अथवा munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
93 समाज , आदशª हो या यथाथª सब पर Óयंµय कì पैनी धार चली है...
बड़े-बड़े आदशª वा³यŌ को
Öवणª±रŌ म¤ िलखवाकर
अपने űाइंगłम म¤ सजा दो
उÆह¤ अपनी
आÖथा , ®Ħा एवं िनķा का अ¶यª दो
११. नई किवता वादमुĉ किवता:
नई किवता िकसी वाद से बंधी नहé है । यह इस किवता कì बहòत बड़ी िवशेषता है । शायद
यही कारण है िक ÿगितवािदयŌ ने भी नई किवता कì धुन म¤ किवता िलखनी शुł कर दी ।
रांगेय राघव जैसा ÿगितशील किव नई किवता के युग म¤ अपनी काÓय धारा को अ±ुÁण
रखते हòए नई किवता कì शÊद योजना म¤ किवता िलखता है...
ठहर जा जािलम महाज न
तिनक तो तू खोल वह मिदरा िवघूिणªत आँख अपनी
देख, कहाँ से लाया बता सÌपि°
कहां से लाया बता साăाºय ।
१२. नारी के ÿित ŀिĶकोण:
नारी के ÿित छायावादी किवयŌ कì ŀिĶ सÌमानपूणª, Öनेह- वाÂसÐयपूणª एवं ®Ħापूणª थी ।
ÿसाद , िनराला और पंत ने नारी को अÂयिधक आद र और गौरव के साथ Öमरण िकया है-
नारी तुम केवल ®Ħा हो िवĵास रजत पग नख तल म¤ ...आिद पंिĉयŌ म¤ ÿसाद ने नारी को
जो उ¸च Öथान िदया , वह इस युग के किवयŌ ने नहé िदया । नर नारी के बीच सृिĶ के
आरÌभ से चले आ रहे संबंधŌ पर रघुवीर सहाय कì िटÈपणी -
नारी िबचारी है, पुŁष कì मारी है
तन से Ôषुिधत है, मन से मुिदत है
लपक झपककर अंत म¤ िच° है
१३. सŏदयªबोध:
नई किवता का सŏदयª-शाľ और उसका सŏदयª-बोध िनIJय ही अनेक संदभŎ म¤ Óयापक
हòआ है । उसम¤ स¸चाई,टकराव और मोहभंग कì िÖथित नई चेतना के łप म¤ आई है । यह
किवता आÅयािÂमक और दाशªिनक िवषयŌ से भी अब परहेज नहé करती । इसम¤ िफर से
पेड़, पौधे, प±ी, ब¸चे, मां, गांव, शहर, वतन, रोमांस, ÿेम, ÿकृित-िचýण आिद का समावेश
हòआ । इससे अनुभूित को नए पंख लगे और उसने काÓय म¤ नए łप धरे ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
94 १४. भाषा:
नई किवता भाषा के ±ेý म¤ भी आधुिनक-बोध के साथ बढ़ती है और नई होती है । नया किव
पुरानी भाषा म¤ नई संवेदना को अिभÓयिĉ के िलए समथª नहé पाता,इसिलए वह भाषा के
नए łप को गढ़ने के िलए तÂपर रहता है:
शÊद अब भी चाहता हóँ
पर वह िक जो जा ए वहाँ जहाँ होता हòआ
तुम तक पहòंचे
चीजŌ के आर-पार दो अथª िमलाकर िसफª एक
Öव¸छंद अथª दे
नई किवता कì इस नई भाषा म¤ गīाÂमकता के ÿित िवशेष लगाव बन गया है । कहé-कहé
तो किवता गī का ÿितłप लगती है । अलंकृत भाषा को नई किवता म¤ बिहÕकृत िकया गया
है । सपाट शÊदŌ म¤ अिभÓयिĉ से इसम¤ सपाटबयानी आ गई है तो कहé खुरदरी हो गई है ।
कहé-कहé तो किवता िसफª Êयौरा बन कर रह गई है । नई किवता के कुछ किवयŌ ने Öवयं
को मौिलक और उÂसाही सािबत करने के िलए Öथािपत मूÐयŌ को भी अÖवीकार करने म¤
अिभधा शैली से अिभÓयिĉ का दंभ भरा है । अशोक वाजपेयी ने ऐसे किवयŌ कì सतही
मुþा, िफकरेबाजी, चालू मुहावरेदानी और पैगÌबराना अंदाज को समथª किवता के िलए
घातक बताया है; उÆही के शÊदŌ म¤-- रचनाÂमक Öतर पर भाषा के संÖकार के ÿित,ठसकì
सांÖकृितक जड़Ō के ÿित, उदासीनता आयी है और पारमपåरक अनुगूंजŌ और आसंगŌ से
किवयŌ के अ²ान और अŁिच के कारण,कट जाने से काÓय भाषा म¤ ºयादातर युवा किवयŌ
कì भाषा म¤ सपाटता,सतहीपन और मानवीय दåरþता आयी है । इस संदभª म¤ मिण मधुकर
कì किवता का एक अंश...
®Ħा, सÌमान और ÿेरणा जैसे शÊदŌ को
पान कì पीक के साथ थूकता हóँ म§
मंिýमंडलŌ म¤ बलाÂकार करनेवाले लोगŌ पर
मेरे थूक का रंग लाल है,
काश, मेरे खून का रंग भी लाल होता
यīिप नई किवता का शÊद संसार बहòत Óयापक है । इसम¤ संÖकृत,िहंदी,उदूª तथा ÿांतीय
भाषाओं और बोिलयŌ के साथ-साथ अंúेजी के शÊदŌ का ÿयोग सामाÆय हो गया है । कई
जगह नए िवशेषणŌ तथा िøयापदŌ का िनमाªण िकया गया है;जैसे- रंिगम,चंदीले, लÌबाियत ,
उकसती , िबलमान , हरयावल आिद । िव²ान , धमª, दशªन, राजनीित , समाजशाľ आिद
सभी ±ेýŌ से उसने शÊदŌ का चयन िकया है । आम आदमी के Öवर,िचर-पåरिचत शÊद आज
कì किवता म¤ देखे जा सकते ह§ । जन भाषा म¤ सूिĉयŌ, लोकोिĉयŌ और मुहावरŌ का ÿयोग
कभी Óयंµय ÿदशªन के िलए तो कभी आम आदमी का आøोश Óयĉ करने के िलए ।
लोकगीतŌ व लोकधुनŌ के आधार पर भी किवता कì रचना कì गई । िफर भी इस बात से munotes.in

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नई किवता (१९५२-१९६०)
95 इनकार नहé िकया जा सकता िक नई किवता ने भाषा को अपनी सुिवधा के अनुłप तोड़ा-
मरोड़ा है,यह भाषा के साथ िखलवाड़ है ।
१५. ÿतीक:
नई किवता ने नवीन और ÿाचीन दोनŌ तरह के ÿतीक चुन¤ ह§ । परÌपरागत ÿतीक नए
पåरवेश म¤ नए अथª के साथ ÿयुĉ हòए ह§ । नए ÿतीकŌ म¤ भेड़, भेिड़या, अजगर जैसे शÊदŌ
को जनता , स°ाधारी वगª, ÓयवÖथा आिद के ÿतीक łप म¤ ÿयोग िकया गया है । पृÃवी,
पहाड़, सूरज, चाँद, िकरण , सायं, कमल आिद परÌपरागत अथª से हट कर नए अथŎ म¤
ÿयुĉ हòए ह§ । मुिĉबोध के ÿतीक वै²ािनक जीवन से लेकर आÅयािÂमक ±ेý तक फैल¤ ह§ ।
ओरांग-उटांग तथा āĺरा±स जैसे ÿतीक बहòत ही सटीक और समथª ह§ । पीपल का वृ± भी
उनका िवशेष िÿय ÿतीक रहा । मौसम शÊद भी ÿतीक बन कर वतªमान पåरवेश को अथª
देता है--
िछनाल मौसम कì मुदाªर गुटरगूं
१६. िबंब:
नई किवता म¤ िबंब किवता कì मूल छिव बन गए ह§, अपनी अंतलªयता के िलए इसम¤
िबंबबहòलता हो गई है । किवयŌ ने इन िबंबŌ को जीवन के बीच से चुना है Óयिĉगत और
सामािजक दोनŌ तरह के िबंब इस किवता म¤ ह§ । पौरािणक और ऐितहािसक िबंब नए अथª
और संदभª म¤ लोक-संपुिĉ के साथ उिदत हòए ह§ । शहरी किव के िबंब िवशेषतया नागåरक
जीवन के और úामीण जीवन के संÖकारŌ से युĉ किव के िबंब िवशेषतया गांव के होते ह§ ।
जीवन के नए संदभŎ म¤ उभरने वाले वाली अनुभूितयŌ,सŏदयª-ÿतीितयŌ और िचंतन आयामŌ
से संपृĉ िबंब नई किवता úहण करती है...
शाखŌ पर जमे धूप के फाहे
िगरते प°Ō से पल ऊब गये
हकाँ दी खुलेपन ने िफर मुझको
लहरŌ के डाक कहé डूब गये
- केदारनाथ िसंह
बँधी लीक पर रेल¤ लादे माल
िचहँकती और रंभाती अफराये
डागर सी
- अĵोय
िठलती -चलती जाती ह§
निदया म¤ बाढ़ आयी munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
96 ढूह सब ढह गये
हåरयाये िकनारे,सूखे प°े सब बह गये
रस म¤ ये डूबे पल
कानŌ म¤ कह गये
तपने से डरते थे
इसिलए देखो
तुम आज सूखे रह गये
- भारत भूषण अúवाल

१७. उपमान:
नई किवता म¤ जहाँ अलंकारŌ का बिहÕकार हòआ, वहé नए उपमान के ÿयोग से उसका
िशÐप नÓय चेतना को यथाथª अिभÓयिĉ देने म¤ समथª हो गया है । लुकमान अली और
मोचीराम जैसी लंबी किवताओं के शीषªक ही उपमान बनकर आते ह§ और आदमी कì Óयथा
का इितहास ÿकट करते ह§ । नई किवता म¤ आटे कì खाली कनÖतर जैसी चीज¤ भी उपमान
बनती ह§:
Èयार, इÔक खाते ह§ ठोकर
आटे के खाली कनÖतर से
अपने आस-पास फैले हòए वातावरण और वÖतुओं को किव उपमान बनाकर ÿÖतुत करता
है:
उंगिलयŌ म¤ अहसास दबा है
िसगरेट कì तरह
तथा सÆनाटा
लटकì हòई कमरे कì कमीज और ह§गर सा
झूल रहा था
१८. रस:
नई किवता म¤ रस का मूल िबÌबिवधान है । नई किवता के सृजेता किव िबंब िवधान म¤ िनIJय
ही समथª माने जा सकते ह§ और उनका यह सामÃयª आज बुिĦ समिÆवत होकर परÌपरा से
कटे हòए रस भावŌ से संयत होकर िविशĶ एवं यथेĶ रसŌ कì सृिĶ कर रहा है । कुछ
आलोचकŌ ने इसे बुिĦ रस कì सं²ा ÿदान कì है:
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नई किवता (१९५२-१९६०)
97 पहले लोग सिठया जाते थे
अब कुिसªया जाते ह§
दोÖत मेरे !
भारत एक कृिष ÿधान नहé
कुसê ÿधान देश है
- डॉ. मदनलाल डागा
१९. छंद:
छंदŌ के ÿित िवþोह ÿयोगवाद से ही आरंभ हो गया था और नई किवता ने िवþोह कì इस
आग को ठंडा नहé होने िदया । िहंदी किवता आज मुĉक छंद को ही अपनाती है । लेिकन
इसम¤ तुकांत के ÿित युवा किवयŌ म¤ आकषªण बढ़ा है । छंद के ÿित आúह न होने के बावजूद
भी नई किवता म¤ ÿवाह और गित िदखाई पड़ती है । नाद सŏदयª इसम¤ एक अंतःसंगीत
उÂपÆन करता है, अथª के धरातल पर इसम¤ एक अंतªलयता कì गूंज उभरती है । कभी-कभी
इन किवताओं म¤ माýाओं का मेल िदखाई पड़ता है लेिकन इससे इÆह¤ छंदो बĦ नहé माना
जा सकता । वÖतुतः नई किवता मुĉक छंद म¤ नई संवेदना और नए िवचार कì सटीक
अिभÓयंजना कì एक कोिशश है ।
७.४ सारांश नई किवता का ±ेý अÂयंत िवÖतृत है। मुĉक शैली म¤ ÿयोग के कारण िकसी िवधान म¤ यह
किवता बंधी नही है इसिलए जीवन म¤ आये सभी ÿसंगो का िवÖतृत वणªन किवता म¤ हòआ है।
आशा है िवīाथê नई किवता कì िवÖतृतता को इस इकाई के अÅययन से समझ सके हŌगे।
७.५ दीघō°री ÿij १. नई किवता का अथª और पåरभाषा समझाते हòए इसके Öवłप को ÖपĶ कìिजए।
२. नई किवता कì ÿवृि°यŌ का सौदाहरण वणªन कìिजए।
७.६ अितलघु°रीय / वÖतुिनķ ÿij १. नई किवता कì कालाविध कब से कब तक मानी गयी है?
उ°र: सन् १९५२ से १९६०
२. तारसĮकìय किवता के िलए िकसने नई किवता नाम कì ÿÖतावना कì ?
उ°र: अ²ेय
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
98 ३. नई किवता नाम से पिýकाओं का ÿकाशन कब से शुł हòआ?
उ°र: सन् १९५४
४. तीसरा सĮक कब ÿकािशत हòआ?
उ°र: सन् १९५९
५. अमरीका म¤ िवगत ५ वषŎ कì किवता म¤ ÿगित को ‘Æयू पोइůी’ िकस िवĬान ने कहा?
उ°र: डेनाÐड
७.७ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास - डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह



