Paper-No.13.2-Jainendra-munotes

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूमम, पात्रों का पररचय और
उपन्यास का साराांश
इकाई की रूपरेखा
१.१ इकाई का उद्देश्य
१.२ प्रस्तावना
१.३ हहिंदी उपन्यास का इहतहास और जैनेंद्र का साहहत्य
१.४ जैनेंद्र कुमार का व्यहित्व और कृहतत्व
१.५ त्यागपत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम
१.६ त्यागपत्र उपन्यास को पात्रों का पररचय
१.६.१ उपन्यास की मुख्यपात्र मृणाल बुआ
१.७ त्यागपत्र उपन्यास का सारािंश
१.८ लघुत्तरीय प्रश्न
१.९ हदघोत्तरीय प्रश्न
१.१ इकाई का उद्देश्य इस इकाई के माध्यम से छात्र हनम्नहलहखत मुद्दों से अवगत होंगे |
१. हहिंदी उपन्यास का उद्भव हवकास तथा जैनेंद्र कुमार के साहहत्य का समग्र पररचय |
२. त्यागपत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम तथा सारािंश का पररचय प्राप्त होगा |
३. त्यागपत्र उपन्यास के देशकाल वातावरण तथा उसमें हचहत्रत सामाहजक आहथिक तथा
सािंस्कृहतक पररवेश का पररचय होगा |
४. त्यागपत्र उपन्यास में हचहत्रत मुख्य तथा गोण पात्रो का हवस्तृत पररचय प्राप्त होगा |
१.२ प्रस्तावना हहिंदी कथा साहहत्य में जैनेंद्र कुमार का महत्वपूणि स्थान तथा योगदान रहा है । जैनेंद्र कुमार
ने हहिंदी कथा साहहत्य को एक नया आयाम हदया है । जैनेंद्र कुमार ने हहिंदी कथा साहहत्य में
मनोवैज्ञाहनक, मनोहवश्लेषणात्मक परिंपरा का उद्भव और हवकास हकया है । उपन्यास
समाट प्रेमचिंद जी के समकालीन साहहत्यकार के रूप में इन्होंने हहिंदी साहहत्य हवश्व में प्रवेश
हकया और एक लिंबे अरसे तक हहिंदी साहहत्य की सेवा करते रहे | जैनेंद्र जी ने मुख्य रूप से
गद्य साहहत्य की रचना की है । जैनेंद्र जी ने प्रेमचिंद जी के सामाहजक समस्या प्रधान परिंपरा
के समानािंतर मनोवैज्ञाहनक मनोहवश्लेषणात्मक कथा साहहत्य की रचना की इस तरह जैनेंद्र
कुमार मनोवैज्ञाहनक मनोहवश्लेषणात्मक साहहत्य परिंपरा के प्रणेता माने जाते है । munotes.in

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हवशेष अध्ययन : जेनेंद्र
2 जैनेंद्र कुमार के साहहत्य में सामाहजक समस्याओिं के स्थान पर मानहसक द्रिंद्र, सिंघषि हदखाई
देता है । इनके साहहत्य में प्रसिंगों और घटनाओिं स्थान पर पात्रों की सिंघषिशील मानहसकता,
मनोव्यथा, आत्म सिंघषि आहद का हवश्लेषण हदखाई देता है । इनके उपन्यास त्यागपत्र में भी
उनके उपन्यास परिंपरा का सहज पररचय हमलता है । ‘त्यागपत्र' जैनेंद्र कुमार की तीसरी
औपन्याहसक कृहत है । आत्मकथात्मक शैली में हलखे गये इस उपन्यास में प्रमोद नामक
पात्रो कथा का सूत्रधार बनकर प्रस्तुत होता है । प्रमोद अपनी हप्रय बुआ (मृणाल) के मृत्यु
की सूचना से तनाव तथा तीव्र मानहसक सिंघषि से गुजरते हुए बुआ के जीवन की शोकािंहतका
कथन करता है । इस तरह इस लघु उपन्यास के प्रारिंभ से लेकर अिंत तक प्रमोद अपनी