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99 ८
िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
इकाई कì łपरेखा
८.० उĥेÔय
८.१ ÿÖतावना
८.२ िहंदी उपÆयास : अथª एवं पåरभाषा
८.२.१ उपÆयास का अथª
८.२.२ उपÆयास कì परीभाषा
८.३ िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
८.३.१ ÿेमचंद पूवª उपÆयास
८.३.२ ÿेमचंद युगीन उपÆयास
८.३.३ ÿेमचंदोतर युगीन उपÆयास
८.४ सारांश
८.५ बोध ÿij
८.६ अितलघु°रीय ÿij
८.७ संदभª úंथ
८.० उĥेÔय इस इकाई म¤ हम उपÆयास िवधा का िवÖतृत अÅययन कर¤ग¤। उपÆयास िवधा का िवकास
øम के सभी युगो के उपÆयास और उनके ÿकार व िवशेषताओं का अÅययन कर¤गे।
८.१ ÿÖतावना भारत म¤ कथा आ´यान कì परंपरा बड़ी ÿाचीन है परंतु उपÆयास 'नवीन' या 'नूतनता' के
अथª म¤ आधुिनक है । इसका उदय यूरोप म¤ हòआ । िजसका ÿभाव बांµला' से िहÆदी म¤ आया,
उÆनीसबी शताÊदी के ÿारंभ म¤ नवजागरण के कालखंड म¤ सन् १८७७ को ®Åदाराम
िफलौरी ने 'भाµयवती' का लेखन िकया परंतु िहंदी के ÿिसĦ आलोचक 'आचायª रामचंþ
शु³ल' ने अंúेजी ढंग का पहला मौिलक उपÆयास लाला ®ीिनवासदास के 'परी±ागुŁ'
(१८८२) को माना है। 'भाµयवती' के भी पीछे जाकर कुछ िवĬान 'देवरानी-जेठानी कì
कहानी' (१८७०), वामा िश±क (१८७२), को िहÆदी का पहला उपÆयास मानते है । इस
ÿकार िहंदी सािहÂय के ÿथम उपÆयास को लेकर िभÆन-िभÆन मत ÿचिलत ह§ । अÖतु िहंदी
उपÆयास िवधा म¤ ÿेमचंद का नाम सवōपåर है इसिलए िहंदी के उपÆयासŌ को ÿेमचंद के
आधार पर बांटा गया है ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
100 ८.२ िहंदी उपÆयास : अथª एवं पåरभाषा ८.२.१ उपÆयास का अथª:
उपÆयास शÊद का अथª होता है सामने रखना । उपÆयास शÊद 'अस' धातु और 'िन' उपसगª
से िमलकर बनता है । इसम¤ Æयास शÊद का अथª है धरोहर । उपÆयास शÊद दो शÊदŌ
उप+Æयास से िमलकर बना है । 'उप' अिधक समीप अथाªत् वाची उपसगª है । िहÆदी मे
उपÆयास शÊद कथा सािहÂय के łप म¤ ÿयोग होता है । वहé बगंला भाषा म¤ उसे 'उपÆयास',
गुजराती म¤ 'नवल कथा', मराठी म¤ 'कादÌबरी' तथा उदूª म¤ 'नावले' के नाम से जाना जाता है
। अत: वे सभी úंथ उपÆयास ह§, जो कथा िसĦाÆत के कम ºयादा िनयमŌ का पालन करते
हòए मानव कì सतत्, संिगनी, कुतूहल, वृि° को पाýŌ तथा घटनाओं को काÐपिनक, यथाथª
तथा ऐितहािसक संयोग Ĭारा ÿदिशªत करते ह§ । उपÆयास म¤ एक ही Óयिĉ के संपूणª जीवन
कì कथा होती है । अथाªत् एक ही Óयिĉ को क¤þ म¤ रखकर सÌपूणª समÖयाओं का िववरण
लेखक Ĭारा िकया जाता है अतएवं उपÆयास सामािजक, धािमªक, राजनीितक, आिथªक,
सांÿदाियक, ऐितहािसक, िमथक, ÿतीकाÂमक, पाý क¤िþत, समÖया ÿधान आिद के साथ-
साथ िकसी न कìसी िवचारधारा से वशीभूत रहती है ।
८.२.२ उपÆयास कì पåरभाषा:
अ) भारतीय लेखक:
१. डॉ. ÔयामसुÆदर दास: “उपÆयास मनुÕय जीवन कì काÐपिनक कथा है ।”
२. मुंशी ÿेमचÆþ: ‘‘म§ उपÆयास को मानव चåरý का िचý माý समझता हóँ। मानव चåरý
पर ÿकाश डालना तथा उसके चåरýŌ को ÖपĶ करना ही उपÆयास का मूल तÂव है ।’’
३. आचायª नÆददुलारे बाजपेयी: ‘‘उपÆयास से आजकल गīाÂमक कृित का अथª िलया
जाता है, पīबĦ कृितयाँ उपÆयास नहé हòआ करते ह§ ।’’
४. डॉ. भगीरथ िम®: ‘‘युग कì गितशील पृķभूिम पर सहज शैली मे Öवाभािवक जीवन
कì पूणª झाँकì को ÿÖतुत करने वाला गī ही उपÆयास कहलाता है ।’’
५. बाबू गुलाबराय: ‘‘उपÆयास कायª कारण ®ृंखला मे बंधा हòआ वह गī कथानक है
िजसम¤ वाÖतिवक व काÐपिनक घटनाओं Ĭारा जीवन के सÂयŌ का उĤाटन िकया है।’’
६. डॉ. हजारी ÿसाद िĬवेदी: “उपÆयास आधुिनक युग कì देन है । नए गī के ÿचार के
साथ-साथ उपÆयास ÿचार हòआ है । आधुिनक उपÆयास केवल कथा माý नहé है और
पुरानी कथाओं और आ´याियकाओं कì भांित कथा-सूý का बहाना लेकर उपमाओं,
łपकŌ, दीपकŌ और ĴेषŌ कì छटा और सरस पदŌ म¤ गुिÌफत पदावली कì छटा
िदखाने का कौशल भी नहé है । यह आधुिनक वैिĉकतावादी ŀिĶकोण का पåरणाम है।”
७. ÿेमचंद: म§ उपÆयास को मानव जीवन का िचý माý समझता हóँ । मानव चåरý पर
ÿकाश डालना और उसके रहÖयŌ को खोलना ही उपÆयास का मूल तÂव है। इस ŀिĶ munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
101 से उपÆयास कì कथा मानव जीवन से जुड़ी और उसके ÓयिĉÂव के रहÖयŌ को
खोलने वाली होती है ।”
ब) पाIJाÂय लेखक:
१. िविलयम हेनरी हेडसन: “मानव और मानवीय भावŌ से तथा िøयाओं कì िवÖतृत
िचýावली ने नर एवं नाåरयŌ कì सावªकािलक, सावªदेिशक Łिच ही उपÆयास के
अिÖतÂव का कारण है ।”
२. डॉ. जे. बी. िøÖटले: “उपÆयास जीवन का िवशाल दपªण है और इसका िवÖतार
सािहÂय के िकसी भी łप से बड़ा है ।”
३. रौल Āांस: “उपÆयास केवल काÐपिनक गī नहé है वरन वह मानव जीवन का गī है
। ऐसी ÿथम कला िजसने सÌपूणª मानव को लेने और उसे अिभÓयंजना देने का ÿयास
िकया है ।”
८.३ िहंदी उपÆयास : िवकास याýा ८.३.१ ÿेमचंद पूवª उपÆयास:
भारत¤दु-युग म¤ लेखकŌ को उपÆयास-रचना कì ÿेरणा बंगला और अंúेज़ी के उपÆयासŌ से
ÿाĮ हòई । अत: अंúेजी ढंग का पहला मौिलक उपÆयास लाला ®ीिनवासदास का 'परी±ागुŁ'
माना जाता है, जो सन् १८८२ म¤ ÿकािशत हòई थी । इसके पूवª ®Ħाराम फुÐलौरी ने
'भाµयवती' (१८७७) शीषªक से लघु सामािजक उपÆयास िलखा था । 'भाµयवती' कì रचना
के पूवª बंगला म¤ सामािजक और ऐितहािसक दोनŌ ही ÿकार के अ¸छे उपÆयास ÿकािशत हो
चुके थे । िहंदी म¤ मौिलक उपÆयासŌ कì रचना आरंभ होने के पूवª बंगला उपÆयासŌ के
अनुवादŌ को लोकिÿयता िमल चुकì थी । िहंदी के भारत¤दु युगीन मौिलक उपÆयासŌ पर
संÖकृत के कथा-सािहÂय एवं परवतê नाटक-सािहÂय के ÿभाव के साथ ही बंगला-
उपÆयासŌ कì छाप भी लि±त कì जा सकती है । इस युग के उपÆयासकारŌ म¤ लाला
®ीिनवासदास (१८५१- १८८७), िकशोरीलाल गोÖवामी ( १८६५-१९३२) / बालकृÕण
भĘ (१८४४-१९१४), ठाकुर जगÆमोहन िसंह (१८५७-१८९९), राधाकृÕणदास (१८६५-
१९०७), लºजाराम शमाª (१८६३- १९३१), देवकìनंदन खýी (१८६१-१९१३) और
गोपालराम गहमरी (१८६६-१९४६) उÐलेखनीय ह§ । भारत¤दु काल म¤ सामािजक,
ऐितहािसक ितलÖमी ऐयारी, जासूसी तथा रोमानी उपÆयासŌ कì रचना-परंपरा का सूýपात
हòआ । यह परंपरा आगे चल कर िĬवेदी युग म¤ अिधक िवकिसत और पुĶ हòई ।
आलो¸य युग के सामािजक उपÆयासŌ म¤ 'भाµयवती' और 'परी±ागुŁ' के अितåरĉ बालकृÕण
भĘ-कृत ‘रहÖयकथा' (१८७९), नूतन āĺचारी' (१८८६), और 'सौ अ²ान एक सुजन
(१८९२),) राधाकृÕणदास कृत 'िनÖसहाय िहंदू' (१९९०), लÌजाराम शमाª-कृत तथा धूतª
रिसकलाल' (१९९०) और Öवतंý रमा और परतंý लàमी (१८९९) तथा िकशोरीलाल
गोÖवामी कृत (िýवेणी वा सौभाµय®ी' (१८९०) िवशेष łप से उÐलेखनीय ह§ । इन सभी
उपÆयासŌ का लàय समाज कì कुरीितयŌ को सामने ला कर उनका िवरोध करना और
आदशª पåरवार एवं समाज कì रचना का संदेश देना है । ये सभी उपÆयास सोĥेÔय िलखे गये munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
102 ह§ और लेखकŌ ने ÿायः ÿारंभ म¤ ही अपना उĥेÔय ÖपĶ कर िदया है । सामािजक उपÆयासŌ
कì तुलना म¤ आलो¸य युग म¤ ऐितहािसक उपÆयास बहòत कम िलखे गये । इस ±ेý म¤
िकशोरीलाल गोÖवामी का नाम ही उÐलेख योµय है िकंतु उनके 'लवंगलता' (१८९०)
उपÆयास को ऐितहािसक उपÆयास कì मयाªदा देना उिचत नहé है । वÖतुतः इस युग म¤
ऐितहािसक उपÆयासŌ कì आकां±ा कì पूितª बिकम के ऐितहािसक उपÆयासŌ के अनुवादŌ से
हòई ।
ितलÖमी ऐयारी उपÆयासŌ कì परंपरा देवकìनंदन खýी (१८६१-१९१३) से मानी जाती है
। खýी जी के 'काजर कì कोठरी (१९०२), 'अनूठी बेगम' (१९०५), 'गुĮ गोदना' (१९०६),
'भूतनाथ' ÿथम छह (१९०६) आिद उपÆयास उस समय के ÿिसĦ और चिचªत उपÆयासŌ
म¤ िगने जाते थे । ितलÖमी ऐयारी उपÆयासŌ म¤ देवकìनंदन खýी-कृत चंþकांता' (१८८२),
'चंþकांता संतित' (चौबीस भाग, १८९६), 'नर¤þ मोिहनी' (१८९३), 'वीर¤þ वीर' (१८९५)
और 'कुसुमकुमारी' (१८९९) तथा हरेकृÕण जौहर कृत 'कुसुमलता' (१९९९) उÐलेखनीय
है । उस समय ितलÖमी और ऐयारी उपÆयास सामाÆय जनता म¤ खूब लोकिÿय हòए थे ।
इनसे रहÖय-रोमांचिÿय सÖती कÐपना को पुिĶ िमलती थी । साथ ही इस युग के जासूसी
उपÆयासŌ म¤ गोपालराम कृत 'अतलाश' (१८९६) और 'गुĮचर' (१८९९) उÐलेखनीय ह§ ।
गोपाल राय गहमरी ने लगभग २०० जासूसी उपÆयास िलखे ।
जासूसी उपÆयासŌ म¤ भी घटनाएं रहÖय- रंिजत होती थé, िकंतु उÆह¤ अिधक-से-अिधक
िवĵसनीय बनाने कì चेĶा कì जाती थी । रोमानी उपÆयासŌ म¤ ठाकुर जगÆमोहन िसंह का
'ÔयामाÖवÈन' (१९८८)) उÐलेखनीय है । उपयुªĉ उपÆयासŌ म¤ सबसे महßवपूणª एवं सशĉ
धारा उन सामािजक उपÆयासŌ कì है, िजनका ®ीगणेश 'परी±ागुŁ' से हòआ था । अÆय
उपÆयासŌ का महßव इतना ही है िक उनसे सामाÆय जनता म¤ िहंदी कì लोकिÿयता बढ़ी ।
इस युग के सवªÿधान उपÆयास-लेखक िकशोरीलाल गोÖवामी माने गये ह§ । गोÖवामी जी ने
लगभग १०० से भी अिधक उपÆयासŌ कì रचना कì है । उनकì रचनाओं म¤ मानवीय ÿेम के
िविवध प±Ō के उĤाटन म¤ ही अपनी शिĉ का अपÓयय िकया । वÖतुतः जीवन के यथाथª को
कला म¤ ढालने वाले उपÆयासŌ कì रचना का वातावरण अभी नहé बन पाया था । िहंदी
सािहÂय म¤ बंगला के बहòत से उपÆयासŌ का अनुवाद भी िकया गया, िजसम¤ बंिकमचंþ
चटजê (१८३८-१८९४), रमेशचंþ द° (१८४८-१९०९), तारकनाथ गांगुली (१८४५-
१८९१) और दामोदर मुखजê (१८५३-१९०७) के उपÆयासŌ का नाम उÐलेखनीय है ।
िहंदी िवधाओं मे एितहािसक उपÆयास कì लोकिÿयता रही है । िजस रचना म¤ ऐितहािसक
घटना मूल क¤þ म¤ होती है, उसे ही ऐितहािसक उपÆयास कì ®ेणी म¤ रखा जाता है ।
िकशोरीलाल गोÖवामी, गंगाÿसाद गुĮ, जगरामदास गुĮ और मथुराÿसाद शमाª आिद लेखक
ऐितहािसक उपÆयासकार कì ®ेणी म¤ आते ह§ । ऐितहािसक उपÆयासŌ म¤ गंगाÿसाद गुĮ कì
कृित 'नूरजहां' (१९०२), 'कुमारिसंह सेनापित' (१९९३) और 'हÌमीर' (१९०३) आिद
उÐलेखनीय ह§ । जयरामदास गुĮ कृत 'काÔमीर पतन' (१९०७), 'नवाबी पåरÖतान वा
सािजद अली शाह' (१९०९), 'भÐका चांद बीबी' (१९०९) आिद तथा मथुराÿसाद शमाª
कृत 'नूरजहाँ बेगम व जहाँगीर (१९०५) म¤ इितहास को सुरि±त रखने कì चेĶा कì गयी है । munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
103 लºजाराम शमाª (१८६३-१९३१) कृत 'आदशª दंपि°' (१९०४), 'िबगड़े का सुधार अथवा
सती सुखदेवी' (१९०७), और 'आदशª िहंदू' (१९१४) तथा िकशोरीलाल गोÖवामी
(१८६५-१९३२) के 'लीलावती वा आदशª सती' (१९०१), 'चपला या नÓय समाज'
(१९०३ १९०४), 'पुनजªÆम या सौितया डाह' (१९०७), 'माधवी माधव या मदन मोिहनी'
(१९०३-१९१०) और 'अंगूठी का नगीना' (१९१८) और अयोÅया िसंह उपाÅयाय
(१८६५-१९४१) कì 'अधिखला फूल' (१९०७), 'ठेठ िहंदी का ठाठ' (१८९९) एवं मÆनन
िĬवेदी (१८८४-१९२१) कृत 'रामलाल' (१९१७) आिद म¤ सामािजक उपÆयासŌ म¤
सुधारवादी जीवनŀिĶ ही ÿधान है । अत: समाज सुधार के िलए गोÖवामी जी ने सती-साÅवी
देिवयŌ के आदशª ÿेम के साथ ही अवैध ÿेम, िवधवाओं के Óयिभचार, वेÔयाओं के कुिÂसत
जीवन और देवदािसयŌ कì िवलासलीला का भी िचýण िकया है और उनका उĥेÔय
नारकìय फुिलत जीवन के दुÕपåरणाम िदखा कर लोगŌ को उ¸च नैितक जीवन म¤ ÿवृ°
करना था । िजसम¤ वे सफल भी हòए । इस ÿकार सामािजक उपÆयासŌ का लàय समाज
सुधारना था और इसी ÿेरणा से उपÆयास सăाट ÿेमचंद सािहÂय जगत म¤ अपना पैर जमाने
लगे और वे इतना आगे बढ गये िक इस वĉ बात वे सामाज सुधार उपÆयास कì ÿेरणा बन
गये । उनके उपÆयास म¤ 'ÿेमा' (१९०७), 'łठी रानी' (१९०७) और 'सेवासदन' (१९१८)
आिद उÐलेखनीय रहे ह§ । उÆहŌने घटना के Öथान पर चåरý को उभारने कì चेĶा कì,
जीवन कì वाÖतिवक समÖयाओं को क¤þ म¤ रखा और øमशः कथा-ÿसंगŌ को मÅयवगª के
तÂकालीन जीवन ÿवाह के साथ जोड़ िदया । ÿेमचंद अंúेजी उपÆयासकारŌ कì रचनाŀिĶ से
पåरिचत थे और उÆहŌने ठीक समय पर िहÆदी उपÆयास को एक नया मोड़ िदया और इस
ÿकार उÆहŌने अपनी रचना म¤ िचिýत पाý को िजवंत łप ÿदान िकया है ।
८.३.२ ÿेमचंद युगीन उपÆयास:
िहंदी उपÆयास सािहÂय म¤ 'सेवासदन' (१९१८) का ÿकाशन न केवल ÿेमचंद (१८८०-
१९३६) के सािहिÂयक जीवन कì, वरन् िहंदी उपÆयास कì भी एक महßवपूणª घटना थी ।
'सेवासदन' उनकì पहली ÿौढ़ कृित है, जहाँ से उनके नये औपÆयािसक जीवन का ही नहé,
बिÐक िहंदी उपÆयास के युग का भी ÿादुभाªव हòआ । 'सेवासदन' के बाद ÿेमचंद के 'ÿेमा®म'
(१९२२), 'रंगभूिम' (१९२५), 'काय' (१९२६), 'िनमªला' (१९२७), 'गबन' (१९३१),
'कमªभूिम' (१९३३) और 'गोदान' (१९३६) आिद मौिलक उपÆयास ÿकािशत हòए । इस
बीच उÆहŌने अपने दो पुराने उदूª उपÆयासŌ को भी िहंदी म¤ łपातंåरत और पåरÕकृत करके
ÿकािशत िकया । 'जलवए ईसार' का łपांतर 'वरदान' (१९२१) म¤ ÿकािशत हòआ । पूवª
ÿकािशत िहंदी-łपांतर 'ÿेमा' अथाªत ये सिखयŌ का िववाह को उÆहŌने ÿित²ा' (१९२९)
शीषªक से उसे सवªथा नये łप म¤ ÿकािशत कराया । एक उÐलेखनीय तÃय यह है िक आरंभ
म¤ ÿेमचंद अपने उपÆयास पहले उदूª म¤ िलखते थे और िफर Öवयं उनका िहंदी-łपांतर करते
थे । 'सेवासदन', 'ÿेमा®म' और 'रंगभूिम' øमशः 'बागरे हòन', 'गोशए-आिĀĉ' और 'चौगाने
हÖती' नाम से उदूª म¤ िलखे गये थे, िकंतु ÿकािशत पहले मे िहंदी म¤ ही हòए । वैसे, मूल łप से
िहंदी म¤ िलिखत उनका पहला उपÆयास ‘कायाकÐप' है । इसके बाद उÆहŌने सभी उपÆयासŌ
कì रचना िहंदी म¤ कì, उदूª कì वैसाखी कì ज़łरत उÆह¤ अब नहé रह गयी थी ।
ÿेमचंद कì रचनाओं म¤ सामियक समÖयाओं पराधीनता, जमéदारŌ, पूंजीपितयŌ और
सरकारी कमªचाåरयŌ Ĭारा िकसानŌ का शोषण, िनधªनता, अिश±ा, अंधिवĵास, दहेज कì munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
104 कुÿथा पर और समाज म¤ नारी कì िÖथित, वैÔयाओं कì िजंदगी, वृĦ-िववाह, आिद िवषय
समÖया, सांÿदाियक वैमनÖय, अÖपृÔयता, मÅयमवगª कì कुंठाएं आिद ने उÆह¤ उपÆयास-
लेखन के िलए ÿेåरत िकया था । ÿेमचंद ने एक-एक कर बड़ी बेसāी से इन समÖयाओं और
जीवन के िविभÆन पहलुओं को अपने उपÆयासŌ म¤ Öथान िदया । 'सेवासदन' म¤ िववाह से
जुड़ी समÖयाओं ितलक- दहेज कì ÿथा, कुलीनता का ÿij, िववाह के बाद घर म¤ पÂनी का
Öथान और समाज म¤ वेÔयाओं कì िÖथित पर रहा । 'िनमªला' म¤ दहेजÿथा और वृĦिववाह से
होने वाले पाåरवाåरक िवघटन तथा िवनाश का िचýण है । उपÆयास 'रंगभूिम' और 'कमªभूिम'
म¤ úामीणŌ को िÖथित का बेबाक िचýण िकया है और 'गोदान' म¤ भी úामीण जीवन और कृिष
संÖकृित क वणªन िकया गया है ।अत: úामीण जीवन का इतना स¸चा, Óयापक और
ÿभावशाली िचýण िहंदी के िकसी अÆय उपÆयास म¤ नहé हòआ है, संभवतः वह संसार के
सािहÂय म¤ बेजोड़ है ।
ÿेमचंद के समकालीन उपÆयासकारŌ कì सं´या दो-ढाई सौ के लगभग है, िकंतु सबका
उÐलेख न यहाँ संभव है और न आवÔयकता िफर भी इस काल के कम-से-कम दस-बारह
उपÆयासकार ऐसे ह§, िजÆहŌने िकसी-न-िकसी łप म¤ अपनी पहचान कायम कì है।
िवĵंभरनाथ शमाª 'कौिशक' (१८९१-१९४६) ने 'मां' और 'िभखाåरणी' िलख कर ÿेमचंद का
सफल अनुकरण िकया था, पर संभवत: इसी कारण िलखने कì योµयता होते हòए भी वे
अपनी अलग पहचान नहé बना सके। ÿेमचंद के अÆय अनुकरणकताªओं म¤ चतुरसेन शाľी
और ÿतापनारायण ®ीवाÖतव ÿमुख ह§। चतुरसेन शाľी चे आलो¸य अविध म¤ 'Ńदय कì
परख (१९१८), 'Ńदय कì Èयास' (१९३२), 'अमर अिभलाषा' (१९३२) और 'आÂमदाह'
(१९३७) शीषªक से उपÆयासŌ कì रचना कì, िकंतु ÿेमचंद कì रचनाशैली से ÿभािवत होने
पर भी उÆहŌने उसे कौिशक जी कì भांित एकांततः úहण नहé िकया है । यही कारण है िक
परवतê युग म¤ उनकì उपÆयासकला पयाªĮ łप से िभÆन आयाम úहण कर सकì ।
ÿतापनारायण ®ीवाÖतव कृत 'िवदा' (१९२९) और 'िवजय' (१९३७) आदशªवादी
उपÆयास ह§ 'िवदा' म¤ नागåरक उ¸चवगêय समाज का िचýण है और 'िवजय' म¤
अिभजातवगêय िवधवा जीवन कì समÖयाएं िचिýत ह§ । रचनाशैली कì ŀिĶ से ये उपÆयास
ÿेमचंद के कहé अिधक समीप ह§ । देवनारायण िĬवेदी (जÆम १९९७) के 'कतªÓयाघात',
'ÿणव', 'पIJा°ाप' और 'दहेज' तथा अनूपलाल मंडल कृत 'िनवाªिसता' (१९२९). भी ÿेमचंद
कì परंपरा म¤ िलिखत औपÆयािसक रचनाएं ह§ । वैसे, इस धारा के अÆय उपÆयासकारŌ म¤
ÿफुÐलचंþ ओझा 'मुĉ' और जगदीश झा 'िवमल' का भी उÐलेख िकया जा सकता है ।
'कालøम कì ŀिĶ से देख¤ तो सबसे पहले िशवपूजन सहाय (१८९३- १९६३) ने िहंदी
उपÆयास को ÿेमचंद से िभÆन मागª पर ले जाने का ÿयास िकया । उनका 'देहाती दुिनया'
(१९२६) शीषªक उपÆयास ÿचिलत łिढ़ को तोड़ने कì िदशा म¤ एक साहिसक कदम था
िकंतु शायद यह कदम समय से पहले उठा िलया गया । ÿेमचंद-युग के समाज सबसे और
इसीिलए सबसे बदनाम उपÆयासकार हòए बैचेन शमाª 'उú', िजÆहŌने 'चंद हसीनŌ के खुद
(१९२७), 'िदÐली का दलाल' (१९२७), 'बुधुआ कì बेटी' (१९२८), 'शराबी' (१९३०)
आिद उपÆयासŌ म¤ समाज कì बुराइयŌ को बड़े ही साहस के साथ, िकंतु सपाटवयानी के
łप ÿÖतुत िकया । उÆहŌने यह के उस वगª को अपने उपÆयासŌ का िवषय बनाया, िजसे
दिलत या पितत वगª कहते ह§ और उसके िचýण म¤ उÆहŌने िकसी ÿकार के 'शील' या
'अिभजात िशĶता का पåरचय नहé िदया । इस कारण उनके उपÆयासŌ म¤ एक ओर स¸चाई munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
105 अपने नµन łप म¤ आयी है, तो दूसरी ओर 'परचेबाज़ी' के िनकट पहòंच जाती है जो िकसी
कृित को कलाłप म¤ पåरणत नहé होने देती । उपÆयासकार 'ऋषभचरण जैन' ने 'उú' कì
भांित तÂकालीन समाज के 'विजªत िवषयŌ' पर 'िदÐली का कलंक', 'िदÐली का Óयिभचार',
'वेÔयापुý', 'रहÖयमयो' आिद उपÆयासŌ कì रचना कì और अनूपलाल मंडल ने पýाÂमक
ÿिविध म¤ 'समाज कì वेदी पर ' और 'łपरेखा' शीषªक उपÆयासŌ का ÿणयन िकया । साथ ही
जयशंकर ÿसाद का उपÆयास 'कंकाल' (१९२९) और 'िततली' (१९३४) भी चचाª के
िवषय बने । इनम¤ से 'कंकाल' ही िवशेष उÐलेखनीय है । 'िततली' म¤ úामीण और कृषक
जीवन का सामाÆय औपÆयािसक फैलाव माý है । 'कंकाल' ही िविशĶता यह है िक इसम¤
ÿसाद ने समाज कì Âयाºय, अवैध और अ²ातकुलशील संतानŌ कì कथा कही है ।
उपÆयास 'िततली' पढते हòए ऐसा आभास होता है िक उसम¤ 'कंकाल' के आगे कì कथा है ।
जबिक दोनŌ उपÆयास िभÆन-िभÆन कथा और समÖया को उÐलेिखत करते ह§ ।
कथाकार 'जैन¤þ' (१९०५-१९८८) कì 'परख' (१९२९), 'सुनीता' (१९३५) और
'Âयागपý' (१९३७) म¤ मनोिवĴेषणवाद अिधक माýा म¤ िदखायी देता है ।उनके उपÆयासŌ
कì कहानी अिधकतर एक पåरवार कì कहानी होती है और वे 'शहर कì गली और कोठरी
कì सËयता' म¤ ही िसमट कर ÓयिĉपाýŌ कì मानिसक गहराइयŌ म¤ ÿवेश करने कì कोिशश
करते ह§। जैन¤þ कì अगर कोई ýुिट है, तो केवल यह िक ये अपने पाýŌ को पहेली बना कर
छोड़ देते ह§ और पाठक उस मनोवै²ािनक पहेली को सुलझाने के असफल ÿयÂन म¤ उलझा
रह जाता है । 'परख' कì भांित 'सुनीता' और 'Âयागपý' भी वयÖक और संवेदनशील पाठकŌ
के िलए िलखे गये उपÆयास ह§, िवषय और िशÐप दोनŌ ŀिĶयŌ से । 'Âयागपý' म¤ समूची कथा
एक पाý िवशेष के अवलोकनिवंदु से ÿÖतुत कì गयी है, जो िनIJय हो नाटकìकरण कì
िवकिसत पĦित है । कÃय के अनुłप उनकì भाषा म¤ भी नवीनता है । 'सादगी' उनकì भाषा
कì भी िवशेषता है, पर वह ÿेमचंद कì भाषा कì सादगी से िभÆन है । इस काल के अÆय
ÿमुख उपÆयासकारŌ म¤ 'भगवतीचरण वमाª' (१९०३), 'रािधकारमणÿसाद िसंह' (१८९०),
'िसयारामशरण गुĮ' (१८९५), 'भगवतीÿसाद वाजपेयी', 'वृंदावनलाल वमाª' (१८८९),
'राहòल सांकृÂयायन' (१८९३), 'सूयªकांत िýपाठी 'िनराला' (१९००) आिद उÐलेखनीय ह§ ।
भगवतीचरण वमाª ने 'िचýलेखा' (१९३४) कì रचना कर पाठकŌ के बीच पयाªĮ लोकिÿयता
ÿाĮ कì थी, पर उपÆयास म¤ जीवन कì धड़कन न होने के कारण इसका कोई Öथायी मूÐय
न हो सका । सन् १९३६ म¤ इनका 'तीन वषª' नामक उपÆयास छपा, जो अपनी 'अनुपंिकल'
भावुकता के कारण पाठकŌ म¤ काफì लोकिÿय हòआ रािधकारमणÿसाद िसंह ने 'राम रहीम'
(१९३७) म¤ कितपय सामािजक पहलुओं का उĤाटन िकया, पर उनका लगभग सारा Åयान
भाषा को 'चुलबुलाहट' से युĉ बनाने म¤ ही लगा रहा ।
िसयारामशरण गुĮ-कृत 'गोद' (१९३२), 'अंितम आकां±ा' (१९३४) और 'भारी' (१९३७)
गांधी दशªन पर आधाåरत मनोवै²ािनक सामािजक उपÆयास ह§, िजनम¤ øमशः लांछनाúÖत
िनरपराध ÓयिĉयŌ कì मनोÓयथा, घरेलू नौकरŌ कì अनुकरणीय मयाªदा और नारी
समÖयाओं के िनराकरण के िलए नये-पुराने मूÐयŌ के समÆवय पर बल िदया गया है ।
भगवतीÿसाद बाजपेयी के उपÆयासŌ 'ÿेमपंच' 'मीठी चुटकì', 'अनाथ पÂनी', 'Âयाग' 'िनमा'
आिद म¤ मÅयवगêय पाåरवाåरक सामािजक जीवन का मनोिवĴेषणपरक िचýण िमलता है।
अपने पाýŌ के संदभª म¤ जीवन कì उपलिÊध- अनुपलिÊधयŌ का तटÖथ, Óयावहाåरक और
कहé-कहé भावुकतापूणª ÿÖतुितकरण उÐलेखनीय िवशेषताएं ह§ । सूयªकांत िýपाठी 'िनराला' munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
106 रिचत 'अÈसरा' (१९३१), 'अलका' (१९३३), 'ÿभावती' (१९३६) और 'िनŁपमा'
(१९३६) उपÆयास भले ही ÿसाद के कथा-सािहÂय कì भांित िवषय िनłपण और शैली
दोनŌ कì ŀिĶ से उनकì किव-चेतना से ÿभािवत ह§, िकंतु इनके उÐलेख के िबना इस काल
के उपÆयास सािहÂय का िवĴेषण अधूरा रहेगा। जहां ÿेमचंद मे िहंदी उपÆयास को ÿथम
बार सािहÂय का दजाª ÿदान िकया और जैन¤þ ने उसे 'आधुिनक' बनाया, वहé ÿसाद,
कौिशक, उú, भगवतीचरण वमाª, भगवतीÿसाद वाजपेयी, िनराला आिद ने भी अपने-अपने
ढंग से उसे समृिĦ ÿदान कर परवतê उपÆयासकारŌ का मागªदशªन िकया।
८.३.३ ÿेमचंदोतर युगीन उपÆयास:
ÿेमचंद के उपरांत िहंदी उपÆयास कई मोड़Ō से गुजरता हòआ िदखायी पड़ता है, िजÆह¤ Öथूल
से तीन दशकŌ म¤ बांटा जा सकता है ; १९५० तक के उपÆयास, १९५० से १९६० तक
के उपÆयास और साठो°री उपÆयास। पहला दशक मु´यतः Āायड और मा³सª कì
िवचारधारा से ÿभािवत है, दूसरा, ÿयोगाÂमक िवशेषताओं से और तीसरा, आधुिनकतावादी
िवचारधारा से पहले दशक म¤ Āायड से ÿभािवत हो कर िजस कथा-सािहÂय कì रचना कì
गयी, उसकì पृķभूिम जैन¤þ पहले ही ÿÖतुत कर चुके थे । जैन¤þ का ÿÂयेक उपÆयास
अंतिवªरोधŌ का उपÆयास बन गया है । यह ÿवृि° मनोिव²ान दाशªिनकता वैयिĉकता आिद
के माÅयम से िविवध łपŌ म¤ उभरी है । उनके नारीपाý यिद एक और समाज कì मयाªदाओं
को बनाये रखना चाहते ह§, वहé दूसरी ओर अपने अिÖतÂव कì पहचान भी करना चाहते ह§ ।
ऐसी िÖथित म¤ आÂमयातना के अितåरĉ और कोई राह शेष नहé रहती । उनके पाý समाज
को न तोड़ कर Öवयं टूटते ह§, िकंतु अपने को तोड़ कर िकसी को िनिमªत नहé करते ।
िनयित हारकर, धमª आिद म¤ अटूट आÖथा उनके उपÆयासŌ को आधुिनक नहé बनने देती,
वे रोम¤िटक 'एगोनी' का łप ले लेते ह§ ।
'अ²ेय - कृत 'शेखर : एक जीवनी' (१९४१-१९४४) के ÿकाशन के साथ िहंदी-उपÆयास
कì िदशा म¤ एक नया मोड़ आया । यह रचना 'अ²ेय' जी ने अमृतसर जेल म¤ बैठकर िलखी
थी । इस जेल म¤ उÆहŌने अपने जीवन को याद करते हòए ३०० से अिधक पÆने प¤िसल से
िलख डाले । बाद म¤ वही शेखर : एक जीवनी के नाम से ÿकािशत कì गयी । इसका मूल
मंतÓय है ; Öवतंýता कì खोज । उसका सवªÿथम समावेश इसी उपÆयास म¤ िदखायी देता है
। यह खोज अपने को सबसे काट कर नहé कì गयी है, बिÐक अÆय संदभŎ म¤, यानी मानवीय
पåरिÖथितयŌ के बीच कì गयी है । उसकì तलाश म¤ शेखर अनेक ÿकार के आंतåरक संघषŎ
से जूझता और भीतरी तनावŌ से गुज़रता है, िकंतु अपने िनषेधाÂमक रोम§िटक िवþोह को ले
कर वह बिहमुªखी नहé हो पाता । फलÖवłप सारा संघषª मौिखक हो कर रह जाता है, िøया
(ऐ³ट) म¤ नहé बदलता ।
'शेखर : एक जीवनी' के दूसरे खंड म¤ अिधक ÓयवÖथा है । पहले भाग का िवþोह सृजन कì
भूिमका मालूम पड़ता है, ³यŌिक इसम¤ उसका िबखरा ÓयिĉÂव संघिटत हो कर रचनाÂमक
बनता है िकंतु राÕů, राÕůीयता, भाषा आिद के संबंध म¤ उसके िवचार िøयाÂमकता से न
जुड़ने के कारण सतही ÿतीत होते ह§ । दूसरी ओर शिश और शेखर के संबंध को ले कर जो
आपि°यां उठायी जाती ह§, ये नैितक अिधक है, वाÖतिवक कम Öमरण रखना चािहए िक
शेखर िवþोही है और समाज Ĭारा िनिमªत ÿितमान उसे सÂय नहé ह§। िजस ÿामािणक munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
107 अनुभूित कì चचाª आज कì रचनाओं के संदभª म¤ कì जाती है, वह इस उपÆयास म¤ पहली
बार िमलती है । शेखर अपनी अनुभूितयŌ को िनÔछल अिभÓयिĉ देता है, जो पåरŀÔय
उसके अनुभव के भीतर नहé आया, वह इस उपÆयास, म¤ भी नहé आया है । यह शेखर कì
कमज़ोरी और उपÆयासकार कì ईमानदारी है । काल कì ŀिĶ से भी यह उपÆयास ÿयोगधमê
है । अ²ेय के दूसरे उपÆयास 'नदी के Ĭीप' (१९५१) को सामाÆयतः शेखर कì संवेदना का
िवकास माना जाता है । शेखर और भुवन तथा रेखा और शिश म¤ एक तरह का साŀÔय
लगता है, पर इस पर तो नहé देना चािहए, 'नदी के Ĭीप' को Öवाित कृित के ł अिधक संगत
है । नायक 'शेखर' कì तुलना म¤, 'भुवन' कì तेजिÖवता कृिýम, आरोिपत और अिवĵ है । वह
ठीक ढंग से िÖथत (िसचुएट) नहé हो पाता, फलÖवłप आÂमक¤िþत और दंभी पन है ।
'शेखर : एक जीवनी' कì शिश भी 'िसचुएटेड' चåरý है, पर रेखा कहé भी संदिभªत नहé है
इसिलए उसकì बौिĦक ऊंचाई Öवयं नदी का Ĭीप है, ÿवाह से अलग 'नदी के Ĭीप' का
ÿतीक पूणªतः अथªवान नहé बनता, ³यŌिक ÿवाह उसे काटता छांटता, उसकì łपरेखा को
बदलता चलता है, कभी-कभी तो उसके अिÖतÂव को ही समाĮ कर देता है । इसके सभी
पाý रेखा पर सीधी सी रेखा पर चलने के कारण बदलाव से नहé टकराते । 'अपने-अपने
अजनबी'' (१९६१) अ²ेय का तीसरा उपÆयास है, िजसम¤ एक ÿकार कì धािमªक ŀिĶ
संपÆनता िदख पड़ती है । पहले दोनŌ उपÆयासŌ म¤ यौन कÐप कì Öथापना के साथ-साथ
उÆहŌने मसीहाई ŀिĶकोण भी अपनाया है, 'अपने-अपने अजनवी' इसी कì फल®ुित है ।
इसम¤ मु´यम Öवतंýता के चरण कì है, जो संýास, अकेलेपन, बेगानगी, मृÂयुबोध,
अजनबीपन आिद से सह ही संयुĉ हो गयी है । Öवतंýता को अहंकार से जोड़ कर अ²ेय ने
इसम¤ अिÖतÂववादी Öवतः के मूल अथª को ही बदल िदया है ।
कथाकार इलाचंþ जोशी का पहला उपÆयास 'घृणामयी' सन् १९२९ म¤ ही ÿकािशत हो
चुका था, िकंतु 'संÆयासी' (१९४१) के Ĭारा ही उÆह¤ उपÆयासकार के łप म¤ ÿितķा िमली ।
इस उपÆयास म¤ हो पहली बार मनोिवĴेषणाÂमक पĦित कì िववृि° देखी जाती है ।
संÆयासी के अितåरĉ उनके 'पद¥ का रानी' (१९४१), 'ÿेत और छाया', 'िनवाªिसत'
(१९४६), 'मुिĉपथ' (१९५०), 'िजÈसी', 'जहाज कì पंछी' (१९५५), 'ऋतुचø', 'भूत का
भिवÕय' (१९७३) आिद ÿकािशत हो चुके ह§ । 'संÆयासी', 'पद¥ कì रानी' और 'ÿेत और छाप'
म¤ एबनॉमªल चåरýŌ को िलया गया है । इनके मु´य पाý िकसी-न-िकसी मनोवै²ािनकŌ के
िशकार ह§ । जब तक उÆह¤ úंिथ का रहÖय नहé मालूम होता तब तक वे अनेक ÿकार
असामािजक कायŎ म¤ संलµन रहते ह§, िकंतु िजस ±ण उनकì úंिथयŌ का मूलोĤाटन हो
जाता है । 'संÆयासी' म¤ आÂमहीनता कì úंिथ है, तो 'ÿेत और छाया' म¤ इिडपस úंिथ और
'पद¥ कì रानी' के पाý भी मानिसक कुंठाओं से úÖत ह§।
उपÆयासकार यशपाल (१९०३) 'दादा कामरेड' म¤ पूंजीवाद, गांधीवाद और øांितकाåरयŌ के
आतंकवाद का िवरोध करते हòए वादा िकया गया है । 'देशþोही' सन् १९४७ कì øांित से
संबĦ है । झूठा सच इनका ÿिसĦ उपÆयास है, िजसे देशÓयापी ĂĶाचार के अÂयंत िनपुणता
से िचिýत करते हòए िवĵसनीय बनाया गया है । िकंतु दोनŌ भागŌ म¤ कÌयुिनĶ पाटê को जो
तरजीह दी गयी है, वह लेखक कì प±धरता कì सूचक है । अपने इन कमज़ोåरयŌ के कारण
'झूठा सच' को अपेि±त रचनाÂमक ऊंचाई नहé िमल सकì । िफर भी िहंदी सािहÂय के
उपÆयास िवधा म¤ उसकì ´याित महानतम ®ेणी म¤ िगनी जाती है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
108 मा³सªवादी उपÆयासकार रामेĵर शु³ल 'अंचल' का उपÆयास 'चढ़ती धूप' (१९४५), 'नयी
इमारत' (१९४६), 'उÐका' (१९४७) और 'मŁÿदीप' (१९५१) आिद ÿिसĦ ह§ । समाज,
संÖकृित और राजनीित के संदभª म¤ समकालीन पåरवेश के िविवध प± को łपाियत करना
इन उपÆयासŌ कì मु´य उपलिÊध है । भगवतीचरण वमाª का उपÆयास 'आिखरी दांव' और
'अपने िखलौने अपनी असंगितयŌ तथा िबखराव के कारण साधारण Öतर के उपÆयास बन
कर रह गये ह§, िकंतु 'भूले- िबसरे िचý' (१९५९) से उÆह¤ ÿितķा िमली है। इसम¤ चार
पीिढ़यŌ कì पåरवतªमान जीवन-- ŀिĶयŌ कì कथा है- सन् १८८५ से १९३० तक । अÔक
कृत उपÆयास 'िगरती दीवार¤' (१९४७) सवō°म है । यथाथªवादी परंपरा के उपÆयासŌ म¤ यह
अपना ऐितहािसक Öथान रखता है । इसके पूवª यथाथªवादी परंपरा का शायद ही कोई ऐसा
उपÆयास हो, जो मÅयवगª कì िववशता, हार, लाचारी और संघषª को वाÖतिवकता कì भूिम
पर ÿितिķत कर सका हो । उपÆयास का मु´य पाý अमेजन न केवल आिथªक पåरिÖथितयŌ
से जूझते हòए अपने आदशª को तोड़ने के िलए बाÅय होता है, अिपतु यह काम कुंठाओं से भी
úÖत है । उसकì समÖया आिथªक उतनी नहé मालूम पड़ती, िजतनी कì कामजÆय । िफर
भी, यह उपÆयास मÅयवगêय नैितक वजªनाओं को तोड़ने कì ÿेरणा देता है और यही इसकì
सफलता का रहÖय है ।
अमृतलाल नागर कृत 'तयायी मसनद', 'सेठ यांकमल', 'महाकाल', 'बूंद और समुþ', 'अमृत
और िवष', 'शतरंज के मोहरे', 'सुहाग के नूपुर', 'एकद नैिमषारÁये' और 'मानस का हंस'
(१९७२) उनके ÿकािशत उपÆयास ह§ । अपने िवÖतार और गहराई के कारण 'बूंद और
समुþ' इनम¤ िवशेष महßवपूणª बन पड़ा है । 'बूंद और समुþ' øमशः Óयिĉ और समाज के
ÿतीक ह§ । लखनऊ के चौक के łप म¤ इसम¤ भारतीय समाज के िविभÆन łपŌ, राज
नीितयŌ, आचार-िवचारŌ, जीवनŀिĶयŌ, मयाªदाओं, टूटती और िनिमªत होती हòई ÓयवÖथाओं
अनिगनत िचý ह§ । इस उफनते हòए समुþ म¤ Óयिĉ-बूंद कì ³या िÖथित है, यह उपÆयास का
मु´य ÿितपाī है । उपÆयास कì सवाªिधक महßवपूणª पाý Óयिĉ और समाज के संघातŌ को
अÂयंत ÿभावशाली ůेजेडी है, पर अÆय पाý वैचाåरक अिधक और जीवंत कम बन पड़े ह§।
एक दूसरे Öतर पर इसम¤ आज के बुिĦजीवी का संकट भी िचिýत िकया गया है । 'अमृत
और िवष' उनका दूसरा महाकाय उपÆयास है। इसम¤ भी अनेक ÿकार कì जीवन िÖथितयŌ,
आंदोलनŌ और रोक åरवाजŌ के ÊयौरŌ को अंिकत िकया गया है। िकंतु अपने अितåरĉ
फैलाव के फलÖवłप यह उपÆयास गहरे जीवन से åरĉ हो कर िववरणाÂमक हो गया है।
उनका एक अÆय महßवपूणª उपÆयास है, 'मानस का हंस' (१९७२)। इसम¤ गोÖवामी
तुलसीदास के जीवनवृ° को सफल औपÆयािसक ÓयिĉÂव ÿदान िकया गया है। ऐितहािसक
संदभŎ के अनुłप तÃय-संपादन माý को शैली न अपना कर इसम¤ रोमानी कÐपना का भी
सहज सिÆनवेश िकया गया है ।
वृंदावन लाल वमाª कì रचना 'झांसी कì रानी', 'कचनार', 'मृगनयनी', 'अिहÐयाबाई', 'मायोज
िशिथय', 'भुवनिवøम' आिद ऐितहािसक उपÆयास है । इनम¤ 'झांसी कì रानी' और
'मृगनयनी' मु´य ह§। 'झांसी कì रानी' म¤ िकशोरीलाल गोÖवामी के उपÆयासŌ जैसा रोमांस
नहé है, िकंतु अÂयिधक तÃया®यी और िववरणाÂमक हो जाने के कारण यह उपÆयास
इितवृ°ाÂमक हो गया है । इसके िवपरीत 'मृगनयनी' म¤ तÂकालीन पåरवेश को उसकì
समúता म¤ आंकिलत करने का ÿयास िदखायी पड़ता है । बीच-बीच म¤ ऐसे ÿसंग भी आ गये
ह§, जो आज कì समÖयाओं से भी जुड़ जाते ह§। िकंतु, पूरे उपÆयास को इस धरातल पर नहé munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
109 उतारा गया है । िहंदी के ऐितहािसक उपÆयासकारŌ म¤ दूसरा उÐलेखनीय नाम आचायª
हजारीÿसाद िĬवेदी का है । 'बाणभĘ कì आÂमकथा', 'चाŁचंþलेख' और 'पुननªवा' के
अितåरĉ उनका एक अÆय 'अनामदास का पोथा' ÿकािशत हòआ है। िĬवेदी जी के उपÆयास
इितहास के तÃयŌ पर आधाåरत नहé ह§, उनम¤ कÐपना के आधार पर ऐितहािसक वातावरण
कì अथªवान सृिĶ कì गयी है । यह अथªव°ा उनके नये ऐितहािसक ŀिĶकोण कì देन है । वे
िकसी कालखंड को जीवंत łप म¤ ÿÖतुत करने के साथ-साथ उसे आज कì ºवलंत
समÖयाओं के साथ भी जोड़ते चलते ह§ और इस संदभª म¤ ही समúतः उनका गंभीर
जीवनदशªन भी ÿितफिलत हो जाता है । 'बाणभĘ कì आÂमकथा' म¤ उÆहŌने मÅयकालीन
जड़ता पर ÿहार करते हòए उसे आधुिनक चैतÆय से संपृĉ िकया है । अनेक ÿकार कì
िवरोधी धमª-साधनाओं के कारण समाज अनेकशः िवभĉ और खंिडत हो चुका था,
राजनीितक िÖथित अिÖथर और चंचल थी । उपÆयासकार ने इन अिÖथरताओं और
िवघटनŌ के बीच नये मूÐयŌ कì खोज करने कì कोिशश कì है सारा समाज एक ÿकार के
अवरोध म¤ है भåĘनी महामाया, िनपुिणका, सुचåरता, यहां तक िक वांणभĘ भी अवŁĦ है ।
इसी भांित रांगेय राघव ने 'मुĥŌ का टोला' म¤ मोहनजोदड़ो के गणतंý का िचýण िकया है ।
चतुरसेन शाľी-कृत 'वैशाली कì नगरवधू' भी गणतंý से संबĦ है । इन उपÆयासŌ कì तुलना
करने पर यह कहा जा सकता है िक जहां राहòल के उपÆयासŌ पर मा³सªवादी जीवनदशªन
सदा उनके ऐितहािसक पåरÿेàय को बहòत कुछ धूिमल और असंगितपूणª बना देता है और
'वैशाली कì नगरवधू' पर आधुिनक जीवन को लाद कर तÂकालीन इितहास कì
ÿामािणकता को ही संिदµध बना िदया गया है, वहé 'मुदŎ का टीला' म¤ इितहास और
मा³सªवादी जीवनदशªन संबंधी उपयुªĉ असंगितयां नहé िमलतé ।
úािमण उपÆयासŌ कì अपनी अलग पहचान रही है ।úामांचल उपÆयास कì ®ेणी म¤ आने
वाले उपÆयासŌ को आंचिलक कह कर उÆह¤ सीिमत कर िदया जाता है । रेणु के 'मैला
आंचल' के ÿकाशन के पूवª नागाजुªन का 'बलचनमा' (१९५२) ÿकािशत हो चुका था, पर
इसे आंचिलक नहé कहा गया, यīिप इसम¤ आंचिलकता का कम रंग नहé है । रेणु ने अपने
उपÆयासŌ म¤ úामांचल को जो ÿधानता दी है, उसके आधार पर केवल उÆहé कì कृितयŌ को
'आंचिलक' कहा जाना चािहए । 'रितनाथ कì चाची', 'बलचनमा', 'नयी पौध', 'बाबा
बटेसरनाथ', 'दुखमोचन', 'वŁण के बेटे' आिद नागाजुªन के ÿकािशत उपÆयास ह§ । úामांचल
को आधार बना कर राही मासूम रजा, िशवÿसाद िसंह, रामदरश िम®, िहमांशु ®ीवाÖतव
आिद ने भी उपÆयास िलखे ह§ राही का 'आधा गांव' िशया मुसलमानŌ कì िजंदगी पर िलखा
गया पहला उपÆयास है । इसम¤ भारत-िवभाजन के पहले और बाद कì िज़ंदगी को उभारा
गया है । और टूटन इसम¤ एक िवशेष ऐितहािसक संदभª म¤ िचिýत है, िजÆह¤ आधुिनकता बोध
के साथ नहé जोड़ा जाना चािहए। पर राÕůीय आकां±ाओं के संदभª म¤ यह उपÆयास तीखा
ददª उभारता है । िशवÿसाद िसंह ने अपने उपÆयास अलग-अलग वैतरणी' म¤ आधुिनकता-
बोध का सिÆनिवĶ करने कì कोिशश कì है । इसम¤ उस पåरवेश का िचýण है, िजसम¤ नये-
पुराने मूÐयŌ, नयी-पुरानी पीढ़ी, िभÆन-िभÆन वगŎ और जाितयŌ कì टकराहट म¤ सारे मूÐय
गड्डमड्ड हो जाते ह§ । ÿÂयेक Óयिĉ अपनी-अपनी वैतरणी म¤ िघर जाता है, 'गा चह पार
जतन बहò हेरा, पावत नाव न योिहत बेरा ।' वैतरणी को पार न करने का मतलब है नरक गांव
नरक हो गये ह§, जहां अलगाव और टूटन कई ÖतरŌ पर घिटत होते ह§ वैयिĉक, पाåरवाåरक,
सामािजक तथा समूचे गांव के Öतर पर इस उपÆयास म¤ िजस गांव कì पåरकÐपना कì गयी munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
110 है, वह िपछली पåरकÐपनाओं से िभÆन है । रामदरश िम®-कृत पानी कì ÿाचीर जल टूटता
हòआ तथा 'सूमता हòआ तालाब' और िहंमाशु ®ीवाÖतव का 'रथ के पिहये' भी अपने-अपने
ढंग से ÿवशाली úामांचलीय उपÆयास ह§ । रामदरश िम® का उपÆयास 'जल टूटता हòआ'
उ°रÿदेश के कछार अंचल कì दमघŌट समÖयाओं, िवसंगितयŌ, अभावŌ और आंतåरक
संदभŎ को तीĄता से अिभÓयĉ करने वाली एक सशĉ कृित है। आधुिनकìकरण और बाहरी
सËयता के संøमण के बीच िनरंतर बदल रहे गांवŌ के िविभÆन आयामŌ को इस उपÆयास म¤
उĤािटत िकया गया है ।
आधुिनकता-बोध के उपÆयास यंýीकरण, दो महायुĦŌ और अिÖतÂववादी िचंतन के
फलÖवłप आधुिनकता कì जो िÖथित उÂपÆन हòई है, उसे ले कर भी िपछले दशक म¤
उपÆयासŌ कì रचना हòई है । आÖथािवहीन समाज, अिनĵयª कì िÖथित म¤ लटके हòए इंसान
और आÂमिनवासन कì अिभÓयिĉ देने कì पहल मोहन राकेश ने अपने उपÆयास 'अंधेरे बंद
कमरे' (१९६१) म¤ कì । इसके अनुसार ÿेम कोई शाĵत उदा° मूÐय नहé रह गया है,
वैयिĉक महßवाकां±ाएँ और आधुिनक जीवन कì सफलताएँ ÿेम कì आंतåरक िववशता म¤
दरार¤ पैदा कर देती ह§ उनका दूसरा उपÆयास' आने वाला कल' आधुिनकता से अिधक
ÿभािवत है । उसका नायक सब कुछ को छोड़ कर या अÖवीकार करके एक िनषेधाÂमक
िÖथित म¤ जा पहòंचता है, पर यह अÖवीकार उसे कहé भी ले जाने म¤ असमथª है और जड़
जीवन को जीने कì सड़ांध उसकì िनयित हो जाती है ।
राजकमल चौधरी का उपÆयास ‘मछली मरी हòई’ समल§िगक यौनाचार म¤ िलĮ िľयŌ कì
कहानी है । िवषयवÖतु के अनोखेपन तथा तटÖथतापरक लेखकìय ŀिĶकोण के कारण इस
उपÆयास का अलग अिÖतÂव है । इस ÿकार कì िवषयवÖतु को चुनने पर भी इसम¤
अĴीलता नहé िमलती । ®ीकांत वमाª-कृत 'दूसरी बार', मह¤þ भÐला - कृत एक पित के
नोट्स', कमलेĵर-कृत 'डाक बंगला' और 'काली आंधी', गंगाÿसाद िवमल- कृत 'अपने से
अलग' आिद उपÆयास भी आधुिनकता कì झŌके म¤ िलखे गये ह§, ठीक उसी ÿकार जैसे
मा³सªवादी ओघ म¤ िलखी गयी रचनाएँ । आज के जीवन-सÂय कì आंिशक झलक देते हòए
भी इÆह¤ चुकì हòई संभावनाओं का उपÆयास कहा जायेगा । आधुिनकता के कुछ चुिनंदा
नुÖखŌ, अिÖतÂववादी दशªन के कुछ मुहावरŌ, ºयां जेने, सादे, काम, काका कì भंिगमाओं के
आधार पर िलखे गये इन उपÆयासŌ को देखने पर िनराशा ही हाथ लगेगी। इनम¤ मोहन राकेश
का 'अंधेरे बंद कमरे' ही ठीक-िठकाने का उपÆयास माना जायेगा। अपनी िवषयवÖतु और
तटÖथता म¤ 'मछली मरी हòई' भी िविशĶ है ।
आधुिनकता बोध के उपÆयासŌ कì उपयुªĉ परंपरा म¤ 'लाल टीन कì छत (िनमªल वमाª) और
'आपका बंटी) (मÆनू भंडारी) भी काफ़ì ÿिसĦ ह§ । इनम¤ कहé वैयिĉक, तो कहé
पाåरवाåरक- सामािजक िवषमताओं का मुखर िवरोध िमलता है । इन उपÆयासकारŌ के
अितåरĉ भी उपÆयासकारŌ को एक लंबी कतार है, िजसम¤ भीÕम साहनी (तमस), रामकुमार
Ăमर, कृÕण बलदेव, वैद िगåरराज िकशोर (जुगलबंदी), िशवानी, कृÕणा सोबती (डार से
िबछुड़ी, िमýो मरजा), उषा िÿयंवदा (पचपन खंभे लाल दीवार¤), रमेश ब±ी (अठारह सूरज
के पौधे), लàमीकांत वमाª, मधुकर गंगाधर, जगदÌबाÿसाद दीि±त (मुदाªघर), आåरंगपूिड़
बालशौåर रेड्डी आिद के नाम उÐलेखनीय ह§ । munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
111 सातव¤ आठव¤ दशक कì चेतना का ÿितिनिधÂव लàमीकांत वमाª के 'एक कटी हòई िजंदगी :
एक कटा हòआ काग़ज़ (१९६५): 'टेराकोटा' (१९७१); लàमीनारायण लाल के 'ÿेम
अपिवý 'नदी', कृÕणा सोबती के 'सूरजमुखी अंधेरे के' (१९७२), 'िमýो मरजानी' (१९६७);
उपेÆþनाथ अÔक के 'शहर म¤ घूमता आईना' (१९६३): भारतभूषण अúवाल के 'लौटती
लहरŌ कì बांसुरी (१९६४); राजेÆþ यादव के 'अनदेखे अनजान पुल' (१९६३); मÆमथगुĮ
के 'शहीद और शोहदे ' (१९७०); फणीĵरनाथ रेणु के 'जुलूस' (१९६५) 'िकतने चौराहे'
(१९६६), 'कलंक-मुिĉ' (१९७६); रामदरश िम® के जाल टूटता हòआ' (१९६९), 'सूखता
हòआ तालाब' (१९७२) ; जगदीशचंþ के 'धरती धन न अपना' (१९७२) ; भीÕम साहनी के
'किड़याँ' (१९७०), 'तमस' (१९७३); उषा िÿयंवदा के 'पचपन खंभे लाल दीवार¤'
(१९६१), 'Łकोगी नहé, रािधका' (१९६७ ) ; मÆनु भंडारी कì 'आपका बंटी' (१९७१),
'महाभोज', कमलेĵर का 'डाक बंगला' (१९६२), 'तीसरा आदमी' (१९६४), 'समुþ म¤
खोया हòआ आदमी' (१९६५), 'आगामी अतीत' (१९७६), 'काली आंधी'; ÿयाग शु³ल के
'गठरी' (१९८६); मोहन राकेश के 'अंधेरे बंद कमरे' (१९६१), 'अंतराल' (१९७२) ; िनमªल
वमाª के 'ये िदन' (१९६४), 'लाल टीन कì छत'; िगåरराज िकशोर के 'याýाएं' (१९७१),
'जुगलबंदी', 'िचिड़याघर', Ńदयेश के 'गांत' (१९७०), 'हÂया' (१९७१) गंगाÿसाद िवमल के
'अपने से अलग': मृदुला गगª के 'िचतकोवरा'; मंजुल भगत, 'लेडी ³लब', जगदंबाÿसाद
दीि±त के 'मुरदाघर' (१९७४); राही मासूम रजा के 'आधा गांव' (१९६६); टोपी शु³ला,
'िहÌमत जौनपुरी', 'िदल एक सादा काग़ज़ '; ®ीलाल शु³ल के 'रागदरबारी' (१९६८),
'अ²ातवास', 'आदमी का जहर'; कृÕणा अिµनहोýी के 'टपरेवाले'; िनŁपमा सेवती के 'बंटता
हòआ आदमी' मालती पलूकर के 'इÆनी'; रजनी पिन³कर के 'महानगर कì मीता', 'दूåरयां',
मेहŁिÆनसा परवेज के 'आंखŌ कì दहलीज', 'उसका घर' मालती जोशी के 'पाषाण युग':
ममता कािलया के 'येघर'; शिशÿभा शाľी के 'सीिढ़यां'; नरेÆþ कोहली के 'दी±ा', 'अवसर';
हåरशंकर परसाई के 'रानी नागमती कì कहानी: सव¥ĵरदयाल स³सेना के 'पागल कु°Ō का
मसीहा' (१९७७), 'सोया हòआ जल' (१९७७), 'क¸ची सड़क' (१९७८), 'उड़ते हòए रंग'
(१९७४), 'अंधेरे पर अंधेरा' (१९८०); मीना±ी पुरी के जाने-पहचाने अजनबी' हåरÿकाश
Âयागी के 'दूसरा आदमी लाओ'; ®ीकांत वमाª के 'दूसरी बार'; सुरेÆþ ितवारी के 'िफर भी
कुछ': ÿभाकर माचवे के 'तीस- चालीस-पचास', 'ददª के पैबंद', 'िकसिलए', 'छूत': िवÕणु
ÿभाकर के 'ÖवÈनमयी' रवीÆþ कािलया के ख़ुदा सही सलामत है'; नरेÆþ कोहली के 'युĦ'
(दो भाग), 'जंगल कì कहानी', 'अवसर', 'साथ सहा गया दुःख', 'अिभ²ान'; नािसरा शमाª के
'सात निदयां एक समुंदर'; यादवेÆþ शमाª 'चंþ' के 'हजार भेड़Ō का सवार' राजी सेठ के
'तÂसत': सुदशªन राके 'सÌमोहन'; िववेकì राय के 'सोना-माटी'; िशवसागर िम® के 'अजÆमा
वह', 'अ±त'; þोणवीर के 'टूटे हòए सूयª' आिद उपÆयासŌ कì एक लंबी सूची पर Åयान जाता
है। कोहली के 'टÈपर 'गाड़ी', पानू खोिलयो के 'िबंब'; अिनŁĦ पांडेय के 'पÆना पुखराज';
'मुþारा±स' के 'हम सब 'मंसाराम' आिद उपÆयास भी इसी बीच ÿकािशत हòए ह§ ।
बीसवé शताÊदी के छठे दशक म¤ 'नयी कहानी', 'आंचिलक कहानी' 'úामकथा', 'नगरकथा'
आिद कथांदोलनो से जुड़ कर या उनसे िबना जुड़े उपÆयास-लेखन के ±ेý म¤ अवतåरत हòए
ह§। इस कालाविध म¤ इनम¤ से सिøय रहने वाले उपÆयासकार ह§ : िवÕणु ÿभाकर
'अधªनारीĵर' (१९९२), 'संकÐप' : (१९९३), लàमीनारायण लाल : 'पुŁषो°म' (१९८३),
'गली अनारकली' (१९८५), केनाट "एक Èलेस' (१९८६), ÿभाकर माचवे : आंख¤ मेरी munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
112 बाक़ì उनका' (१९८३), 'लापता' (१९८४), नरेश मेहता 'उ°रकथा' (भाग २, १९८२),
कमलेĵर : 'सुबह, दोपहर, शाम' (१९८२), 'रेिगÖतान' (१९८८), 'िकतने पािकÖतान'
(२०००), कृÕण बलदेव वैद: 'गुजरा हòआ जमाना (१९८१), 'काला कोलाज' (१९८९),
'नर-नारी' (१९९६), 'मालक' (१९९९), नौकरानी को डायरी' (२०००), लàमीकांत वमाª
मुंशी, ®ीलाल शु³ल पड़ाव' (१९८७), 'िबąामपुर का संत' (१९९८), 'राग-िवराग'
(२००५), शैलेश मिटयानी 'गोपुली गफूरन' (१९८१), 'चंद औरतŌ का शहर' (१९८१),
'बावन निदयŌ का संगम' (१९८१), 'अĦªकुंभ कì याýा' (१९८३), 'मुठभेड़' (१९८४),
'उ°रकांड' (१९९५), राज¤þ अवÖथी एक रजनीगंधा कì चोरी' (१९८५), रामदरश िम®
'िबना दरवाज़े का मकान' (१९८४), 'दूसरा घर' (१९८६), 'थकì हòई सुबह' (१९९४),
'बीस यरस' (१९९६), उपा िÿयंवदा : 'शेष याýा' (१९८४), 'अंतवंशी' (२०००), िनमªल
वमाª : 'रात का åरपोटªर' (१९८९), 'अंितम अरÁय' (२०००), गुलशेर खां शानी : 'सांप और
सीढ़ी' (१९८३, पूवª łप 'कÖतूरी' : १९६१), राही मासूम रजा : 'असंतोष के िदन'
(१९८६), 'नीम का पेड़' (२००३), उदूª उपÆयास का ÿभात िýपाठी-कृत िहंदी łपांतर),
िगåरराज िकशोर : 'तीसरी सुचा' (१९८२), 'यथाÿÖतािवत' (१९८२), 'पåरिशĶ' (१९८४),
'असलाह' (१९८७), 'अंतÅवंस' (१९९०), 'ढाई घर' (१९९१), 'यातनाघर' (१९९७),
'पहला िगरिमिटया' (१९९९), िशवÿसाद िसंह : 'नीला चांद' (१९८८), 'शैलूष' (१९८९),
'मंजुिशमा' (१९८९), 'औरत' (१९९२), 'कुहरे म¤ युĦ' (१९९३), 'िदÐली दूर है' (१९९३),
'वैĵानर' (१९९६), िववेकìराय ' "माटी' (१९८३), 'समर शेष है' (१९८८), 'मंगल भवन'
(१९९४), अमंगलहारी' (२०००), 'देहरी पार' (२००३), कृÕणा सोबती 'िदलोदािनश'
(१९९३), 'समय सरगम' (२००२), : मह¤þ भÐला 'उड़ने से पेĵर' (१९८७), 'दो देश और
तीसरी उदासी' (१९९७), िवĵÌभराय उपाÅयाय : 'जाग मछंदर गोरख आया' (१९८३),
'दूसरा भूतनाथ' (१९८५), 'जोगी मत जा' (१९८९), 'िव±ुÊध' (१९९०), 'िवĵबाहò
परशुराम' (१९९७), 'ÿितरोध' (१९९८), 'कठपुली' (१९९२), जगदीशचंþ : 'घासगोदाम'
(१९८५), नरककुंड म¤ बास' (१९९४), अमरकांत 'बीच कì दीवार' (१९८१), 'सुखजीवी'
(१९८२), 'लाट को वापसी' (२०००), 'ज़मीन अपनी तो थी' (२००१) आिद ।
िमिथलेĵर : 'यह अंत नहé' (२०००), 'सुरंग म¤ सुबह' (२००३), काशीनाथ िसंह : 'काशी
का अÖसी' (२००२), भीमसेन Âयागी : 'काला गुलाब' (१९८१), 'लमीन' (२००४), संजीव
: 'जंगल जहां शुł होता है' (२०००), 'सूýधार' (२००३), िÿयंवद : 'परछाई नाच'
(२०००), Öवयं ÿकाश: 'ईंधन' (२००४), असगर वजाहत : ‘कैसी आग लगायी' (२००४).
भगवानदास मोरवाल : 'बायल तेरा देस म¤' (२००४), 'रेत' (२००८) दूधनाथ िसंह :
'आिखरी कलाम' (२००३), तेिजंदर : 'काला पादरी (२००२), राकेशकुमार िसंह : 'पठार
पर कोहरा (२००३), हåरराम मीणा : 'धूणी तपे तीर' (२००८), रणेÆþ : 'µलोबल गाँव के
देवता' (२००९), महòआ माजी : 'मरंगगोड़ा नीलकंठ हòआ' (२०१२)) इÂयािद । इस िवगत्
प¸चीस वषª कì िहंदी उपÆयास कì ÿवृि°यां इस बात का ÿमाण ह§ िक िहंदी- उपÆयास म¤
सिøयता रही है और वÖतु एवं िशÐप के Öतर पर बड़ी िविवधता आयी है । िविवधता का
कारण कई पीिढ़यŌ कì युगपत् सिøयता है जब पीढ़ी बदलती है तो उसकì संवेदना, उसकì
जीवनŀिĶ म¤ भी मौिलक और सूàम पåरवतªन होता है, ³यŌिक संवेदना और ŀिĶ के िनमाªण
म¤ जहां Óयिĉ कì अपनी िनजी जैिवक संरचना, पारंपåरक संÖकार अपनी भूिमका िनभाते ह§,
वहाँ उसका पåरवेश भी महßवपूणª भूिमका िनभाता है । munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
113 ८.४ सारांश िहंदी के उपÆयासकारŌ ने सामूिहक अनुभव और मूÐय ÿणाली से वैयिĉक अनुभव और
मूÐय-ÿणाली कì िदशा म¤ याýा कì है । पूंजीवादी, बाज़ारवादी और उपभोगवादी
अथªÓयवÖथा, महानगरीय पåरवेश और सामािजक गितशीलता ने अब उपÆयासकार को
वगªÿितिनिधकता से अलग करके Öवाय° Óयिĉ इकाई बना िदया है । फलतः Óयिĉशः
उपÆयासकारŌ का अनुभव ±ेý सीिमत और िविशĶ होता गया है। ľी-िवमशª और दिलत
िवमशª जैसी चीज¤ इसी बदलाव का पåरणाम ह§ । फलतः िवगत् प¸चीस वषŎ के िहंदी
उपÆयास म¤ वÖतु और िशÐप, दोनŌ के Öतर पर अÂयिधक ÿयोगशीलता आयी है । इसीिलए
कथा कहने के िलए ऐसे-ऐसे चमÂकारपूणª िशÐपगत ÿयोग इस कालाविध म¤ उपÆयासकारŌ
ने िकये ह§, िजनकì पहले का उपÆयासकार ÖवÈन म¤ भी कÐपना नहé कर सकता था । नयी
पीढ़ी के उपÆयासकारŌ के िलए मौिलकता बीजमंý हो गयी है ।
८.५ बोध ÿij १. उपÆयास का अथª बताते हòए उसके िवकास øम के बारे सिवÖतार िलिखए ।
२. िहÆदी उपÆयास के िवकास याýा को सोदाहरण सिहत ÖपĶ कìिजए ।
३. िहÆदी उपÆयास के िवकासøम पर ÿकाश डािलए ।
८.६ अितलघु°रीय ÿij १. िहÆदी का ÿथम उपÆयास कौनसा है?
उ°र: परी±ा गुł – लाल ®ीिनवासदास
२. िहÆदी उपÆयास िवधा का िवकास िकतने काल खंडŌ म¤ हòआ है?
उ°र: चार भागŌ म¤
३. ÿेमचंद युग का समय कब से कब तक माना जाता है?
उ°र: सन् १९१६ से १९३६ तक
४. ितिलÖमी और ऐ Íयारी उपÆयास िकस युग म¤ िलखे गये?
उ°र: ÿेमचंद युग
५. मैलाआंचल उपÆयास के लेखक है?
उ°र: फिणĵरनाथ रेणू

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
114 ८.७ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह

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115 ९
िहंदी कहानी : िवकास याýा
इकाई कì łपरेखा
९.० उĥेÔय
९.१ ÿÖतावना
९.२ िहंदी कहानी : अथª एवं पåरभाषा
९.२.१ कहानी का अथª
९.२.२ कहानी कì पåरभाषा
९.३ िहंदी कहानी : िवकास याýा
९.३.१ ÿारंिभक युग (१८०० ई. से १९०० ई.) तक
९.३.२ ÿेमचंद पूवª कहानी (सन् १९०० से १९१५ तक)
९.३.३ ÿेमचंदयुगीन कहानी (सन् १९१६ से १९३६ तक)
९.३.४ ÿेमचंदो°र कहानी (सन् १९३६ से १९५० तक)
९.३.५ नयी कहानी (सन् १९५० से अब तक)
९.४ सारांश
९.५ बोध ÿij
९.६ अितलघु°रीय ÿij
९.७ संदभª úंथ
९.० उĥेÔय इस इकाई के अÅययन से िवīाथê कहानी का आरÌभ, िवकास øम, और युग िवभाजन के
आधार पर कहानी िवधा का समú अÅययन कर सक¤गे।
९.१ ÿÖतावना कहानी मानव जीवन के िकसी एक घटना या मनोभाव का रोचक, कौतुहल पूणª िचýण है ।
कहािनयाँ मानव सËयता के आिदकाल से ही मनोरंजन एवं आनंद का साधन रही है । केवल
मनोरंजन ही नहé, वरन् िश±ा ÿदान करने नीित और उपदेश देने के िलए अ¸छे साधन का
काम करती है । हमारे देश म¤ मनोरंजन के िलए जहाँ वृहत् कथा मंजरी और कथा-
सåरतासागर सŀश रोचक कहानी-úÆथ िमलते है, वहाँ मानव - Óयवहार संबंधी नीितपूणª,
उपदेषाÂमक कहािनयŌ के िलए पंचतंý एवं िहतोपदेष जैसी रचनाएँ भी िमलती ह§ । इसके
अितåरĉ उपिनषदŌ कì कहािनयाँ तो मानव को दाशªिनक जीवन कì गहराइयŌ से सराबोर
कर देती ह§ । इस ÿकार कहानी वह सरव, सरस, िÿय एवं माÅयम है िजसके Ĭारा हम ऊँची munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
116 से ऊँची िश±ा ÿदान कर सकते ह§ । मनुÕय के जीवन म¤ कहानी महÂवपूणª भूिमका िनभाती
है ।
कहानी छोटी हो या बड़ी एक सीख अवÔय दे जाती है । कहािनयŌ Ĭारा मनुÕय के ÓयिĉÂव
को िनखारने म¤ सहायता िमलती है । कहािनयŌ के माÅयम से दी गयी सीख ही मनुÕय के
आÆतåरक जीवन से जुड़कर उसके वतªमान को सँवारती है । बचपन से ही लोक कथाओं,
धािमªक कथाओं, पौरािणक कथाओं और ऐितहािसक कथाओं को सुनकर ब¸चे कì चेतना
धमª, समाज और मानवता के ÿित िवĵास úहण करती है । उसी परÌपरा का िनवाªह करते
हòए ÿेम से जुड़ी कहािनयाँ, जैसे ‘नल-दमयंती’, ‘दुÕयंत-शकुंतला’, ‘सÂयवान-सािवýी’ आिद
के माÅयम से मनुÕय के Ńदय म¤ ÿेम कì भावना िवकिसत होती है, इनसे ÿेåरत होकर वह भी
अपने जीवन म¤ कहé न कहé उस ÿेम को ढूँढने लगता है । अिधकतर कहािनयाँ मनोरंजक
और काÐपिनक होती ह§ िकÆतु कहé न कहé वह कÐपना से जुड़कर वाÖतिवकता एवं अपने
पाýŌ Ĭारा वतªमान कì यथाथª िÖथितयŌ का िचýण करती ह§ । इस ÿकार कहानी मनुÕय को
नैितक और संवेदनशील बनाती है। कहानी को हम अनेक नामŌ से जानते ह§ िजनम¤ मनुÕय
पूवª घटनाओं एवं काÐपिनक घटनाओं को कहानी के माÅयम से Óयĉ करता है ।
९.२ िहंदी कहानी : अथª एवं पåरभाषा ९.२.१ कहानी का अथª:
कहानी को िविभÆन शÊदŌ से सं²ािÆवत िकया गया है और इÆहé शÊदŌ के माÅयम से कहानी
के अथª और भाव को ÖपĶ करने कì कोिशश कì गयी है । यहाँ िविभÆन शÊदकोश,
भाषाकोश, अथªकोश, पाåरभािषक शÊदावली कोश आिद के माÅयम से कहानी शÊद के अथª
का मूल भाव ÖपĶ िकया गया है ।
वृहद िहÆदी शÊदकोष के अनुसार:
“िहÆदी शÊदकोश म¤ कहानी का अथª कथा, आ´याियका, वृ°ाÆत, िकÖसा, यथाथª और
कÐपना के िम®ण से ÿÖतुत कोई घटना, िववरण जो उĥेÔय ÿधान हो, गī सािहÂय कì एक
समाŀत िवधा शॉटª Öटोरी, मनगढ़ंत बात ³यŌ कहानी बनाये जा रहे हो ।”
िहÆदी-अंúेजी शÊदकोश, बþीनाथ कपूर
अंúेजी भाषा म¤ कहानी को ‘Öटोरी’, ‘फेबल’, ‘टेल’ कहते ह§ ।
उदूª-िहÆदी शÊदकोश के अनुसार, आचायª रामचंþ वमाª
उदूª म¤ कहानी को ‘िकÖसा’ कहा जाता है ।
वृहद िहÆदी शÊदकोश के अनुसार, स. Ôयाम बहादुर वमाª
संÖकृत म¤ कहानी को ‘आ´यान’, ‘उपा´यान’ एवं ‘कथा’ कहते ह§ ।
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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
117 ९.२.२ कहानी कì पåरभाषा:
कहानी अथवा आ´यान कì परÌपरा पुरातन काल से भारतीय समाज का अिभÆन अंग रही
है । कहानी अलग-अलग नामŌ से जानी जाती रही है लेिकन िवकास के øम म¤ यह एक
Öवतंý िवधा के łप म¤ िवकिसत हòई । इसिलए इसे भी एक सुिनिIJत पåरभाषा कì
आवÔयकता पड़ी ।
भारतीय लेखकŌ Ĭारा पåरभािषत:
 पं. रामचंþ शु³ल “कहानी सािहÂय का वह łप है, िजसमे कथा ÿवाह एवं कथोपकथन
म¤ अथª अपने ÿकृत łप मे अिधक िवīमान रहता है ।"
 नामवर िसंह “कहानी छोटी मुंह बड़ी बात होती है ।”
 मुंशी ÿेमचÆद ‘‘गÐप (कहानी) एक ऐसी गī रचना है, जो िकसी एक अंग या मनोभाव
को ÿदिशªत करती है । कहानी के िविभÆन चåरý, कहानी कì शैली और कथानक उसी
एक मनोभाव को पुĶ करते ह§ । यह रमणीय उīान न होकर, सुगिÆधत फूलŌ से युĉ
एक गमला है।’’
 बाबू गुलाब राय के अनुसार, "छोटी कहानी एक Öवतः पूणª रचना ह§, िजसम¤ एक िदन
या ÿभाव को अúसर करने वाली Óयिĉ केिÆþत घटना या घटनाओं का आवÔयक,
परÆतु कुछ अÿÂयािशत ढंग से उÂथान-पतन और मोड़ के साथ पाýŌ के चåरý पर
ÿकाश डालने वाला कौतूहलपूणª वणªन हो।"
 डॉ. ÔयामसुÆदर दास के शÊदŌ म¤, "आ´याियका एक िनिIJत लàय को Åयान म¤
रखकर िलखा गया नाटकìय आ´यान ह§।"
पाIJाÂय लेखकŌ Ĭारा पåरभािषत:
 चाÐसª वैरेट के अनुसार, “कहानी एक लघु वणªनाÂमक रचना ह§, िजसम¤ वाÖतिवक
जीवन को कलाÂमक łप म¤ ÿÖतुत िकया जाता ह§। कहानी का ÿमुख उĥेÔय मनोरंजन
करना ह§ ।"
 एडगर एिलन के अनुसार- “कहानी वह छोटी आ´ यानाÂ मक रचना है िजसे एक बैठक
म¤ पढ़ा जा सके जो पाठक पर एक समिÆवत ÿभाव उÂ पÆ न करने के िलये िलखी गई हो
िजसम¤ उस ÿभाव को उÂ पÆ न करने म¤ सहायक तÂ वŌ के अितåर³ त और कुछ न हो
और जो अपने आप म¤ पूणª हो ।”
९.३ िहंदी कहानी : िवकास याýा कहािनयŌ कì ÿाचीन परÌपरा तथा उससे जुड़ी लोक कथाओं को भी शािमल करना होगा
³यŌिक कहािनयŌ के उĩव म¤ धािमªक कथाय¤ तथा लोककथाएँ एक महÂवपूणª भूिमका
िनभाती ह§ । अगर हम वैिदक सािहÂय म¤ झाँक कर देख¤ तो कहािनयŌ का आिवभाªव वहé से
आरÌभ होता है । िहÆदी के कथा सािहÂय म¤ वैिदक संÖकृत कालीन सािहÂय तथा लौिकक munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
118 सािहÂय का अिधक योगदान है । िजसम¤ कथा सåरÂसागर, पंचतंý, िहतोपदेश आिद । इस
ÿकार लोक कथा िविभÆन ąोतŌ से जुड़ी होती है । िहंदी कहानी के उĩव और िवकास म¤
बांµला सािहÂय का िवशेष योगदान रहा है । अंúेजी का सािहÂय अनुवाद के łप म¤ बांµला म¤
आया और बांµला से यह िहंदी म¤ आया । बांµला म¤ कहानी को गÐप कहा जाता है । जैसा िक
शु³ल जी कहते ह§ “अंúेजी कì मािसक पिýकाओ म¤ छोटी-छोटी आ´याियकाएं व कहािनयाँ
िनकला करती ह§, वैसी ही कहािनयŌ कì रचना “गÐप के नाम से बंग भाषा म¤ चल पड़ी थी ।”
इस ÿकार बांµला म¤ गÐप के नाम से कहािनयाँ िलखी गयé जो धीरे-धीरे िहÆदी म¤ आया ।
अरबी-फारसी सािहÂय म¤ भी कहािनयŌ का łप देख¤तो वहां अिधकतर ितलÖमी, ऐयारी
कहािनयाँ िमलती ह§ जैसे- ‘हाितमताई’, ‘अिलफ़ लैला’, आिद कहािनयाँ उसी सािहÂय कì
देन ह§, िजसका ÿभाव िहÆदी कहािनयŌ पर पड़ा । उपयुªĉ िववेचन से यह ÖपĶ होता है िक
कहािनयŌ का उĩव ÿाचीन काल म¤ ही आरÌभ हो गया था िजसमे धािमªक कथाओं,
िकंवदंितयŌ एव लोक कथाओं, अंúेजी सािहÂय, बांµला कथा सािहÂय तथा अरबी-फारसी
सािहÂय का बड़ा योगदान रहा है ।
िहंदी कहानी का उĩव लगभग सन् १९०० से माना जाता है । मानव जÆम के साथ ही
कहानी का भी जÆम हòआ और कहानी को कहने तथा सुनने कì ÿकृित िनिमªत हòई । यही
कारण है िक सभी सËय तथा आिदम समाज म¤ कहािनयाँ पायी जाती ह§ । कथा-िकÖसŌ का
इितहास भारतीय परंपरा म¤ बहòत पुराना है । िहतोपदेश कì कथाओं और बैताल पचीसी
जैसी कथाओं के माÅयम से भारतीय समाज म¤ नीित-नैितकता और आदशª कì िश±ाएँ दी
जाती रही ह§ । कहानी िहÆदी गī लेखन कì बहòचिचªत और सवªमाÆय िवधा है । इस िवधा का
उĩव उÆनीसवé सदी म¤ हòआ । बांµला भाषा म¤ कहानी को गÐप कहा जाता है । मानव समाज
के आरÌभ के साथ ही कहानी का भी उĩव हòआ । कहानी कहने और सुनने कì परंपरा
मानव के Öवभाव म¤ रही । यही कारण है िक हर समाज म¤ उनकì कहािनयाँ मौजूद ह§ । हमारे
देश म¤ कहािनयŌ कì बड़ी सुदीघª और समृĦ परंपरा रही है । “वेद एवं उपिनषद म¤ विणªत
‘यम-यमी’, ‘पुŁरवा-उवªशी’, ‘सनÂकुमार- नारद’, ‘गंगावतरण’, ‘®ृंग’, ‘नहòष’, ‘ययाित’,
‘शकुÆतला’, ‘नल-दमयÆती’ जैसे चिचªत आ´यान कहानी के ÿाचीन łप ह§ ।
ÿाचीनकाल म¤ सिदयŌ तक ÿचिलत वीरŌ तथा राजाओं के शौयª, ÿेम, Æयाय, ²ान, वैराµय,
साहस, समुþी याýा, अगÌय पवªतीय ÿदेशŌ म¤ ÿािणयŌ का अिÖतÂव आिद कì कथाएँ,
िजनका कथानक घटना ÿधान हòआ करता था, वे भी कहानी के ही łप ह§ । ‘गुणढ्य’ कì
‘वृहÂकथा’ को िजसम¤ ‘उदयन’, ‘वासवद°ा’, समुþी ÓयापाåरयŌ, राजकुमार तथा
राजकुमाåरयŌ के पराøम कì घटना ÿधान कथाओं का बाहòÐय है। इसके बाद ‘पंचतंý’,
‘िहतोपदेश’, ‘बेताल प¸चीसी’, ‘िसंहासन ब°ीसी’, ‘कथा सåरÂसागर’ जैसी सािहिÂयक एवं
िश±ाÿद कहािनयŌ का युग आरÌभ हòआ । इन कहािनयŌ से ®ोताओं ने मनोरंजन के साथ
ही नैितक िश±ा भी ÿाĮ कì । ÿायः इन कहािनयŌ म¤ असÂय पर सÂय कì िवजय िदखाई गई
। अÆयाय पर Æयाय कì जीत िदखाई गई और अधमª पर धमª कì िवजय िदखाई गई है ।
िहंदी कहानी आज के समय कì लोकिÿय िवधा बन गयी है । िहंदी कहानी का ±ेý बहòत
िवÖतृत है ³यŌिक कहानी म¤ जीवन, समय और समाज से जुड़ा कोई भी प± अछूता नहé रह
गया है । िहंदी कहानी के लेखन म¤ मिहलाओं के साथ ही अलग-अलग ±ेýŌ के लोगŌ का
आगमन हòआ है । आज के कहानीकारŌ म¤ मृदुला गगª, काशीनाथ िसंह, गोिवंद िम®, उदय munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
119 ÿकाश, ÿभा खेतान, ²ान रंजन और सुधा अरोड़ा जैसे अनेक सािहÂयकारŌ कì सिøयता
देखी जा सकती है। आज ÿवासी कहानी के łप म¤ ÿवासी भारतीयŌ कì रचनाएँ भी खूब
चिचªत हो रही है । इस ÿकार कहा जा सकता है िक आज कì िहंदी कहानी अपनी
सामािजक िजÌमेदारी को िनभाते हòए जीवन के अनेक प±Ō का समú और सटीक िचýण कर
रही है । कालखंड के अनुसार िहÆदी कहानी के उßपित और िवकास को िनÌन िवभाजन के
माÅयम से ÖपĶ िकया जा सकता ह§ ।
९.३.१ ÿारंिभक युग (१८०० ई. से १९०० ई.) तक:
कहानी के łप म¤ सािहÂय कì िजस िवधा का हम अÅययन करते ह§, वह पाIJाÂय सािहÂय के
माÅयम से िहंदी सािहÂय म¤ आई है । िहÆदी कहानी के िवकास म¤ सन् १९०० म¤ आरÌभ
होने वाली पिýका सरÖवती का बहòत महÂवपूणª योगदान है । गī के िवकास कì ŀिĶ से
भारत¤दु युग एक सुिनिIJत आरÌभ िबÆदु माना जाता है । सन् १८५७ ई. से भारत¤दु युग कì
शुŁआत मानी जाती है । इस कालखंड म¤ भारत¤दु हåरIJंþ सिहत अÆय सािहÂयकार नाटकŌ
और िनबंधŌ के लेखन म¤ ºयादा सिøय थे । हालाँिक इस काल म¤ कुछ कहािनयाँ िलखी गईं,
मगर उÆह¤ िहंदी कì मौिलक कहानी नहé माना जाता है । इसी युग म¤ िविभÆन मािसक एवं
साĮािहक पý-पिýकाओं का ÿकाशन आरÌभ हòआ जो िवचारŌ कì लड़ाई के िलए उपयुĉ
माÅयम बना । भारतेÆदु युग के लेखकŌ ने भारत िवरोधी िāिटश ÿचार और शोषण के िवŁĦ
वैचाåरक संघषª के िलए एक सशĉ माÅयम के łप म¤ जनजागरण के िलए इनका ÿयोग
िकया । ‘किववचन सुधा’, ‘हåरIJंþ मैगज़ीन’, ‘िहÆदी ÿदीप’, ‘āाĺण’ आिद पý पिýकाओं म¤
अपनी रचनाओं और सÌपादकìय लेखŌ Ĭारा अपना िवरोध Óयĉ िकया ।
गī िवधाओं के िवकास कì ŀिĶ से कहानी भारतेÆदु युग म¤ उपÆयास िनबÆध आिद कì तरह
िवकिसत नहé हòई लेिकन तÂकालीन िनबÆधŌ और अÆय गī łपŌ म¤ िजन शैिलयŌ का
आिवभाªव हो रहा था उनम¤ कहानी के तÂव सिøय थे जो कालाÆतर म¤ एक जीवÆत िवधा के
łप म¤ िवकिसत हòई। गī łपŌ के इसी अिभनव और चमÂकृत कर देने वाले िवकास के
कारण ही ‘मुंशी इंशा अÐलाह खां’ कì सन् १८०८ म¤ िलखी ‘रानी केतकì कì कहानी’ को
िहÆदी कहानी के łप िनधाªरण कì ŀिĶ से िवशेष महÂव नहé िमला िकÆतु वह अपने महÂव
को Öथािपत कर सकì ।
सरÖवती पिýका का ÿकाशन सन् १९०० म¤ हòआ था । िहंदी कहानी कì ŀिĶ से इस पिýका
कì भूिमका महाßवपूणª रही है । इसी पिýका म¤ सन् १९०० के जून माह के अंक म¤ िकशोरी
लाल गोÖवामी कì कहानी ‘इंदुमती’ ÿकािशत हòई । इस कहानी को ÿथम िहÆदी कहानी
मानने पर इसिलए भी आपि° कì जाती है ³यŌिक इस पर शे³सिपयर के ÿिसĦ नाटक
‘टेÌपेÖट’ कì छाया िदखती थी । आचायª शु³ल ने इसकì मौिलकता पर सÆदेह Óयĉ िकया
था । इसी पिýका म¤ िहÆदी कì पहली कहानी मानी जाने वाली इंशा अÐलाह खां Ĭारा रिचत
‘रानी केतकì कì कहानी’ ÿकािशत हòयी थी, इसी पिýका म¤ ÿमुख सािहÂयकार
वृÆदावलाल वमाª कì कहानी ‘राखीबÆद भाई’ और ‘तातार और एक वीर राजपूत’ भी
ÿकािशत हòई थी, ‘माधवराव सÿे’ कì ‘एक टोकरी िमĘी’ (१९०१) भगवान दास कì ‘Èलेग
कì चुड़ैल’ (१९०२) पंिडत िगåरजाद° वाजपेयी कì ‘पंिडत और पंिडतानी’, आचायª
रामचÆþ शु³ल कì ‘µयारह वषª का समय’(१९०३) लाला पावªती नंदन कì ‘िबजली’ munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
120 (१९०४) और बंग मिहला कì ‘दुलाई वाली’ (१९०७) ÿमुख कहानी है, िजसने कहानी
िवधा को एक ÖवतÆý िवधा के łप म¤ Öथािपत करने म¤ अहम भूिमका िनभाई है । आरÌभ म¤
कहानी िवधा बड़ी उपेि±त रही थी. कहानी िवधा को सामािजक ÿितķा न िमलने के कारण
®ीमती राजा बाला घोष ने अपना नाम िछपा कर छĪ नाम ‘बंग मिहला’ के नाम से और बाबू
िगåरजा कुमार घोष जी अपने छĪ नाम ‘पावªती नंदन’ के नाम से िलखते ह§ ।
९.३.२ ÿेमचंद पूवª कहानी (सन् १९०० से १९१५ तक):
िहंदी कहानी का ÿथम दौर सन् १९०० से १९१५ तक का माना जाता है । इसके उपरांत
‘सरÖवती’ पिýका के बाद ‘इंदु’ ÿकािशत हòई और इसम¤ जयशंकर ÿसाद जी िक कहािनयाँ
ÿकािशत होने लगी, िजसम¤ से 'ÿसाद कì ÿारंिभक महÂवपूणª कहािनयाँ - आग, चंदा,
गुलाम, िचतौड़ – उĦार आिद इंदु के ÿारंिभक वषō म¤ ÿकािशत हòई ।" 'गुलबहार’
'िकशोरीलाल गोÖवामी' (१९०२, ‘पंिडत और पंिडतानी’ िगåरजाद° वाजपेयी (१९०३),
‘µयारह वषª का समय’ रामचंþ शु³ल (१९०३), ‘दुलाईवाली’ बंगमिहला (१९०७), ‘मन कì
चंचलता’ माधवÿसाद िम® (१९०७),‘िवīा बहार ‘िवīानाथ शमाª (१९०९), ‘राखीबंद
भाई’ वृÆदावनलाल वमाª (१९०९), ‘úाम’ जयशंकर 'ÿसाद' (१९११), ‘सुखमय जीवन’
चंþधर शमाª गुलेरी (१९११), ‘रिसया बालम’ जयशंकर ÿसाद (१९१२), ‘परदेसी’
िवĵÌभरनाथ िजºजा (१९१२), ‘कानŌ म¤ कंगना ‘राजारािधकारमण ÿसाद िसंह (१९१३),
‘र±ाबंधन’ िवĵÌभरनाथ शमाª 'कौिशक' (१९१३), ‘उसने कहा था’ चंþधर शमाª गुलेरी
(१९१५), आिद के ÿकाशन से िसĦ होता है िक इस ÿारंिभक काल म¤ िहÆदी कहािनयŌ के
िवकास के सभी िचÆह िमल जाते ह§ ।
ÿेमचंद के आगमन से िहÆदी का कथा-सािहÂय आदशōÆमुख यथाथªवाद कì ओर मुड़ा और
ÿसाद के आगमन से रोमांिटक यथाथªवाद कì ओर । चंþधर शमाª 'गुलेरी' कì कहानी 'उसने
कहा था' (१९१५) म¤ यह अपनी पूरी रंगीनी म¤ िमलता है । सन् १९२२ म¤ उú का िहÆदी-
कथा-सािहÂय म¤ ÿवेश हòआ । उú न तो ÿसाद कì तरह रोम§िटक थे और न ही ÿेमचंद कì
भाँित आदशōÆमुख यथाथªवादी । वे केवल यथाथªवादी थे, ÿकृित से ही उÆहŌने समाज के
नंगे यथाथª को सशĉ भाषा-शैली म¤ उजागर िकया ।
९.३.३ ÿेमचंदयुगीन कहानी (सन् १९१६ से १९३६ तक):
िहÆदी कहानी का िवकास सन् १९१६ से १९३६ के बीच िजतनी गित के साथ हòआ उतनी
गित िकसी अÆय सािहिÂयक िवधा के िवकास म¤ नहé देखी जाती । िहंदी कहानी के ±ेý म¤
ÿेमचंद के आने के साथ ही एक नया युग शुł होता है । एक ňुव तारे कì तरह से वे सािहÂय
जगत म¤ चमक उठते है । इसे ÿेमचंद युग के नाम से जाना जाता है । ÿेमचंद ने लगभग तीन
सौ कहािनयाँ िलखé । ÿेमचÆद कì कहािनयŌ का कÃय यथाथª जीवन से सÌबĦ था । िहÆदी-
उदूª के जानकार ÿेमचंद ने तÂकालीन पåरिÖथितयŌ पर बड़े साहस से िलखा । इस काल म¤
जनता म¤ िāिटश काल से मुिĉ पाने के िलए छटपटाहट बढ़ रही थी और ÿेमचÆद अपनी
कहानी के माÅयम से इस आÆदोलन को ÿखर कर रहे थे। उस समय तक ÿेमचंद ÿबुĦ
मÅयमवगêय चेतना के ÿतीक बन गए थे। ÿेमचÆद ने देश कì तÂकालीन राजनीितक और
सामािजक पåरिÖथितयŌ को समझ िलया था और अपनी कहािनयŌ के माÅयम से अपने
िवचारो और संवेदनाओं को वाणी देने का काम आरÌभ कर िदया था । munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
121 ÿेमचÆद ने अपने पहले ही कहानी संúह 'सोजे वतन' से ही जातीय और राÕůीय सवालŌ को
जोड़ िदया था । इसी परÌपरा को उÆहŌने आगे अपनी कहानी 'आहòित' 'जुलूस', 'समरयाýा',
'बूढी काकì', 'पंच-परमेĵर', 'पूस कì रात', 'कौशल', 'माँ', बड़े भाई 'साहब', 'Öवामी', 'शांित',
'नाशा', 'घर जमाई', 'ईदगाह', 'लैला' 'कफन' और 'िøकेट मैच' आिद ÿेमचंद कì सुÿिसĦ
कहािनयाँ है । उÆहŌने अपनी कहािनयŌ के माÅयम से जन-जागृित, लोकिहत, ľी चेतना,
मानवीय मूÐय, Âयाग, ÿेम, कमªठ, लोक चेतना और आÂम शिĉ को जगाने का कायª िकया
। ÿेमचÆद धािमªक पाखंड को देश िहत के िलए बहòत ही हािनकारक मानते थे । उनकì
'अंधेर' तथा 'खून सफेद’ आिद कहािनयŌ म¤ िहÆदू समाज म¤ ÓयाĮ धािमªक पाखंड का तीखा
िचýण िमलता है । समाज म¤ फैले ĂĶाचार के ÿितरोध म¤ उÆहŌने 'नमक का दरोगा' कहानी
िलखी थी । अपनी कहानी 'बड़े घर कì बेटी' म¤ úामीण मÅयमवगª कì पाåरवाåरक बनावट
और मानिसकता का यथाथª िचýण िकया है । ÿेमचÆद कì ÿायः सभी कहािनयŌ म¤ चåरý या
घटना केÆþ म¤ रहती है साथ ही ऐितहािसक पाýŌ को क¤þ म¤ रख कर भी उÆहŌने कई
कहािनयाँ िलखी ह§ । उदाहरण के तौर पर 'रानी सारÆधा', 'राजा हरदौल', 'मयाªदा कì वेदी',
'पाप का अिµनकुंड' आिद ÿमुख कहािनयाँ ह§ । अत: एक लेखक के łप म¤ वे अपने
ऐितहािसक चåरýŌ का ÿयोग अपने जन आÆदोलन को मुखर करने के िलए करते ह§ ।
गांधीवादी िसĦांतŌ और आचरणŌ के ÿित अपने गहरे िवĵास के कारण ही ÿेमचÆद अपनी
कहानी म¤ यथाथªवाद को अपयाªĮ मानकर िटÈपणी करते ह§ । उसम¤ कÐपना कì माýा कम,
अनुभूितयŌ कì माýा अिधक होती है बिÐक अनुभूितयाँ ही रचनाशील भावना से अनुरंिजत
होकर कहानी बन जाती है, यह समझना भूल होगी िक कहानी जीवन का यथाथª िचý है ।
िकसान के ÿित अपनी ÿितबĦता दोहराते हòए वे कहते ह§ िक मनुÕय समाज दो भागŌ म¤ बंट
गया है । बड़ा िहÖसा मरने और खपने वालŌ का है और बहòत ही छोटा िहÖसा उन लोगŌ का
है जो अपनी शिĉ और ÿभाव से बड़े समुदाय को अपने वश म¤ िकये हòए है । ÿेमचÆद ने
अपनी कहािनयŌ म¤ úामीण पåरवेश, सामाÆय गरीब, मजदूर तथा िनÌन समाज के मनुÕयŌ के
जीवन को उभारा है । 'ठाकुर का कुआं' कहानी म¤ ÿेमचÆद ने दिलत समाज कì समÖयाओं
का िचýण िकया है । इस दौर म¤ अंúेजी और बांµला सािहÂय का ÿभाव कम होने लगा और
िहंदी कहानी म¤ भारतीय समाज िदखने लगा । इस कालखंड म¤ जयशंकर ÿसाद ने भारतीय
संÖकृित को आधार बनाकर कई कहािनयाँ िलखé । इस कालखंड म¤ चंþधर शमाª गुलेरी,
सुदशªन, चतुरसेन शाľी, वृंदावनलाल वमाª, िवĵÌभरनाथ कौिशक, पंिडत बेचन शमाª उú,
अली अÊबास हòसैनी, राय कृÕण दास, िशवपूजन सहाय, चंडीÿसाद Ćदयेश, िवनोद शंकर
Óयास, पदुमलाल पÆनालाल ब´शी आिद ने कई कहािनयाँ िलखé ।
िहÆदी कहानी मंच पर ÿसाद का ÿवेश एक ऐितहािसक घटना है.कहानी के ±ेý म¤ ÿसाद जी
आधुिनक ढंग कì कहािनयŌ के रचियता माने जाते ह§। सन् १९१२ ई. म¤ 'इंदु' पिýका म¤
उनकì पहली कहानी 'úाम' ÿकािशत हòई । जयशंकर ÿसाद जी ने लगभग कुल ७०
कहािनयाँ रिच ह§ । उनकì अिधकतर कहािनयŌ म¤ भावना कì ÿधानता है िकÆतु उÆहŌने
यथाथª कì ŀिĶ से भी कुछ ®ेķ कहािनयाँ िलखी ह§ । उनकì वातावरण-ÿधान कहािनयाँ
अÂयंत सफल हòई ह§ । उÆहŌने ऐितहािसक, ÿागैितहािसक एवं पौरािणक कथानकŌ पर
मौिलक एवं कलाÂमक कहािनयाँ िलखी ह§ । भावना-ÿधान ÿेमकथाएँ, समÖयामूलक
कहािनयाँ िलखी ह§ । भावना ÿधान ÿेमकथाएँ, समÖयामूलक कहािनयाँ, रहÖयवादी,
ÿतीकाÂमक और आदशōÆमुख यथाथªवादी उ°म कहािनयाँ भी उÆहŌने िलखी ह§ । जयशंकर munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
122 ÿसाद जी भारत के उÆनत अतीत का जीवÆत वातावरण ÿÖतुत करने म¤ िसĦहÖत थे ।
उनकì िकतनी ही कहािनयाँ ऐसी ह§ िजनम¤ आिद से अंत तक भारतीय संÖकृित एवं आदशō
कì र±ा का सफल ÿयास िकया गया है । उनकì कुछ ®ेķ कहािनयŌ के नाम ह§;
'आकाशदीप', 'गुंडा', 'पुरÖकार', 'सालवती', 'Öवगª के खंडहर म¤', 'आँधी', 'इंþजाल', 'छोटा
जादूगर', 'िबसाती', 'मधुआ', 'िवरामिचÆह', 'समुþ संतरण' आिद अपनी कहािनयŌ म¤ िजन
अमर चåरýŌ कì उÆहŌने उजागर िकया ह§ ; उनम¤ से ÿमुख łप से 'चंपा', 'मधुिलका', 'लैला',
'इरावती', 'सालवती' और 'मधुआ' कहानी का 'शराबी', ‘गुंडा' कहानी का 'नÆहकूिसंह'
'ममता' और 'घीसू' जो आज भी सािहÂय ±ेý म¤ जीिवत है ।
जैनेÆþ ने सन् १९२७-२८ म¤ कहानी िलखना आरंभ िकया । उनके आगमन के साथ ही
िहÆदी कहानी का नया उÂथान शुł हòआ । सन् १९३६ म¤ ÿगितशील लेखक संघ कì
Öथापना हो चुकì थी । इस समय के लेखकŌ कì रचनाओं म¤ ÿगितशीलता के तßव का जो
समावेश हòआ उसे युगधमª समझना चािहए । यशपाल राÕůीय संúाम के एक सिøय
øांितकारी कायªकताª थे, अतः वह ÿभाव उनकì कहािनयŌ म¤ भी आया । िवĵÌभरनाथ
कौिशक तÂकालीन कहानीकार थे । ÿेमचÆद के समान सािहÂय म¤ इनका ŀिĶकोण भी
आदशōÆमुख यथाथªवाद था । इनकì अिधकांश कहािनयाँ चåरý ÿधान ह§ । इन कहािनयŌ के
पाýŌ के चåरý िनमाªण म¤ लेखक ने मनोिव²ान का सहारा िलया है और सुधारवादी
मनोवृि°यŌ से पåरचािलत होने के कारण उÆह¤ अÆत म¤ दानव से देवता बना िदया है । इनकì
ÿमुख कहािनयाँ ‘र±ाबंधन’, ‘उĦार’, ‘माता का Ćदय’, ‘ÿेम का पापी’, ‘पåरणाम’, ‘सुÿबंध
अंितम भ¤ट’ आिद ह§ ।
कहानीकार बैचेन शमाª ‘उú’ कì कहािनयŌ कì पृķभूिम कÖबाई तथा महानगरीय रही है ।
ÿेमचÆद और उú कì उă म¤ बीस वषª का अंतर होने के बावजूद दोनŌ कì कहािनयŌ म¤
Öवतंýता कì ÿितबĦता देखी जा सकती है । गांधी के आंदोलन का उन पर भरपूर असर था
। इनकì ÿमुख कहािनयाँ ‘बिलदान’, ‘देश þोह’, ‘पागल का ओट’, ‘दोजख कì आग’,
‘चाकलेट’ आिद ह§ । कथाकार सुदशªन भी ÿेमचÆद परÌपरा से जुडे हòए कहानीकार ह§ ।
इनका ŀिĶकोण सुधारवादी है । ये आदशōÆमुख यथाथªवादी ह§ । इÆहŌने अपनी कहािनयो म¤
समÖयायŌ का आदशªवादी समाधान ÿÖतुत िकया है । रचनाकार 'सुदशªन' कì भाषा सरल,
Öवाभािवक, ÿभावोÂपादक और मुहावरेदार है । इनकì ÿमुख कहानी ‘सेवा धमª’, ‘हार कì
जीत’, ‘तीथª याýा’, ‘गरीब कì आह’, ‘आशीवाªद’ आिद ÿमुख है । लेखक आचायª चतुरसेन
भी इस युग के ÿमुख कथाकार रहे ह§ । इनकì ÿमुख कहािनयŌ म¤ 'अ±त', 'रजकण', 'वीर
बालक', 'मेघनाद', 'सीताराम', 'िसंहगढ़ िवजय', 'वीरगाथा', 'लÌबúीव', 'दुखवा म§ कासŌ कहóं
सजनी', 'कैदी', 'आदशª बालक', 'सोया हòआ शहर', 'कहानी खÂम हो गई', 'धरती और
आसमान' आिद ह§ । इस ÿकार से देखा जाय तो इस काल म¤ ÿेमचंद ने कहानी कì मजबूत
नéव रखी और इनके समकालीन कथाकारŌ ने मजबूती ÿदान कì । पूवª काल कì अपे±ा इस
काल म¤ अिधक कहािनयŌ का ÿकाशन हòआ, िजसम¤ Łिढ़वादी ÓयवÖथा, अंधिवĵास, ľी
शोषण तथा úामीण समाज कì समÖयाओं को दशाªया गया है । िहÆदी कहानी के िवकास म¤
इस युग का बहòत योगदान रहा है ।
munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
123 ९.३.४ ÿेमचंदो°र कहानी (सन् १९३६ से १९५० तक):
ÿेमचंद का देहांत सन् १९३६ म¤ हòआ था लेिकन उनके िनधन से पहले ÿगितशील लेखक
संघ कì Öथापना हो चुकì थी । िजसम¤ अिधकतम ÿगितशील लेखक जुड़े थे । सन् १९३६
से १९५० ई. तक के कालखंड को ÿेमचंदो°र काल या िĬतीय युग कहा जा सकता है ।
इस युग म¤ िहÆदी कहानी के ±ेý का िवकास हòआ । यशपाल अपने सिøय øािÆतकारी
जीवन के कारण जेल म¤ थे । जैन¤þ और इलाचंþ जोशी ने मनोिवĴेषणवादी कहािनयाँ िलखé
तथा रांगेय राघव और फणीĵरनाथ रेणु ने आंचिलक कहािनयाँ िलखé । यशपाल ने
ÿगितवादी िवचारधारा को आधार बनाकर कहािनयाँ िलखé । इस कालखंड म¤ यथाथªपरक-
सामािजक परंपरा, ऐितहािसक-सांÖकृितक परंपरा, यौनवादी परंपरा, हाÖय-रस परंपरा और
साहिसक परंपरा कì कहािनयाँ िलखी गईं । इन परंपराओं का िवÖतार और िवकास आने
वाले समय म¤ हòआ । इस कालखंड म¤ अ²ेय, भगवतीचरण वमाª, उप¤þनाथ अÔक, नागाजुªन,
िवÕणु ÿभाकर आिद कहानीकारŌ ने िहंदी कहानी के िवकास म¤ योगदान िदया ।
यशपाल एक मा³सªवादी कहानीकार थे । उनकì कहािनयŌ म¤ अिधकतर समाज के वगª
संघषª, मजदूर शोषण आिद का िचýण िमलता है । यशपाल कì कहािनयŌ म¤ सवªदा कथा रस
िमलता है । मनोिवĴेषण और तीखा Óयंµय इनकì कहािनयŌ कì िवशेषताएँ ह§ । उनके ÿमुख
कहानी संúह '²ानदान' (१९३३), 'अिभशĮ' (१९३३), तथा ÿिसĦ कहािनयाँ 'िपंजड़े कì
उड़ान' (१९३९), 'तकª का तूफ़ान' (१९४४), 'भÖमावृतिचंगारी (१९४६), 'वो दुिनया'
(१९४८), 'फूलो का कुताª' (१९४९), 'धमªयुĦ' (१९५०), 'उ°रािधकारी' (१९५१), 'िचý
का शीषªक' (१९५१), 'उ°मी कì माँ' (१९५५), 'तुमने कहा था िक म§ सुÆदर हóं' (१९५४),
'सच बोलने कì भूल' (१९६२), 'ख¸चर और आदमी' (१९६५), 'भूख के तीन िदन'
(१९६८) ÿेमचंदो°र उपÆयासकारŌ म¤ जैन¤þ कुमार का िविशĶ Öथान है । उनके ÿमुख
कहानी संúह म¤ 'फाँसी' (१९२९), 'वातायन' (१९३०), 'नीलम देश कì राजकÆया'
(१९३३), 'एक रात' (१९३४), 'दो िचिड़याँ' (१९३५), 'पाजेब' (१९४२),'जयसंिध'
(१९४९) आिद ÿमुख ह§ ।
कथाकार इलाचंद जोशी का उ°रांचल म¤ जÆमे होने के कारण, वहाँ के ÿाकृितक वातावरण
का इनके िचÆतन पर बहòत ÿभाव पड़ा । अÅययन म¤ Łिच रखने वाले इलाचÆþ जोशी ने
छोटी उă म¤ ही भारतीय महाकाÓयŌ के साथ-साथ िवदेश के ÿमुख किवयŌ और
उपÆयासकारŌ कì रचनाओं का अÅययन कर िलया था । 'धूप रेखा' (१९३८), 'आहòित'
(१९४५), आिद इनके ÿमुख संúह ह§ । िहÆदी के शे³सिपयर कहे जाने वाले असाधारण
ÿितभा के धनी रचनाकार 'रांगेय राघव' ने बहòत ही चिचªत कहािनयाँ िलखी है, िजसम¤ ÿमुख
łप से 'पंच परमेĵर', 'अवसाद का छल', 'गूंगे', 'ÿवासी', 'िघसटता कÌबल', 'पेड़', 'नारी का
िव±ोभ', 'काई', 'समुþ के फेन', 'देवदासी', 'कठपुतले', 'तबेले का धुंधलका', 'जाित और
पेशा', 'नई िजंदगी के िलए', 'ऊंट कì करवट', 'बांबी और मंतर', 'गदल', 'कु°े कì दुम और
शैतान : नए टे³नी³स', 'जानवर-देवता', 'भय', 'अधूरी मूरत' आिद ÿमुख ह§ ।
कथा-सािहÂय को एक महßवपूणª मोड़ देने वाले कथाकार, लिलत-िनबÆधकार, सÌपादक
और अÅयापक के łप म¤ सि¸चदानंद हीरानंद वाÂÖयायन 'अ²ेय' को जाना जाता है । इनके
ÿमुख कहानी संúह 'िवÿगाथा' (१९३७), 'परÌपरा' (१९४४), 'कोठरी कì बात' (१९४५), munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
124 'शरणाथê' (१९४८), 'जयदोल' (१९५१), 'ये तेरे ÿित łप' (१९६१) आिद है । अ²ेय
ÿयोगधमाª कलाकार थे, उनके आगमन के साथ कहानी नई िदशा कì ओर मुड़ी । िजस
आधुिनकता बोध कì आज बहòत चचाª कì जाती है उसके ÿथम ÿÖतुतकताª अ²ेय ही
ठहरते ह§ । अÔक, ÿेमचंद परंपरा के कहानीकार ह§ । अÔक के अितåरĉ वृंदावनलाल वमाª,
भगवतीचरण वमाª, इलाचÆþ जोशी, अमृतलाल नागर आिद उपÆयासकारŌ ने भी कहािनयŌ
के ±ेý म¤ काम िकया है िकÆतु इनका वाÖतिवक ±ेý उपÆयास है, कहानी नहé । इसके बाद
सन् १९५० के आसपास से िहÆदी कहािनयाँ नए दौर से गुजरने लगé । आधुिनकता बोध
कì कहािनयाँ या नई कहानी नाम िदया गया ।
कहानीकार िवÕणु ÿभाकर िहÆदी के सुÿिसĦ लेखक रहे ह§ । उनकì कृितयŌ म¤ देशÿेम,
राÕůवाद, तथा सामािजक िवकास मु´य भाव ह§। इनके ÿमुख कहानी संúह 'संघषª के बाद',
'धरती अब भी धूम रही है', 'मेरा वतन', 'िखलौने', 'आिद और अÆत' इÂयािद िहंदी सािहÂय
कì अमूल धरोहर है । पĪभूषण से सÌमािनत भगवती चरण वमाª उस युग के ÿमुख लेखक
रहे है । 'मोचाªबंदी' कहानी संúह उनका सबसे चिचªत संकलन रहा है । इस ÿकार हम देखते
ह§ िक कई लेखक ऐसे थे, जो ÿेमचंद के समय से िलख रहे थे लेिकन अपनी उपिÖथित का
एहसास बहòत बाद म¤ हòआ । ऐसे लेखकŌ म¤ 'उपेÆþनाथ अÔक', 'भैरव ÿसाद गुĮ', 'िवÕणु
ÿभाकर', 'अमृत लाल नागर', 'अमृत राय' आिद ÿमुख ह§ । ÿेमचÆदो°र कहानी का यह युग
आजादी के कुछ वषō के बाद तक बना रहा । इसी बीच कहानीकारŌ कì एक नयी पीढ़ी कì
दÖतक सुनायी पड़ने लगी, िजसने देश कì आजादी के बाद अपना होश संभाला और
वयÖक हòए थे । समाज, राजनीित, पåरवार और सािहÂय के ÿित उनमे एक तीखा असंतोष
था । इस असंतोष कì तीĄता और उसके िवŁĦ नया कुछ करने का उÂसाह कहानी म¤ एक
नए सजªनाÂमक िवÖफोट का संकेत बनकर सामने आता है । यह रचनाÂमक िवÖफोट ही
नयी कहानी के łप म¤ हमारे सामने आता है ।
९.३.५ नयी कहानी (सन् १९५० से अब तक):
नयी कहानी का आरंभ सन् १९५० ई. से देखा जाता है ।इसम¤ 'नई कहानी', 'सचेतन
कहानी', 'समांतर कहानी', 'अ-कहानी' और 'सिøय कहानी' आिद धाराओं का उÐलेख
िकया जा सकता है । १९५० तक िहÆदी कहानी का एक िवÖतृत दौर समाĮ हो जाता है
और िहÆदी कहानी पåरप³वता के दौर म¤ ÿवेश करती है। िपछली एक सदी म¤ िहंदी कहानी
ने आदशªवाद, यथाथªवाद, ÿगितवाद, मनोिवĴेषणवाद, आँचिलकता आिद के दौर से
गुजरते हòए सुदीघª याýा म¤ अनेक उपलिÊधयाँ हािसल कì है । मोटे तौर पर सन् १९५४ से
१९६३ तक का समय को 'नयी कहानी' के łप म¤ कहा जा सकता है । नयी कहानी सबसे
पहले िकसने कहा इस बात पर मतभेद है । कुछ लोग इसे नामवर िसंह कì देन कहते है, तो
कुछ इसका ®ेय दुÕयंत कुमार को देते ह§ ।
िहंदी सािहÂय के ®ृंखला म¤ नामवर िसंह का नाम बड़े आदर के साथ िलया जाता है ।
नामवर िसंह अपनी पुÖतक 'कहानी-नयी कहानी' म¤ कहते ह§ िक “कहानी कì चचाª म¤
अनायास ही नई कहानी शÊद चल पड़ा और सुिवधानुसार इसका ÿयोग कहानीकारŌ ने भी
िकया और आलोचकŌ ने भी ।” परंपरागत िहÆदी कहािनयŌ से अलगाने के िलए इÆह¤ नई
कहािनयाँ कहा जाने लगा । वÖतुतः नई कहािनयाँ नाम नई किवता के वज़न पर रखा गया । munotes.in