बुआ के जीवन सिंघषि को पाठकों के सामने रखता है । प्रमोद, बुआ के साथ और बुआ की
याद में हबताए गए अनेक छोटे-बडे प्रसिंगो, घटनाओिं के हचत्रण द्रारा बुआ के जीवनी की
शोकािंहतका को पाठको के सामने रखता है । प्रमोद बुआ की दयनीय अवस्था से अस्वस्थ
होकर मानहसक सिंघषि में चला जाता है । त्यागपत्र उपन्यास में प्रमोद अपनी बुआ के जीवन
की शोकािंहतका को बुआ की मृत्यु घटना के साथ हवशद करता है ।
सन १९३७ में प्रकाहशत त्यागपत्र उपन्यास में प्रमोद की मृणाल बुआ तत्कालीन आयि
समाज के सिंयुि पररवार व्यवस्था, प्रेमे की असफलता तथा अनमेल हववाह की परिंपरा का
हशकार हो जाती है, और जीवन के पथ से कटी पतिंग की तरह लुढ़कती च जाती है ।
प्रमोद मृणाल बुआ के जीवन के हर मोड़ पर उसे सहारा देने मे असफल हो जाता है । अपनी
इसी असफलता से कुिंहठत होकर वह अपने न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है । त्यागपत्र
उपन्यास में तत्कालीन सामाहजक, पाररवाररक, आहथिक पृष्ठभूहम पर मृणाल बुआ और
प्रमोद भतीजे के मानहसक सिंघषि, द्रिंद्र का माहमिक हचत्रण हकया गया है ।
१.३ म ांदी उपन्यास का इमत ास तथा जैनेंद्र कुमार का साम त्य १९ वी सदी के अिंहतम दशकों में हहिंदी उपन्यास के उद्भव-हवकास का पररचय हमलता है ।
सन १८८२ प्रकाहशत लाला श्रीहनवास दास का उपन्यास 'परीक्षा गुरु' से ही हहिंदी उपन्यास
परिंपरा का उद्भव माना गया है । इस तरह १९ वीं सदी के ९ वे दशक से हहिंदी उपन्यास
साहहत्य के उद्भव और हवकास की परिंपरा का प्रारिंभ हदखाई देता है । हहिंदी उपन्यास
साहहत्य की सबसे बडी हवशेषता यह रही हक वह अपने उद्भव काल से ही सवािहधक
लोकहप्रय हवधा का गौरव पाने में सफल रहा है। हहिंदी उपन्यास अपनी प्रारिंहभक काल से ही
कथ्य-हशल्प की दृहि से हवहवधता से भरा रहा है । देवकीनिंदन खत्री, रामगोपाल गहमरी के
हतलस्मी,ऐयारी जासूसी उपन्यासों ने लोकहप्रयता के झिंडे गाड हदए | दूसरी ओर हकशोरी
लाल गोस्वामी, राधा कृष्णदास बालमुकुिंद शमाि आहद उपन्यासकारों में सामाहजक,
ऐहतहाहसकता के आधार पर प्रेम, शौयि, राष्रीयता की प्रखर चेतना से सिंबिंहधत उपन्यास
हलखकर हहिंदी उपन्यास को उसके प्रारॅहभक काल में ही लोकहप्रय बनाया | प्रेमचिंद जी के
हबना हहिंदी उपन्यास साहहत्य का इहतहास ही अधूरा है । उन्होने हहिंदी उपन्यास को कथ्य-
हशल्प, शैली आहद सभी गुणो से समृद्ध बनाया और हहिंदी उपन्यास को सिंख्यात्मक और
गुणात्मक दोनो दृहियों से चरमोत्कषि पर पहुिंचाया | प्रेमचिंद ने सामाहजक समस्या प्रधान
यथाथोन्मुख आदशिवादी उपन्यासो की परिंपरा को समृद्ध बनाया | प्रेमचिंदोत्तर काल में हहिंदी
उपन्यास में अनेक नए हवषयों का समावेश हुआ | यशपाल ने साम्यवादी, जैनेंद्र कुमार जी ने
मनोवैज्ञाहनक, सुदशिन जी ने प्रेमचिंद जी के सामाहजक समस्या प्रधान परिंपरा का हवकास munotes.in

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम, पात्रों का पररचय और उपन्यास का सारािंश