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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
125 कुछ लोग इन कहािनयŌ को पूवªवतê पीढ़ी कì कहािनयŌ का िवकास मानते ह§ और कुछ
परंपरा से कटकर या उसे अÖवीकार कर इसे एकदम नई कहने कì हठधमê से बाज नहé
आते । वÖतुतः इन नामŌ म¤ कुछ अथªपूणª नहé है ।
'नई कहानी' से भी अपने को अलगाने के िलए और नाम रखे गये ; 'सचेतन कहानी',
'अकहानी' आिद, नामŌ पर बहस करना बेईमानी है । कहानी तो कहानी है । युग पåरवतªन के
साथ उसकì ÿवृि°याँ बदल¤गी ही । Öवतंýता – ÿािĮ के कुछ ही वषŎ बाद भारतीय पåरवेश
म¤ ÿसÆनता - अवसाद के िवरोधी Öवर सुनाई पड़ने लगे । कुछ लोग राÕůीय आकां±ाओं के
ÿित आशािÆवत थे और कुछ लोगŌ का मोह-भंग हो चुका था । Öवतंýता कì ÿािĮ एक
रोमांिटक घटना थी । úाम तथा उसके अंचल संबĦ कहािनयŌ म¤ रोमानी यथाथª िचिýत
हòआ है । 'िशवÿसाद िसंह', 'माकªÁडेय' और 'फणीĵरनाथ रेणु' कì कहािनयŌ को इसी कोिट
म¤ रखा जा सकता है । उनकì कुछ कहािनयŌ म¤ जीवÂव भी िमलता है िकंतु इस तरह कì
अिधकांश कहािनयाँ, जाने-समझे और आंिशक łप से भोगे यथाथª पर आधाåरत होने पर
भी, पुराने मूÐयŌ का ही ÿितपादन करती ह§ । इन दो दशकŌ म¤ देखते देखते दादा, बाबा, माई
के ÿित Óयĉ कì गई आÖथा उलट गई और वह पुराने-नए मूÐयŌ के संघषª के łप म¤ िचिýत
कì जाने लगी । यह टकराहट नए बदलाव कì सूचना देती है । आधुिनक जीवन म¤ कुछ ऐसा
टूट गया है िक पुराने सारे संबंध बदल गए ह§ । रागपूणª संबंध अपने तनावŌ म¤ मूÐयहीन होने
के साथ अथªहीन भी हो गये ह§ ।
कथाकार 'मोहन राकेश' ने इन तनावŌ को मु´य łप से अपनी कहािनयŌ म¤ Óयĉ िकया है ।
लेखक कमलेĵर तनावŌ के बीच मूÐय ŀिĶ कì तलाश करते ह§ । रचनाकार 'िनमªल वमाª'
मूलतः रोम¤िटक होते हòए भी कुछ कहािनयŌ म¤ आज कì सामािजक िवडंबन को ÿभावशाली
ढंग से िचिýत करते ह§ । 'धमªवीर भारती', 'रघुवीर सहाय' और 'नरेश मेहता' किव पहले ह§
और कहानीकार बाद म¤ । इनम¤ भारती का ÓयिĉÂव सबसे अिधक िनल¥प ±मतावान और
मूÐयपरक है । उनकì कहािनयŌ पर उनका किव ÓयिĉÂव कहé हावी नहé होता । इस दौर म¤
'कमलेĵर', 'माक«डेय', 'मोहन राकेश', 'राज¤þ यादव', 'कृÕणा सोबती', 'धमªवीर भारती',
'अमरकांत' आिद कहानीकारŌ ने अपनी कहािनयŌ के माÅयम से िहंदी कथा-सािहÂय को
समृĦ िकया । ľी िवमशª, दिलत िवमशª और आिदवासी िवमशª जैसे िवमशŎ के माÅयम से
िहंदी कहानी के ±ेý को बहòत िवÖतार िमला । 'हåरशंकर परसाई', 'रवéþनाथ Âयागी' और
'शरद जोशी' जैसे कहानीकारŌ ने हाÖय-Óयंµय कì शैली म¤ कहािनयाँ िलखकर समय और
समाज कì समÖयाओं को ÿकट िकया ।
१. नयी कहानी:
नयी कहानी का सूýपात सन् १९५० के आसपास नई किवता कì तजª पर हòआ । नये
कहानीकारŌ म¤ ÿमुख ह§ ; मोहन राकेश, राजेÆþ यादव, कमलेĵर, धमªवीर भारती, िनमªल
वमाª, अमरकाÆत, माकªÁडेय, मÆनू भÁडारी, राजकमल चौधरी, ®ीकाÆत वमाª आिद । इन
सभी ÿिसĦ िहंदी रचनाकारŌ को नयी कहानी के िवकास का सहायक माना जाता है ।
‘देवताओं कì मूितªयाँ’ (१९५२), ‘खेल-िखलौने’ (१९५३), ‘जहाँ लàमी कैद है’ (१९५७),
‘अिभमÆयु कì आÂमहÂया’ (१९५९), ‘छोटे-छोटे ताजमहल’ (१९६१), ‘िकनारे से िकनारे
तक’ (१९६२), ‘टूटना’ (१९६६), ‘चौखटे तोड़ते िýकोण’ (१९८७), ‘ये जो आितश munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
126 गािलब’ (ÿेम कहािनयाँ) (२००८), ‘वहाँ तक पहòँचने कì दौड़’, ‘हािसल’ आिद इनकì
ÿिसĦ कहािनयाँ ह§ । ‘एक Èलेट सैलाब’ (१९६२), ‘म§ हार गई’ (१९५७), ‘तीन िनगाहŌ कì
एक तÖवीर’, ‘यही सच है’ (१९६६), ‘िýशंकु’, ‘आंखŌ देखा झूठ’ तथा ‘अकेली’ । ‘अकेली’
कहानी सोमा बुआ नाम के पाý को क¤þ म¤ रखकर िलखी गई है । सोमा अपने पास पड़ोस से
घुलने-िमलने के ÿयासŌ के बावजूद अकेली पड़ जाती है । वह अकेली इसिलए है ³यŌिक
वह पåरÂयĉा है, बूढ़ी हो चली है तथा उसका पुý भी उसे छोड़कर जा चुका है। अपने
पåरवेश के साथ घुलने िमलने के उसके ÿयास भी एक तरफा ह§ ।
२. सचेतन कहानी:
'आधार' नामक पिýका म¤ महीप िसंह जी ने 'सचेतन कहानी िवशेषांक' िनकाला । िजससे
सन् १९६४ के आसपास 'महीप िसंह' Ĭारा सचतेन कहानी का ÿवतªन माना जाता है ।
वÖतुत: इस कहानी म¤ वैचाåरकता को िवशेष महÂव िदया जाता है । इस वगª के कहानीकार
म¤ 'महीप िसं'ह, 'रामकुमार Ăमर', 'बलराज पिÁडत', 'िहमांशु जोशी', 'सुदशªन चोपड़ा',
'देवेÆþ सÂयाथê' अिúम Öथान रखते ह§ ।
३. समकालीन कहानी:
इस कहानी आÆदोलन के ÿवतªक डा. गंगा ÿसाद 'िवमल' ह§ । 'संजय', 'उदय ÿकाश',
'अÊदुल िबिÖमÐलाह', 'रमेश उपाÅयाय', 'Öवयं ÿकाश', 'िशवमूितª' आिद समकालीन
कहानीकार कì ®ेणी म¤ आते ह§ । 'अÊदुल िबिÖमÐलाह' कì रचनाओं म¤ भारतीय मुिÖलम
संÖकृित का अंश अिधकार माýा म¤ देखने को िमलता है । उनकì रचनाएँ अिधकतर
भारतीय मुिÖलम कì समÖयाओं को उजागर करती ह§ । 'िबिÖमÐलाह' कì ÿमुख कहािनयŌ
म¤ ‘अितिथ देवो भव’, ‘रफ रफ मेल’, ‘िकतने िकतने सवाल’, ‘रैन बसेरा’, ‘टूटा हòआ पंख’
और ‘जीिनया के फूल’ आिद ÿमुख है । कथाकार उदय ÿकाश ने अपने लेखन के माÅयम से
िहंदी सािहÂय कì कहािनयŌ को सराबोर कर िदया है । उनकì कहािनयŌ म¤ 'दåरयायी घोड़ा'
(१९८९), 'ितåरछ' (१९८९), 'द°ाýेय के दुख' (२००२), 'पॉलगोमरा का Öकूटर'
(१९९७), 'नेलकटर', 'अरेबा परेबा', 'और अंत म¤ ÿाथªना', 'मोहनदास' (२००६),
'म§गोिसल', 'पीली छतरीवाली लड़कì' (२००१), 'राम सजीवन कì ÿेमकथा', 'म¤गोिलस',
'िदÐली कì दीवार' आिद ÿमुख है । उदय ÿकाश कì कहािनयŌ म¤ िवखंिडत पåरवार,
मानिसक तनाव, ÿेम का टूटना आिद समÖयाएँ िनिहत होती ह§ ।
४. अकहानी:
सन् १९६० के आसपास कुछ ऐसे कथाकार सामने आए, िजÆहŌने कहानी के Öवीकृत
मूÐयŌ के ÿित िनषेध Óयĉ करते हòए अपने ÖवतÆý अिÖतÂव कì घोषणा कì । डॉ. नामवर
िसंह ने िनमªल वमाª को इस कहानी आÆदोलन का ÿवतªक उनकì कहानी 'एक और
शुŁआत' के आधार पर बताया है । इस तरह कì कुछ अÆय कहािनयां ह§ ; ‘कृÕणबलदेव’ कì
कहानी ‘िýकोण’, ‘रमेश व±ी’ कì कहानी ‘िपता-दर-िपता’, ‘दूधनाथ िसंह’ कì कहानी
‘सुखाÆत’, ‘रवीÆþ कािलया’ कì कहानी ‘एक डरी हòई औरत’, ‘सुदशªन चोपड़ा’ कì कहानी
‘सड़क दुघªटना’, गंगाÿसाद 'िवमल' कì कहानी ‘िवÅवंस’ आिद है ।
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िहंदी उपÆयास : िवकास याýा
127 ५. समानाÆतर कहानी:
इस आÆदोलन के सूýधार कमलेĵर ह§, िजÆहŌने सन् १९७१ के आसपास समानाÆतर
कहानी का ÿवतªन िकया । ‘धमªयुग’ पिýका म¤ इस कहानी आÆदोलन का जमकर िवरोध
िकया गया । इस ÿकार कì कहािनयŌ म¤ िनÌनवगêय समाज कì िÖथितयŌ, िवषमताओं एवं
समÖयाओं का खुलकर िचýण हòआ है । ‘साåरका’ पिýका ने इस आÆदोलन को बढ़ावा िदया
। इस आÆदोलन से जुड़े कुछ कहानीकारŌ म¤ ‘कमलेĵर’, ‘से. रा. याýी’, ‘®वण कुमार’,
‘नरेÆþ कोहली’, ‘िहमांशु जोशी’, ‘िनłपमा सोवती’, ‘मृदुला गगª’, ‘मिण मधुकर’ आिद है ।
९.४ सारांश कहानी िहÆदी सािहÂय िक गī िवधाओं म¤ महÂवपूणª िवधा ह§ । अÆय िवधाओं कì अपे±ा
कहानी छोटी होती है । अत: पाठक कम समय म¤ इसे पढ़ लेता है इसिलए कहानी िवधा
समाज म¤ ºयादा पसंद कì जाती है । कहानी को पढ़ते समय पाठक का मन उÂसािहत हो
जाता ह§ । कहानी कì परÌपरा हमारे समाज म¤ बहòत पहले से ही है । हमारे तमाम धमª úंथो
और नीितशाľŌ. म¤ छोटी छोटी कहािनयŌ के माÅयम से नैितक सीख देने का काम करते है
। उÆहé कहािनयŌ से ÿेरणा लेकर लोक कथाओं का आिवभाªव हòआ है । पहले कì कहानी
पौरािणक तथा धािमªक कथाओं पर आधाåरत होती थी । समय के साथ बदलते हòए कहानी
म¤ ऐितहािसक कथाओं का समावेश हòआ ।
Öवतंýता पूवª कहानी के आरंिभक काल म¤ भारत¤दु जी के समय म¤ कहािनयŌ म¤ राÕůीयता
और नैितकता को ÿाथिमकता दी जाती थी । भारत¤दु जी के बाद ‘सरÖवती’ पिýका के
आगमन से ही कहािनयŌ म¤ िकसान और úाम आ गया । ÿेमचंद ने लगभग अपनी सभी
कहािनयŌ म¤ िकसान और úाम को ही ÿमुखता दी है । Öवतंýता के बाद कहानी एक नए दौर
म¤ पहòँच जाती है । जहाँ पर लेखक अपने आस-पास घिटत होने वाली समÖयाओं पर Åयान
केिÆþत करने लगा । मानव जीवन म¤ घटने वाली समÖया, पाåरवाåरक समÖयाएँ, दिलत,
गरीबी, शोषण मÅयम वगêय, समाज कì आिथªक समÖयाओं को अपना कथानक बना कर
लेखक ने कहािनयŌ का िनमाªण करने लगा ।
९.५ बोध ÿij १. िहÆदी कहानी के िवकासøम को उदाहरण सिहत विणªत कìिजए ।
२. िहÆदी कहानी के िवकास याýा को सोदाहरण सिहत ÖपĶ कìिजए ।
३. कहानी का अथª बताते हòए उसके िवकास øम को बताइए ।
९.६ अितलघु°रीय ÿij १. कहानी को ÿाचीन काल म¤ िकस नाम से पुकारा जाता था?
उ°र: गÐप या आ´याियका
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
128 २. िहÆदी कì ÿथम कहानी कौनसी है?
उ°र: रानी केतकì कì कहानी
३. चंþधर शमाª गुलेरी िकस युग के कहानीकार है?
उ°र: ÿेमचंद युग
४. िहÆदी म¤ हाÖयरस कì कहािनयाँ िलखने वाले दो लेखक के नाम िलिखए?
उ°र: जी. पी. ±ीवाÖतव, हåरशंकर शमाª
५. समाÆतर कहानी कì अवधारणा िकसने ÿÖतुत कì?
उ°र: कमलेĵर
९.७ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह


*****

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129 १०
आलोचना : िवकास याýा
इकाई कì łपरेखा
१०.० उĥेÔय
१०.१ ÿÖतावना
१०.२ िहंदी आलोचना : अथª एवं पåरभाषा
१०.२.१ िहंदी आलोचना : अथª
१०.२.२ िहंदी आलोचना : पåरभाषा
१०.३ आलोचना : िवकास याýा
१०.४ सारांश
१०.५ बोध ÿij
१०.६ अितलघु°रीय ÿij
१०.७ संदभª úंथ
१०.० उĥेÔय उपÆयास, नाटक, कहानी, िनबंध आिद िवधाओं को समझने के िलए आलोचना कì
आवÔयकता पड़ी। इस इकाई म¤ हम आलोचना का अथª, पåरभाषा, आलोचना कì िवकास
याýा के िवषय म¤ जान¤गे।
१०.१ ÿÖतावना भारत¤दु हåरIJÆþ के समय से ही िहंदी सािहÂय म¤ आधुिनक काल कì शुŁआत हòई और इसी
युग से अनेक गī-िवधाओं, जैसे कहानी, उपÆयास, नाटक, िनबंध आिद- कì िवकास याýा
आरंभ हòई । रचना को समझने के िलए आलोचना कì जłरत पड़ती है । आलोचना का अथª
है िकसी वÖतु या कृित का सÌयक् मूÐयांकन करना । इस मूÐयांकन-ÿिøया म¤ रसाÖवादन,
िववेचन, परी±ण, िवĴेषण आिद का योगदान होता है । आलोचना, रचना और पाठक या
सŃदय के बीच सेतु का कायª करती है । यह रचना के मूÐय और सŏदयª को उĤािटत करती
है, पाठक कì समझ का िवÖतार करती है और कृित को जाँचने-परखने के िलए उसे
आलोचनाÂमक ŀिĶ देती है । रचना के गुण-दोष िववेचन से लेकर उसम¤ अंतिनªिहत सŏदयª
और मूÐय के उĤाटन तक कì याýा करने वाली आलोचना कì भी अनेक पĦितयाँ ह§ जैसे
िनणªयाÂमक आलोचना, तुलनाÂमक आलोचना, ऐितहािसक आलोचना, सैĦांितक
आलोचना, Óयावहाåरक आलोचना आिद । इस अÅयाय म¤ हम आलोचना के अथª, पåरभाषा,
उĩव एवं िवकास पर ŀिĶ डाल¤गे ।
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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
130 १०.२ िहंदी आलोचना : अथª एवं पåरभाषा १०.२.१ िहंदी आलोचना : अथª:
'आलोचना' 'लोच्' धातु से बना है; आ+लोच्+अन+आ अथाªत् आलोचना। लोच् का अथª है
देखना । इसीिलए िकसी वÖतु या कृित कì सÌयक् Óया´या अथवा उसका होना मूÐयांकन
आिद करना ही आलोचना है । िनÂय के Óयावहाåरक जीवन म¤ िकसी न िकसी Óयिĉ, वÖतु
अथवा िकसी नए कायªकलाप कì समी±ा म¤ हमारी सहज ÿवृि° होती है । िकंतु संÖकारŌ,
िचंतन ±मता एवं सामािजक िनÂय के अवधारणा ÿवृि° अÆय Óयिĉगत िवशेषताओं के
आधार पर उसकì आलोचना कì जाती है ।
१०.२.२ िहंदी आलोचना : पåरभाषा:
'आलोचना' शÊद 'लुच' धातु से बना है । 'लुच' का अथª है 'देखना' । अÖतु समी±ा और
समालोचना शÊदŌ का भी यही अथª है । अंúेजी के 'िøिटिसºम' शÊद के समानाथê łप म¤
'आलोचना' का Óयवहार होता है । संÖकृत म¤ ÿचिलत 'टीका-Óया´या' और 'काÓय-िसĦाÆत
िनłपण' के िलए भी आलोचना शÊद का ÿयोग कर िलया जाता है ।
भारतीय िवĬान:
१. आचायª रामचÆþ शु³ल: “आधुिनक आलोचना, संÖकृत के काÓय-िसĦाÆत िनłपण
से Öवतंý है । आलोचना का कायª है िकसी सािहिÂयक रचना कì अ¸छी तरह परी±ा
करके उसके łप, गुण और अथªÓयÖथा का िनधाªरण करना ।”
२. डॉ. ÔयामसुÆदर दास: “यिद हम सािहÂय को जीवन कì Óया´या मान¤ तो आलोचना
को उस Óया´या कì Óया´या मानना पड़ेगा ।”
३. डॉ. भगीरथ िम®: आलोचना का कायª किव और उसकì कृित का यथाथª मूल ÿकट
करना है ।
पाIJाÂय िवĬान:
१. डाइडन: “आलोचना िनणªय का एक मानदंड है जो िवचारशील पाठकŌ को आनंद
ÿदान करने वाली सािहÂय िवशेषता का लेखा-जोखा करती है। यह हमारे तकª का
मूÐय मानदंड है ।”
२. मैÃयू अनाªÐड: “सवª®ेķ िवचारŌ भावŌ कì खोज करना और उसके रसोई म¤ योगदान
देना आलोचना के महÂवपूणª कायª है ।”
३. टी एस इिलयट: “आलोचना का उĥेÔय िकसी वÖतु के मूÐय का िनणªय करना है ।”
१०.३ िहंदी आलोचना : िवकास याýा िहंदी म¤ आलोचना का उĩव और िवकास आधुिनक काल म¤ हòआ है । अत: िहंदी सािहÂय म¤
आलोचना एक महßवपूणª िवधा मानी जाती है । इसी के आधार पर रचना का मूल अथª munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
131 उभरकर सामने आता है । अनेक आलोचकŌ कì उÂकृĶ आलोचनाओं ने यह ÿमािणत िकया
िक आलोचना रचना कì अनुवतê नहé है बिÐक उसकì भी एक Öवतंý स°ा है और रचना
कì तरह वह भी एक सृजन है ।
१. शु³ल पूवª िहंदी आलोचना:
रीितकाल म¤ संÖकृत के काÓयशाľीय úंथŌ से ÿेरणा लेकर केशवदास, िचÆतामिण,
मितराम, कुलपित िम®, िभखारीदास आिद अनेक आचायª-किवयŌ ने रस, छंद, अलंकार,
रीित. शÊदशिĉ और नायक-नाियका भेद से संबंिधत अनेक ल±ण-úंथŌ कì रचना कì िकंतु
इनसे िसĦांत-िनłपण से आगे बढ़कर Óयावहाåरक समी±ा का मागª ÿशÖत नहé हòआ ।
इसका एक बड़ा कारण यह था िक उस समय तक गī का िवकास नहé हòआ था । सारी बात¤
पī म¤ िलखी जाती थé । पī म¤ िकसी बात पर तकª-िवतकª करना, उसका सÌयक् मूÐयांकन
और िवĴेषण करना संभव नहé था, इसिलए Óयावहाåरक आलोचना का मागª अवŁĦ रहा ।
रीितकाल म¤ Óयावहाåरक आलोचना का łप संÖकृत कì सूý-शैली के łप म¤ ही ÿचिलत
रहा- वह भी पī म¤ ही । इस काल म¤ किवयŌ कì िवशेषताओं को सूý-łप म¤ Óयĉ करने कì
पĦित ±ीण łप म¤ ÿचिलत थी । आलोचना का यह Öफुट łप, गहन िचÆतन, मनन और
िवĴेषण से शूÆय था । इसम¤ ÿभावाÂमक अिभÓयिĉ और ÿशंसाÂमक मूÐयांकन कì
ÿधानता थी । अÖतु खंडन-मंडन कì इस शैली से सािहÂय का न तो मूÐयांकन संभव था, न
उसका रसाÖवादन ।
१) भारत¤दु युगीन आलोचना:
िहंदी सािहÂय के आधुिनक काल का आरंभ भारत¤दु के समय (सन् १८५०-१८८५) के
साथ ही माना जाता है । भारतीय जनता म¤ बौिĦकता, तािकªकता और भौितकवादी
ŀिĶकोण का ÿसार हòआ और पý-पिýकाओं के माÅयम से अÆय गī łपŌ के साथ िहंदी
आलोचना के नए और आधुिनक łप का जÆम हòआ । भारत¤दु Ĭारा सÌपािदत-
‘किववचनसुधा’ और ‘हåरIJÆþ मैगजीन’ म¤ समी±ा के ÖतÌभŌ म¤ पुÖतकŌ कì समी±ाएँ
ÿकािशत होती थé । ‘िहंदी ÿदीप’, ‘भारतिमý’, ‘āाĺण’, ‘आनंद कादिÌबनी’ आिद ने भी
पुÖतकŌ कì समी±ाएँ ÿकािशत करके इस िवधा को गित ÿदान कì । यīिप आरंभ म¤ ये
समी±ाएँ पåरचयाÂमक एवं साधारण कोिट कì थé लेिकन धीरे-धीरे उनम¤ िनखार और
पåरÕकार भी आता गया । भारत¤दु ने अपने 'नाटक' नामक लेख म¤ नाटक पर िवचार करते
समय उसकì ÿकृित, समसामियक जीवन Łिच, Öवाभािवकता, यथाथªता और ÿाचीन
नाट्यशाľ कì उपयोिगता तथा नए नाटकŌ कì आवÔयकता का जो िववेचन िकया है, उसे
िहंदी आलोचना का ÿथम उÆमेष मानना चािहए और भारत¤दु को िहंदी का ÿथम आलोचक ।
यīिप भारत¤दु Óयावहाåरक आलोचना का मागª ÿशÖत नहé कर सके, वे ºयादातर
सैĦांितक िववेचन तक ही सीिमत रह गए, िकंतु उनके िववेचन म¤ आलोचना-ŀिĶ का जो
उÆमेष हòआ, उसको बालकृÕण भĘ और चौधरी बदरी नारायण “ÿेमघन” ने आगे बढ़ाया ।
आलोचना के अंतगªत िकसी कृित के मूÐयांकन का कायª इÆहé दोनŌ कì समी±ाओं से आरंभ
हòआ । ÿेमघन जी ने ‘आनंद कादिÌबनी’ म¤ बाणभĘ कì ‘कादÌबरी’ कì जहाँ ÿशंसाÂमक
समी±ा कì, वहé बाबू गदाघर िसंह Ĭारा िलखे गए ‘बंग िवजेता’ नामक बंगला उपÆयास कì
िवÖतृत समी±ा उपÆयास के तÂवŌ के आधार पर कì और Öवाभािवकता, मनोवै²ािनकता munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
132 तथा सामािजक मयाªदा कì ŀिĶ से उपÆयास के गुण-दोषŌ का उÐलेख िकया । लाला
®ीिनवास दास के “संयोिगता Öवयंवर” नाटक कì समी±ा जहाँ ÿेमघन ने ‘आनंद
कादिÌबनी’ म¤ बड़े ÿशंसाÂमक ढंग से कì, वहé बालकृÕण भĘ ने ‘िहंदी ÿदीप’ म¤ ‘स¸ची
समालोचना’ के नाम से उसकì कटु समी±ा कì । इस तरह भारत¤दु युग म¤ एक ओर
परÌपरागत सािहÂय िसĦांतŌ को िवकिसत करने का ÿयÂन हòआ और दूसरी ओर
Óयावहाåरक समी±ा का सूýपात हòआ ।
२) िĬवेदी युगीन आलोचना:
िहंदी भाषा और सािहÂय के िवकास एवं पåरÕकार के िलए आचायª महावीर ÿसाद िĬवेदी ने
जो कायª िकया, वह िहंदी सािहÂय म¤ अिĬतीय है । उनके युग म¤ िहंदी सािहÂय कì ®ीवृिĦ तो
हòई ही, सािहÂयालोचना के ±ेý म¤ भी उÐलेखनीय कायª हòआ । इस युग म¤ यīिप िहंदी
आलोचना का गंभीर एवं तािÂवक łप तो नहé िनखरा िकंतु अनेक महÂवपूणª आलोचना-
पĦितयाँ अवÔय िवकिसत हòईं, जैसे - शाľीय आलोचना, तुलानाÂमक मूÐयांकन एवं
िनणªय, पåरचयाÂमक तथा Óया´याÂमक आलोचना, अÆवेषण तथा अनुसंधानपरक समी±ा
आिद ।
ÿाचीन िसĦांतŌ के पåरपोषण और िववेचन के साथ ही इस युग के नवीन िसĦांतŌ के
ÿितपादन का भी कायª हòआ है । इस ŀिĶ से आचायª महावीर ÿसाद िĬवेदी, पुÆनालाल
ब´शी, आचायª रामचÆþ शु³ल, बाबू ÔयामसुÆदर दास और गुलाब राय के नाम उÐलेखनीय
ह§ । िĬवेदी जी ने 'रसारंजन' म¤ िवषय के अनुकूल छंदयोजना, सरल भाषा के ÿयोग, अथª-
सौरÖय, मनोरंजन के Öथान पर युगबोध, नैितकता, मयाªदा, देश-ÿेम आिद से संबंिधत उ¸च
भावŌ कì अिभÓयिĉ पर िवशेष बल िदया और रीितकालीन किवता कì अित®ृंगाåरकता
तथा िवलािसता कì ÿवृि° कì कड़ी आलोचना करते हòए कहा िक इससे न तो देश और
समाज का कÐयाण हो सकता है, न उसके सजªक का ही । उÆहŌने अपने 'किव क°ªÓय'
नामक िनबंध म¤ िवÖतार के साथ किव के नए कतªÓयŌ का बोध कराते हòए काÓय-िवषय,
काÓय-भाषा, शैली, उĥेÔय आिद का जो िववेचन िकया है, उससे पता चलता है िक िĬवेदी
जी नवीनता के पोषक थे और नयी पåरिÖथितयŌ म¤ सािहÂय साधना को नए दाियÂवŌ से
जोड़ना चाहते थे । उÆहŌने 'सरÖवती' पिýका के माÅयम से इस कायª को सÌपÆन िकया और
िहंदी भाषा, सािहÂय और आलोचना को नयी िदशा ÿदान कì ।
िĬवेदी-युग म¤ तुलनाÂमक समी±ा म¤ िवशेष ÿगित हòई । इस युग म¤ सािहÂयकारŌ का संÖकृत
के साथ-साथ अंúेजी, फारसी, उदूª आिद भाषाओं के सािहÂय से घिनķ पåरचय होने के
कारण तुलनाÂमक एवं िनणªयाÂमक समी±ा कì ÿवृि° का िवकास हòआ । इस ±ेý म¤
पदमिसंह शमाª, िम®बंधु (Ôयामिबहारी िम®, शुकदेव िबहारी िम®, गणेश िबहारी िम®),
लाला भगवानदीन और कृÕणिबहारी िम® ने िवशेष कायª िकया । सबसे पहले पĪिसंह शमाª
ने ‘िबहारी’ और फारसी के किव ‘सादी’ कì तुलनाÂमक आलोचना कì, उसके बाद
िम®बंधुओं ने 'िहंदी नवरÂन' नामक úंथ म¤ तुलनाÂमक मूÐयांकन के आधार पर िहंदी के नौ
किवयŌ (सूर, तुलसी, देव, िबहारी, केशव, भूषण, सेनापित, चÆद, हåरशचÆþ) को ®ेणीबĦ
करके उनकì आलोचना ÿकािशत कì । बाद म¤ उनके इस ®ेणी-िनधाªरण म¤ पåरवतªन भी
होता रहा िम® बंधुओं ने देव को िबहारी से ऊँचा किव माना, इसके उ°र म¤ पĪिसंह शमाª ने munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
133 'िबहारी' को बड़ा िसĦ िकया । बाद म¤ तुलना के इस अखाड़े म¤ कृÕणिबहारी िम® और लाला
भगवानदीन भी आ गए । इस तरह तुलनाÂमक समी±ा का एक ऐसा मागª िनकला िजसम¤
ÿचीन िसĦांतŌ के आलोक म¤ िहंदी किवयŌ कì Óयावहाåरक समी±ा कì गई । यह शाľीय
आलोचना के भीतर जÆम लेने वाली वह Óयावहाåरक समी±ा थी, िजसम¤ गुण-दोष िववेचन
और बड़ा-छोटा िसĦ करने कì ÿवृि° अिधक थी। जीवन और समाज के Óयापक संदभō म¤
सािहÂय को समझने कì यिद कोिशश कì गई होती तो इस आलोचना म¤ अिधक Óयापकता
आ जाती ।
इस युग म¤ 'सािहÂयालोचन' कì ÿवृि°यŌ और आदशŎ पर अनेक लेख 'नागरी ÿचाåरणी
पिýका', 'सरÖवती', 'समालोचक', 'इÆþ', 'माधुरी’, आिद पिýकाओं म¤ ÿकािशत हòए । 'नागरी
ÿचाåरणी पिýका' म¤ गंगाÿसाद अिµनहोýी ने 'समालोचना' नामक लेख ÿकािशत करके
समालोचक के गुणŌ - मूलúंथ का ²ान, सÂय-ÿीित, शांत Öवभाव और स×दयता - को
रेखांिकत िकया । महावीरÿसाद िĬवेदी ने 'िवøमांकदेव चåरत नैषधचåरत चचाª' और
'कािलदास कì िनरंकुशता' जैसे लेखŌ से Óयावहाåरक समी±ा का मागª ÿशÖत िकया और
संÖकृत, बंगला, अंúेजी, मराठी और उदूª सािहÂय म¤ ÿाĮ महÂवपूणª सामúी कì जानकारी
िहंदी पाठकŌ को दी, िजसे आचायª शु³ल ने 'एक मुहÐले कì बात दूसरे मुहÐले तक पहòँचाने'
का कायª कहा । िकंतु यह नहé भूलना चािहए िक यह िहंदी पाठकŌ, सजªकŌ और समी±कŌ
को ²ान से समृĦ करने वाला एक महÂवपूणª कायª था ।
िĬवेदी युग म¤ ही आचायª रामचÆþ शु³ल कì Óयावहाåरक समी±ा कì Óया´याÂमक पĦित
िवकिसत हòई । चूँिक शु³ल जी कì आलोचना कई तरह से िहंदी आलोचना म¤ एक मानक कì
तरह है और िĬवेदी युग कì आलोचना से काफì आगे कì है, इसिलए इसकì िवशेष चचाª
शु³ल युगीन िहंदी आलोचना के अंतगªत कì जाएगी । िĬवेदी युग म¤ ही अनुसंधानपरक
समी±ा का िवकास हòआ । वैसे तो 'नागरी ÿचाåरणी पिýका' म¤ ÿकािशत लेखŌ से ही इस
पĦित के दशªन होने लगे थे, िकंतु उसका सÌयक् िवकास िĬवेदी-युग म¤ सन् १९२१ ई. म¤
बाबू Ôयाम सुंदर दास के काशी िहंदू िवĵिīालय म¤ िहंदी िवभाग म¤ िनयुĉ होने के बाद ही
हòआ । शोध या अनुसंधानपरक आलोचना म¤ अनुपलÊध या अ²ात तÃयŌ का अÆवेषण तथा
उपलÊध तÃयŌ का नवीन आ´यान आवÔयक होता है । बाबू Ôयामसुंदर दास, राधाकृÕण
दास, जगÆनाथ दास रÂनाकर और सुधाकर िĬवेदी ने िĬवेदी युगीन अनुसंधानपरक
आलोचना का Öवłप िवकिसत करने म¤ योग िदया है ।
सारांशत: इस ÿकार िĬवेदी युग म¤ िहंदी आलोचना िविभÆन पĦितयŌ को िवकिसत करती
हòई उ°रो°र शिĉ सÌपÆन हòई । इसी युग म¤ पाIJाÂय सािहÂय से पåरिचत होकर और
उसका ÖवÖथ ÿभाव úहण कर िहंदी आलोचना ने Öवतंý ÓयिĉÂव ÿाĮ िकया और इसम¤
किव-िवशेष के सामाÆय गण-दोष के िववेचन के साथ ही रचना कì गहरी छान-बीन, देश और
समाज के पåरÿेàय म¤ सािहÂय कì उपयोिगता और मूÐयव°ा को परखने कì ÿवृि°
िवकिसत हòई ।
३) शु³ल युगीन आलोचना:
िĬवेदी-युग कì सैĦांितक एवं Óयावहाåरक समी±ा को िवकिसत एवं समृĦ करने का ®ेय
आचायª रामचÆþ शु³ल को है। वे िहंदी आलोचना के ÿशÖत-पथ पर एक ऐसे आलोक-munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
134 ÖतÌभ के łप म¤ ÿितिķत ह§, िजसके ÿकाश म¤ हम आगे और पीछे दोनŌ ओर बहòत दूर तक
देख सकते ह§ । आचायª शु³ल ने िलखा है िक यīिप िĬवेदी-युग म¤ िवÖतृत समालोचना का
मागª ÿशÖत हो गया था, िकंतु वह आलोचना भाषा के गुण-दोष िववेचन, रस, अलंकार आिद
कì समीचीनता आिद बिहरंग बातŌ तक ही सीिमत थी । उसम¤ Öथायी सािहÂय म¤ पåरगिणत
होने वाली समालोचना, िजसम¤ िकसी किव कì अÆतªवृि° का सूàम Óयव¸छेद होता है,
उसकì मानिसक ÿवृि° कì िवशेषताएँ िदखाई जाती ह§, बहòत ही कम िदखाई पड़ी । इस युग
म¤ आलोचकŌ का Åयान गुण-दोष कथन से आगे बढ़कर किवयŌ कì िवशेषताओं और उनकì
अंत:वृि° कì छानबीन कì ओर गया । इस ÿकार कì समी±ा का आदशª शु³ल जी कì सूर,
जायसी और तुलसी संबंधी समी±ाओं म¤ देखा जा सकता है ।
इन समी±ाओं म¤ शु³ल जी के गंभीर अÅययन, वÖतुिनķ िववेचन, सारúािहणी ŀिĶ,
संवेदनशील Ńदय और ÿखर बौिĦकता का सामंजÖय, ÿाचीनता और नवीनता के समुिचत
समÆवय से ÿाĮ ÿगितशील िवचारधारा, रसवादी, नीितवादी, मयाªदावादी और लोकवादी
ŀिĶ का सÌयक् पåरचय ÿाĮ होता है । इन सबके चलते शु³ल जी ने िहंदी आलोचना म¤
अपना िविशĶ ÓयिĉÂव Öथािपत िकया और वे एक ऐसे आलोचक के łप म¤ ÿितिķत हòए
िजसम¤ सैĦांितक एवं Óयावहाåरक समी±ा का उÂकृĶ łप िदखाई पड़ता है । िहंदी म¤ ही
नहé, आधुिनक काल कì समूची भारतीय आलोचना-परÌपरा म¤ आचायª रामचंþ शु³ल का
िविशĶ Öथान और महÂव है ।
शु³ल जी ने सूर, तुलसी, जायसी आिद मÅयकालीन किवयŌ और छायावादी काÓयधारा का
गंभीर मूÐयांकन करके जहाँ Óयावहाåरक आलोचना का आदशª ÿÖतुत िकया और िहंदी
आलोचना को उÆनित के िशखर तक पहòँचाया, वहé 'िचंतामिण' और 'रसमीमांसा' जैसे úंथŌ
से सैĦांितक आलोचना को नई गåरमा और ऊँचाई ÿदान कì । 'किवता ³या है’, 'काÓय म¤
रहÖयवाद’, ‘साधारणीकरण और Óयिĉ वैिचÞयवाद’, ‘रसाÂमक बोध के िविवध łप’ आिद
िनबंधŌ म¤ शु³ल जी ने अपनी काÓयशाľीय मेधा और Öवतंý िचंतन-शिĉ के साथ-साथ
भारतीय एवं पाIJाÂय काÓय शाľ के िवशद् एवं गंभीर ²ान तथा Óयापक लोकानुभव और
गहरी लोकसंÖकृित का जो पåरचय िदया है, वह अÆयý दुलªभ है ।
आचायª शु³ल ने अपनी Óयावहाåरक समी±ा म¤ िजस तरह के सूýाÂमक िनÕकषª और
आलोचना के नए मानदंड ÿÖतुत िकए ह§, वे उनकì समी±ा-शिĉ और सािहÂय म¤ गहरी पैठ
के ÿमाण ह§ । उनकì शाľीय समी±ा म¤ उनका पािÁडÂय, मौिलकता और सूàम पयªवे±ण
पग-पग पर िदखाई पड़ता है । िहंदी कì सैĦांितक आलोचना को पåरचय और सामाÆय
िववेचन के धरातल से उठाकर गंभीर मूÐयांकन और Óयावहाåरक िसĦांत ÿितपादन कì
उ¸चभूिम पर ÿितिķत करने का ®ेय आचायª रामचÆþ शु³ल को है । सूर, तुलसी, जायसी
संबंधी उनकì आलोचनाएँ Óयावहाåरक आलोचना का ÿितमान बनी हòई ह§ । आचायª शु³ल
लोकवादी समी±क ह§। लोकमंगल, लोक धमª, लोक मयाªदा आिद को क¤þ म¤ रखकर ही वे
सािहÂय कì ®ेķता और उÂकृĶता का िनदशªन करते ह§ ।
आचायª रामचंþ शु³ल के साथ-साथ िहंदी आलोचना को समथª और गितशील बनाने वाले
आलोचकŌ म¤ पं. कृÕणशंकर शु³ल, आचायª िवĵनाथ ÿसाद िम®, गुलाब राय,
लàमीनारायण 'सुधांशु' के नाम उÐलेखनीय ह§ । कृÕणशंकर ने 'केशव कì काÓयकला' और munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
135 'किवकर रÂनाकर' नामक कृितयŌ म¤ केशवदास और जगÆनाथ दास 'रÂनाकर' कì जीवनी
और उनके काÓय के िविभÆन प±Ō पर सŃदयतापूवªक ÿकाश डाला है । इन दोनŌ पुÖतकŌ
कì ÿशंसा करते हòए आचायª शु³ल ने अपने इितहास-úंथ म¤ िलखा - 'केशव कì काÓयकला'
म¤ पंिडत कृÕणशंकर शु³ल ने अ¸छा िवĬ°ापूणª अनुसंधान भी िकया है । इसी ÿकार
आचायª िवĵनाथÿसाद िम® ने भी 'िहंदी सािहÂय का अतीत' और 'िबहारी कì वािµवभूित'
जैसे úंथŌ म¤ उÂकृĶ आलोचना-ÿितभा का पåरचय िदया है । इÆहŌने रीितकाल के महÂवपूणª
किवयŌ, िबहारी, केशव, घनानंद, भूषण, रसखान आिद कì िवÖतृत समी±ा करके अपनी
िसĦांतिनķ, अनुसंधानपरक और सारúाही आलोचना-पĦित से िहंदी आलोचना को काफì
शिĉ ÿदान कì है । उनकì रीितकाÓय कì Óया´याएँ और टीकाएँ भी आलोचना के बड़े काम
कì ह§ ।
लàमीनारायण 'सुधांशु' ने 'काÓय म¤ अिभÓयंजनावाद' म¤ øोचे के 'अिभÓयंजनावाद' और
उसके ÿकाश म¤ भारतीय काÓयशाľ और िहंदी के नवीन काÓय पर िवचार करते हòए अपनी
सŃदयता, िवĬ°ा और ममªúािहता का पåरचय िदया है । बाबू गुलाबराय ने 'िसĦांत और
अÅययन', 'काÓय के łप' और 'नवरस' जैसे úंथŌ के माÅयम से िहंदी कì सैĦांितक
आलोचना को पुĶ िकया । उÆहŌने आचायª रामचंþ शु³ल कì ही तरह भारतीय एवं पाIJाÂय
काÓयशाľ के समÆवय से नवीन आलोचना-िसĦांतŌ को िवकिसत करने का कायª िकया ।
पाIJाÂय एवं भारतीय काÓयशाľŌ कì माÆयताओं का गंभीर अÅययन-िवĴेषण करके अपनी
समÆवय बुिĦ Ĭारा आचायª शु³ल ने भी िहंदी के एक नए आलोचना-शाľ के िनमाªण का
कायª िकया । इस संदभª म¤ डॉ. नगेÆþ कहते ह§ िक “शु³लजी ने संÖकृत काÓयशाľ का
पुनरा´यान कर और पाIJाÂय आलोचना-िसĦांतŌ को अपने अनुłप ढालकर िहंदी के िलए
एक नए आलोचना-शाľ का िनमाªण िकया।” शु³लानुवतê आलोचकŌ ने उनके इस कायª म¤
योग िदया, यह दूसरी बात है िक वे आचायª शु³ल कì सी गहराई, Óयापकता और ऊँचाई का
पåरचय नहé दे सके, िफर भी उनके योगदान को कम करके नहé आँका जा सकता है ।
४) शु³लो°र युगीन आलोचना:
आचायª रामचÆþ शु³ल कì आलोचना के क¤þ म¤ वीरगाथा काल से लेकर छायावादी
काÓयधारा तक का सािहÂय रहा है । उनके समी±ा-िसĦांत और काÓय के ÿितमान िवशेष
łप से भिĉकाÓय के आधार पर िनिमªत हòए ह§ । िजस समय शु³ल जी का आलोचक
ÓयिĉÂव अपने पूरे िनखार पर था । उसी समय Óयिĉ चेतना को क¤þ म¤ रखकर छायावादी
काÓयधारा का िवकास हòआ, िजसकì आचायª शु³ल ने कड़ी आलोचना कì । रसवादी,
परÌपरािनķ, लोकमंगलवादी और मयाªदावादी आचायª शु³ल Óयिĉ के सुख-दुख, आशा-
आकां±ा, ÿेम-िवरह और मानवीय सŏदयª के आकषªण से पåरपूणª छायावादी किवता को
अपेि±त सŃदयता से न देख-समझ सके । वÖतुत: इसे नÆददुलारे वाजपेयी, शांितिÿय
िĬवेदी और डॉ. नग¤þ जैसे समथª आलोचकŌ का बल ÿाĮ हòआ । इन आलोचकŌ ने आचायª
शु³ल कì आलोचना-परÌपरा का िवकास करते हòए अनेक संदभō म¤ अपनी Öवतंý ŀिĶ और
मौिलकता का पåरचय िदया है । शु³लो°र िहंदी आलोचना का िवकास कई łपŌ म¤ हòआ ।
यहाँ पर आचायª शु³ल के बाद से Öवतंýता ÿािĮ तक कì िहंदी आलोचना कì िविभÆन
ÿवृि°यŌ एवं पĦितयŌ पर ÿकाश डाला जा रहा है । आचायª शु³ल के बाद िहंदी म¤ munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
136 Öव¸छÆदतावादी , मनोवै²ािनक, ऐितहािसक और मा³सªवादी आलोचना का िवकास हòआ ।
इनका Öवतंý łप से पåरचय ÿाĮ कर लेना आवÔयक है ।
१. Öव¸छÆदतावादी आलोचना:
Öव¸छÆदतावादी आलोचना का िवकास िहंदी कì छायावादी काÓयधारा के मूÐयांकन के
साथ हòआ । आचायª रामचÆþ शु³ल के Óयापक ÿभाव के बावजूद भी आचायª नÆददुलारे
वाजपेयी ने छायावाद को अपना समथªन िदया और इस काÓयधारा के सŏदयª को
ÿभावशाली ढंग से उĤािटत िकया । उÆहŌने छायावादी किवयŌ के Öवर म¤ अपना Öवर
िमलाते हòए सािहÂय कì Öवाय° स°ा कì घोषणा कì और कहा - “काÓय का महÂव तो
काÓय के अंतगªत ही है, िकसी बाहरी वÖतु म¤ नहé। काÓय और सािहÂय कì Öवतंý स°ा है,
उसकì Öवतंý ÿिøया है और उसकì परी±ा के Öवतंý साधन ह§ ।”
वाजपेयी जी कì इस आलोचना को, Öव¸छÆदता को चरम मूÐय मानने के कारण
'Öव¸छÆदतावादी ’ और काÓय-सौķव पर बल देने के कारण ‘सौķववादी’ सं²ा िमली ।
नÆददुलारे वाजपेयी ने ‘आधुिनक सािहÂय’, नया सािहÂय : नए ÿij’, ‘जयशंकर ÿसाद’,
‘किव िनराला’, ‘िहंदी सािहÂय : बीसवé शताÊदी’ आिद जैसे आलोचनाÂमक úंथŌ म¤
छायावाद, Öव¸छÆदतावाद और छायावादी किवयŌ - पंत, िनराला, ÿसाद - का मूÐयांकन
ÿÖतुत िकया और इस नवीन काÓयधारा के संदभª म¤ नए समी±ा-िसĦांतŌ का िनमाªण िकया
। वाजपेयी जी के साथ ही डॉ. नगेÆþ ने छायावादी काÓय का जो मूÐयांकन ÿÖतुत िकया,
वह भी िहंदी कì Öव¸छÆदतावादी आलोचना को पåरपुĶ करने वाला है । ‘आधुिनक िहंदी
किवता कì ÿवृि°याँ’ और ‘सुिमýानंदन पंत’ जैसे úंथŌ से उÆह¤ छायावादी आलोचक के łप
म¤ ´याित िमली। उÆहŌने काÓय म¤ आÂमािभÓयिĉ को महÂवपूणª माना और छायावाद को
‘Öथूल के िवŁĦ सूàम का िवþोह’ कहा । उÆहŌने यह Öथािपत िकया िक भिĉ आंदोलन के
बाद िहंदी सािहÂय म¤ छायावाद एक बड़ा काÓयाÆदोलन था । पंत के काÓय का मूÐयांकन
करके डॉ. नगेÆþ ने जहाँ उनके काÓय को समझने कì ŀिĶ दी, वहé उनकì किवता से ही
अपनी आलोचना के मूÐय भी िनकाले ।
२. मनोवै²ािनक:
मनोिवĴेषणवादी आलोचना का संबंध Āायड के मनोिव²ान कला-िसĦांत से है जो यह
मानता है िक सािहÂय और कलाएँ मनुÕय कì दिमत वासनाओं कì अिभÓयिĉ ह§ । इनके
अनुसार मनुÕय कì दिमत वासनाओं का उदा°ीकृत łप ही सािहÂय या कला म¤ Óयĉ होता
है । दिमत वासनाएँ काममूला होती ह§ । मनोवै²ािनक आलोचक किव के Óयिĉगत जीवन के
आधार पर उसकì वासनाओं का िवĴेषण करता है और उसके सािहÂय म¤ उनकì
अिभÓयिĉ को रेखांिकत करता है । मनोिवĴेषणवादी सािहÂय-ŀिĶ के अनुसार सािहÂय-
िनमाªण कì ÿेरणा मनुÕय कì चेतना से नहé, अवचेतन म¤ दिमत वासनाओं म¤ िमलती है चूंिक
ये वासनाएँ ÿवृि°मूलक और वैयिĉक होती ह§, अत: यह माना जाता है िक सािहÂय का
संबंध Óयिĉ-चेतना से अिधक है, सामािजक चेतना से नहé अत: सािहÂय सामािजक होने
कì अपे±ा Óयिĉगत होता है। इस तरह कला मूलत: ÖवाÆतः सुखाय होती है ।
मनोिवĴेषणवादी, नैितकता के ÿij को भी महÂव नहé देता । munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
137 इलाचÆþ जोशी ने सािहÂय-रचना और समी±ा का उÐलेखनीय कायª िकया है । उÆहŌने
‘सािहÂय-सजªना’ नामक पुÖतक से अपने मनोवै²ािनक िसĦांतŌ कì Öथापना कì और
िववेचना’, ‘िवĴेषण’, ‘देखा-परखा’ जैसी कृितयŌ म¤ मनोवै²ािनक आलोचना का
Óयावहाåरक łप ÿÖतुत िकया । भारतीय सािहÂय म¤ ÿगितशीलता’, ‘महादेवी जी का
आलोचना-सािहÂय’, ‘छायावादी तथा ÿगितपंथी किवयŌ का मनोवै²ािनक िवĴेषण’,
‘कामायनी’, ‘शरतचÆþ कì ÿितभा’, आिद िनबंधŌ म¤ उनकì मनोिवĴेषणवादी समी±ा-ŀिĶ
Óयावहाåरक łप से ÿकट हòई है । इलाचÆþ जोशी का मानना है िक िहंदी का भिĉ सािहÂय
दिमत काम-कंठा का ही ÿतीक है । छायावादी काÓय म¤ भी उÆह¤ यौन-संबंधŌ कì कुंठाएँ
शालीन łप म¤ अिभÓयĉ हòई िदखाई पड़ती ह§ । अत: अ²ेय, डॉ. नगेÆþ और डॉ. देवराज
कì भी समी±ाओं म¤ भी मनोिवĴेषण कì ÿवृि° िदखाई पड़ती है । अ²ेय के ‘िýशंक’,
‘आÂमनेपद’, डॉ नगेÆþ के रस-िसĦांत के िवĴेषण और पंत-काÓय के मूÐयांकन तथा डॉ.
देवराज के सािहÂय का मनोवै²ािनक अÅययन’ नामक úंथŌ म¤ मनोिवĴेषणवादी समी±ा-
ŀिĶ का Óयावहाåरक एवं सैĦांितक łप देखा जा सकता है ।
३. ऐितहािसक एवं सांÖकृितक आलोचना:
आचायª हजारी ÿसाद िĬवेदी (१९०७) ने िहंदी म¤ ऐितहािसक एवं सांÖकृितक आलोचना
का मागª ÿशÖत िकया । उÆहŌने ‘िहंदी सािहÂय कì भूिमका’ नामक पुÖतक म¤ ÖपĶ łप से
यह ÿितपािदत िकया िक िकसी úंथकार का Öथान िनधाªåरत करने के िलए øमागत
सामािजक, सांÖकृितक एवं जातीय सातÂय को देखना आवÔयक है । इसके िलए आवÔयक
है िक आलोचक को अपनी जातीय परंपरा या सांÖकृितक िवरासत का बोध हो । आचायª
िĬवेदी ने अपनी इस धारणा के तहत ‘िहंदी सािहÂय कì भूिमका’, िहंदी सािहÂय का
आिदकाल’ और ‘कबीर’ जैसे आलोचनाÂमक úंथŌ कì रचना कì । उÆहŌने िहंदी सािहÂय को
ठीक से समझने के िलए । पूवªवतê सािहÂय-परÌपराओं (संÖकृत, पािल, ÿाकृत एवं अपĂंश)
कì जानकारी को आवÔयक माना और उनके साथ िहंदी-सािहÂय के घिनķ संबंध को
रेखांिकत िकया । उÆहŌने ‘मÅयकालीन बोध का Öवłप’, ‘भारत के ÿाचीन कला - िवनोद’,
‘कािलदास कì लािलÂय योजना’ जैसी रचनाओं के माÅयम से ऐितहािसक-सांÖकृितक
आलोचना को पåरपुĶ िकया । उÐलेखनीय है िक ऐितहािसक-सांÖकृितक आलोचना िकसी
कृित का मूÐयांकन इितहास और संÖकृित के Óयापक पåरÿेàय म¤ करती है ।
ऐितहािसक आलोचक के अनुसार मानव-समुदाय कì चेतना देश-काल के अनुसार
पåरवितªत होते हòए भी परंपरा से बँधी होती है । इसी तरह सांÖकृितक आलोचना भी रचना
म¤ सांÖकृितक तÂवŌ कì छानबीन करती है और उसके सांÖकृितक महÂव और अवदान को
रेखांिकत करती है । िĬवेदी जी ने अपने समी±ाÂमक úंथŌ म¤ ऐितहािसक-सांÖकृितक
आलोचना का आदशª łप ÿÖतुत िकया है । आचायª िम® ने ‘भूषण úंथावली’ और परशुराम
चतुव¥दी ने ‘उ°री भारत कì संत परंपरा’ म¤ ऐितहािसक िववेचना एवं मूÐयांकन को चåरताथª
िकया है ।
४. मा³सªवादी आलोचना:
ÿेमचंद ने अपने अÅय±ीय भाषण म¤ सािहÂय के नए उĥेÔयŌ और सŏदयª कì नई कसौिटयŌ
और ŀिĶयŌ पर िवÖतृत ÿकाश डाला । इसी के साथ िहंदी म¤ ÿगितशील लेखन और munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
138 मूÐयांकन का दौर शुł हòआ । ÿगितशील आंदोलन का वैचाåरक आधार मा³सªवादी दशªन
रहा है जो वÖतुजगत को ही चरम सÂय मानता है और िवकास कì ĬंĬाÂमक ÿणाली म¤
िवĵास करता है । मा³सªवादी कì माÆयता है िक मानव-चेतना का िनयमन सामािजक
पåरिÖथितयाँ करती ह§ और कला चेतना मानव चेतना का ही उदा° łप है, इसिलए ÿÂयेक
युग का कलाकार जाने-अनजाने उस वगª िवशेष का ही ÿितिनिधÂव करता है िजसम¤ वह
पला होता है । यह दुिनया दो वगŎ म¤ िवभĉ ह§- एक शोषक वगª है, दूसरा शोिषत । शोषक वगª
का पूँजी पर एकािधपÂय है और शोिषत वगª अपने अथक ®म के बावजूद हर तरह से दीन-
हीन और िवपÆन है। यही सवªहारा वगª है । मा³सªवाद मानता है िक पूँजीवाद को िमटाने और
साÌयवाद कì Öथापना का धमª है िक वह अपनी रचना के माÅयम से सवªहारा के Öवािभमान
को जागृत करे और उसे अपने हक कì लड़ाई के िलए तैयार करे । इस धारणा के तहत जो
रचनाएँ होती ह§ उÆह¤ मा³सªवादी या ÿगितवादी सािहÂय कहते ह§ और रचना म¤ उपयुªĉ
िवशेषताओं कì खोजबीन करने वाली आलोचना को मा³सªवादी आलोचना कहा जाता है ।
मा³सªवादी-िवचार-दशªन से अनुÿािणत होकर आरंभ म¤ िजन आलोचकŌ ने मा³सªवादी
आलोचना का मागª ÿशÖत िकया, िजसम¤ िशवदान िसंह चौहान, ÿकाशचÆþ गुĮ और
रामिवलास शमाª के नाम उÐलेखनीय ह§ । िशवदान िसंह चौहान ने ‘ÿगितवाद’, ‘सािहÂय कì
परख’, ‘आलोचना के मान’, ‘सािहÂय कì समÖयाएँ’ और ‘सािहÂयानुशीलन’, ÿकाशचÆþ
गुĮ ने ‘िहंदी सािहÂय’, ‘आधुिनक िहंदी सािहÂय’ और ‘िहंदी सािहÂय कì जनवादी परंपरा’
तथा रामिवलास शमाª ने ‘ÿगित और परंपरा’, ‘ÿगितशील सािहÂय कì समÖयाएँ’, ‘आÖथा
और सŏदयª’ जैसे आलोचनाÂमक úंथŌ से िहंदी कì मा³सªवादी समी±ा का Öवłप िवकिसत
िकया । तथा रामिवलास शमाª ने आचायª शु³ल कì लोकमंगल कì भावना को. ÿगितशील
सािहÂयालोचन के क¤þ म¤ रखकर िजस तरह परÌपरा का मूÐयांकन िकया है, वह िहंदी कì
ÿगितशील आलोचना का ®ेķ उदाहरण है । आगे चलकर िहंदी म¤ मा³सªवादी समी±ा का
काफì िवकास हòआ । इसकì िवÖतृत चचाª ÖवाýंÞयो°र िहंदी आलोचना के अंतगªत कì
जाएगी ।
५. नयी समी±ा:
रामिवलास शमाª के साथ ÖवातंÞयो°र काल कì ÿगितशील िहंदी आलोचना या मा³सªवादी
िहंदी आलोचना को सशĉ बनाने वालŌ म¤ गजानन माधव मुिĉबोध, नामवर िसंह, रांगेय
राघव, िवĵÌभरनाथ उपाÅयाय, िशवकुमार िम® के नाम उÐलेखनीय ह§ । मुिĉबोध ने
‘कामायनी : एक पुनिवªचार’, ‘नयी किवता का आÂमसंघषª तथा अÆय िनबंध’, ‘नये सािहÂय
का सŏदयªशाľ’ जैसे úंथŌ से िहंदी कì मा³सªवादी आलोचना को एक ऐसी ऊँचाई ÿदान कì
है िजसको छू पाना परवतê आलोचना के िलए मुिÔकल हो रहा है । मुिĉबोध ने छायावादी
काÓय के ÿित सकाराÂमक Łख अपनाया और उसकì ÿगितशील भूिमका कì सराहना भी
कì । मुिĉबोध ने कामायनी को िĬअथªक कृित न मानकर एक फ§टेसी माना और यह
Öथािपत िकया िक कामायनी इसिलए महÂवपूणª नहé है िक उसम¤ मनु को देश-कालातीत,
शाĵत मानव का łप िदया गया है बिÐक उसकì मह°ा इसम¤ है िक उसम¤ पूँजीवादी
हासगत सËयता के भीतर Óयिĉ के भीतरी िवक¤þीकरण का ÿij बड़े जोर से उठाया गया है ।
‘एक सािहिÂयक कì डायरी’ एवं ‘नए सािहÂय का सŏदयªशाľ’ जैसी पुÖतकŌ कì रचना munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
139 करके मा³सªवादी जीवन-ŀिĶ और कला-िसĦांतŌ कì ऐसी łपरेखा ÿÖतुत कर दी, जो
िफलहाल िहंदी आलोचना म¤ एक मानक बनी हòई है ।
मुिĉबोध के साथ ही नामवर िसंह ने भी िहंदी कì मा³सªवादी समी±ा को काफì सुŀढ़ िकया
है । उनकì महÂवपूणª आलोचना-पुÖतकŌ म¤ छायावाद’, ‘किवता के नये ÿितमान’, ‘दूसरी
परÌपरा कì खोज’, और ‘वाद-िववाद संवाद’, िवशेष łप से उÐलेखनीय ह§ । इन पुÖतकŌ के
आधार पर नामवर िसंह कì मा³सªवादी आलोचना-ŀिĶ और उनकì Óयावहाåरक समी±ा का
अ¸छा पåरचय ÿाĮ िकया जा सकता है । नामवर िसंह एक ÿखर समी±क के łप म¤ जाने
जाते ह§ । वे रसवादी समी±क डॉ. नगेÆþ, मा³सªवादी समी±क रामिवलास शमाª और
कलावादी समी±क अशोक वाजपेयी से बराबर िभड़ते रहे ह§ और इस िभड़Æत से ही उÆहŌने
अपनी आलोचना म¤ वह धार पैदा कì है िजसका उÐलेख लोग कभी-कभी ‘नामवरी तेवर’ के
łप म¤ करते ह§ । ‘वाद-िववाद संवाद’ पुÖतक उनकì इस उÖतादी का ®ेķ उदाहरण है। इस
पुÖतक म¤ नामवर िसंह ने ‘जनतंý और समालोचना’, आलोचना कì Öवाय°ता’,
‘ÿासंिगकता पर पुनIJ : ÿलय कì छाया’, ‘आलोचना कì संÖकृित और संÖकृित कì
आलोचना’ जैसे िनबंधŌ से िहंदी आलोचना को नए सरोकारŌ से जोड़ते हòए आने वाले खतरŌ
से िजस तरह आगाह िकया है, वह उनकì ÿखर आलोचना-ŀिĶ और सचेत आलोचना-कमª
का उÂकृĶ उदाहरण है । वाद-िववाद नामवर िसंह कì ÿकृित म¤ है और वे यह मानते ह§ िक
“वादे-वादे जायते तÂवबोधः ।”
नामवर िसंह डॉ. नगेÆþ, िवजयदेव नारायण साही, अशोक वाजपेयी, रामिवलास शमाª और
राजेÆþ यादव से बराबर वाद-िववाद करते रहे ह§। इस िववाद से िहंदी आलोचना को तेवर भी
िमला है और ŀिĶ भी । मा³सªवादी आलोचना-परंपरा के अÆय आलोचकŌ म¤ रांगेय राधव
(ÿगितशील सािहÂय के मापदंड, काÓय, यथाथª और ÿगित, काÓय के मूल िववे¸य) का नाम
िवशेष उÐलेखनीय है। ये łप-तÂव को बहòत महÂव नहé देते ह§। इÆहŌने ĬÆĬाÂमक
भौिककवाद के आलोक म¤ भारतीय काÓयशाľ का भी अÅययन िकया है। ये ÿितबĦ
मा³सªवादी समी±क ह§ । अ²ेय ने उपने ‘तारसĮक’ के वĉÓय म¤ ‘जीवन कì जिटलता’,
‘िÖथित-पåरवतªन कì असाधारण तीĄ गित’, ‘किव कì उलझी हòई संवेदना’, साधारणीकरण
और सÌÿेषण कì समÖया, जैसी अनेक नई बातŌ कì ओर लोगŌ का Åयान आकृĶ िकया
और नए भावबोध से िलखी गई किवताओं के िलए नए आलोचना-ÿितमानŌ कì आवÔयकता
पर बल िदया । इसी समय अ²ेय ने ‘तारसĮक’ म¤ िलखा – “नयी किवता का अपने पाठक
और Öवयं के ÿित उ°रदाियÂव बढ़ गया है। यह मानकर िक शाľीय आलोचकŌ से उसका
सहानुभूितपूणª तो ³या पूवाªúहरिहत अÅययन भी नहé िमला है, यह आवÔयक हो गया है िक
Öवयं आलोचक तटÖथ और िनमªम भाव से उसका परी±ण कर¤। दूसरे शÊदŌ म¤ पåरिÖथित
कì माँग यह है िक किवगण Öवयं एक दूसरे के आलोचक बनकर सामने आएँ ।” किवयŌ को
आलोचना-कमª म¤ ÿवृ° करने का यह आĽान नया नहé था । छायावादी किवयŌ ने भी यह
कायª िकया था ।
यहाँ थोड़ा Łककर आंµल-अमरीकì ‘नयी समी±ा’ को समझ लेना जłरी है। टी. एस.
इिलयट, आई ए. åरचड्ªस, जॉन øो रेÆसम, एलेन टेट, राबटª पेन वारेन, आर. पी. Êलेकमर,
³लीÆथ āु³स आिद ने ‘नयी समी±ा’ का जो शाľ और दशªन तैयार िकया उसकì मु´य
बात¤ इस ÿकार ह§: munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
140 १. रचना एक पूणª एवं Öवाय° भािषक संरचना है। इसिलए भाषा के सजªनाÂमक तÂवŌ का
िवĴेषण ही समी±ा का मु´य कायª है।
२. ऐितहािसक, सामाजशाľीय , दाशªिनक एवं िवĴेषणवादी समी±ाएँ अनावÔयक एवं
अÿसांिगक ह§। ³यŌिक ये सिहÂयेतर ÿितमान ह§।
३. रचना का मूÐयांकन रचना के łप म¤ ही करना अभीĶ है।
४. रचना कì आंतåरक संगित और संिĴĶ िवधान के िववेचन-िवĴेषण के िलए उसका
गहन पाठ आवÔयक है ।
िहंदी के आलोचकŌ ने भी जिटल भावबोध और तदनुकूल जिटल कलाÂमक उपादानŌ
शÊद-संकेतŌ, िबंबŌ, ÿतीकŌ, उपमानŌ आिद - से युĉ संिĴĶ काÓयभाषा वाली नयी किवता
कì समी±ा के िलए एक सवªथा िभÆन समी±ा-ŀिĶ एवं शैली कì आवÔयकता का अनुभव
िकया िजसके फलÖवłप िहंदी म¤ 'नयी समी±ा’ का ÿसार हòआ । आधुिनक भावबोध को
क¤þ म¤ रखकर समी±ा-कमª म¤ ÿवृ° होने वाले समी±कŌ म¤ अ²ेय, िगåरजाकुमार माथुर,
रघुवंश, लàमीकांत वमाª, िवजयदेवनारायण साही, जगदीश गुĮ, मलयज, रामÖवłप
चतुव¥दी, अशोक वाजपेयी, रमेशचÆþ शाह आिद के नाम उÐलेखनीय ह§ । इन समी±कŌ ने
युगीन पåरवेश म¤ ÓयाĮ िवसंगित’, िवडÌबना’, ‘असहायता’, ‘िनŁĥेÔयता’, ‘एकाकìपन’,
‘अजनबीपन’, ‘ऊब’, ‘संýास’, ‘कुंठा’ आिद का िवĴेषण करते हòए ‘अनुभूित कì
ÿामािणकता’ और ‘ÓयिĉÂव कì अिĬतीयता’ को रेखांिकत िकया और ‘अिÖमता के संकट’
से गुजरते हòए मनुÕय कì मुिĉ कì आवÔयकता पर बल िदया। इसके साथ ही रचना को
भािषक सजªना मानकर काÓय-भाषा के िवĴेषण को समी±ा का मु´य िवषय बनाया ।
नयी समी±ा कì िवशेषताओं को उĤािटत एवं Öथािपत करने वाली तथा इस ŀिĶ से नयी
किवता और किवयŌ कì समी±ा करने वाली रचनाओं म¤ ‘भवंती’, ‘आÂमनेपद’, ‘आलवाल’,
‘अīतन’ (अ²ेय), ‘नयी किवता के ÿितमान’ (लàमीकांत वमाª), िहंदी नवलेखन’,
‘काÓयधारा के तीन िनबंध’, ‘भाषा और संवेदना’, ‘सजªन और भािषक संरचना’,(रामÖवłप
चतुव¥दी), ‘मानवमूÐय और सािहÂय’ (धमªवीर भारती), ‘सािहÂय का नया पåरÿेàय’
(रघुवंश), नयी किवता : सीमाएँ और संभावनाएँ’ (िगåरजाकुमार माथुर), ‘नयी किवता :
Öवłप और समÖयाएँ’ (जगदीश गुĮ), ‘किवता से सा±ाÂकार’, ‘संवाद और एकालाप’
(मलयज), ‘समानाÆतर’, ‘वागथª’, ‘सबद िनरंतर’,(रमेशचÆþ शाह), ‘िफलहाल’ (अशोक
वाजपेयी) आिद उÐलेखनीय ह§ । यहाँ यह भी ²ातÓय है िक िहंदी के नए समी±कŌ ने काÓय
के संदभª म¤ भाषा के महÂव को Öवीकार िकया, उसके सजªनाÂमक तÂवŌ का िवĴेषण और
मूÐयांकन िकया, सजªनाÂमक ŀिĶ से उÂकृĶ रचना कì अिĬतीयता और मह°ा को सराहा,
संवेदना और िशÐप कì अिÆवित को रेखांिकत िकया, वÖतु और łप के संबंधŌ का िवĴेषण
िकया िकंतु अमरीकì या पिIJम के नए समी±कŌ कì तरह रचना को उसके ऐितहािसक
संदभाª से पूरी तरह काटकर नहé देखा । इतना अवÔय है िक कई समी±कŌ ने किवता के
सजªनाÂमक तÂवŌ के िवĴेषण, उनकì संिĴĶता और अनुभव कì अिĬतीयता आिद पर
िवशेष बल देते हòए अपने कलावादी Łझान को अिधक मुखर łप म¤ Óयĉ िकया । यīिप
नयी समी±ा का ºवार बड़ी जÐदी उतर गया, िकंतु यह भी एक तÃय है िक इसकì वेगवती
धारा थोड़ी देर के िलए ही सही, मा³सªवादी समी±कŌ को भी अपने ÿवाह म¤ बहा ले गई । munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
141 नयी समी±ा का संबंध िवशेष łप से किवता से ही रहा है । कहना चािहए िक यह किवता-
क¤िþत ऐसी आलोचना-पĦित थी िजसने किवता कì Öवाय°ता और सजªनाÂमकता पर
अिधक बल िदया । उपÆयास, कहानी, नाटक आिद गī-िवधाओं के मूÐयांकन के िलए इस
पĦित का उपयोग बहòत कम हòआ । नयी समी±ा कì संरचना-क¤िþत आलोचना-ŀिĶ को
और अिधक सूàम और सघन करने वाली एक और समी±ा-पĦित का िवकास हòआ िजसे
शैली िव²ान कहा गया । यह भािषक िवĴेषण कì वह वै²ािनक पĦित है िजसम¤ भाषा के
सभी उपादानŌ - शÊद, पद, वा³य, Åविन, छंद को अÅययन का िवषय बनाया जाता है ।
िहंदी म¤ इस समी±ा-मĦित के पुरÖकताª ह§ – रवीÆþनाथ ®ीवाÖतव, िजÆहŌने शैली िव²ान
का िसĦांत भी तैयार िकया और तदनुकूल Óयावहाåरक शैली वै²ािनक समी±ा भी िलखी ।
पांडेय शिशभूषण शीतांशु और सुरेश कुमार ने भी इस िदशा म¤ उÐलेखनीय कायª िकया है ।
पं. िवīािनवास िम® ने शैलीिव²ान कì जगह रीित िव²ान को ÿमुखता ÿदान कì, िकंतु
उनके तकō को अिधक बल नहé िमला ।
रवीÆþनाथ ®ीवाÖतव ने शैली वै²ािनक समी±ा का जो Óयावहाåरक łप केदारनाथ िसंह
कì किवता ‘इस अनागत का कर¤ ³या’ कì समी±ा करके ÿÖतुत िकया उसे डॉ. ब¸चन िसंह
ने किवता कì शव-परी±ा कहकर शैली-वै²ािनक समी±ा कì सीमाओं को भली-भाँित
उजागर कर िदया। उÆहŌने उस समी±ा कì समी±ा करते हòए िलखा - “ÖपĶ है िक शैली
वै²ािनक ÿणाली के आधार पर वा³यŌ, उपवा³यŌ, सं²ा, सवªनाम, पद, पद-बंध आिद के
माÅयम से किवता कì जो परी±ा कì गई है, वह उसकì शव-परी±ा बन जाती है। इसम¤ िजस
Óयाकरण कì सहायता ली गई है वह किवता को छोटे-छोटे खंडŌ म¤ काट तो देता है पर उसे
संĴेिषत नहé कर पाता । इस Óयव¸छेदन-Óयापार से मूÐयांकन का संबंध िनःशेष हो जाता
है ।” दरअसल शैली वै²ािनक समी±ा एक ÿकार का भािषक िवĴेषण है जो काÓय भाषा को
तार-तार करके उसके ÿयोग वैिशĶ्य और कलाÂमक बारीकì को तो ÿÖतुत कर देता है।
िकंतु न तो काÓयममª को उĤािटत कर पाता है, न ही रचना कì मूÐयव°ा को ठीक से
रेखांिकत कर पाता है। यह एक तरह से नéबू-िनचोड़ समी±ा है जो रस को बाहर फ¤क देती है
और गूदे का िवĴेषण करके उसका सŏदयª देखती ह§ ।
‘नयी समी±ा’ ‘शैली िव²ान’ और संरचनावाद’ के साथ ही िहंदी म¤ सजªनाÂमक आलोचना
कì भी काफì चचाª हòई है । समी±क के कायª कì सृजनशीलता कì चचाª करते हòए मुिĉबोध
ने िलखा है “आलोचक या समी±क का कायª, वÖतुत: कलाकार या लेखक से भी अिधक
तÆमयतापूणª और सृजनशील होता है, उसे एक साथ जीवन के वाÖतिवक अनुभवŌ के समुþ
म¤ डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है िक िजससे लहरŌ का पानी उसकì आँखŌ
म¤ न घुस पड़े । उनकì ŀिĶ म¤ ‘जीवन-सÂयŌ पर आधाåरत सािहÂय-समी±ा Öवयं एक
सृजनशील कायª है और वह न केवल लेखक को वरन् पाठक को भी जीवन-सÂयŌ के अपने
उĤाटनŌ Ĭारा सहायता करती जाती है।’ इसीिलए मुिĉबोध ‘आलोचना को रचना कì
पुनसªिĶ’ मानते ह§ । नामवर िसंह भी लगभग इसी तरह कì बात¤ कहते ह§ – “आलोचक जब
आलो¸य कृित के संपूणª कÃय को कथन-माý के łप म¤ Öवीकार करके आलोचना-कमª म¤
ÿवृ° होता है तो उस पर कÃय-कथन संबंध म¤ ÿवेश करने कì किठन िजÌमेदारी आ जाती
है । तादाÂÌय के łप म¤ ÿÖतुत कÃय-कथन के बीच वह एक तरह से स¤ध लगाता है और
अंतिनªिहत तनाव कì तलाश करता है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
142 आलोचक कì यह तलाश ही उसकì सृजनशीलता है ।” मुिĉबोध यह मानते ह§ िक रचना म¤
इस ÿकार का सृजनाÂमक अंत:ÿवेश उसके कलाÂमक सŏदयª के माÅयम से ही िकया जा
सकता है – “कलाÂमक सŏदयª तो वह िसंहĬार है िजसम¤ से गुजरकर ही कृित के ममª ±ेý म¤
िवचरण िकया जा सकता है, अÆयथा नहé।” अिभÿाय यह िक आलोचना भी एक रचना है
और उसकì यह रचनाÂमकता आलो¸य कृित म¤ उसकì अिभÓयिĉ के उपकरणŌ के माÅयम
से उसम¤ अंत: ÿवेश करके ही उपलÊध कì जा सकती है । इसम¤ कोई संदेह नहé िक
सजªनाÂमक आलोचना उ¸च ®ेणी कì आलोचना है और वह आलोचक को भी रचनाकार
कì ®ेणी म¤ रख देती है तथा उसकì आलोचना को रचनाÂमक समृिĦ ÿदान करती है ।
आचायª रामचंþ शु³ल और आचायª हजारीÿसाद िĬवेदी कì आलोचना म¤ भी सजªनाÂमकता
के तÂव ÿभूत माýा म¤ िवīमान ह§ । मुिĉबोध कì पुÖतक ‘कामायनी : एक पुनिवªचार’
सजªनाÂमक आलोचना का ®ेķ उदाहरण है। अशोक वाजपेयी और मलयज कì आलोचनाएँ
भी सजªनाÂमक आलोचना कì िवशेषताओं से पåरपूणª ह§ ।
आलोचना का कायª सािहÂय का िनणªय अथवा Óया´या करना नहé है । वह Öवयं भी
रचनाÂमक हो सकती है यिद वह अपने म¤ आलो¸य कृित कì पुनरªचना कर ले । यह
पुनरªचना आलोचक कì रचनाÂमक ±मता पर िनभªर करती है । अत: कहा जा सकता है िक
रचनाÂमक ÿितभा से संपÆन आलोचक ही सजªनाÂमक समी±ा िलख सकता है, िकंतु
इसका सरलीकरण इस łप म¤ नहé हो सकता िक रचनाकार ही ®ेķ सजªनाÂमक आलोचक
हो सकता है बावजूद इस सÂय के िक अनेक रचनाकारŌ ने उÂकृĶ आलोचनाएँ भी िलखी ह§
। ‘ÿसाद’, ‘पंत’, ‘िनराला’, ‘अ²ेय’, मुिĉबोध’, ‘िवजयदेव नारायण साही’, और ‘शमशेर’ इस
बात के उदाहरण ह§ िक उनकì किवताएँ िजतनी अ¸छी ह§, उतनी ही अ¸छी और
संभावनापूणª उनकì समी±ाएँ भी ह§। िजस तरह संभावनापूणª होकर कोई रचना अÂयिधक
रचनाÂमक ÿमािणत होती है, उसी तरह संभावनापूणª होकर कोई आलोचना भी अपनी
रचनाÂमकता को ÿÂय± करती है ।
ÖवातंÞयो°र िहंदी आलोचना का िववेचन करते हòए ÿाय: आज तक कì िहंदी आलोचना कì
ÿवृि°यŌ और उपलिÊधयŌ को रेखांिकत करने कì कोिशश कì गई है । इस दौर म¤ मु´य łप
से मा³सªवादी और łपवादी ÿवृि°यŌ कì ÿबलता है लेिकन अÂयिधक ÿभावी और
ÿसरणशील आलोचना-पĦित के łप म¤ मा³सªवादी आलोचना का ही िवकास हो रहा है ।
मा³सªवादी समी±कŌ म¤ रामिवलास शमाª और नामवर िसंह के साथ इधर नए समी±कŌ कì
एक बड़ी पंिĉ तैयार हòई है । िजसम¤ िशवकुमार िम®, धनंजय वमाª, िनमªला जैन, नंदिकशोर
नवल, शंभुनाथ, कणªिसंह चौहान, मधुरेश, खगेÆþ ठाकुर आिद के नाम उÐलेखनीय है ।
मा³सªवािदयŌ म¤ भी जनवािदयŌ कì एक अलग पीढ़ी तैयार हो रही है िजसकì अगली पंिĉ म¤
िशवकुमार िम® और मैनेजर पाÁडेय िदखाई पड़ रहे ह§ । दरअसल इस समय रचना और
आलोचना को लेखक-संगठन और लघु पिýकाएँ अपने-अपने ढंग से िनद¥िशत-ÿेåरत कर
रही ह§ और तदनुसार ‘िकÖम-िकÖम’ कì आलोचना ÿकाश म¤ आ रही है, िजसम¤ अपने को
और अपने प±धरŌ को Öथािपत और उÂसािहत करने कì ÿवृि° अिधक है और रचना का
वÖतुगत मूÐयांकन गौण हो गया है । एक ही रचना एक खेमे म¤ ®ेķ और महान मानी जाती
है. दूसरे खेमे म¤ िनकृĶ और महÂवहीन । यह आलोचना-जगत म¤ एक ÿकार कì वही
अराजकता है जो वतªमान भारतीय राजनीित म¤ आए िदन िदखाई पड़ रही है । munotes.in

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आलोचना : िवकास याýा
143 १०.४ सारांश िहंदी आलोचना का उ°रो°र िवकास हòआ है और नयी रचनाशीलता के साथ-साथ िहंदी
आलोचना ने भी अपने म¤ बराबर पåरवतªन भी िकया है। यह रचना के समानाÆतर आलोचना
कì वह याýा है जो रचना को परखने का भी कायª करती है और रचना के दबावŌ के अनुłप
अपने म¤ नयी शिĉ और सामÃयª का भी िवकास करती है । िहंदी आलोचना कì यह
ÿगितशीलता इस łप म¤ अिधक ÖपĶता के साथ देखी जा सकती है िक जो आलोचना
आरंभ म¤ शाľिनķ और सैĦांितक अिधक थी, वह उ°रो°र उÆमुĉ होती हòई आलोचना
कì सजªनाÂमकता के िबंदु तक पहòँच गई । यिद आलोचना म¤ कठमुÐलापन ही बना रहता,
देशी-िवदेशी संदभō से जुड़कर अपने को नवीन करने कì ÿवृि° न होती, रचना म¤ अंत:ÿवेश
करके रचना-मूÐयŌ को टटोलने कì उÂसुकता न होती तो आलोचना और रचना के बीच
घिनķ åरÔता कायम न हो पाता ।
िहंदी आलोचना के िवकास-øम का अÅययन करने से यह भी ÖपĶ हो जाता है िक समय-
समय पर अनेक समी±कŌ ने अपनी उÂकृĶ आलोचना-ÿितभा और सािहÂय कì गहरी
समझ से िहंदी आलोचना को नई ऊँचाई और गåरमा ÿदान कì है । आचायª महावीरÿसाद
िĬवेदी, रामचÆþ शु³ल, आचायª नÆददुलारे वाजपेयी, आचायª हजारीÿसाद िĬवेदी, डॉ
नगेÆþ, डॉ रामिवलास शमाª, मुिĉबोध, डॉ.नामवर िसंह, डॉ. ब¸चन िसंह, डॉ. रघुवंश, डॉ.
रामÖवłप चतुव¥दी, अशोक वाजपेयी, मलयज, िवजयदेव नारायण साही आिद ऐसे
आलोचक ह§ िजÆह¤ने आलोचना को अपनी सैĦांितक एवं Óयावहाåरक समी±ा से समृĦ
िकया है और उसे जड़ या िÖथर होने से बचाया है । इनकì Óयावहाåरक आलोचनाओं से
िहंदी म¤ रचनाÂमक उÂकषª कì नई िदशाएँ भी ÖपĶ हòई ह§ । दूसरे शÊदŌ म¤ यह भी कहा जा
सकता है िक इनकì आलोचनाओं और Öथापनाओं ने रचनाओं के िलए नई चुनौितयाँ भी
पेश कì ह§ । इससे रचना और आलोचना का वह ĬंĬाÂमक åरÔता भी ÖपĶ हòआ है जो दोनŌ
म¤ गुणाÂमक िवकास को ÿÂय± करने म¤ स±म होता है ।
१०.५ बोध ÿij १. िहÆदी आलोचना का अथª बताते हòए उसके िवकास øम को िलिखए ।
२. िहÆदी आलोचना के िवकास याýा पर ÿकाश डािलए ।
३. िहÆदी आलोचना के उĩव एवं िवकास को सोदाहरण िलिखए ।
४. आधुिनक िहÆदी आलोचना कì आरंिभक िÖथित पर िवÖतार से चचाª कìिजए ।
१०.६ अितलघु°रीय ÿij १. ‘आलोचना का उĥेÔय िकसी वÖतु के मूÐय का िनणªय करना है।’ आलोचना के संबंध
म¤ यह पåरभाषा िकस िवĬान कì है?
उ°र: टी. एस. इिलयट munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
144 २. आलोचना से संबंिधत दो िवĬानŌ के नाम िलिखए।
उ°र: आचायª महावीर ÿसाद िĬवेदी और आचायª रामचंþ शु³ल
३. ‘संयोिगता Öवयंवर’ नाटक कì समी±ा कौ नसे िवĬान Ĭारा कì गई?
उ°र: ®ीिनवास दास
४. िĬवेदी युग म¤ िकस ÿकार कì आलोचना िवकिसत हòई?
उ°र: सैĦािÆतक एवं Óयावहाåरक
५. िचंतामिण और रस मीमांसा जैसे समी±ाÂमक úंथ के लेखक है?
उ°र: आचायª रामचंþ शु³ल
१०.७ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास - डॉ. नग¤þ
 िहंदी सािहÂय का इितहास - आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय उĩव और िवकास - हजारीÿसाद िĬवेदी
 िहंदी सािहÂय का आलोचनाÂमक इितहास- डॉ. रामकुमार वमाª
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°याँ - डॉ. जयिकशनÿसाद खÁडेलवाल
 आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास - ब¸चन िसंह