3 हकया, ऐहतहाहसक उपन्यासों की परिंपरा का भी हवकास हुआ । स्वातिंत्र्योत्तर काल में
उपन्यास के क्षेत्र मे अनेक प्रयोग हुए। बदलते हुए पररवेश के साथ अनेक नए हवषयो को
लेकर उपन्यास हलखे गए | फणीश्वरनाथ रेणु द्रारा आिंचहलक उपन्यासों की परिंपरा का उद्भव
और हवकास हुआ । इस तरह हहिंदी उपन्यास अपने प्रारिंहभक काल से आज तक अपनी
लोकहप्रयता बनाए हुए है ।
जैनेंद्र ने प्रेमचिंद जी के समानािंतर अपने उपन्यासो के माध्यम से सविथा नए पथ का
अनुगमन हकया । इन्होने प्रेमचिंद जी के सामाहजकता के स्थान पर अिंतमुिखी गहतहवहधयों के
हचत्रण की परिंपरा प्रारिंभ की । इस तरह जैनेंद्र पहले प्रयोगशील उपन्यासकार माने जाते है ।
जैनेंद्र के साहहत्य में बाह्य गहतहवहधयों की अपेक्षा मानवीय मानस का हचत्रण हदखाई देता है।
उनका साहहत्य मानव मन के सूक्ष्म हवश्लेषण का साहहत्य बन गया है । इस तरह जैनेंद्र
कुमार ने मनोवैज्ञाहनक, मनोहवश्लेषणात्मक उपन्यासो की परिंपरा का हवकास हकया । उनकी
इस परिंपरा हवकास स्वातिंत्र्योत्तर काल में भी होता रहा है । स्वातिंत्र्योत्तर काल के
साहहत्यकार अज्ञेय, इलाचिंद्र जोशी, भगवती प्रसाद वाजपेयी आहद साहहत्यकारों ने इस
परिंपरा का स्वतिंत्र्योत्तर काल में हवकास हकया है |
१.४ जैनेंद्र कुमार का व्यमित्व और कृमतत्व जैनेंद्र कुमार का जन्म २ फरवरी १९०५ में अलीगढ़ के कौंहडयागिंज गािंव में हुआ । उनका
बचपन का नाम आनिंदीलाल था | वह २ साल के हुए तब उनके हपता का देहािंत हुआ । हपता
के हनधन के प त उनकी माता और मामा ने उनकी परवररश की | जैनेंद्र कुमार की
प्रारिंहभक हशक्षा-दीक्षा उनके मामा द्रारा स्थाहपत हहस्तनापुर के गुरुकुल में हुई । जैनेंद्र कुमार
ने मैहरक की परीक्षा १९१९ में पिंजाब से उत्तीणि की, तथा उच्च हशक्षा के हलये काशी हहिंदू
हवश्वहवद्यालय में दाहखला हलया | सन १९२१ में असहयोग आिंदोलन से जुडे रहे, हतलक
स्कूल ऑफ पॉहलहटक्स में भी कायिरत रहे । सन १९२१ से १९२३ तक व्यापार भी हकया,
राजनीहतक पत्र के सिंवाददाता भी रहे, रोजगार की खोज में कोलकाता भी गए थे । हकिंतु हर
तरफ से हनराश होकर उन्होने लेखन को ही अपने उपजीहवका का साधन बनाया और
जीवन के अिंत तक हलखते रहे । २४ हदसिंबर १९८८ को उनका देहािंत हुआ ।
जैनेंद्र का कृमतत्व:
जैनेंद्र कुमार बीसवीं सदी के प्रहतभा सिंपन्न साहहत्यकार थे उन्होने गद्य की प्राय: सभी
प्रमुख हवधाओिं में साहहत्य की रचना की है । उन्होने उपन्यास, कहानी, हनबिंध, अनुवाद,
सिंपादन आहद गद्द हवधाओ में साहहत्य की रचना की है । उनकी साहहहत्यक रचनाएिं
हनम्नहलहखत हैं ।
प्रकामशत रचनाएां - उपन्यास:
१) परख (१९२९),
२) सुनीता (१९३५),
३) त्यागपत्र (१९३७), munotes.in

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हवशेष अध्ययन : जेनेंद्र
4 ४) कल्याणी (१९३९),
५) हववति (१९५२),
६) सुखदा (१९५३),
७) व्यतीत (१९५३),
८) जयवधिन (१९५६).
क ानी सांग्र :
१) फािंसी (१९२९),
२) वातायन (१९३०),
३) नीलम देश की राजकन्या (१९३३),
४) एक रात (१९३४),
५) दो हचहडया (१९३५),
६) पाजेब (१९४२),
७) जयसिंहध (१९४९) तथा जैनेंद्र की कहाहनयािं (सात भाग).
मनबांध सांग्र :
१) प्रस्तुत प्रश्न (१९३६),
२) जड़ की बात (१९४५),
३) पुवोदय (१९५१),
४) साहहत्य श्रेय और प्रेय (१९५३),
५) काम प्रेम और पररवार (१९५३),
६) मिंथन (१९५३),
७) सोच हवचार (१९५३),
८) ये और वे (१९५४),
९) इतस्तत: (१९६३),
१०) समय और हम (१९६४) ,
११) पररप्रेक्ष्य (१९६३) साहहत्य और सिंस्कृहत लहलत शुक्ल द्रारा सिंपाहदत (१९७९). munotes.in

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम, पात्रों का पररचय और उपन्यास का सारािंश
5 अनुमदत ग्रांथ:
१) मिंदाहकनी (नाटक १९३५),
२) पाप और प्रकाश (नाटक १९५३).
स लेखन: तपोभूहम (उपन्यास त्रषभचरण जैन के साथ१९३२)
सांपामदत ग्रांथ:
● साहहत्य चयन (हनबिंध सिंग्रह १९५१)
● हवचार वल्लरी (हनबिंध सिंग्रह१९५२)
● पुरस्कार / सम्मान
● १९७१ में पद्मभूषण
● १९७९ में साहहत्य अकादमी पुरस्कार
१.५ त्यागपत्र उपन्यास की पृष्ठभूमम साहहत्य समाज का दपिण माना जाता है । साहहत्य में वह सब कुछ होता है जो समाज में
हदखाई देता है । उपन्यास हवधा को तो वास्तहवक समाज का काल्पहनक हचत्रण ही माना
जाता है । इस दृहि से उपन्यास में हबना हकसी लाग लपेट के अपने समय के समाज का
सीधा सरल हचत्रण हकया जाता है । हकसी भी उपन्यास को जानने समझने और उसकी
समीक्षा करने के हलए उपन्यास की पृष्ठभूहम का जानना जरूरी होता है । साहहत्य काल
सापेक्ष होता है, हकसी भी रचना का अध्ययन अध्यापन करने से पूवि रचनाकार के समय की
पृष्ठभूहम तथा हवहवध पररहस्थहतयों को जान लेना उपयोगी होता है । साहहत्यकार की कृहत
उसके आसपास की पृष्ठभूहम का कलन होती है । कथा का आधार, पात्रो का चररत्र
हचत्रण, प्रसिंगों का हववेचन हवश्लेषण तथा लेखक का मिंतव्य आहद भी पृष्ठभूहम की ही उपज
होता है । इसहलए उपन्यास के मूल्यािंकन के हलए उसके समय की पृष्ठभूहम का पररचय
आवश्यक हो जाता है । वैसे तो जैनेद्र कुमार के उपन्यास बाह्य पृष्ठभूहम की अपेक्षा पात्रों की
मानहसक हस्थहत का सूक्ष्म हचत्रण करने वाले उपन्यास है । पात्रो की मानहसक हस्थहत भी
बाह्य पृष्ठभूहम से उत्पन्न होती है । वस्तुतः व्यहि का व्यहित्व बाह्य पररहस्थहतयों तथा
अिंतगित हवचारधारा से प्रस्फुहटत होता है । इसहलए मनोवैज्ञाहनक उपन्यास में भी उपन्यास