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145 ११
आÂमकथा
इकाई कì łपरेखा
११.० उĥेÔय
११.१ ÿÖतावना
११.२ आÂमकथा का अथª एवं पåरभाषा
११.३ आÂमकथा कì िवशेषताएं
११.४ आÂमकथा का उĥभव एवं िवकास
११.४.१ आÂमकथा का आरंिभक काल
११.४.२ पुनजाªगरण काल (भारतेÆदु युग)
११.४.३ नवजागरण काल (िĬवेदी युग)
११.४.४ छायावाद युग
११.४.५ छायावादो°र युग
११.४.६ समकालीन युग (२००० से अब तक)
११.५ सारांश
११.६ िदघō°री ÿij
११.७ वैकिÐपक ÿij
११.० उĥेÔय इस इकाई के माÅयम से िवīाथê आÂमकथा संबंधी समú ²ान अिजªत कर सक¤गे। इस
इकाई म¤ आÂमकथा अथª, पåरभाषा, िवकास øम, ÿमुख लेखक और उनके Ĭारा िलिखत
आÂमकथा का िवÖतृत अÅययन िकया जाएगा।
११.१ ÿÖतावना िहंदी कì सािहÂय िवधाओं म¤ समृĦ łप से किवता, कहानी, नाटक, िनबंध, उपÆयास का
िवकास हòआ है ।आधुिनक समय म¤ सािहÂय इÆहé िवधाओं म¤ न िसमट कर वह िवÖतृत łप
म¤ अÆय िवधा जीवनी, आÂमकथा, डायरी, संÖमरण, åरपोताªज, सा±ाÂकार, रेखािचý आिद
िवधाओं म¤ िवकास हो रहा है। वतªमान समय म¤ ºयŌ- ºयŌ जीवन कì जिटलता, मन कì
कुंठाएँ, ľीपुŁष संबधŌ कì रहÖयाÂमकता, मानवीय जीवन का संघषª बढ़ता जाएगा सािहÂय
म¤ गīाÂमक िवधाएँ और समृĦ होती जाएंगी । िहंदी सािहÂय कì अÆय गī िवधाओं म¤ चिचªत
और समृĦ िवधा आÂमकथा ही मानी जाती है । ³यŌिक आÂमकथा का कोई न कोई अंश
हम¤ मÅयकाल म¤ ही पī के łप म¤ िमल जाता है । अतः हम आÂमकथा को पूणª łप से
नवीन िवधा नहé कह सकते । लेिकन ÿाचीन काल म¤ आÂमकथा लेखन का िवकास न के munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
146 बराबर ही था आधुिनक समय म¤ आने के पIJात आÂमकथा लेखन कì परÌपरा म¤ िवकास
होता चला गया । आÂमकथा लेखन को समझने से पहले सवªÿथम हम जान¤गे आÂमकथा
³या है? इसकì पåरभाषा एवं Öवłप को समझना भी आवÔयक है। आÂमकथा लेखन एक
ऐसी परÌपरा है िजसम¤ कोई महान Óयिĉ या लेखक अपने जीवन कì महÂवपूणª घटनाओं
का ®ृंखलाबĦ िववरण Öवयं िलखता है, उसे सािहÂय म¤ आÂमकथा कहा जाता है ।
आÂमकथा लेखन से समाज म¤ Óयिĉ का संघषª, उसके जीवन का अÅयाय, सकाराÂमक एवं
नाकाराÂमक प± दोनŌ Öवłप पाठकŌ के सम± आते है । िजसम¤ बहòत घटनाएं ऐसी होती है
जो समाज म¤ Óयिĉ को जीवन जीने का सही राह और ÿेरणा ®ोत बन जाती है । वह समाज
म¤ बदलाव लाने का नया साधन बन जाता है । इसिलए सािहÂय म¤ आÂमकथा महÂवपूणª
िवधा म¤ से मानी जाती है । आÂमकथा म¤ रचनाकार को सदैव िनरपे± एवं तटÖथ रहना
चािहए। तभी वह सही łप से अपने जीवन के कमजोर तथा ŀढ़ प±Ō को समाज के सामने
रख पाय¤गे । आÂमकथा िवधा को आंतåरक łप से समजने के िलए उसकì पृķभूिम एवं अथª
को समझना अित आवÔयक है ।
११.२ आÂमकथा का अथª एवं पåरभाषा आÂमकथा का अंúेजी म¤ शािÊदक łप ‘आटोबायोúाफì ’ है । संÖकृत म¤ आÂमकथा को ÖपĶ
करते हòए िलखा गया है िक “आÂमनः िवषये कÃयते यÖयां साआ” Âमकथा अथाªत ऐसी
कथा आÂमकथा है जो Öवयं के बारे म¤ िलखी गई हो । आÂमकथा, आÂमचåरत, आÂमचåरý
को बहòधा पयाªयवाची शÊद माना जाता है जो Öथूल łप से सही है लेिकन सूàम łप से
आÂमकथा व आÂमचåरत के मÅय िवभाजक रेखा खéची जा सकती है । "एक सूàम अÆतर
कदािचत यह है िक आÂमचåरý कहलाने वाली रचना िकंिचत िवĴेषणाÂमक एवं िववेक
ÿधान होती है तथा आÂमकथा कही जाने वाली कृित अपे±या अिधक रोचक और सुपाठ्य
होती है ।
एनसाइ³लोपीिडया िāटेिनका “म¤ आÂमकथा के संदभª म¤ Óया´याियत है" आÂमकथा, Óयिĉ
के जीये हòए जीवन का Êयौरा है, जो Öवयं उसके Ĭारा िलखा जाता है ।" और "आÂमकथा
का मूल िसĦांत आÂमिवĴेषण होना चािहए ।" अतः लेखक Öवयं अपने जीवन का øिमक
Êयौरा पेश करता है उसे ‘आÂमकथा’ कहते ह§ । इसी तरह कैसेल ने 'एनसाइ³लोपीिडया
ऑफ िलटरेचर' म¤ आÂमकथा को पåरभािषत करते हòए कहा गया है "आÂमकथा Óयिĉ के
जीवन का िववरण है, जो Öवयं के Ĭारा ÿÖतुत िकया जाता है । इसम¤ जीवनी के अÆय
ÿकारŌ से सÂय का अिधकतम समावेश होना चािहए ।" अतः आÂमकथा म¤ लेखक
आÂमाÆवेषण और आÂमालोचन करता है, िजससे उसका सÌपूणª जीवन ÿÂय± łप से सभी
के सामने आता है । इसम¤ लेखक अपने अंतजªगत को बिहजªगत के सम± ÿÖतुत करता है ।
आÂमकथा - लेखक िनमªम होकर अपने दोषŌ को भी उĤािटत करता है और इसीिलए
उसका लेखन सÂयाधाåरत होता है । ÿाचीन समय म¤ १६६५ ही बनारसीदास चतुव¥दी Ĭारा
िलिखत ‘अधªकथा’ रचना ने पī म¤ आÂमकथा कì नéव पड़ गई थी परÆतु उसका िवÖतार
आधुिनक काल म¤ होता है आÂमकथा को िविवध सािहÂयकारŌ तथा िवĬानŌ ने इस ÿकार
पåरभािषत िकया है । munotes.in

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आÂमकथा
147 पाIJाÂय िवĬान ‘पाÖकल’ ने आÂमकथा को पåरभािषत करते हòए िलखा है िक “आÂमकथा
जीवन कì या उसके िकसी एक भाग कì स¸ची घटनाओं को िजस समय म¤ वह पिटत हòई
हो, उन समÖत चेĶाओं को पुनगªिठत करती है । इसका मु´य संबंध आÂमिववेचन से होता
है । बाĻ िवĵ से नहé । यīिप ÓयिĉÂव को अिĬतीय बनाने के िलए बाĻ िवĵ को भी लाया
जा सकता है और आवÔयकतानुसार छोड़ा भी जा सकता है । जीवन को पुनगªिठत करना
एक असंभव कायª है । एक ही िदन के आगे पीछे का अनुभव असीम होता है । इस ÿकार
कहा जा सकता है आÂमकथा बीती हòई घटनाओं से बनती है ।”
भारतीय िवĬानŌ ने आÂमकथा िवधा के िवकास के बाद इसे पåरभािषत करने का ÿयास
िकया है । चूंिक आÂमकथा िवधा का िवकास ही आधुिनक काल म¤ भारतेÆदु के Ĭारा िकया
जाता है इस वजह से भी यह िवधा इस समय तक ढंग से अपना łप úहण न कर पाई थी ।
िजसके कारण इसे पåरभािषत करना किठन था । भारतेÆदु के समय म¤ यह िवधा एक पåरचय
पý के łप म¤ शुł हòई थी जो बाद के समय म¤ जाकर अपना वाÖतिवक łप úहण कर पाती
है ।
िहंदी सािहÂय कोश के अनुसार “आÂमकथा लेखक के जीवन का संबंिधत वणªन है ।
आÂमकथा के Ĭारा अपने बीते हòए जीवन का िसंहावलोकन तथा अपने Óयापक पृķभूिम म¤
अपने जीवन का महßव ÿदिशªत िकया जाना संभव है ।”
डॉ. भोलानाथ ितवारी के अनुसार “अपने Ĭारा िलखी हòई अपनी जीवनी को आÂमकथा
कहते है ।”
डॉ . नगेÆþ ने आÂमकथा को पåरभािषत करते हòए िलखा है िक “आÂमकथाकार अपने संबंध
म¤ िकसी िमथक कì रचना नहé करता , कोई ÖवÈन सृिĶ नहé करता, वरन् अपने गत जीवन
के खĘे - मीठे, उनके अंधेरे, ÿसÆन - िवषाÆण, साधारण असाधारण संचयन पर मुड़कर एक
ŀिĶ डालता है । अतीत को पुनः कुछ ±णŌ के िलए Öमृित म¤ जी लेता है । और अपने
वतªमान तथा अतीत के मÅय संबंध सूýŌ कì पड़ताल करता है ।”
११.३ आÂमकथा कì िवशेषताएँ आÂमकथा कì िवशेषताएँ आÂमकथा कì िनÌनिलिखत िवशेषताएँ ह§ ।
(i) आÂमकथा का नायक अपने आप एक लेखक होता है ।
(ii) आÂमकथा म¤ काÐपिनक ÿसंगŌ हेतु कोई जगह नहé होती ³यŌिक आÂमकथा यथाथª व
ÿामािणक कथनŌ पर आधाåरत होती है ।
(iii) आÂमकथा म¤ केवल आÂम-िवĴेषण ही नहé होता अिपतु बाहरी संसार से सÌबिÆधत
िøयाओं ÿितिøयाओं का भी िववेचन िकया जाता है ।
(iv) आÂमकथा कì शैली म¤ इस ÿकार कì ÿभावोÂपादकता होनी चािहए जो पाठक के
मिÖतÕक व अÆतªमन पर पूणªत: अिभÓयĉ हो जाये । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
148 (v) आÂमकथा के लेखक को अपने जीवन सÌबÆधी घटनाओं व पåरिÖथितयŌ का उÐलेख
पूरी ईमानदारी से करना चािहए ³यŌिक ईमानदारी व स¸चाई आÂमकथा का मु´य
ÿाण है । अतएव सÂयता कì र±ा करना लेखक का धमª है ।
११.४ आÂमकथा का उĥभव एवं िवकास ११.४.१ आÂमकथा का आरंिभक काल:
सवªÿथम आÂमकथा कì आरंिभक अवÖथा ÿाचीन काल के संÖकृत सािहÂय म¤ आÂमचåरत
के माÅयम से हमारे समłप उपिÖथत है उसम¤ किव अपनी रचनाओं के साथ साथ अपने
जीवन का भी पåरचय िदता है। जो उस समय ÿाचीन úंथŌ म¤ तथा िशलालेखो म¤ उपलÊध है
जैसे ‘िशशुपाल वध’ रचना म¤ किव माघ ने अपना तथा िपतामह का पåरचय िदया है और
अपनी वंश- परÌपरा का गुणगान िकया है । संÖकृत म¤ महाकिव बाणभĘ Ĭारा रिचत
‘हषªचåरत तथा ‘कादÌबरी म¤ किव ने अपने जीवन कì घटनाओं का उÐलेख िकया है जहाँ
पर कुछ अंश आÂमकथा कì ÿवृि° िमलती है । ÿारंिभक काल के कुछ रचनाओं म¤
आÂमकथा का अंश भर ÿाĮ हòआ है । आÂमकथा के łप म¤ जैन किव बनारसीदास कì
'अधªकथा' (१६४१) िहÆदी कì ÿथम आÂमकथाओं म¤ िगनी जाती है । िहÆदी के ÿाचीन
सािहÂय म¤ आÂमकथाÂमक सामúी भी यý-तý ही िमलती है, सुिनिIJत और ÓयविÖथत
आÂमकथाओं के िलखे जाने का तो कोई ÿचलन ही न था । यह आÂमकथा पī म¤ िलखी
गयी है। आÂमकथा का सुÓयविÖथत िवकास आधुिनक काल म¤ हòआ ।
११.४.२ पुनजाªगरण काल (भारतेÆदु युग):
आधुिनक युग के पुनजाªगरण काल म¤ जहाँ राजनीितक िÖथितयŌ म¤ उथल- पुथल चल रही
थी वही सािहÂय के अÆय गī िवधा के łप म¤ आÂमकथा िलखने कì ओर लेखकŌ का Åयान
गया । Öवयं भारतेÆदु हåरIJÆþ ने 'कुछ आपबीती, कुछ जगबीती' नाम से आÂमकथा िलखना
ÿारÌभ िकया था । िजतना अंश वे िलख सके ,उसम¤ उÆहŌने अपने पåरवेश के समय
देशकाल, वातावरण के साथ साथ राजनीित म¤ मुÉतखोरी, िसफाåरशे आिद का सजीव िचý
खीचा है । Öवामी दयानÆद ने पूना के Óया´यानŌ के अÆतगªत अपने जीवन से सÌबĦ िववरण
िदये थे । अिÌबकाद° Óयास ने 'िनजवृ°ाÆत 'नामक आÂमकथा िलखी । भारतेÆदु मंडल के
ÿिसĦ रचनाकार ÿतापनारायण िम® कì आÂमकथा ‘ÿताप चåरत’ है, जो अपूणª रह गयी।
यह इनके úंथावली म¤ संकिलत िकया गया है । Öवामी ®ĦानÆद कì आÂमकथा 'कÐयाण
पथ का पिथक' िहÆदी कì ÿारिÌभक आÂमकथाओं मे एक है । इस ÿकार भारतेÆदु काल के
रचनाकरŌ म¤ भारतेÆदु, ÿतापनारायण िम® तथा अिÌबकाद° Óयास ने आÂमकथा को िलख
कर इस िवधा को िवÖतृत करने म¤ अपना योगदान िदया । कालाÆतर म¤ अनेक सÌबĦ और
Öफुट आÂमकथाएँ िहÆदी म¤ िलखी जाती रही । ÖपĶ łप से िलखी गयी आÂमकथाओं मे
ÔयामसुÆदर दास कì 'मेरी आÂमकहानी' और राजेÆþÿसाद कì 'आÂमकथा' ÿमुख है ।
राजेÆþ बाबू कì आÂमकथा उनके जीवन कì कथामाý न होकर समÖत समकालीन
घटनाओं, ÓयिĉयŌ और आÆदोलनŌ का भी इितहास है ।
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आÂमकथा
149 ११.४.३ नवजागरण काल (िĬवेदी युग):
िĬवेदी युग म¤ िविवध रचनाकरŌ ने अपनी आÂमकथा के Ĭारा अपने जीवन के समÖत
सामिजक, राजनैितक, पåरवाåरक, सांÖकृितक तथा देशकाल आिद के तÂकाल वातावरण
तथा घटनाओं को अपने आÂमचåरत के माÅयम से उĦृत िकया है िजसम¤ महावीर ÿसाद
िĬवेदी कì आÂमकथा, गुलाबराय कì 'मेरी असफलताएँ' या िसयारामशरण गुĮ कì 'झूठ -
सच', 'बाÐयÖमृित' आिद रचनाओं म¤ Öवाभािवकता, सŃदयता और िनÕकपट आÂमÿकाशन
के गुण िवīमान है । महावीर ÿसाद िĬवेदी ने अपने जीवन काल म¤ िहंदी के िवकास म¤
बहòमूÐय योगदान िदया है । लेखकŌ के अनुभव, उनका जीवन, संघषª याýा सभी का सूàम
łप से उÆहŌने अपने आÂमकथा के माÅयम से उजागर िकया है ।
११.४.४ छायावाद युग:
छायावाद युग म¤ रचनाकार रामिवलास शमाª, Öवामी दयानÆद, सÂयानÆद अिµनहोýी आिद ने
समाज कì उÆनित के िलए समाज म¤ महÂवपूणª योगदान िदया है । अपनी आÂकथा के
माÅयम से उÆहŌने इस िवधा को भी पोिषत िकया है । िजसम¤ Öवामी दयानÆद िलिखत
जीवनचåरý (संवत् १९१७ िव.), सÂयानÆद अिµनहोýी िलिखत ‘मुझ म¤ देव-जीवन का
िवकास’ (१९१० ई.), भाई परमानÆद िलिखत ‘आप बीती’ (१९२१ ई.), सुभाषचंþ बोस
Ĭारा रिचत ‘तŁण के ÖवÈन’ (१९३३) शीषªक कृितयाँ उÐलेखनीय है । ®ी रामिवलास
शु³ल िलिखत म¤ ‘øािÆतकारी कैसे बना’ (१९३३ ई.), भवानीदयाल संÆयासी कृत ÿवासी
कì कहानी (१९३९ ई.) इस काल म¤ महाÂमा गांधी कì आÂमकथा का अनुवाद ®ी हåरभाऊ
उपाÅयाय ने आÂमकथा के नाम से िकया तथा सुभाषचंþ भोस कì आÂमकथा का अनुवाद
िगरीशचÆþ जोशी ने िकया । यह दोनŌ आÂमकथा ÿेरणाÂमक है, जो पाठको को जीवन के
अúिसत करता रहेगा ।
डॉ . रामिवलास शमाª कì आÂमकथा ‘अपनी धरती अपने लोग’ तीन खÁडŌ म¤ ÿकािशत है ।
तीनŌ खÁडŌ का पåरचय डॉ. साहब के ही शÊदŌ म¤ इस ÿकार िदया है -"पहला खÁड मुँडेर
पर सूरज बचपन से शुł होकर अÅयापन कायª से छुĘी पाने तक, मेरे जीवन और पåरवेश के
संÖमरण ÿÖतुत करता है । दूसरे खÁड देर सबेर म¤ उन राजनीितक कायªकताªओं और
लेखकŌ के संÖमरण ह§, िजनसे थोड़ी या ºयादा देर के िलए मेरा सÌपकª हòआ था । इसके
िसवा मेरे लेखन कायª कì ÿेरणाएँ योजनाएँ उनके देर - सबेर पूरा होने कì आशाएँ -
आकां±ाएँ भी यहाँ देखी जायँगी । तीसरा खÁड आपस कì बात¤ छाýजीवन से लेकर बुढ़ापे
तक भाइयŌ के नाम, मु´यतः बड़े भाई के नाम, मेरे पýŌ का संकलन है । यहाँ संÖमरण नहé
ÓयिĉयŌ, घटनाओं पर मेरी ताजी ÿितिøया और िटÈपिणयाँ ह§ ।" वÖतुत : डॉ. शमाª के
जीवन का ÖवÈन था िक अपने लोग गरीबी कì रेखा से ऊपर आएँ, अपनी धरती कì उवªरता
बनी रहे तथा िहÆदी ÿदेश और सारे देश का सांÖकृितक िवकास हो । यह ÖवÈन ही उनके
लेखन का ÿेरणा ąोत है ।
११.४.५ छायावादो°र युग:
छायावादो°र युग म¤ आÂमकथा िवधा का िवकास बेहद िवÖतृत łप म¤ हòआ िजसम¤
अिधकतर रचनाकारŌ ने अपने जीवन से सÌबंिधत घटनाओं को िनÕप± łप से िलखा है। munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
150 एक ÿेरणा®ोत के łप म¤ पाठकŌ के सम± उपलÊध हòआ है । िजसम¤ ÿिसĥ सािहÂयकार
डॉ.ÔयामसुÆदरदास रिचत ‘मेरी आÂमकहानी’ १९४१ ई. म¤ ÿकािशत हòई । िहÆही सािहÂय
जगत के ÿमुख ÿिसĥ रचनाकार महापंिडत राहòल सांकृÂयायन कृत ‘मेरी जीवनयाýा
(१९४६ ई.) जो तीन खंडो म¤ िवभािजत है। उसका ÿकाशन हòआ िजसम¤ उÆहŌने अपने
घुम³कड़ जीवन का सÌपूणª िववरण पाठकŌ के सामने ÿÖतुत िकया है । तथा अÆय
रचनाकरŌ म¤ डॉ . राजेÆþÿसाद रिचत ‘आÂमकथा (१९४७ ई.), िवयोगी हåर कृत ‘मेरा
जीवन-ÿवाह (१९४८ ई.), देवेÆþ सÂयाथê कì तीन खÁडŌ म¤ ÿकािशत आÂमकथा 'चाँद
सूरज के बीरन' (१९५४ ई.) ‘नीलयाि±णी’ (१९८५ ई.) तथा 'नाच मेरी बुलबुल' (१९९९
ई.), सेठ गोिवÆददास कृत आÂमिनरी±ण (तीन भागŌ म¤ १९५८ ई.), पाÁडेय बेचन शमाª
'उú' रिचत ‘अपनी खबर’ (१९६० ई.) तथा आचायª चतुरसेन शाľी कृत ‘मेरी
आÂमकहानी’ (१९६३ ई.) महßवपूणª कृितयाँ ह§ । इसी øम म¤ ‘जीवन के चार अÅयाय’
(१९६६ई.) ®ी भुवनेĵर िम® माधव कृितयाँ भी Öमरणीय ह§ । ÿेमचÆदजी ने 'हंस' के
आÂमकथांक म¤ कुछ सािहÂयकारŌ कì संि±Į आÂमकथाएँ ÿकािशत कì थé ।
अतः िहÆदी म¤ आÂमचåरý िलखने कì कला िवकिसत हो गयी है । िपछले ३० वषŎ म¤ कुछ
महßवपूणª आÂमकथाएँ ÿकािशत हòई ह§ । इनम¤ ³या भूलूँ ³या याद कłँ (१९६९ ई.), नीड़
का िनमाªण िफर (१९७० ई.), बसेरे से दूर (१९७८ ई.) और दशहार से सोपान तक
(१९८५ ई.), (चार खÁडŌ म¤) हåरवंश राय ब¸चन आÂमकथा ÿकािशत है । चारखÁडŌ म¤
ÿकािशत हåरवंश राय 'ब¸चन' कì आÂमकथा Öवयं उÆहé के शÊदŌ म¤ एक 'Öमृित याýा य²'
है । इसम¤ उनका आरिÌभक जीवन, वंश, संघषª, िवĵिवīालय के उनके अनुभव, इलाहाबाद
रेिडयो Öटेशन पर िहÆदी ÿोड्यूसर का उनका अनुभव, िवदेश मंýालय म¤ आिफसर आन
Öपेशल ड्यूटी (िहÆदी) के łप म¤ राजनीितक कायŎ म¤ िहÆदी के ÿयोग को बढ़ावा देने के
िलये िकये गये उनके ÿयÂन, सिचवालय के सिचवŌ कì मानिसकता तथा वहाँ से अवकाश
लेने के बाद का उनका जीवन अनुभव एक बृहद् उपÆयास कì रोचक शैली म¤ जीवÆत और
साकार हो उठा है यौवन के Ĭार पर (१९७० ई.), डॉ. देवराज उपाÅयाय; अपनी कहानी
(१९७० ई.), वृÆदावन लाल वमाª; मेरी िफÐमी आÂमकथा (१९४७ ई.), बलराज साहनी;
घर कì बात (१९८३ ई.), मेरे सात जनम (तीन खÁडŌ म¤), हंसराज रहबर; मेरी जीवन धारा
(१९८७ ई.), यशपाल जैन; तपती पगडंिडयŌ पर पद याýा (१९८९ ई.), कÆहैयालाल िम®
'ÿभाकर'; आÂम पåरचय (१९८८ ई.), 'रेणु'; टुकड़े टुकड़े दाÖतान (१९८६ ई.), अमृतलाल
नागर; अधªकथा (१९८८ ई.), डॉ. नगेÆþ तथा सहचर है समय (१९९१ ई.), रामदरश
िम® कì आÂमकथाएँ िवशेष łप से चिचªत हòई ह§ । इस सÆदभª म¤ कुछ नये ÿयोग भी हमारा
Åयान आकृĶ करते ह§ । डॉ. नगेÆþ कì अधªकथा म¤ Öवयं उÆहé के साàय पर कहा जा सकता
है िक इसम¤ जीवन का 'अधªसÂय' Óयĉ हòआ है । वे कहते ह§- "यह मेरे जीवन का केवल
अधªसÂय है- अथाªत् उपयुªĉ तीन खÁडŌ म¤ म§ने केवल अपने बिहरंग जीवन का ही िववरण
उसका समभागी बनने कì उदारता मुझम¤ नहé है । जहाँ म§ खड़ा हóँ , 'रोशनी का िदया है । x
x x जहाँ तक अंतरंग जीवन का ÿij है, वह िनताÆत मेरा अपना है आपको उसका समभागी
बनाने कì उदारता मुझम¤ नहé है गिदªश के िदन (१९८० ई.) शीषªक से कमलेĵर के
संपादकÂव म¤ िहÆदी तथा अÆय भारतीय भाषाओं के बारह रचनाकारŌ का 'आÂमकÃय' एक
साथ ÿकािशत हòआ है । हंसराज रहबर के जीवन म¤ अनेक उतार - चढ़ाव आये ह§ । उÆहŌने
सन् १९८५ से १९८९ तक के अपने जीवन - सÆदभŎ को तीन खÁडŌ म¤ मेरे सात जनम munotes.in

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आÂमकथा
151 शीषªक से िलिपबĦ िकया है । इसम¤ आधुिनक सािहिÂयक गितिविधयŌ के सÌबÆध म¤ भी
मूÐयवान सामúी सुरि±त है । इधर १९९८ ई. म¤ इसका चौथा खÁड ÿकािशत हòआ है ।
रामदरश िम® कì आÂमकथा ‘सहचर है समय’ (१९९१ ई.) के नाम खÁडŌ म¤ िलखी गयी से
ÿकािशत हòई है । इसम¤ िम® कì ÖवतÆýता ÿािĮ के बाद úामीण पåरवेश से िनकलकर संघषª
के राÖते अपने जीवन का लàय तलाश करने वाले एक सािहÂयकार का पूरा अनुभव -
संसार, अपनी ÓयािĮ म¤ लगभग आधे भारत को समेटे हòए, साकार हो उठा है । इसी परÌपरा
म¤ इधर इनकì एक आÂमीय ±णŌ को Óयĉ करने वाली रचना फुरसत के िदन (२००० ई.)
ÿकािशत हòई है । इसम¤ िवĵिवīालय से अवकाश úहण करने से लेकर सन् १९९९ ई. तक
के आपके िनजी और पाåरवाåरक जीवन के दुःख - सुख का बड़ा ही मािमªक िचýण िकया
गया है । सुख इतना िक मन किवता कì पंिĉयाँ गुन - गुनाने लगे और दुःख इतना कì
उसकì जमी हòई पतō को िपघलाने के िलए अंधेरे को सहायक और साथी बनाना पड़े ।
िपछले कुछ वषŎ म¤ आÂम कथा - लेखन कì परÌपरा म¤ एक उÐलेखनीय बात यह हòई है िक
अब मिहला लेिखकाय¤ भी मुĉ मन से अपनी आÂमकथाएँ िलखने लगी ह§ । काल - øम से
देखा जाय तो दÖतक िजÆदगी कì (१९९० ई.) और मोड़ िजÆदगी का (१९९६ ई.) इन दो
खÁडŌ म¤ ÿकािशत ÿितभा अúवाल कì आÂमकथा सबसे पहले आती है । इसी øम म¤
øमशः जो कहा नहé गया (१९९६ ई.) कुसुम अंसल, लगता नहé है िदल मेरा (१९९७ ई.)
कृÕणा अिµनहोýी, बूँद बावड़ी (१९९९ ई.) इस ÿकार छायावादो°र काल म¤ ÿगित- ÿयोग
काल से लेकर नवलेखन काल तक के अिधकतर रचनाकरŌ ने आपने आÂमकथा को
िलखकर इस िवधा को िवÖतृत िकया है ।
११.४.६ समकालीन युग (२००० से अब तक):
समकालीन युग म¤ िवमशª कì धारा का ÿवाह हòआ िजसम¤ ľी िवमशª, दिलत िवमशª,
आिदवासी िवमशª तथा िकÆनर िवमशª के माÅयम से सािहÂय कार दिलत ÓयिĉयŌ के दुःख -
ददª तथा उनके जीवन को अिभयĉ िकया । िहंदी सािहÂय म¤ आÂमकथा िवधा के माÅयम
से दिलत, िकÆनर, आिदवासी, िľयŌ के Öवयं कì आपबीती िलख कर समाज के काले प±
को बाहर लाया िजसम¤ ľी िवमशª कì लेिखकाओं ने समाज कì Łढीवादी परÌपराओं का
उÐलेख अपने आÂमकथा के माÅयम से िकया है । दÖतक िजÆदगी कì १९९० तथा मोड़
िजÆदगी कì दो खÁडŌ म¤ ÿितभा अúवाल कì आÂमकथा सबसे पहले आती है ।ÿिसĦ कथा
लेिखका कृÕणाअिµनहोýी को उनकì आÂमकथा 'लगता नहé िदल मेरा' से िवशेष ´याित
ÿाĮ हòई है । इसम¤ उÆहŌने अपने जीवन के अ¸छे - बुरे अनुभवŌ को दो - टूक शÊदŌ म¤ साहस
के साथ Óयĉ िकया है । अपनी आÂमकथा के िवषय म¤ वे Öवयं कहती ह§- "म§ने अपनी आप
बीती को िबÐकुल तटÖथ मुþा के साथ अिभÓयĉ िकया है ..... मेरे मरघट, मधुवन नहé बने
परÆतु यहाँ जलती भावनाओं के शव िजÆदगी कì ओर खéच ले जाते ह§ और एक ÿij है - हम
³यŌ नहé मानव बने रह सकते ? ³यŌ नहé Öवयं मानव रहकर अÆय मानव अिÖमता
Öवीकार कर लेते ह§ ?" हम¤ लगता है, जबतक मनुÕय के भीतर का पशु जीिवत है, यह ÿij
इसी ÿकार पूछा जाता रहेगा । उसके बाद मैýेयी पुÕपा कì दो खÁडŌ म¤ कÖतूरी कुÁडल बसै
(२००२ ई.), गुिड़या भीतर गुिड़या (२००८ ई.), मैýेयी पुÕपा कì आÂमकथा कÖतूरी
कुÁडत बसै उतनी ही सजªनाÂमक है, िजतना कोई उपÆयास होता है, या हो सकता है ।
मैýेयी कì माता का नाम कÖतूरी था । वे अपने समय कì एक ऐसी जीवंत मिहला थé, munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
152 िजÆहŌने अपने बल बूते पर अपना राÖता बनाया था । रमिणका गुĮ कì दो खÁडŌ म¤ हादसे
(२००५ ई.) आप हòदरी (२०१५ ई.), मÆनू भÁडारी कì ‘एक कहानी यह भी (२००७ ई.),
ÿभा खेतान कì ‘अÆया से अनÆया’ (२००७ ई), चÆþिकरण सौनरे³सा कì िपजरे कì मैना
(२००८ ई.), कृÕणा अिµनहोýी कì और - और औरत (२०१० ई.), डॉ. सुषम बेदी कì
आरोह-अवरोह (२०१५ ई.), डॉ. िनमªला जैन कì जमाने म¤ हम (२०१५ ई.), आिद
आÂमकथाएँ ÿकािशत हòई ह§ । ‘जमाने म¤ हम’ इस आÂमकथा के बहाने िनमªला जैन ने अपने
बचपन कì ÖमृितयŌ को एक बार पुनः जीिवत िकया है । साथ ही िदÐली िवĵिवīालय के
िहÆदी िवभाग कì उठा - पटक कì अÆदłनी कहानी को भी िचिýत िकया है ।
दिलत िवमशª म¤ दिलत लेखकŌ ने भी आÂमकथा के माÅयम से समाज के सामािजक
ÓयवÖथा के काले Öवłप को सम± लाया है । िजसम¤ ÿथम दिलत आÂमकथा मोहन
नैिमशायराण जी कì जो दो भागŌ म¤ ‘अपने अपने िपंजरे भाग (१९९५ ई.) तथा दूसरा भाग
२००० ई. ÿकािशत है । इसके उपराÆत अनेक दिलत सािहÂयकारŌ ने आÂमकथा िलखा है
जो इस ÿकार है - ओमÿकाश वाÐमीिक कì जूठन (१९९७ ई.) जूठन भाग दो (२०१५
ई.), डॉ. सूरजपाल चौहान कì ितरÖकृत (२००२ ई.) तथा संतĮ (२००६ ई.), łप
नारायण सोनकर कì नागफनी (२००७ ई)., Ôयौराज िसंह बेचैन कì मेरा बचपन मेरे कÆधŌ
पर (२००९ ई.), डॉ. धमªवीर कì ‘मेरी पÂनी और भेिड़या’ (२०१० ई.), डॉ. तुलसीराम
कì ‘मुदªिहया’, तथा ‘मिणकिणªका’ (२०१४ ई.), डॉ. तुलसीराम कì दो खÁडŌ म¤ िलखी गयी
आÂमकथा 'मुदªिहया' (२०१० ई.) तथा मिणकिणªका िजसम¤ केवल दिलत ही नहé अिपतु
गाँव का सÌपूणª लोकजीवन ही केÆþ म¤ है । १८४ पृķŌ कì इस आÂमकथा म¤ आरिÌभक
पढ़ाई से लेकर मैिůक तक कì पढ़ाई का िचýण है । परÆतु यहाँ लेखक केÆþ म¤ नहé है ।
केÆþ म¤ है दिलत जीवन, अंध ®Ħाएँ, कमªकाÁड, भूतŌ के ÿित भय, सवणŎ का जीवन,
दिलतŌ का संघषª, दåरþता, रोजी - रोटी कì तलाश, Âयोहार, पूजा - पाठ, लोक - गीत,
दिलत बाĻ संघषª आिद का उÐलेख िकया है । तथा सुशीला टाकभौरे कì आÂमकथा
िशकंजे का ददª (२०१२ ई .) कì आÂमकथाओं ने िहÆदी - जगत् का Åयान आकृĶ िकया है।
अÆय समका समय के ÿिसĦ सािहÂयकारŌ म¤ रवीÆþ कािलया कì गािलब छूटी शराब’
२०००, भगवतीचरण वमाª कì ‘किह न जायका किहए’ (२००१ ई.), राजेÆþ यादव कì
‘मुड-मुड़ कर देखता हóँ’ (२००१ ई.) अिखलेश कì वह जो यथाथª (२००१ ई.), भीÕम
साहनी कì ‘आज के अतीत’ (२००३ ई.), अशोक वाजपेयी कì पावभर जीरे म¤ (२००३
ई.), Öवदेश दीपक कì ‘म§ने मांडू नहé देखा’ (२००३ ई.), रवीÆþनाथ Âयागी कì ‘वसÆत से
पतझड़ तक’ (२००५ ई.), राजेÆþ यादव का आÂमकÃय ‘देहåर भई िवदेस (२००५ ई.)
[सं.], िवÕणु ÿभाकर कì पंखहीन खÁड, मुĉ गगन म¤ खÁड और पंछी उड़ गया (२००४
ई.), एक अÆतहीन तलाश (२००७ ई.) रामकमल राय, भूली नहé जो याद¤ (२००७ ई.)
दीनानाथ मÐहोýा, सागर के इस पार से उस पार तक (२००८ ई.) कृÕण िबहारी, मेरी
आÂमकथा कालजयी संघषªगाथा (२००७ ई.) डॉ. Ĭाåरका ÿसाद स³सेना, गुजरा कहाँ
कहाँ से (२००७ ई.), कहना जłरी था (२००९ ई.), म§ था और मेरा आकाश (२०११ ई.)
कÆहैयालाल नंदन, यŌ ही िजया (२००७ ई.) डॉ. देवेश ठाकुर, जोिखम (२००९ ई.)
Ńदयेश (१९३०-२०१६ ई.), मेरे िदन मेरे वषª (२००९ ई.) एकाÆत ®ीवाÖतव, पानी िबच
मीन Èयासी (२०१० ई.), और कहाँ तक कह¤ युगŌ कì बात (२०१२ ई.) िमिथलेĵर, माटी
पंख और आकाश (२०१२ ई.) ²ानेĵर मूले, आलोचक का आकाश (२०१२ ई.) मधुरेश, munotes.in

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आÂमकथा
153 कमब´त िनÆदर (२०१३ ई.), डॉ. नरेÆþ मोहन, िकतनी धूप म¤ िकतनी बार (२०१३ ई.),
डॉ. महीप िसंह मेरा मुझम¤ कुछ नहé (२०१३ ई.), रमेश उपाÅयाय, आÂम Öवीकृित
(२०१४ ई.) नरेÆþ कोहली, डगर डगर पर मगर (२०१४ ई.) हरदशªन सहगल, अिÖत और
भवित (२०१४ ई.) डॉ. िवĵनाथ ÿसाद ितवारी, जाग चेत कुछ करौ उपाई (२०१५ ई.)
िमिथलेĵर, जीवन ÿवाह म¤ बहते हòए (२०१५ ई.) डॉ. लालबहादुर वमाª, ³या हाल सुनावा
(२०१५ ई.) डॉ. नरेÆþ मोहन, मेरी सािहिÂयक याýा (२०१६ ई.) भीÕम साहनी, िजÆदगी
का ³या िकया (२०१७ ई.) धीरेÆþ अÖथाना कì आÂमकथाय¤ िवशेष łप से चिचªत हòई ह§ ।
११.५ सारांश िनÕकषªतः कहा जा सकता है कì सािहÂय के माÅयम से Óयिĉ अपने काल तथा पåरवेश म¤
घटी घटनाओं को मानवीय धरातल पर अिभÓयĉ करता है िजसम¤ आÂमकथा िवधा कì
भूिमका बहòत महÂवपूणª है यह आिदकाल म¤ िवÖतृत łप से भले ही िवकिसत नहé हòई
लेिखन आÂमचåरत िलखने का चलन उसी काल म¤ हो गया था और उसका िवकार
आधुिनक काल म¤ हòआ िजसम¤ Óयिĉ अपने से जुडी तमाम घटनाओं को पाठकŌ के सामने
अिभÓयĉ िकया है । वतªमान समय म¤ आÂमकथा Öवतंý िवधा के łप म¤ िवकिसत हो चुकì
है । िवमशª के ±ेý म¤ िविवध सािहÂय करŌ ने आÂमकथा के िलख कर समाज म¤ पåरवतªन
और समानता लाने कì øांित के łप म¤ सामने आई। िजसम¤ सामाज के उन प±Ō को सामने
रखा जो आज तक पद¦ म¤ था । इस ÿकार आÂमकथा एक िवकिसत िवधा के łप म¤ हमारे
सम± है िजसम¤ सािहÂयकारŌ, कृितकारŌ, ऐितहािसक पुłषŌ कì आÂमकथा के माÅयम से
पाठकŌ के øम±ेý ÿेरणा ®ोत बनकर उपिÖथत हòई है ।
११.६ िदघō°री ÿij १. आÂमकथा का पåरभाषा एवं ÖवŁप िलिखए
२. आÂमकथा का उĥभव एवं िवकास याýा िलिखए ।
११.७ वैकिÐपक ÿij १) सवªÿथम आÂमकथा िकसकì मानी जाती है ?
१. अधªकथा
२. आपबीती
३. मेरी जीवन याýा
४. मेरी आÂमकथा

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
154 २) भारतेÆदु हåरIJंþ कì आÂमकथा का नाम ³या है ?
१. आपबीती
२. मेरी जीवन याýा
३. मेरी आÂमकथा
४. 'कुछ आपबीती, कुछ जगबीती
३) जूठन आÂमकथा कì रचनाकार कì रचना है ?
१. मोहन दास नैिमशराय
२. ओम ÿकाश वाÐमीिक
३. तुलसीराम
४. सूरजपाल चौहान
४) आÂमकथा का िवकास िकस काल म¤ होता है
१. आिदकाल
२. भिĉकाल
३. रीितकाल
४. आधुिनक काल
५) आपहòदारी िकसकì आÂमकथा है ?
१. रमिणका गुĮा
२. कृÕणा अिµनहोýी
३. मÆनू भंडारी
४. इनम¤ से कोई नहé


*****
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155 १२
जीवनी
इकाई कì łपरेखा
१२.० उĥेÔय
१२.१ ÿÖतावना
१२.२ जीवनी कì पåरभाषा एवं ÖवŁप
१२.३ जीवनी के भेद
१२.४ जीवनी का उĩव एवं िवकास
१२.४.१ भारतेÆदु युग
१२.४.२ िĬवेदी युग
१२.४.३ छायावाद युग
१२.४.४ छायावादो°र काल
१२.४.५ समकालीन युग २००० से अब तक
१२.५ सारांश
१२.६ िदघō°री ÿij
१२.७ वैकिÐपक ÿij
१२.० उĥेÔय इस इकाई म¤ हम जीवनी िवधा का अÅययन कर¤गे। इसके अंतगªत जीवनी कì अथª, पåरभाषा
व समयकाल के अनुसार जीवनी के िवकास øम को समझ¤गे साथ ही ÿमुख जीवनी के
िवकास øम को भी अÅययन कर¤गे।
१२.१ ÿÖतावना िहंदी सािहÂय म¤ जीवनी एक महÂवपूणª िवधा है, िजसम¤ िकसी महान् Óयिĉ के जीवन कì
घटनाओं, उसके कायªकलापŌ तथा अÆय गुणŌ का आÂमीयता, औपचाåरकता तथा गÌभीरता
से ÓयविÖथत łप म¤ वणªन िकया जाता है । इसम¤ Óयिĉ िवशेष के जीवन कì सूàम से सूàम
घटनाओं का वणªन िकया जाता है जीवनी Ĭारा पाठक उसके अÆतरंग जीवन से हे अवगत
नहé होता, अिपतु तादाÂÌय Öथािपत कर लेता है । जीवनीकार जीवनी म¤ ÿाय: उन ÖथलŌ
पर िवशेष बल देता है, िजनके Ĭारा पाठक ÿेरणा úहण कर अपने जीवन को ºयादा
उÆनितशील बनाने म¤ समथª हो सके । जीवनी का ÿामािणक होना आवÔयक है । िहÆदी के
जीवनी सािहÂय को समृĦ बनाने म¤ डॉ. गुलाबराय, रामनाथ सुमन, डॉ. रामिवलास शमाª,
िवÕणु ÿभाकर, अमृतराय, सुमंगल ÿकाश, राही मासूम रजा, ओंकार शरद, डॉ. शािÆत
जोशी, भगवती ÿसाद िसंह आिद ने उÐलेखनीय कायª िकए ह§ । िहंदी सािहÂय म¤ आधुिनक munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
156 काल म¤ िहंदी कì गī िवधा के łप म¤ जीवनी का िवकास िवÖतृत łप म¤ हòआ है। िजसम¤
महान राजनेताओं, वै²ािनकŌ, दाशªिनकŌ, सािहÂयकारŌ आिद कì जीवनी Ĭारा पाठकŌ का
जीवन ÿेåरत करता रहा है ।
१२.२ जीवनी कì पåरभाषाएँ एवं ÖवŁप िविवध सािहÂयकारŌ के अनुसार जीवनी को पåरभािषत िनÌनिलिखत łप से िकया है ।
पं. ®ीराम शमाª के अनुसार, “जीवनी िकसी Óयिĉ के जीवन का शÊद - िचý है और इसिलए
जीवनी लेख कì लेखनी तािलका से अंिकत िचý यथाथª होने चािहए । उसे िनÕप± łप से
Æयायाधीश कì भाँित जीवन- नायक के जीवन पर सÌमित देनी चािहए हाँ लेखन कला
कौशल इसी म¤ है जीवनी िचý म¤ रंग आवÔयकता से अिधक गहरा या फìका न हो और
चåरý िवĴेषण के आधे भाग म¤ जीवनी नायक कì घटनाओं अथवा दुघªटनाओं सÌबÆधी
सामúी होनी चािहए न िक अपनी मनोभावना माý ।”
बाबू गुलाबराय के अनुसार, “जीवनी घटनाओं का अंकन नहé, वरन् िचýण है । वह सािहÂय
कì िवधा है और उसम¤ सािहÂय एवं काÓय के सभी गुण ह§ । वह एक मनुÕय के अÆतर और
बाĻ Öवłप का कलाÂमक िनłपण है । िजस ÿकार िचýकार अपने िवषय का एक ऐसा प±
पहचान लेता है, जो उसके िविभÆन प±Ō म¤ ओत - ÿोत रहता है और िजसम¤ नायक कì
सभी कलाय¤ और छटाएँ समिÆवत हो जाती ह§ । उसी ÿकार जीवनीकार अपने नायक के
ÓयिĉÂव कì कुंजी समझकर उसके आलोक म¤ सभी घटनाओं का िचýण करता है ।”
®ी रामनाथ 'सुमन' के अनुसार, "जीवन कì घटनाओं के िववरण का नाम जीवनी नहé है ।
लेखक जहाँ नायक के जीवन म¤ िछपे उसके िवकास के उसके ÓयिĉÂव के रहÖय को,
उसकì मु´य जीवन - धारा को खोलकर पाठकŌ के सामने रख देता है । वहाँ जीवनी,
लेखन, कला साथªक होती है । ऊपर से िदखायी पड़ने वाले łप को िदखाकर ही जीवनी
लेखन कला सÆतुĶ नहé होती है वह उस आवरण को भेदकर अÆतःÖवłप और आÆतåरक
सÂय को ÿÂय± करती है ।"
१२.३ जीवनी के भेद जीवनी के मु´य łप से दो ÿकार हो सकते ह§ । एक तो ऐसी जीविनयाँ , िजनम¤ लेखक
चåरý नायक के गुण व दोषŌ का ºयŌ का ÂयŌ वणªन कर दे तथा पाठक अपनी Łिच के
अनुसार उसका िनÕकषª िनकाल ले । दूसरी वे जीविनयाँ , िजÆह¤ लेखक एक िविशĶ
ŀिĶकोण से िलखता है । ऐसी जीविनयाँ अिधक माýा म¤ िलखी गयी ह§ एवं अभी भी िलखी
जा रही ह§ । ÿथम ÿकार कì जीविनयाँ बहòत ही कम िदखाई देती ह§ । बौसवेल Ĭारा िलिखत
डॉ . जॉÆसन कì जीवनी ÿथम ÿकार कì जीविनयŌ का एक अ¸छा उदाहरण है ।
िवषय कì ŀिĶ से जीवनी के मु´य łप से पाँच भेद कर सकते ह§ ।
munotes.in