की पृष्ठभूहम का जान लेना आवश्यक हो जाता है |
त्यागपत्र उपन्यास चररत्र प्रधान लघु उपन्यास है । इस उपन्यास की कथा का सूत्रधार पात्र
प्रमोद अपनी बुआ मृणाल के सिंघषिशील जीवन को पाठकों के सामने खोलकर रखता है ।
स्वतिंत्र पूवि काल की पृष्ठभूहम पर हलखे गए इस उपन्यास में तत्कालीन समाज में नारी की
पररवार से लेकर समाज तक होने वाली उपेक्षा का हचत्रण हदखायी देता है । मृणाल बुआ घर
पररवार से लेकर ससुराल तथा पूरे समाज में उपेक्षा का हशकार होकर जीवन की अनेक
समस्याओिं से जूझती हुई जीवन का अहस्तत्व खो देती है । लेखक ने त्यागपत्र उपन्यास में munotes.in

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हवशेष अध्ययन : जेनेंद्र
6 तत्कालीन पृष्ठभूहम पर, हवहशि पररहस्थहत से हघरकर बचपन से लेकर मृत्यु के समय तक
उपेक्षा, प्रता ना का हशकार हुई नारी के जीवन की शोकािंहतका को हचहत्रत हकया है ।
तत्कालीन सिंयुि पररवार, समाज में प्रेम सिंबिंधों की उपेक्षा, अनमेल हववाह की अहभशप्त
हस्थहत तथा समाज में अकेली नारी की ओर देखने का भोगपरख दृहिकोण आहद हवहवध
पररहस्थहतयों को केंद्र में रखते हुए इस उपन्यास की रचना की है । तत्कालीन पुरानपिंथी
रूहढवादी समाज की पृष्ठभूहम में एक खुद्दार नारी पर हुए अन्याय, अत्याचार, शोषण-दमन
की कथा के रूप में मृणाल की कथा हचहत्रत की गई है । त्यागपत्र उपन्यास मनोवैज्ञाहनक
हवश्लेषणात्मक रुप में प्रमोद और उसकी मृणाल बुआ की मानहसक द्रिंद्र के साथ सामाहजक
पृष्ठभूहम का कलन करने वाला लघु उपन्यास है |
१.६ त्यागपत्र उपन्यास के पात्रों का पररचय जैनेंद्र कुमार के उपन्यासो में दाशिहनक और अध्याहत्मक तत्वों की प्रधानता रहती है । इन
तत्वों का समावेश अनेक प्रसिंगो और घटनाओिं के माध्यम से पात्रो के मानहसक सिंघषि में
रूपाहयत होता है । उनके उपन्यासों के पात्र बाहय वातावरण और पररहस्थहतयों से प्रभाहवत
ना होते हुए स्वयिं की अिंतमुिखी गहतहवहधयो से सिंचाहलत होते हैं । इनके उपन्यासों में
सामाहजक समस्या प्रधान उपन्यासों की तरह पात्रो की भरमार नहीं होती | इसके हवपरीत
हकसी एक केंद्रीय पात्र के मानहसक द्रिंद्र के कारण उनके पात्र प्रस्तुत होते हैं । त्यागपत्र लघु
उपन्यास भी इसके हलए अपवाद नहीं है । इस उपन्यास में मुख्य दो पात्र है - एक प्रमोद जो
अपनी मृणाल बुआ को लेकर आत्मा हवविंचना में डूबा हुआ है, तथा दूसरा पात्र मृणाल बुआ