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जीवनी
157 १. सÆत चåरý:
इस कोिट म¤ सÆत महाÂमाओं के जीवन कì िविशĶ घटनाओं को आधार मानकर िलखे गये
úÆथ आते ह§ । इनम¤ गोपाल शमाª शाľी Ĭारा िलिखत 'दयानंद- िदिµवजय', िचÌमन लाल
वैÔय Ĭारा िलिखत Öवामी दयानÆद', मÆमथनाम गुĮ Ĭारा िलिखत 'गुŁनाथ', सुशीला नायर
Ĭारा िलिखत 'बापू के कारावास कì कहानी' एवं बलदेव उपाÅयाय Ĭारा िलिखत '®ी
शंकराचायª' इÂयािद उÐलेखनीय ह§ । इनके अलावा Öवामी रामकृÕण परमहंस, Öवामी
िववेकानÆद, Öवामी रामतीथª इÂयािद महाÂमाओं कì जीविनयŌ को ÿितपािदत िकया गया है ।
२. ऐितहािसक चåरý:
ऐितहािसक पुŁषŌ कì जीविनयŌ को िलखने वाले सािहÂयकारŌ म¤ राधाकृÕण दास, जगमोहन
वमाª, देवी ÿसाद मुंिसफ, काितªक ÿसाद खýी एवं सÌपूणाªनÆद के नाम उÐलेखनीय ह§ । देवी
ÿसाद मुंिसफ ने 'मानिसंह', 'मंगलदेव', 'उदयिसंह महाराणा', 'जसवÆत िसंह' व 'ÿतापिसंह
महाराणा' नामक úÆथŌ के Ĭारा कई इितहास ÿिसĦ ÓयिĉयŌ कì जीविनयाँ Óयĉ कì ह§ ।
राधाकृÕण काितªक ÿसाद खýी व जगमोहन वमाª कì कृितयŌ म¤ øमश: बाÈपा महाराज
िवøमािदÂय एवं बुĦदेव महÂवपूणª ह§ । सÌपूणाªनÆद ने हषªवधªन, अशोक व छýसाल जैसे
इितहास ÿिसĦ सăाटŌ कì जीविनयाँ Óयĉ कì ह§ ।
३. सािहिÂयक चåरý:
सािहÂयकारŌ कì जीविनयŌ म¤ मदनगोपाल कì कलम का मजदूर, डॉ. रामिवलास शमाª कì -
िनराला कì सािहÂय साधना, अमृतराय कì कलम का िसपाही, िवÕणु ÿभाकर कì - आवारा
मसीहा तथा भगवती ÿसाद कì - मनीषी कì लोक याýा इÂयािद उÐलेखनीय ह§ ।
४. राजनीितक चåरý:
भारतीय राजनीित को करने वाले महापुŁषŌ म¤ लाला लाजपतराय, सुभाषचÆþ बोस, पं.
जवाहर लाल नेहł, इिÆदरा गाँधी, जयÿकाश नारायण, मदनमोहन मालवीय, डॉ. राजेÆþ
ÿसाद, दादाभाई नौरोजी, चÆþशेखर आजाद तथा महाÂमा गाँधी इÂयािद के नाम
उÐलेखनीय ह§ । आधुिनक काल म¤ कई सािहÂयकारŌ ने इन महापुŁषŌ कì जीविनयाँ
ÿितपािदत कì ह§ ।
५. िवदेशी चåरý:
िवदेशी महापुŁष सÌबÆधी जीविनयŌ म¤ रमाशंकर ÓयाÖकृत- नेपोिलयन बोनापाटª,
िशवनारायण वेदीकृत - कोलÌबस, देवीÿसाद कृत- महाÂमा सुकरात, सÂयĄतकृत- अāाहम
िलंकन, सÂयभĉ कृत- कालª मा³सª तथा राहòल सांकृÂयायन कृत - माओ Âसे तुंग इÂयािद ।
जीवनी के लेखकŌ म¤ राहòल सांकृÂयायन का िवशेष Öथान है । उनकì जीविनयŌ म¤ महाÂमा
बुĦ, माओ Âसे तुंग, लेिनन, सरदार पृÃवी िसंह, वीरचÆþ िसंह गढ़वाली, Öटािलन एक
जीवनी कालªमा³सª, भारत के नए नेता इÂयािद ÿमुख ह§ । इसी परÌपरा म¤ िवĵनाथ
वैशÌपायन के माÅयम से रिचत øािÆतकारी चÆþशेखर आजाद कì जीवनी व वीर िसÆधु
कृत सरदार भगत िसंह पर शोधपूणª जीवनी िवशेषतः वणªनीय ह§ । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
158 १२.४ जीवनी का उĩव एवं िवकास जीवनी सािहÂय भारतवषª के िचÆतक, मनीषी किव और कलाकार ÿाकृतजन गुणगान से
िवरत रहना ®ेयÖकर मानते थे । जीवन के ÿित आÅयािÂमक ŀिĶकोण कì ÿधानता के
कारण वे उन तßवŌ कì खोज को महßव देते थे, जो शाĵत और अमर हŌ । इसिलए इस देश
म¤ अवतारी पुŁषŌ और महामानवŌ कì आदशêकृत गाथाएँ तो िलखी गयé, िकÆतु
जनसाधारण का जीवन वृ° उपेि±त रहा मÅययुग म¤ भĉŌ कì परÌपरा म¤ 'भĉमाल' िलखे
गये, िकÆतु इÆह¤ जीवनी सािहÂय के अÆतगªत समािवĶ नहé कर सकते । संतŌ और भĉŌ के
ÿित ÿगाढ़ ®Ħा होने के कारण उनके जीवन - वृ° के इदª - िगदª अनेक अलौिकक घटनाएँ
संघिटत हो गयी ह§ । आधुिनक युग वै²ािनक और बौिĦक जीवन - ŀिĶ के िवकास के साथ
ही जीवनी सािहÂय िलखने कì परÌपरा पÐलिवत हòई और अब तो जीवनी - सािहÂय िहÆदी
- गī कì एक पृथक् िवधा के łप म¤ माÆय है ।
१२.४.१ भारतेÆदु युग:
जीवनी सािहÂय आधुिनक युग कì अÆय अनेक िवधाओं के समान जीवनी- सािहÂय का
आरंभ भी भारत¤दू युग म¤ ही हòआ । Öवयं भारत¤दु हåरIJंþ ने िवøम, कािलदास, रामानुज,
जयदेव, सूरदास, शंकराचायª, वÐलभाचायª, मुगल बादशाहŌ, मुसलमान महापुŁषŌ तथा लॉडª
मेयो, åरपन ÿभृित अंúेज शासकŌ से संबĦ अनेक महßवपूणª जीविनयाँ िलखŌ, जो
'चåरतावली', 'बादशाहदपªण', 'उदयपुरोदय' और 'बूंदी का राजवंश' नामक úंथŌ म¤ संकिलत
ह§ । िवषयानुकूल तथा भावानुकूल भाषा - शैली के ÿयोग Ĭारा Óयिĉ िवशेष के जीवनवृ° का
सशĉ अंकन उनके जीवनी सािहÂय कì ÿमुख िवशेषता है । भारत¤दु - युग के जीवनी
लेखकŌ म¤ काितªकÿसाद खýी ने अिहÐयाबाई का जीवनचåरý' (१८८७), 'छýपित िशवाजी
का जीवनचåरý' (१८९०) और 'मीराबाई का जीवनचåरý' (१८९३), नाÌनी जीविनयाँ
िलखé । काशीनाथ खýी ने िहंदुÖतान कì अनेक रािनयŌ का जीवन चåरý' (१८७९) और
'भारतवषª कì िव´यात िľयŌ के जीवनचåरý' (१८८३) कì रचना कर जीवनी सािहÂय कì
®ीवृिĦ कì रमाशंकर Óयास कì उÐलेखनीय कृित 'नेपोिलयन बोनापाटª का जीवनचåरý'
(१८८३) है । इस युग के सवªÿिसĦ जीवनी लेखक देवीÿसाद मुंिसफ़ है । उÆहŌने ' महाराज
मानिसंह क¸छवाल वाले अमीर का जीवनचåरý' (१८८९), 'राजा मालदेव का जीवनचåरý'
(१८८९), 'उदयिसंह महाराजा' (१८९३), 'अकबरनामा' (१८९३), 'राणा भीम' (१९९३),
'जसवंत िसंह (१८९६) आिद ऐितहािसक जीविनयाँ िलख कर जीवनी सािहÂय को समृĦ
िकया राधाकृÕणदास ने 'आयªचåरतामृत बाÈपा रावल' (१८८४) के अितåरĉ '®ीनागरीदास
जी का जीवनचåरý' (१८९४), 'किववर िवहारीलाल' (१८९५), 'सूरदास' (१९००) आिद
सािहÂयकारŌ कì जीविनयाँ िलखé । गोपाल शमाª शाľी, ÿतापनारायण िम®, बालमुकुंद
गुĮ, गोकुलनाथ शमाª, बलभþ िम® तथा अंिबकादत Óयास ने øमशः 'दयानंद- िदिµवजय'
(१८८१).. 'आयªचåरतामृत' (१८८४), 'हåरदास गुरमानी' (१८९६), '®ी देवीसहायचåरý'
(१८९७), 'Öवामी दयानंद महाराज का जीवनचåरý' (१८९७) और Öवामी भाÖकरानंद से
संबĦ 'Öवामी चåरतामृत' (१८९९) नामक जीवनीúंथ िलखे । इनम¤ से 'आयªचåरतामृत'
बंगला से अनूिदत है । िहंदी - जीवनी सािहÂय के िवकास म¤ िवदेशी िमशनåरयŌ ने भी पयाªĮ
योग िदया 'िव³टोåरया महारानी का वृ°ांत' (१८९६), 'िसकंदर महान का वृ°ांत' (१८९९)
आिद पुÖतक¤ ईसाई िमशनåरयŌ के ÿयÂनÖवłप ही ÿकािशत हòई । िवदेशी महापुŁषŌ कì munotes.in

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जीवनी
159 जीविनयŌ म¤ रमाशंकर Óयास कृत 'नेपोिलयन बोनापाटª' (१८८३) भी महßवपूणª है । िकंतु
भारत¤दुयुगीन जीवनी सािहÂय का समú łपेण मूÐयांकन करने पर यह कहा जा सकता है
िक पåरमाण कì ŀिĶ से अÂयÐप न होने पर भी इस युग के जीवनी - सािहÂय म¤ ÿायः न तो
पåरमािजªत एवं ÿितिनिķत भाषा ÿयोग पåरलि±त होता है और न िच°ाकषªक शैली ही
िमलती है । वÖतुतः इस युग को जीवनी सािहÂय का बीजवपनकाल कहना ही उिचत होगा
१२.४.२ िĬवेदी युग:
जीवनी सािहÂय कì ŀिĶ से भारतेÆदु काल समृĦ काल माना जाता है । भारतेÆदु हåरIJंþ ने
Öवयं जीवनी लेखन के ±ेý म¤ रचनाकारŌ को जीवनी लेखन म¤ ÿेåरत िकया । उसी ÿकार
महावीरÿसाद िĬवेदी ने भी अपने काल म¤ अनेक रचनाकारŌ को ÿेåरत िकया इस गī िवधा
लेखन म¤ łिच ली िĬवेदी Ĭारा रिचत जीविनयाँ ‘ÿाचीन पंिडत और किव’ १९१८, ‘सुकिव-
संकìतªन १९२४, चåरत चचाª १९२९ आिद úंथो म¤ संकिलत है । उनके अितåरĉ िजन
अनेक लेखकŌ ने जीवनी सािहÂय को समृĦ िकया, उन सबकì रचनाओं का अनुशीलन
करने पर यह कहा जा सकता है िक इस काल म¤ मु´यत: पांच ÿकार का जीवनी सािहÂय
िलखा गया- (क) आयªसमाज के ÿवतªक ऋिष दयानंद तथा अÆय महापुŁषŌ से संबंिधत
जीविनयाँ (ख) राÕůीय महापुŁषŌ से संबंिधत जीविनयाँ, (ग) ऐितहािसक महापुŁषŌ से
संबंिधत जीविनयाँ, (घ) िवदेश के महापुŁषŌ से संबंिधत जीविनयाँ, (ङ) मिहलाओं
जीविनयाँ । इनम¤ से महिषª दयानंद का जीवनचåरý अिधक पåरमाण म¤ िलखा गया, कारण
यह था िक इस युग म¤ आयªसमाज Ĭारा िकये गये कायª अपनी पराकाķा पर थे । सवª®ी
रामिवलास सारदा, दयाराम, िचÌमनलाल वैÔय और अिखलानंद शमाª ने िविभÆन ŀिĶकोणŌ
से Öवामी दयानंद के जीवन के िविवध प±Ō को उभारते हòए øमश: ‘आयª धम¦दु जीवन महिषª’
(१९०४), 'Öवामी दयानंद' (१९०७) और ‘दयानंद िदिµवजय’। इन जीविनयŌ कì सबसे बड़ी
सीमा यह है िक कर िलखे जाने के फलÖवłप ये ÿचाराÂमक (१९०१), 'दयानंद (१९१०)
शीषªक के ÿचार - ÿसार चåरतामृत' कृितयŌ कì रचना को ŀिĶपथ म¤ रख अिधक आयªधमª
हो गयी ह§ । इस वगª कì एक अÆय उÐलेखनीय कृित माधवÿसाद िम® Ĭारा िलिखत
'िवशुĦानंद चåरतावली' है, िजसम¤ महाÂमा िवशुĦानंद का जीवनचåरý िदया गया है ।
आलो¸य युग राÕůीय चेतना का युग था । इस काल म¤ अंúेज़ी शासन को नĶ करने के िलए
जनता म¤ अपूवª संगठन - शिĉ पैदा हो गयी थी । फलÖवłप कुछ लेखकŌ ने उन, महापुŁषŌ
कì जीविनयाँ भी िलखé, जो युग कì िवचारधारा का नेतृÂव कर रहे थे । महादेव भĘ,
पारसनाथ िýपाठी मुकुंदीलाल वमाª, संपूणाªनंद, नंदकुमार देव शमाª, बþीÿसाद गुĮ,
बृजिबहारी शु³ल, शीतलाचरण वाजपेयी मातासेवक आिद सािहÂयकारŌ ने øमशः 'लाजपत
मिहमा' (१९०७), तपोिनķ महाÂमा अरिवंद घोष' (१९०९), 'कमªवीर गांधी' (१९१३),
'धमªवीर गांधी' (१९१४), 'महाÂमा गोखले' (१९१४), 'दादाभाई नौरोजी' (१९१४),
'मदनमोहन मालवीय (१९१६), 'रमेशचंþ द°' (१९१७), 'लोकमाÆय ितलक का चåरý
(१९१८) आिद रचनाएं िलखé । अपने युग के कमªवीर महापुŁषŌ के ÿेरणाÿद कायŎ का
िनłपण करने वाली इन जीविनयŌ का मूल उĥेÔय तयुगीन जनता के मन म¤ देशÿेम कì
भावना जाúत करना था । राÕůीय चेतना को बल ÿदान करने म¤ पूवªवतê ÿिसĦ ऐितहािसक
ÓयिĉयŌ कì जीवन - गाथाएं भी सहायक िसĦ होती ह§ । यही कारण है िक इस युग के
लेखकŌ ने ऐितहािसक जीविनयाँ पयाªĮ माýा म¤ िलखी ह§ । इस ŀिĶ से काितªकÿसाद,
बलदेवÿसाद िम®, देवीÿसाद, ºवालाद° शमाª, आनंदिकशोर मेहता रघुनंदनÿसाद िम®, munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
160 संपूणाªनंद और लàमीधर वाजपेयी Ĭारा øमशः िलिखत 'छýपित िशवाजी का जीवनचåरý'
(१९०१), 'पृÃवीराज चौहान' (१९०२), 'महाराणा ÿतापिसंह' (१९०३), 'िस³खŌ के दस
गुŁ' (१९०९), 'गुŁ गोिवंदिसंह जी' (१९१४), 'िशवाजी और मराठा जाित' (१९१४),
'महाराज छýसाल (१९१६) तथा 'छýपित िशवाजी' (१९१७) शीषªक कृितयाँ िवशेषतः
पठनीय ह§ । यहाँ यह उÐलेखनीय है िक अपने देश कì महान िवभूितयŌ के जीवनवृ° ही
नहé, िवदेशी महापुŁषŌ के जीवनचåरý भी पयाªĮ ÿेरणाÿद होते ह§ । िĬवेदी - युग के लेखक
इस तÃय से अपåरिचत न थे । उÆहŌने िवदेश के अनेक महामानवŌ के जीवनवृ° िलखे ह§,
िजÆहŌने Âयाग, बिलदान तथा कतªÓय - भावना से ÿेåरत हो कर अपने - अपने राÕůŌ के
उÂथान के िलए अनथक ÿयÂन िकये । उदाहरणाथª, िसĦेĵर वमाª, उमापित द° शमाª,
नाथूराम ÿेमी, āĺानंद, लàमीधर वाजपेयी, कृÕणÿसाद िसंह अखौरी, इंþ वेदालंकार,
Ĭारकाÿसाद शमाª और चंþशेखर पाठक Ĭारा øमश: रिचत 'गैरीबाÐडी' (१९०१),
'नेपोिलयन बोनापाटª कì' (१९०५), 'जान Öटुअटª िमल' (१९१२), 'जमªनी के िवधाता'
(१९१४), 'गेåरफ मैिजनी' (१९१४), 'नेलसन' (१९१४), 'िÿंस िबÖमाकª' (१९१५),
'महाÂमा साकूटीज़' (१९१५) एवं 'नेपोिलयन बोनापाटª' (१९१६), शीषªक कृितयाँ
अवलोकनीय ह§ । िवदेशी महापुŁषŌ से संबĦ रचनाओं म¤ नेपोिलयन बोनापाटª संबंधी
जीविनयाँ ही सवाªिधक माýा म¤ िलखी गयी ह§ । इनके अितåरĉ राजÖथान के इितहास
लेखन म¤ महßवपूणª योग देने वाले कनªल जेÌस टॉड के संबंध म¤ एक अÆय महßवपूणª जीवनी
गौरीशंकर ओझा ने 'कनªल टॉड' (१९०२) शीषªक से िलखी आलो¸य युग म¤ देश - िवदेश
कì महान मिहलाओं से संबंिधत जीविनयाँ भी पयाªĮ माýा म¤ िलखी गयé । गंगाÿसाद गुĮ,
परमानंद, हनुमंत िसंह, पÆनालाल, यशोदादेवी, Ĭारकाÿसाद चतुव¥दी देव¤þÿसाद जªन,
लिलताÿसाद शमाª, रामजीलाल वमाª, लालताÿसाद वमाª, सूयªनारायण िýपाठी, रामानंद
िĬवेदी तथा द°ाýेय बलवंत पारस ने øमशः 'रानी भवानी' (१९०४), 'पितĄता िľयŌ के
जीवनचåरý' (१९०४), 'रमणीय रÂनमाला' (१९०७); 'वीर पÂनी संयोिगता' (१९१२),
'आदशª मिहलाएँ' (१९१७), 'ऐितहािसक िľयां' (१९१२), 'िवदुषी िľयां' - भाग १, २
(१९१२), 'भारतीय िवदुषी' (१९१२), 'भारतवषª कì वीर माताएं' (१९१३), 'रानी दुगाªवती'
(१९१४). "नूरजहां (१९१२), 'झांसी कì रानी लàमीबाई (१९१८) शीषªक जीविनयŌ कì
रचना कर इस िदशा म¤ ÿशंसनीय योग िदया । जैसा िक इस िववरण से ÖपĶ है, इस युग म¤
लेखकŌ का झुकाव भारतीय मिहलाओं के गुण - Öतवन कì ओर ही अिधक रहा । समúतः
यह कहा जा सकता है िक िĬवेदीयुगीन जीवनी सािहÂय पयाªĮ समृĦ एवं वैिवÅयपूणª है ।
१२.४.३ छायावाद युग:
जीवनी सािहÂय छायावाद युग म¤ जीवनी-लेखन कì िदशा म¤ पयाªĮ कायª हòआ । तÂकालीन
राÕůीय आंदोलन के ÿभावÖवłप Öवभावतः लेखकŌ कì सवाªिधक अिभŁिच राÕůीय
नेताओं से संबंिधत जीवनी िलखने कì ओर रही । इसके साथ ही इितहासÿिसĦ महापुŁषŌ
और महान मिहलाओं के जीवन वृ° ÿÖतुत करने को ओर भी Åयान िदया गया । राÕůीय
नेताओं के संदभª म¤ नवजािदकलाल ®ीवाÖतव, ईĵरीÿसाद शमाª, रामदयाल ितवारी,
रामनरेश िýपाठी, नरो°मदास Óयास, डॉ. राज¤þÿसाद, नंदकुमारदेव शमाª, ÓयिथतŃदय,
गणेशशंकर िवīाथê, इंþ वाचÖपित, जगपित चतुव¥दी तथा मÆमथनाथ गुĮ ने øमशः
'देशभĉ लाला लाजपतराय' (१९२०), 'बाल गंगाधर ितलक' (१९२०), 'गांधी - मीमांसा'
(१९२१), 'गांधी जी कौन ह§' (१९२१), 'गांधी - गौरव' (१९२१), 'चंपारन म¤ महाÂमा गांधी' munotes.in

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जीवनी
161 (१९२२), 'लाजपत - मिहमा' (१९२२), 'पं. जवाहरलाल नेहł' (१९२६) ®ी गांधी'
(१९३१), 'जवाहरलाल नेहł' (१९३३), 'लाला लाजपतराय' (१९३८), 'चंþशेखर
आजाद' (१९३८) आिद रचनाओं के माÅयम से जीवनी सािहÂय को समृĦ िकया । गांधी
जी इस युग के सवाªिधक लोकिÿय नेता थे । समसामियक राÕůीय िवभूितयŌ के अितåरĉ
इस काल म¤ भारतीय इितहास के महापुŁषŌ से संबंिधत जीविनयाँ भी पयाªĮ सं´या म¤ िलखी
गयé । रामनरेश िýपाठी, संपूणाªनंद, चंþशेखर पाठक, सुखसंपितराय भंडारी, रामवृ± शमाª,
गौरीशंकर हीराचंद ओझा, गंगाÿसाद मेहता, ÿेमचंद आिद ने øमशः पृÃवीराज चौहान'
(१९१९), 'सăाट् हषªवĦªन' (१९२०), 'राणा ÿतापिसंह' (१९२०), 'िशवाजी' (१९२५),
'महाराणा ÿतापिसंह' (१९२७), 'चंþगुĮ िवøमािदÂय' (१९३२), दुगाªदास (१९३८) आिद
कृितयŌ कì रचना कर इस सािहÂयिवधा के िवकास देश और समाज के िविभÆन कायª±ेýŌ म¤
िनķावती मिहलाओं के इितहास ÿिसĦ जीवनचåरý िलखने कì ओर भी कुछ लेखकŌ का
Åयान गया । िशवĄतलाल वमªन, मनोरमाबाई, जहóरब´श, जटाधरÿसाद शमाª िवमल,
जगÆनाथ शमाª, भगवददत आिद ने øमशः 'स¸ची देिवयां' (१९२१), 'िवīो°मा' (१९२४),
'आयª मिहलारÂन' (१९२४), 'अिहÐयाबाई' (१९२६), 'रमणी नवरÂन' (१९२७) तथा
भारतीय मिहला' (१९३५) नाÌनी रचनाओं का ÿणयन कर एतिĬषयक सािहÂय कì
अिभवृिĦ कì । इस ÿकार इस युग के जीवनी लेखकŌ कì ŀिĶ पाठकŌ को राÕůÿेम और
जनसेवा कì ÿेरणा देने कì ओर रही है । फलÖवłप उĨोधनाÂमकता , आदशªवाद,
ओजिÖवता सहज, ÖपĶ भाषा - शैली आिद का संयोजन सभी लेखकŌ के िलए अभीĶ रहा
है । जीविनयाँ दुलªभ नहé ह§, िजनम¤ इितवृ°ाÂमकता माý न हो कर िवषय का आÂमीयतापूणª
ÿितपादन है ।
१२.४.४ छायावादो°र काल:
छायावादो°र युग म¤ जीवनी सािहÂय का बहòमुखी िवकास हòआ । लोकिÿय नेताओं, संत -
महाÂमाओं, सािहÂयकारŌ, िवदेशी महापुŁषŌ, वै²ािनकŌ, िखलािड़यŌ, उīोगपितयŌ आिद से
संबंिधत जीविनयाँ ÿचुर पåरमाण म¤ िलखी गयी । महाÂमा गांधी इस युग के सवाªिधक
लोकिÿय नेता थे, फलतः उनसे संबंिधत जीविनयाँ सवाªिधक सं´या म¤ उपलÊध होती ह§ ।
घनÔयामदास िबड़ला, काका कालेलकर, सुमंगल ÿकाश सुशीला नायर, डॉ. राज¤þÿसाद
तथा जैन¤þ कुमार Ĭारा øमशः िलिखत 'बापू' (१९४०), 'बापू कì झांिकयां' (१९४८), 'बापू
के क़दमŌ म¤' (१९५०) और 'अकाल पुŁष गांधी' (१९६८) इस िदशा म¤ उÐलेखनीय
कृितयां ह§ । महाÂमा गांधी िवषयक जीविनयŌ म¤ सवाªिधक महÂवपूणª कृित रोमां रोलां कì है ।
िहंदी म¤ उसका अनुवाद तीन भागŌ म¤ महाÂमा गांधी : िवĵ के अिĬतीय पुŁष' (१९४७)
शीषªक से हòआ । महाÂमा गांधी के अितåरĉ भगतिसंह, सुभाषचंþ बोस तथा जवाहरलाल
नेहł से संबंिधत जीविनयां िलखने कì ओर भी लेखकŌ कì पयाªĮ अिभŁिच रही ।
भगतिसंह पर िलखी गयी जीविनयŌ म¤ पहली महßवपूणª कृित रतनलाल बंसल - िवरिचत'
सरदार भगतिसंह' (१९४९) है । इस कृित म¤ भगतिसंह के बिलदान का मूÐयांकन
ऐितहािसक पåरÿेàय म¤ िकया गया है । भगतिसंह पर िलखे गये अÆय जीवनी - úंथŌ म¤ वीर¤þ
िसंधु कì शोधपूणª कृित 'युगþĶा भगतिसंह और उनके मृÂयुंजय पुरखे' (१९६८) तथा
मÆमथनाथ गुĮ - िवरिचत 'øांितदूत भगतिसंह और उनका युग' (१९७२) अलग - अलग
ŀिĶयŌ से महßवपूणª ह§ । वीर¤þ िसंधु भगतिसंह के बहòआयामी ÓयिĉÂव का आंकलन
ऐितहािसक तÃयŌ के आलोक म¤ िकया है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
162 भारतीय जनजीवन म¤ संत - महाÂमा सदा से पूÁय रहे ह§ । उनका उººवल चåरý तथा
अमूÐय उपदेश इस देश के लोगŌ म¤ नये जीवन का संचार करता रहा है । अतएव , यह
Öवाभािवक ही है । िक िविभÆन लेखकŌ ने महाÂमा बुĦ, हजरत मुहÌमद, शंकराचायª आिद
के जीवन को आधार बना कर अपनी कृितयŌ कì रचना कì । इस ŀिĶ से भदंत आनंद
कौशÐयायन, सुंदरलाल, भवानीदयाल संÆयासी, दीनदयाल उपाÅयाय, बलदेव उपाÅयाय,
पंिडत लिलताÿसाद, āĺचारी िशवानंद आंजनेय तथा अमृतलाल नागर का नाम
उÐलेखनीय ह§ िजÆहŌने øमश: 'भगवान बुĦ' (१९४०), 'हजरत मुहÌमद' (१९४०), 'Öवामी
शंकरानंद' (१९४२), 'जगģुŁ शंकराचायª' (१९४७), '®ी शंकराचायª' (१९५०), '®ी
हåरवाया' (१९५७), 'हमारे ®ी महाराज जी' (१९७०) तथा 'चैतÆय महाÿभु' नाÌनी कृितयŌ
कì रचना कì । इनम¤ बलदेव उपाÅयाय िवरिचत जीवनी म¤ जहां शंकराचायª के जीवनचåरत
िवचारधारा तथा ÓयिĉÂव का ÿामािणक एवं ÿभावी िनłपण है, वहé दीनदयाल उपाÅयाय
ने शंकराचायª म¤ सांÖकृितक राÕůवाद के िलए उपयुĉ ÿेरक ÓयिĉÂव के दशªन िकये ह§ । '®ी
हåरबाबा' को आधुिनक युग का चैतÆयदेव माना जाता है । पंिडत लिलताÿसाद कई
दशािÊदयŌ तक उनके साथ रहे थे । अतएव, लेखक को चåरतनायक के आंतåरक ÓयिĉÂव
कì ÿामािणक झांकì ÿÖतुत करने म¤ अनायास सफलता िमल गयी है । वह उनके łप,
शील, िवīा, तप तथा भगवत् ÿेम का ÿभावी ÿÂयंकन करने म¤ समथª हो सका है ।
इस युग म¤ भारतीय इितहास के महापुरषŌ कì जीविनयाँ िलखने म¤ भी ÿवृ° होती है । जहाँ
छýपित िशवाजी को आधार बनाकर जीविनयाँ िलखी गई । इसम¤ लाजपतराय Ĭारा रिचत
जीवनी ‘छýपित िशवाजी १९३९ ÿमुख है तथा भीमसेन िवīालंकार Ĭारा रिचत िशवाजी
१९५१ उÐलेखनीय है । सीताराम कोहल Ĭारा रिचत, 'रंजीत िसंह' (१९३१), Ĭारकाÿसाद
शमाª कृत 'भीÕम िपतामह' (१९४०), जीवनलाल ÿेम - ÿणीत 'गुŁ गोिवंद िसंह' (१९४५),
चंþबली िýपाठी कृत 'धमªराज युिधिķर' (१९५१) इस वगª कì अÆय उÐलेखनीय रचनाएं ह§ ।
इस कालखंड म¤ िवदेशी महापुŁषŌ को जीवनगाथा को आधार बना कर भी अनेक कृितयां
िलखी गयé । इस ŀिĶ से राहòल सांकृÂयायन तथा रामवृ± बेनीपुरी के नाम उÐलेखनीय ह§ ।
राहòल सांकृÂयायन ने 'Öतािलन' (१९५३), 'कालª मा³सª' (१९५४),' लेिनन' (१९५४) तथा
'माओ चे तुंग' (१९५६) नामक úंथŌ कì रचना कì इितहासकार कì तटÖथ शैली म¤ िलखी है
। बनारसीदास चतुव¥दी Ĭारा िवरिचत' ‘अराजकतावादी लुई’ (१९३९), रामइकबाल िसंह
कृत 'Öटािलन' (१९३९), लàमणÿसाद भारĬाज - िवरिचत ‘इटली का तानाशाह
मुसोिलनी’ (१९४०), अनंतÿसाद िवīाथê Ĭारा िलिखत 'िम.चिचªल' (१९४२) तथा
रामनारायण यादव¤þ कृत 'िहटलर' (१९५०) इस कालखंड कì अÆय उÐलेखनीय कृितयां
ह§।
जीवनी - लेखन के ±ेý म¤ इस युग कì सबसे महßवपूणª देन सािहÂयकारŌ के जीवनचåरý ह§ ।
कथा सăाट मुंशी ÿेमचंद के जीवन को आधार बना कर सबसे अिधक जीविनयाँ िलखी गयé
। ÿेमचंद कì पÂनी िशवरानी ÿेमचंद ने 'ÿेमचंद घर म¤' (१९५६) म¤ अęासी उपशीषªकŌ के
अंतगªत ÿेमचंद के बचपन से लेकर अंितम िदन तक के संघषªमय जीवन को पूरी ईमानदारी
एवं स¸चाई के साथ ÿÖतुत िकया है । ÿेमचंद के पुý अमृतराय (१९२१-१९९६) Ĭारा
िलखी गयी ÿेमचंद कì जीवनी 'क़लम का िसपाही' (१९६८) ÿिसĥ रचना है । ÿेमचंद के
जीवन पर एक अÆय महßवपूणª कृित मदनगोपाल कृत 'कलम का मज़दूर (१९६५) है, munotes.in

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जीवनी
163 िजसम¤ लेखक ने चåरतनायक के संघषªमय जीवन कì तेजोŀĮ छिव अंिकत कì है । जीवनी -
लेखन के कायª का ®ेय कमलिकशोर गोयनका को ह§, िजÆहŌने 'ÿेमचंद िवĵकोश, भाग १'
(१९८१) शीषªक से कालøमानुसार ÿेमचंद का ÿामािणक जीवनवृ° ÿÖतुत िकया है ।
गंगाÿसाद पांडेय Ĭारा िलिखत 'महाÿाण िनराला' तथा रामिवलास शमाª (१९१२-२०००)
िवरिचत 'िनराला कì सािहÂय साधना' ( ÿथम भाग, १९६९) िवशेष łप से उÐलेखनीय ह§ ।
कहा जा सकता है िक इस युग म¤ जीवनी सािहÂय का िवकास िवÖतृत łप से हòआ है ।
१२.४.५ समकालीन युग २००० से अब तक:
समकालीन युग म¤ भी जीवनी सािहÂय का िवकास समृĦ है, िजसम¤ अनेक लेखकŌ ने
महापुŁष, सािहÂयकार, संत-महाÂमाओं के जीवन पर लेखन िकया है । िजसम¤ से ‘उÂसव
पुŁष’- नरेश मेहता (२००३ ई.), वट वृ± कì छाया म¤ (२००६ ई.), कुमुद नागर; भारतेÆदु
हåरIJÆþ एक ÓयिĉÂव िचý’ (२००४ ई.) ²ानचÆद जैन, ‘मेरे हमसफर’ (२००५ ई.) गायýी
कमलेĵर; ‘कÐपतŁ कì उÂसव लीला’ (२००५ ई.) डॉ . कृÕणिबहारी िम®; आलोचक का
Öवदेश (२००८ ई.) डॉ. िवजय बहादुर िसंह; Óयोमकेश दरवेश (२०११ ई.) डॉ . िवĵनाथ
िýपाठी; मÆटो िजÆदा है (२०१२ ई.) नरेÆþ मोहन; ‘दपªण देखे साँप के’ (परसाई जीवन
और िचÆतन) डॉ. रामशंकर िम®; ‘बगावां म¤ बहार’ (२०१४ ई.) उिमªला िशरीष; ‘गोिवÆद
िमý कì जीवनी’, ‘गोिवÆद के गीत गोिवÆद’ (२०१७ ई.) सुधीर स³सेना कì सेठ गोिवÆद
दास कì जीवनी आिद उÐलेखनीय ह§ ।
रामकृÕण परमहंस कÐपतŁ कì उÂसव लीला (२००४) कì रचना ÿिसĦ आÂमÓयंजक
िनबÆध लेखक और गī िशÐपी ®ीकृÕणिबहारी िम® ने कì है । ®ी रामकृÕण परमहंस
उÆनीसवé शती कì िदÓय िवभूित थे । बड़ा से बड़ा िवĬान् अलौिकक ÓयिĉÂव का अंकन
पूरी तÆमयता से करता है । इस कृित म¤ उनकì शोध - वृि° और लािलÂयपूणª लेखन का
सािहÂय म¤ अĩुत समÆवय लि±त होता है । िहÆदी जीवनी लेखन कì परÌपरा म¤ यह कृित
अÆयतम है । कमलेĵर ‘मेरे हमसफर’ (२००५ ई.) कì रचना ÿ´यात सािहÂयकार ®ी
कमलेĵर कì पÂनी गायýी कमलेĵर ने कì है । ®ी कमलेĵर का जीवन बहòआयामी और
घटना बहòल रहा है । सफल कहानीकार, उपÆयासकार, नाटककार और पýकार होने के
अलावा टेलीिवजन और िफÐमŌ से भी जुड़े रहे ह§ । गायýी कमलेĵर Ĭारा रिचत इस कृित
को हम उनके जीवन का दपªण कह सकते ह§ ।
१२.५ सारांश जीवनी सािहÂय िहंदी सािहÂय म¤ ÿाचीनतम िवधा है इसका िवकास मÅयकाल से ही माना
जाता है । इसम¤ संतŌ, महाÂमाओं, ऐितहािसक युगपुŁषŌ कì जीविनयŌ के माÅयम से इनके
कायª±ेý तथा इनका गुणगान हòआ है । िजसके कारण पाठको को ÿितभाशाली जीवन जीने
के िलए ÿेरणा िमली है । िहंदी सािहÂय म¤ जीवनी बहòत महÂवपूणª िवधा मानी गई है । जीवनी
के माÅयम से कई ऐितहािसक पुłषŌ के जीवन कì शौयªगाथा से लोग ÿभािवत होते है तथा
जीवन के सफलताओं कì तरफ बढ़ने का मागªदशªन िमलता है ।
munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
164 १२.६ िदघō°री ÿij १. जीवनी कì पåरभाषा एवं ÖवŁप ÖपĶ करे ।
२. जीवनी कì िवशेषताएँ एवं भेद िलिखए ।
३. जीवनी का उĩव एवं िवकास याýा िलिखए ।
१२.७ वैकिÐपक ÿij १) वट वृ± कì छाया म¤ यह जीवनी िकसके जीवन पर आधाåरत है ।
१. भारतेÆदु
२. महावीर ÿसाद िĬवेदी
३. जयशंकर ÿसाद
४. अमृतलाल नागर
२) आवारा मसीहा िकसके Ĭारा रिचत जीवनी है
१. जयशंकर ÿसाद
२. अमृतलाल नागर
३. िवÕणु ÿभाकर
४. महादेवी वमाª
३) ‘महाÂमा गांधी : िवĵ के अिĬतीय पुŁष’ िकसके Ĭारा रिचत जीवनी है ।
१. रामधारी िसंह िदनकर
२. मैथलीशरण गुĮ
३. रोमा रोला
४. जयशंकर ÿसाद
४) महवीर ÿसाद िĬवेदी Ĭारा रिचत जीवनी नहé है ।
१. ‘ÿाचीन पंिडत और किव
२. सुकिव-संकìतªन
३. चåरत चचाª
४. वट वृ± कì छाया म¤ म¤ munotes.in

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जीवनी
165 ५) ‘मेरे हमसफर’ जीवनी िकस पर िलखी गई है ।
१. कमलेĵर
२. ÿेमचंद
३. अमृतलाल नागर
४. इनम¤ से कोई नहé
*****
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166 १३
संÖमरण
इकाई कì łपरेखा
१३.० उĥेÔय
१३.१ ÿÖतावना
१३.२ संÖमरण कì पåरभाषा
१३.३ संÖमरण का िवशेषता एवं तÂव
१३.३.१ संÖमरण के तÂव
१३.४ संÖमरण का उĩव एवं िवकास याýा
१३.५ सारांश
१३.६ िदघō°री ÿij
१३.७ वैकिÐपक ÿij
१३.८ संदभª úंथ
१३.० उĥेÔय िवīाथê इस इकाई के माÅयम से संÖमरण िवधा का अथª, पåरभाषा और िवकास øम का
ÿदीघª अÅययन कर सक¤गे। साथ ही संÖमरण िवधा िलखने वाले ÿमुख लेखक व ÿमुख
संÖमरण कì भी जानकारी हािसल कर सक¤गे।
१३.१ ÿÖतावना िहंदी सािहÂय म¤ िहंदी कì अÆय गया िवधाओं म¤ जीवनी, आÂमकथा, संÖमरण, रेखािचý,
याýा - वृ°ांत, åरपोताªज आिद माना जाता है । ÿाचीन काल के सािहÂय म¤ अÆय िवधाओं
का िवकास समृĦ łप म¤ नहé हòआ, िजसके कारण िहंदी सािहÂय म¤ अÆय गī िवधा का
िवकास नहé हòआ। भारतेÆदु काल के बाद ही इस िवधा के संदभª म¤ लेखकŌ कì łिच िदखाई
गई और इसम¤ ही िवÖतृत łप से इसका िवकास हमारे सम± िदखाई देता है ।
बीसवé सदी कì शुŁआत म¤ िहंदी सािहÂय म¤ ÿकट होनेवाली यह आधुिनक िवधा पिIJम कì
देन है । वतªमान म¤ समाज, राजनीित, अथªÓयवÖथा, संÖकृित, सािहÂय- हर ±ेý म¤ Óयापक
पåरवतªन और अिभनव ÿयोग िदखाई देते ह§ । िहंदी सािहÂय म¤ संÖमरण और रेखािचý एक
दूसरे से िमलती-जुलती गī-िवधाएँ ह§ । इनका िवकास आधुिनक िहÆदी गī कì िवशेषता है
। संÖमरण िकसी ‘Öमयªमाण’ कì Öमृित का शÊदांकन है । Öमयªमाण के जीवन के वे पहल वे
सÆदभª और वे चाåरिýक वैिशĶ्य जो Öमरणकताª को शÊदांिकत करता है । Öमरण वही रह
जाता है, जो महत, िविशĶ, अंिकत करते हòए लेखक Öवयं भी अंिकत होता चलता और
दोनŌ ही łपाियत होते ह§ । इसिलए इसम¤ Öमरणकताª मृत रह जाते िविचý और िÿय हो ।
Öवयंमाण को है । संÖमरण म¤ िवषय पूणªतः तटÖथ नहé रह पाता । वह अपने 'Öव' का पुनः munotes.in

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संÖमरण
167 सजªन करता है । इस ÿकार संÖमरण म¤ अपने जीवन म¤ सÌबंिधत ÓयिĉयŌ के जीवन का
वणªन िकया जाता है ।
१३.२ संÖमरण कì पåरभाषा संÖमरण का ताÂपयª है 'सÌयक् Öमरण' यािन संÖमरण म¤ लेखक Öवतः अपनी अनुभव कì
हòई िकसी वÖतु, Óयिĉ या घटना का आÂमीयता तथा कलाÂमकता के साथ िववरण पेश
करता है । अÆय शÊदŌ म¤, जब िकसी महान् Óयिĉ से सÌबिÆधत कुछ घटनाओं अथवा
कथनŌ को Öमृित के आधार पर जब कोई दूसरा Óयिĉ रोचक व कलाÂमक ढंग से ÿÖतुत
करता है तो उस रचना को संÖमरण कहा जाता है । इसम¤ लेखक अपनी अपे±ा उस Óयिĉ
को अिधक महÂव देता है, िजसका वह संÖमरण िलखता है । इसम¤ िकसी िवशेष Óयिĉ का
Öवłप, आकार-ÿकार, आदत, भाव - भंिगमा, आचरण, जीवन के ÿित ŀिĶकोण, दूसरे
ÓयिĉयŌ के साथ सÌबÆध, वाताªलाप इÂयािद समÖत बातŌ का िवĵसनीय łप म¤ आÂमीयता
के साथ उÐलेख होता है । िहÆदी के मु´य संÖमरण लेखकŌ म¤ ®ीनारायण चतुव¥दी,
बनारसीदास चतुव¥दी, पĪिसंह शमाª इÂयािद सिÌमिलत ह§ ।
संÖमरण का अथª एवं पåरभाषाएँ 'संÖमरण' शÊद सम् उपसगª पूवªक 'Öमृ' (याद करना) धातु
म¤ 'Ðयुट्' ÿÂयय के योग से बना होता है िजसका ताÂपयª है - 'सÌयक् संÖमरण' यािन अ¸छे
से Öमरण करना । हम अपने Óयिĉगत जीवन म¤ ÿितिदन कई ÓयिĉयŌ के सÌपकª म¤ आते ह§
। संसार का सामाÆय Óयिĉ इन पलŌ को अ³सर भूल जाता है परÆतु ये पल संवेदनशील
लेखक के अÆतः पटल पर सदा के िलए अंिकत हो जाते ह§ । जब इन पलŌ कì याद लेखक
कì अÆतराÂमा को झकझोरती है, तो वह संÖमरण सािहÂय कì रचना हेतु ÿवृ° होता है इस
ÿकार यह कह सकते ह§ िक Öमृित के आधार पर िकसी Óयिĉ अथवा िवषय के सÌबÆध म¤
िलखे गए लेख अथवा úÆथ को संÖमरण कहते ह§ ।
इस सÌबÆध म¤ कुछ िवĬानŌ Ĭारा िनÌनिलिखत पåरभाषाएँ ŀĶÓय ह§ ।
डॉ. चौहान के अनुसार, "संÖमरण लेखक िकसी घटना, Öथान या Óयिĉ से सÌबिÆधत
िनजी अनुभूितयŌ कì Öमृित को साकार łप ÿदान करता है, जो अÆदर ही अÆदर उसके मन
को कुरेदती ह§ और अिभÓयिĉ के िलए उसके मन व ÿाण को उĬेिलत करती ह§ ।"
डॉ. िýगुणायत के अनुसार, "भावुक कलाकार जब अतीत कì अनÆत ÖमृितयŌ म¤ से कुछ
Öमरणीय अनुभूितयŌ को अपनी कोमल कÐपना से अनुरंिजत कर Óयंजनामूलक संकेत -
शैली म¤ अपने ÓयिĉÂव कì िवशेषताओं से िविशĶ बनाकर रोचक ढंग से यथाथª łप म¤ Óयĉ
कर देता है, तब वह संÖमरण कहलाता है ।" उपरोĉ पåरभाषाओं से ÖपĶ है िक ‘संÖमरण’
आधुिनक गī कì एक महÂवपूणª िवधा है । िजसका Öवयं का एक िवशेष Öवłप है ।
१३.३ संÖमरण कì िवशेषताएं एवं तÂव संÖमरण कì िनÌनिलिखत िवशेषताएँ ह§ ।
१. संÖमरण यथाथª पर आधाåरत होता है । munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
168 २. संÖमरण लेखक कì वैयिĉक अनुभूितयŌ पर आधाåरत होता है ।
३. संÖमरण म¤ संवेदना, आÂम - तÂव व अनुभूित का बहòत अ¸छा समावेश होता है ।
४. संÖमरण म¤ Öमरणकताª व Öमरणीय दोनŌ कì समािĮ कì िÖथित होती है ।
५. संÖमरण म¤ शैलीगत ÿभावोÂपादक गुण- रोचकता, ÖपĶता, लाघवता तथा
अिभÓयंजनाÂमकता आवÔयक है ।
१३.३.१ संÖमरण के तÂव:
संÖमरण के तÂव संÖमरण के िनÌनिलिखत तÂव ह§ ।
१. वÁयª िवषय:
वÁयª िवषय संÖमरण का मु´य तÂव है । इसम¤ लेखक Öवयं के सÌपकª म¤ आने वाले Óयिĉ
िवशेष के जीवन कì िवशेष घटनाओं का वणªन िकया करता है । संÖमरण के वÁयª - िवषय
को ÿÖतुत करने म¤ रोचकता, यथाथªता व सुसंगिठतता होनी चािहए । िवषय का इस ÿकार
से वणªन करना चािहए िक नीरस िवषय भी रोचक िदखाई दे । लेखक कì कोमल अनुभूितयŌ
का कÐपना िमि®त संÖपशª वÁयª िवषय को सरल बनाने म¤ सहायता करता है । संÖमरण म¤
यथाथª का समावेश आवÔयक है । संÖमरण कì ÖपĶता ही उसको सÌÿेषण बनाती है ।
२. पाý तथा चåरý िचýण:
संÖमरण नायक के जीवन के िभÆन - िभÆन प±Ō का कलाÂमक िचýण ही संÖमरणकार का
उĥेÔय होता है । संÖमरण म¤ लेखक का अपना ÓयिĉÂव भी ÿितिबिÌबत होता है । उसकì
अपनी अिभŁिचयाँ भी संÖमरण म¤ िदखाई देती ह§ । एक आलोचक - संÖमरणकार, संÖमरण
- नायक कì गितिविधयŌ पर समी±ाÂमक ŀिĶ रखता है । मनोवै²ािनक संÖमरण लेखक
अपने चåरतनायक के ÓयिĉÂव कì िवशेषताओं को मनोवै²ािनक ŀिĶकोण म¤ ÿकट करता है
। उसकì इसी म¤ सफलता है िक संÖमरण- नायक के ÓयिĉÂव कì ÿभावपूणª घटना के वणªन
के माÅयम से उसके समú ÓयिĉÂव कì झाँकì िदखाई देने लगे ।
३. देशकाल तथा वातावरण:
संÖमरण - नायक के ÓयिĉÂव को ÖपĶ करने हेतु देशकाल का िचýण भी आवÔयक है ।
राजनीितक ±ेý के नायक के ÓयिĉÂव के मूÐयांकन हेतु राजनीितक पåरिÖथितयŌ का
िचýण आवÔयक है । अगर नायक सािहिÂयक है तो लेखक को सािहÂय म¤ उसके Öथान का
िनधाªरण करने हेतु सािहिÂयक पåरिÖथितयŌ का भी वणªन करना होगा । देशकाल के सफल
िचýण हेतु Öथानीय बोध का होना भी आवÔयक है ।
४. भाषा-शैली:
संÖमरण म¤ शÊद - चयन िवषय के अनुłप होना चािहए । संÖमरण म¤ सरल व ÿसाद - गुण-
सÌपÆन भाषा म¤ सरलता व रोचकता का समावेश करती है । संÖमरणकार का हर एक शÊद
वÁयª - िवषय को पाठक के सामने मूतªłप देता है । संÖमरण म¤ भाषा कì भाँित ही शैली का munotes.in

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संÖमरण
169 भी उिचत महÂव है । संि±Įता, रोचकता, ÿभावोÂपादकता तथा आÂमीयता इÂयािद
संÖमरण कì शैली कì िवशेषताएँ ह§ ।
५. उĥेÔय:
िकसी भी िवधा के मु´य तÂवŌ म¤ उĥेÔय का िवशेष Öथान होता है । उĥेÔयहीन रचना
िनरथªक होती है । संÖमरणकार संÖमरण लेखन के माÅयम से आÂमतोष तो पाता ही है,
इसके साथ ही उसका यह भी उĥेÔय रहता है िक संÖमरण म¤ विणªत घटनाएँ पाठकŌ को
समय - समय पर ÿेरणा देकर उनके जीवन म¤ नयी Öफूितª का संचार करती रह¤ ।
१३.४ संÖमरण का उĩव एवं िवकास याýा संÖमरण और रेखािचý म¤ सामाÆयतः भेद करना किठन है । ®ी बनारसीदास चतुव¥दी ने
िलखा भी है- संÖमरण, रेखािचý और आÂमचåरत इन तीनŌ का एक दूसरे से इतना घिनķ
सÌबÆध है िक एक कì सीमा दूसरे से कहाँ िमलती है और कहाँ अलग हो जाती है, इसका
िनणªय करना किठन है । “महादेवी वमाª ने अपने ÖमृितिचýŌ के सÌबÆध म¤ िलखा है "इन
ÖमृितिचýŌ म¤ मेरा जीवन भी आ गया है । यह Öवाभािवक भी था । अंधेरे कì वÖतुओं को हम
अपने ÿकाश कì धुंधली या उजली पåरिध म¤ लाकर ही देख पाते ह§, उसके बाहर तो वे
अनÆत अंधकार के अंश ह§ परÆतु मेरा िनकटताजिनत आÂम-िव²ापन उस राख से अिधक
महßव नहé रखता, जो आग को बहòत समय तक सजीव रखने के िलए ही अंगारŌ को घेरे
रखती है ।” संÖमरण और रेखािचýŌ के इस नैकट्य के कारण ही ÿाय: दोनŌ कì चचाª एक
साथ कì जाती ह§ । िहÆदी म¤ यŌ तो पं. पĪिसंह शमाª के ‘पĪपराग’ से सफल संÖमरणŌ कì
परÌपरा का ÿारÌभ Öवीकार िकया जाता है; िकÆतु अिधक कलाÂमक और सजीव संÖमरण
िĬवेदी-युग के बाद ही िलखे गये ह§ । इस ÿसंग म¤ ®ीराम शमाª कृत ‘बोलती ÿितमा' (१९३७
ई.), महादेवी वमाª कृत 'अतीत के चलिचý' (१९४१ ई.), 'Öमृित कì रेखाएँ' (१९४७ ई.)
और 'पथ के साथी' (१९५६ ई.), 'मेरा पåरवार' (१९७२ ई.), बनारसीदास चतुव¥दी कृत
'हमारे आराÅयै', 'संÖमरण' (१९५२ ई.) और 'रेखािचý' (१९५२ ई.) रामवृ± बेनीपुरी कृत
‘माटी कì मूरत¤ (१९४६ ई.), ÿकाशचÆद गुĮ कृत ‘िमĘी के पुतले' तथा 'पुरानी ÖमृितयŌ
और नये Öकेच' िशवपूजन सहाय कृत 'वे िदन वे लोग' (१९४६ ई.), सेठ गोिवÆददास कृत
'Öमृित कण' (१९५९ ई.), िवÕणु ÿभाकर कृत 'जाने अनजाने' (१९६२ ई.), माखनलाल
चतुव¥दी कृत 'समय के पाँव' (१९६२ ई.), जगदीशचÆþ माथुर कृत 'दस तसवीर¤' (१९६३
ई.), कÆहैयालाल िम® 'ÿभाकर' कृत 'भूले हòए चेहरे' आिद कृितयŌ का उÐलेख िकया जा
सकता है । इन कृितयŌ के अितåरĉ पý - पिýकाओं म¤ जब - तब अनेक नये लेखक
रेखािचý िलखते रहते ह§ ।
संÖमरण िवधा म¤ रामवृ± बेनीपुरी और ÿकाशचÆþ गुĮ को अिधक सफलता िमली है । डॉ.
नगेÆþ और िवनयमोहन शमाª के रेखािचýŌ म¤ भी ÓयिĉयŌ के शील वैिशĶ्य का सफल
िबंबाकन हòआ है । महादेवी वमाª के संÖमरणनुमा रेखािचý बेजोड़ ह§ । साधारण ÓयिĉयŌ और
िनजêव पदाथŎ को रेखांिकत करना अपे±ाकृत किठन है । नये लेखक भी संÖमरणाÂमक
शैली म¤ अपने िमýŌ, सहधिमªयŌ और आदरणीयŌ का ÓयिĉÂव अंिकत करते ह§, िकÆतु ऐसा
कम हòआ है । अिधकतर संÖमरण बुजुगª लेखकŌ ने ही िलखे ह§। िबगत वषŎ म¤ ÿकािशत munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
170 संÖमरणŌ म¤ ब¸चन िनकट से (१९६८ ई.) अिजत कुमार और ओंकारनाथ ®ीवाÖतव, गाँधी
संÖमरण और िवचार (१९६८ ई.) काका साहेब कालेलकर, संÖमरण और ®Ħांजिलयाँ
(१९६९ ई.) रामधारी िसंह 'िदनकर', ÓयिĉÂव कì झाँिकयाँ (१९७० ई.) लàमीनारायण
सुधांशु, अंितम अÅयाय (१९७२ ई.) पदुमलाल पुÆनालाल ब´शी, 'Öमृित कì िýवेिणका'
(१९७४ ई.) लàमी शंकर Óयास, चंद संतर¤ और (१९७५ ई.) अनीता राकेश, मेरा हमदम
मेरा दोÖत (१९७५ ई.) कमलेĵर, रेखाएँ और संÖमरण (१९७५ ई.) ±ेमचÆþ सुमन, म§ने
Öमृित के दीप जलाये (१९७६ ई.) रामनाथ सुमन, बीती याद¤ (१९७६ ई.) पåरपूणाªनÆद,
Öमरण को पाथेय बनने दो (१९७८ ई.) िवÕणुकाÆत शाľी, कुछ ´वाबŌ म¤ कुछ ´यालŌ म¤
(१९७८ ई.) शंकर दयाल िसंह, अतीत के गतª से (१९७९ ई.) भगवतीचरण वमाª,
®Ħांजिल संÖमरण (१९७९ ई.) मैिथलीशरण गुĮ, पुनः (१९७९ ई.) सुलोचना रांगेय
राघव, यादŌ के झरोखे (१९८० ई.) कुँवर सुरेश िसंह, यादŌ कì तीथªयाýा (१९८१ ई.)
िवÕणु ÿभाकर, औरŌ के बहाने (१९८१ ई.) राजेÆþ यादव, िजनके साथ िजया (१९८१ ई.)
अमृतलाल नागर, सृजन का सुख-दुख (१९८१ ई.) ÿितभा अúवाल, हंस बलाका ( १९८२
ई.), आचायª जानकì वÐलभ शाľी युगपुŁष (१९८३ ई.) रामेĵर शु³ल 'अंचल', दीवान
खाना (१९८४ ई.) पĪा सचदेव, Öमृित लेखा (१९८६ ई.) 'अ²ेय', हजारीÿसाद िĬवेदी,
कुछ संÖमरण (१९८८ ई.) कमल िकशोर गोयनका, भारतभूषण अúवाल : कुछ याद¤ - कुछ
चचाªएँ (१९८९ ई.) िबÆदु अúवाल आिद उÐलेखनीय ह§ ।
®ी ±ेमचÆþ सुमन Öवयं म¤ िहÆदी सािहÂयकारŌ के िवĵकोश है । रेखाएँ और संÖमरण म¤
आपने ३१ िदवंगत आचायō, सािहÂयकारŌ तथा पýकारŌ एवं नेताओं के ÓयिĉÂव का अंकन
िकया है । रामनाथ सुमन अ¸छे संÖमरण लेखक ह§ । म§ने Öमृित के दीप जलाये म¤ उÆहŌने
चौदह सािहÂयकारŌ- पुŁषो°मदास टÁडन, वृÆदावनलाल वमाª, चतुरसेन शाľी,
हनुमानÿसाद पोĥार, िशवपूजन सहाय, कृÕणदेवÿसाद गौड़, सेठ गोिवÆददास, पाÁडेय
बेचनशमाª उú, रामवृ± बेनीपुरी, जनादªनÿसाद झा 'िदन', िवनोदशंकर Óयास, भुवनेĵर िम®
'माधव', िशवÿसाद िम® 'Łþ', गोपाल िसंह नेपाली के संÖमरण िलखे ह§ । ®ी हनुमानÿसाद
पोĥार, बेचनशमाª 'उú' और िवनोदशंकर Óयास के संÖमरण अिधक मािमªक ह§ । मैिथलीशरण
गुĮ आधुिनक िहÆदी सािहÂय के जीिवत इितहास थे । वे राजनेताओं और सािहÂयकारŌ के
बीच सेतु का कायª करते थे । उनके संÖमरणŌ का ऐितहािसक महÂव है । सुलोचना रांगेय
राघव Öव. रांगेव राघव कì पÂनी ह§ । राजेÆþ यादव ÿिसĦ कथाकार ह§ । 'औरŌ के बहाने'
उनके Ĭारा िलिखत संÖमरणŌ का संúह है । इसम¤ रांगेय राघव, उपेÆþनाथ 'अÔक', कृÕणा
सोबती, कमलेĵर, मÆनू भÁडारी, अमरकाÆत, पĪिसंह शमाª 'कमलेश', ओमÿकाश,
ÿेमचÆद काÉका और चेखव के रचनाÂमक ÓयिĉÂव का संÖमरणाÂमक आंकलन िकया गया
है ।
पĪा सचदेव डोगरी ÿ´यात कवियýी है । उÆहŌने िहÆदी म¤ भी बहòत कुछ िलखा है
दीवानखाना उनके संÖमरणŌ का संúह है । इसम¤ अमृतलाल नागर, पं. रिवशंकर, हåरवंशराय
ब¸चन, राजेÆþ िसंह बेदी, उÖताद अÐलारखा खां, िसतारा देवी, इÖमत चुगताई, रामधारी
िसंह 'िदनकर', लता मंगेशकर, अमृता ÿीतम, ®ी सराफ (डोगरी पýकाåरता के जनक),
पंिडत िशवकुमार शमाª, रेÔम (गाियका) और शेरे कÔमीर शेख अÊदुÐला के संÖमरण संगृहीत
ह§ । लेिखका ने चूँिक बहòत से बुजुगŎ के सÌबÆध म¤ भी िलखा है, इसिलए इस संÖमरण म¤ munotes.in

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संÖमरण
171 सा±ाÂकार के तÂव भी ह§ । इसम¤ सािहÂयकारŌ के अितåरĉ पýकार, राजनेता और
संगीतकारŌ को भी याद िकया गया है ।
Öमृित लेखा Öमृित शेष ®ी 'अ²ेय' के संÖमरणŌ का संúह है । इसम¤ सरोिजनीनायडू,
मैिथलीशरण गुĮ, रायकृÕणदास, ÿेमचÆद, 'िनराला', 'पÆत', 'होमवती देवी', माखनलाल
चतुव¥दी, 'रेणु', 'िदनकर', हजारीÿसाद िĬवेदी, और बालकृÕण शमाª 'नवीन' से सÌबिÆधत
संÖमरण संगृहीत ह§ । इन संÖमरणŌ म¤ 'अ²ेय' जी ने िजन रचनाकारŌ का चयन िकया है,
उनसे वे कहé बहòत गहरे ÿभािवत रहे ह§ । Öवयं 'अ²ेय' के ÓयिĉÂव को पूणªता और समúता
देने म¤ इनका भी योगदान रहा है । पं. िवīािनवास िम® जी के शÊदŌ म¤- "Öमृित - लेख
ऐितहािसक दÖतावेज नहé है, पर Öमृित का िविशĶ सजªनाÂमक उपयोग है, समकालीन
सािहÂय के इितहास को एक नया चौखटा इस लेखा से िमलता है और इस ŀिĶ से यह
इितहास रचना को एक नया आयाम देगा यह इसकì एक गौण उपलिÊध है । इसकì मु´य
उपलिÊध तो यह है िक लेखक, लेखक को कैसे देखता है - बस इस देखने को आप देखते
रह¤ : आपकì आँखे नम हो जाय¤गी । "®ी कमलिकशोर गोयंका अÂयÆत ®मशील और
िज²ासु ÿवृित के लेखक है । आपने 'ÿेमचÆद िवĵकोश' ÿÖतुत करके ´याित पायी है ।
‘हजारीÿसाद िĬवेदी : कुछ संÖमरण’ म¤ आपने ३६ लेखकŌ Ĭारा िलिखत आचायª िĬवेदी
सÌबÆधी संÖमरणŌ का संúह िकया है । लेखकŌ म¤ िĬवेदीजी के पåरवार के लोग , उनके
िशÕय और िहÆदी के ÿितिķत िवĬान् सभी तरह के लोग ह§ । इसिलए इसम¤ िĬवेदीजी के
ÓयिĉÂव के अनेक आयाम उभर कर सामने आये ह§ । िबÆदु अúवाल, Öव. भारतभूषण
अúवाल कì पÂनी ह§ । आपने अúवालजी के िदवंगत होने के बाद भारतभूषण अúवाल : कुछ
याद¤ कुछ चचाªएँ नाम से उनसे सÌबिÆधत सभी तरह कì सामúी एकý कर दी है । पुÖतक के
ÿथम खÁड म¤ 'संÖमरण और सा±ाÂकार' है । इनम¤ भारतभूषण अúवाल के अÆतरंग जीवन
कì झाँकì ÿÖतुत करने वाले कुछ संÖमरण भी है । इस ŀिĶ से संúह का िवशेष महßव है ।
हम हशमत एक लÌबी जीवन - िचý - कथा है, िजसम¤ ÓयिĉयŌ और िÖथितयŌ को अÂयÆत
जीवÆत शैली से मूतª िकया गया है । इसम¤ िनमªल वमाª, भीÕम साहनी, कृÕण बलदेव वैद,
गोिवÆद िम®, मनोहर Ôयाम जोशी, महेÆþ भÐला, नागाजुªन आिद ÿिसĦ लेखक, पýकार
और बुिĦजीवी तो ह§ ही, 'राजकमल ÿकाशन' कì ÿ´यात पुÖतक ÿकािशका शीला संधू,
टै³सी űाइवर, नानवाई और वेटर भी है । पुÖतक के Éलैप पर ठीक ही कहा गया है- " हम
हशमत' बोलते शÊद - िचýŌ कì एक घूमती हòई रील है । एक िवÖतृत जीवन - फलक जैसे
घूमता है और सामने िचý उभरते ह§ - साफ और जीवÆत िचý, एक के बाद एक ।"
'हशमत' और कोई नहé ÿिसĦ कथा लेिखका कृÕणा सोबती ह§ । अपने ÿÂयेक शÊद - िचý
म¤ आप Öवयं भी अपने शोख और तीखे अÆदाज म¤ उपिÖथत ह§ । आदमी से आदमी तक म¤
भीमसेन Âयागी ने िदÐली के िनकट खुली िजÆदगी Óयतीत करने वाले राजÖथानी गािड़या
लोहारŌ के जीवन का रेखांकन िकया है । लेखक ने इसे शÊद - िचý कहा है । हåरपाल ने
ÿÂयेक शÊद - िचý को रेखा - िचý म¤ ÿÖतुत करके लेखक के मÆतÓय को पूणª कर िदया है ।
िपछले कुछ वषŎ के भीतर संÖमरण लेखन कì ÿवृि° बढ़ी है । चिचªत संÖमरणŌ म¤ - सृजन
के सेतु ( १९९० ई.) िवÕणु ÿभाकर, याद हो िक न याद हो (१९९२ ई.) काशीनाथ िसंह,
िनकट मन म¤ (१९९२ ई.) अिजत कुमार (१९३१-२०१७), िजनकì याद हमेशा रहेगी
(१९९२ ई.) अमृत राय, सुिधयाँ उस चÆदन के वन कì (१९९२ ई.) ®ी िवÕणुकांत शाľी, munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
172 लाहौर से लखनऊ तक (१९९४ ई.) ÿकाशवती पाल, सĮपणê (१९९४ ई.) िगåरराज
िकशोर, लौट आ ओ धार (१९९५ ई.) दूधनाथ िसंह, ÖमृितयŌ के छंद (१९९५ ई.) और
अपने - अपने राÖते (२००१ ई.) रामदरश िम®, अतीतजीवी (१९९५ ई.) ÿफुÐलचÆþ
ओझा, सृजन के सहयाýी (१९९६ ई.) रवीÆþ कािलया, अिभÆन (१९९६ ई.) िवÕणुचÆþ
शमाª, याद¤ और बात¤ (१९९८ ई.) िवÆदु अúवाल, हम हशमत, (भाग - दो) कृÕणा सोबती,
अमराई (१९९९ ई.) पīा सचदेव, वे देवता नहé है (२००० ई.) राजेÆþ यादव, याद आते ह§
(२००० ई.) रमानाथ अवÖथी, नेपÃय नायक लàमीचÆþ जैन ( २००० ई . ) सं .
मोहनिकशोर दीवान, यादŌ के कािफले (२००० ई.) देवेÆþ सÂयाथê , Öमरािम ( २००० ई.)
नरेÆþ कोहली, अंतरंग संÖमरणŌ म¤ ÿसाद (२००१ ई.) सं . पुŁषो°मदास मोदी , एक नाव
के याýी (२००१ ई.) िवĵनाथÿसाद ितवारी, ÿदि±णा अपने समय कì (२००१ ई.) नरेश
मेहता, िचिड़या रैन बसेरा (२००२ ई.) िवīािनवास िम®, लखनऊ मेरा लखनऊ (२००२
ई.) मनोहर Ôयाम जोशी, लौटकर आना नहé होगा (२००२ ई.) कािÆत कुमार जैन, नेह के
नाते अनेक (२००२ ई.) कृÕणिबहारी िम®, ÖमृितयŌ का शु³ल प± (२००२ ई.) डॉ.
रामकमल राय, सािहÂय के ÖवÈन पुŁष (२००२ ई.) िवÕणु ÿभाकर, रघुवीर सहाय
रचनाओं के बहाने एक संÖमरण (२००३ ई.) मनोहरÔयाम जोशी, आँगन के वÆदनवार
(२००३ ई.) और मेरे सुŃदय ®Ħेय (२००५ ई.) डॉ. िववेकì राय, ये जो आइना है
(२००६ ई.) मधुरेश, काशी का अÖसी (२००२ ई.), आछे िदन पाछे भये (२००४ ई.) डॉ.
काशीनाथ िसंह , लाई हयात आए (२००४ ई.) डॉ. लàमीधर मालवीय, तुÌहारा परसाई
(२००४ ई.), जो कहóँगा सच कहóँगा (२००६ ई.), अब तो बात फैल गई (२००७ ई.), और
बैकुÁठपुर म¤ बचपन (२०१० ई.) डॉ. कािÆतकुमार जैन, पर साथ - साथ चल रही याद
(२००४-१०) ®ी िवÕणुकाÆत शाľी, नंगा तलाई का गाँव (२००४ ई.) डॉ. िवĵनाथ
िýपाठी, सुिमरन के बहाने (२००५ ई.) केशवचÆद वमाª, घर का जोगी जोगड़ा (२००६ ई.)
डॉ . काशीनाथ िसंह, एक दुिनया अपनी (२००७ ई.) डॉ. रामदरश िम®, कुछ याद¤ कुछ
बात¤ (२००८ ई.) अमरकाÆत, िदÐली शहर दर शहर (२००९ ई.) डॉ. िनमªला जैन,
कालातीत (२००९ ई.) मुþा रा±स, िकतनी शहरŌ म¤ िकतनी बार (२०१० ई.) ममता
कािलया, हािशये कì इबारत¤ (२००९ ई.), मेरे भोजपý (२००९ ई.) चÆþकाÆता, किववर
ब¸चन के साथ (२००९ ई.) एवं िजनके संग िजया (२०१५ ई.) अजीत कुमार, अमृत लाल
नागर कì बाबूजी बेटाजी एÁड कÌपनी (२००९ ई.) अचला नागर, जे एन यू म¤ नामवर िसंह
(२०१० ई.) सÌपादक डॉ. सुमन केशरी, अंधेरे म¤ जुगनू (२०१० ई.) अजीत कुमार, यादŌ
के गिलयारे (२०१० ई.) नािसरा शमाª, कल परसŌ के बरसŌ (२०११ ई.) ममता कािलया,
Öमृित म¤ रह¤गे वे (२०११ ई.) शेखर जोशी, िटगåरया का लोकदेवता भवानी ÿसाद िम®
(२०११ ई.) डॉ. ÿेमशंकर रघुवंशी, अतीत राग (२०११ ई.) नÆद चतुव¥दी (१९२३-
२०१४ ई.), मेरे िहÖसे का शहर (२०११ ई.) सुधीर िवīाथê, िदÐली हमेशा दूर (२०११
ई.) अजीत कुमार, ÖमृितयŌ के गिलयारे से (२०१२ ई.) नरेÆþ कोहली, गंगा Öनान करने
चलोगे (२०१२ ई.) डॉ. िवĵनाथ िýपाठी, माफ करना यार (२०१२ ई.) बलराम, अपने -
अपने अ²ेय, दो खÁड (२०१२ ई.) सÌपादक ओम थानवी, यादŌ का सफर (२०१२ ई.)
ÿकाश मनु, हम हशमत भाग -३ (२०१२ ई.) कृÕणा सोबती, नेह के नाते (२०१२ ई.) डॉ.
कमलाÿसाद , लता मंगेशकर ऐसा कहा से लाऊँ (२०१२ ई.) पĪा सचदेव, ²ानरंजन के
बहाने (२०१२ ई.) नीलाभ, दर´तŌ के साये (२०१३ ई.) मधुकर गंगाधर, जहाँ से उजास
(२०१३ ई.) राजी सेठ, कृित और कृितकार (२०१३ ई.) मृदुला गगª, एक पेड़ कì याद munotes.in

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संÖमरण
173 (२०१३ ई.) शेखर जोशी, कथािशÐपी कमलेĵर (२०१३ ई.) सं. महावीर अúवाल, िफर
मुझे रहगुजर याद आया (२०१३ ई.) शैलेÆþ सागर धीमी - धीमी आँच (२०१३ ई.)
बलराम, ई इलाहाबाद है भइया (२०१३ ई.) िवमलचÆद पाÁडेय ÖमृितयŌ का साàय
(२०१४ ई.) Ńदयेश, महागुŁ मुिĉबोध : जुÌमा ट§क कì सीिढ़यŌ पर (२०१४ ई.)
कािÆतकुमार जैन, बोŁंदा डायरी (२०१५ ई.) मालचÆद ितवाड़ी, गुŁजी कì खेती - बाड़ी
(२०१५ ई.) डॉ. िवĵनाथ िýपाठी, मेरे हमकलम (२०१५ ई.) रवीÆþ कािलया, एक था
राजा (२०१५ ई.) डॉ. कािÆतकुमार जैन, याद¤ - यादे... और याद¤ (२०१६ ई.) पुÕपा
भारती, म§ और वे (२०१५ ई.) मधुरेश , आवा हयािम (२०१६ ई.) रमेश चÆþ शाह, बारह
दरी (२०१६) पĪा सचदेव, वो सफर था िक मुकाम था : मेरी नजर म¤ राजेÆþ यादव
(२०१६ ई.) मैýेयी पुÕपा, पकì जेठ का गुलमोहर (२०१६ ई.) भगवानदास मोरवाल, मेरी
सािहÂय याýा (२०१६ ई.) भीÕम साहनी, वो सूरत¤ (२०१७ ई.) संÖमरण और ®Ħांजिलयाँ
( २०१७ ई.) पंकज िवĶ, रंिजश ही सही (२०१७ ई.) डॉ. अजीत कुमार, गुŁवर ब¸चन से
दूर (२०१७ ई.) अजीत कुमार, शÊदŌ के लोग : कुमार पंकज, शे³सिपयर वाया ÿो.
Öवामीनाथन (२०१७ ई.) डॉ. कािÆत कुमार जैन, लौट जाती है उधर को भी नजर (२०१७
ई.) डॉ. कािÆत कुमार जैन, सबको अमर देखना चाहता हóँ (२०१७ ई.) दूधनाथ िसंह, कथा
से इतर (२०१७ ई.) असगर वजाहत, मूरत¤ माटी और सोने कì (२०१७ ई.) नंदिकशोर
नवल आिद ।
®ी िवÕणु ÿभाकर ÿ´यात कथाकार और जीवनी लेखक ह§ । 'सृजन के सेतु' म¤ आपने कुल
पÆþह लेखकŌ को याद िकया है । लेखक नई पीढ़ी के भी ह§ और पुरानी पीढ़ी के भी इÆþ
िवīा वाचÖपित और िवयोगी हåर जैसे पýकार और समाज सुधारक भी यहाँ आदर पूवªक
याद िकए गए ह§ । शेष संÖमृत रचनाकार है- अमृतलाल नागर, कÆहैयालाल िम® 'ÿभाकर' ,
रामवृ± बेनीपुरी, 'अ²ेय', रावी, सव¥ĵर, सुदशªन, सोमद°, शांितिÿय िĬवेदी, ऋषभ चरण
जैन, वृÆदावनलाल वमाª और रामनारायण उपाÅयाय िवÕणुजी ने अपने Öवभाव के अनुसार
सभी संÖमृत सािहÂयकारŌ के ÿदेय को Öवीकारा है और सभी को यथोिचत मान देते हòए
याद िकया है । याद हो िक न याद हो काशीनाथ िसंह कì एक बहòचिचªत संÖमरण पुÖतक है ।
इसम¤ आचायª हजारीÿसाद िĬवेदी, िýलोचन, नामवर िसंह, राजेÆþयादव, धूिमल, कमलेĵर,
रवीÆþ कािलया और िवजय मोहन जैसे रचनाकारŌ एवं लेखकŌ के Óयिĉ िचý तो ह§ ही,
बनारस के अÖसी चौराहे को ÓयिĉÂव ÿदान कर िदया गया है । 'िजनकì याद हमेशा रहेगी'
ÿिसĦ समी±क और कथाकार अमृतराय के संÖमरणŌ का संúह है । इसम¤ कथाकार
अमृतलाल नागर, कहानीकार कृÕणचंदर, जैनेÆþ, ÿेमचÆद, 'िनराला', फादर कािमल बुÐके,
महादेवी वमाª, रांगेयराघव, राहòल सांकृÂयायन और सुिमýानÆदन पंत जैसे जाने माने िहÆदी
सािहÂयकारŌ के साथ बँगला कहानीकार राधाकृÕण उफª लाल बाबू, बँगला किव सुभाष
मुखोपाÅयाय, उदूª शायर सुहैल अजीमाबादी, ÿिसĦ िचýकार मकबूल िफदा हòसैन और
ÿ´यात िफÐम िनमाªता सÂयजीत राय को याद िकया गया है । इस संÖमरण - संúह कì दो
िवशेषताएँ ह§ । एक तो यह िक इसका Öमृित संसार िवÖतृत है । दूसरी यह िक इसम¤ अमृत
का समी±क ÓयिĉÂव कì िनरÆतर सिøय रहा है । 'लाहौर से लखनऊ तक'- ®ीमती
ÿकाशवती पाल Ĭारा िलिखत ÿ´यात कथाकार यशपाल के जीवन संघषª का
संÖमरणाÂमक दÖतावेज है । अÿैल १९३० म¤ ÿकाशवतीजी कì सगाई यशपाल से हòई थी ।
तब से लेकर २६ िदसÌबर १९७६ को यशपाल के देहावसान तक दुःख - सुख के ÿÂयेक munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
174 ±ण म¤ वे उनके साथ रही ह§ । इसिलए यशपाल के अंतरंग जीवन का सा±ाÂकार करने के
िलए इससे अिधक िवĵसनीय माÅयम दूसरा नहé हो सकता । िवÈलव कायाªलय को
यशपालजी ने अपने खून - पसीने से सéचकर एक अÆतरराÕůीय सांÖकृितक संÖथान का
łप िदया था, उस पर गत कई वषŎ से िकÆही सहदेव िसंह एडवोकेट का गैर कानूनी कÊजा
है और ÿकाशवतीजी Æयाय के िलए गुहार करती िफर रही ह§ । इससे तो यही िनÕकषª
िनकलता है िक आजादी के िलए अपना सब कुछ िनछावर कर देने वाले िशखर
सािहÂयकारŌ कì ÖमृितयŌ के िलए भी कोई Öथान नहé है । 'सĮपणê' सुÿिसĦ कथाकार
िगåरराज िकशोर कì कई गī - िवधाओं का संúह है । लौट आओ धार किव कथाकार
दूधनाथ िसंह के घर से चुपचाप िनकलकर इलाहाबाद आने , असहाय भटकने , बीमार होने
और मृÂयु के मुख से िनकलने से लेकर िवĵिवīालय के अÅयापक और ÿितिķत रचनाकार
होने तक कì संÖमरणाÂमक संघषª गाथा है । इस ÿकार िĬवेदी युग के बाद संÖमरण िवधा म¤
लेखन का कायª िवÖतार पूवªक हòआ है । अिधकतर रचनाकारŌ के अपने जीवन कì जुडी
तमाम घटनाओं तथा ÿभावी ÓयिĉयŌ के Óयिĉव का िवĴेषण उÆहŌने इस िवधा के माÅयम
से िकया है ।
१३.५ सारांश िनÕकषªतः Öमृित के आधार पर िकसी िवषय पर अथवा िकसी Óयिĉ पर िलिखत आलेख
संÖमरण कहलाता है । इसम¤ कथा का ÿमुख पाý Öवयं लेखक होता है । संÖमरण लेखक
का ŀिĶकोण िभÆन रहता है । संÖमरण म¤ लेखक जो कुछ Öवयं देखता है और Öवयं अनुभव
करता है उसी का िचýण करता है। लेखक कì Öवयं कì अनुभूितयाँ तथा संवेदनाय¤ संÖमरण
म¤ अÆतिनªिहत रहती ह§ । इस वह अपने चारŌ ओर के जीवन का वणªन करता है।
इितहासकार के समान वह केवल यथातÃय िववरण ÿÖतुत नहé करता है । अतः जीवन म¤
िजन चåरýŌ या घटना का ÿभाव लेखक के जीवन पर पड़ता है उसे लेखक यथाथª łप से
िचिýत करता है । िजसे संÖमरण कहा जाता है । इस िवधा के माÅयम से लेखन अपने आस
पास के वातावरण तथा सकारÂमक ÿभावी जीवन के चåरý को उजाकर करने का ÿयास
करता है । और समाज के असामािजक तÂवŌ को उजागर करता है ।
१३.६ िदघō°री ÿij १. संÖमरण िवधा के उĩव और िवकास को िवÖतार पूवªक िलिखए ।
२. संÖमरण िवधा के िवशेषता एवं तÂवŌ को ÖपĶ कìिजये ।
१३.७ वैकिÐपक ÿij १) ‘याद हो कì न याद हो’ यह संÖमरण िकसके Ĭारा िलखा गया है ।
१. भारतेÆदु
२. दूधनाथ
३. कशी नाथ
४. अ²ेय munotes.in

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संÖमरण
175 २) सृजन के सेतु म¤ कुल िकतने संÖमरण संúहीत है ?
१. १५
२. १०
३. १२
४. १४
३) ‘लौट आओ धार’ िकसकì रचना है ।
१. भारतेÆदु
२. दूधनाथ
३. कशी नाथ
४. अ²ेय
४) ‘हम हशमत’ कुल िकतने खÁडŌ म¤ िवभािजत है ?
१. २
२. ३
३. ४
४. ५
५) 'लाहौर से लखनऊ तक' यह संÖमरण िकसके जीवन पर आधाåरत है ।
१. यशपाल
२. कमलेĵर
३. काशीनाथ
४. दूधनाथ
१३.८ संदभª úंथ  िहंदी सािहÂय का इितहास – आचायª रामचंþ शु³ल
 िहंदी सािहÂय का इितहास – संपािदत डॉ. नगेÆþ
 िहंदी सािहÂय का दूसरा इितहास- डॉ ब¸चन िसंह
 िहंदी सािहÂय का वै²ािनक इितहास – गणपितचÆþ गुĮ
 िहंदी सािहÂय का संवेदनाÂमक इितहास – रामÖवłप चतुव¥दी munotes.in

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आधुिनक िहंदी सािहÂय का इितहास
176  िहंदी सािहÂय का आधुिनक इितहास- डॉ ब¸चन िसंह
 िहंदी सािहÂय का गī इितहास – रामचंþ ितवारी
 िहंदी सािहÂय का सरल इितहास – िवĵनाथ िýपाठी
 िहंदी सािहÂय कì ÿवृि°या – डॉ जयिकशन खंडेलवाल
 िहंदी सािहÂय का अतीत – िवĵनाथ ÿसाद िम®

*****
munotes.in

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1 नमुना ÿij पý
Semester - VI Course - IV
समय: 3:00 घंटे पूणा«क : 100
सूचना: 1. सभी ÿij अिनवायª है।
2. सभी ÿijŌ के िलए समान अंक है।
ÿij 1. आधुिनक काल कì युगीन पåरिÖथितयŌ पर ÿकाश डािलए। 20
अथवा
भारतेÆदु युग कì ÿमुख ÿवृि°यŌ का पåरचय दीिजए।
ÿij 2. ÿगितवादी किवता कì ÿमुख िवशेषताओं पर ÿकाश डािलए। 20
अथवा
नई किवता कì िवशेषताओं को ÖपĶ कìिजए।
ÿij 3. िहंदी उपÆयास के िवकास - øम को ÖपĶ कìिजए। 20
अथवा
िहंदी आलोचना के िवकास - øम को िवÖतार से समझाइए।
ÿij 4. िहंदी जीवनी सािहÂय के िवकास øम पर ÿकाश डािलए। 20
अथवा
िहंदी आÂमकथा सािहÂय के िवकास øम का िववेचन कìिजए।
ÿij 5. क) िकÆहé दो िवषयŌ पर िटÈपिणयाँ िलिखए। 10
1. िĬवेदी युगीन किवता
2. छायावादी काÓय
3. समकालीन किवता
4. िहंदी उपÆयास
ख) वÖतुिनķ ÿij- 05
1. भारतेÆदु युग को पुनजाªगरण काल कì सं²ा िकसने दी है।
2. 'पुÕप कì अिभलाषा किवता के किव कौन है?
3. 'øांित कì भावना' िकस किवता कì एक ÿमुख िवशेषता है? munotes.in

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4. 'Öवगª कì झलक' नाटक के रचनाकार कौन ह§?
5. 'अधªनारीĵर िनबंध संúह के लेखक कौन ह§?
ग) िवकÐप ÿij- 05
1. आधुिनक िहंदी सािहÂय का ÿवतªक िकसे माना जाता है?
i) ÿतापनारायण िम® ii) भारतेÆदु
iii) ÿेमपन iv) बालकृÕण भĘ
2. सरोज Öमृित िकसकì रचना है?
i) ÿसाद ii) िनराला
iii) सुिमýानंदन पंत iv) महादेवी वमाª
3. इनम¤ से ÿगितवाद कì ÿमुख िवशेषता ³या है?
i) Óयिĉवाद ii) शोषकŌ ÿित घृणा
iii) सŏदयª भावना iv) रहÖयवाद
4. ÿयोगवादी किवता िक िनÌनिलिखत कौन-सी ÿमुख िवशेषता है?
i) लघु मानव ii) िशÐप कì नवीनता
iii) नगर बोध iv) úाम बोध
5. इनम¤ से भीÕम साहनी कì कहानी कौन सी है?
i) चीफ कì दावत ii) ÿती±ा
iii) मवाली iv) नीली झील

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