है जो पाररवाररक तथा सामाहजक रूढीवादी व्यवस्था के फल स्वरुप अहभशप्त जीवन
हबताते हुए मर जाती है । इसके अलावा उपन्यास के पूवािधि में मृणाल की सहपाठी शीला
तथा उसका बड़ा भाई तथा मृणाल का प्रेमी का उल्लेख होता है, तो उत्तराधि में प्रमोद का
हमत्र सतीश, प्रमोद के फूफा, प्रमोद की माता-हपता, प्रमोद के हलए हववाह को ररश्ते के रूप
में राजनिंहदनी युवती, तथा राजनिंहदनी के डॉक्टर हपता और कभी न हुई प्रमोद की सास
उल्लेहखत होते है । प्रमोद के सिंयुि पररवार के सदस्यों का कथा में उल्लेख मात्र हदखाई
देता हैं ।
बुआ का भतीजा प्रमोद:
प्रमोद इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र तथा उपन्यास की कथा का सूत्रधार भी है । उपन्यास
के प्रारिंभ में वह घर पररवार सिंसार से हवरि अधेड़ उम का प्रौढ हचिंतनशील व्यहि बनकर
सामने आता है । प्रमोद की बातों से स्पि हो जाता है हक वह अत्याहधक मानहसक तनाव
और मानहसक द्रिंद्र से हघरा हुआ है । वह माता-हपता की इकलोती सिंतान है । वह मध्यम
वगीय रूहढवादी पररवार में बड़ा हुआ है । प्रमोद बचपन से ही भावुक और सिंवेदनशील है ।
वह बुआ के प्रहत सहज भाव का पररचय देता है । प्रमोद और बुआ के बीच बड़ा लगाव है,
उन दोनो के बीच भाई- बहन की तरह सिंबिंध हदखाई देता है । प्रमोद छोटी उम्र में ही समाज
के रीहत ररवाज, पाररवाररक मयािदा को जानता समझता है और समझदार लड़का प्रतीत
होता है । वह पढाई में कुशाग्र बुहद्ध बालक है, अपने इसी बुहद्धमत्ता के बल पर वह जज बन
जाता है । इस तरह प्रमोद आहथिक सामाहजक और व्यावहाररक स्तर पर एक सफल इिंसान
है। वह बाहर से हजतना स्वस्थ और सम्पन्न है, उतना ही बुआ को लेकर अस्वस्थ munotes.in

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम, पात्रों का पररचय और उपन्यास का सारािंश
7 तनावग्रस्त तथा हचिंताग्रस्त हदखाई देता है। प्रमोद के मानहसक सिंघषि, तनाव और हचिंता का
मुख्य कारण मृणाल बुआ है । प्रमोद उपन्यास के प्रारिंभ से लेकर अिंत तक बुआ के जीवन
सिंघषि को लेकर अत्यिंत तीव्र मानहसक तनाव और मानहसक सिंघषि से ग्रस्त हदखाई देता है ।
उपन्यास के अिंत में अपने बुआ के जीवन सिंघषि की शोकािंहतका के हलए प्रमोद अपराध का
बोध महसूस कर अपनी नौकरी से त्यागपत्र देता है ।
प्रमोद के व्यहित्व को इस उपन्यास केंद्र में रखकर हचहत्रत हकया गया है । उपन्यास के
प्रारिंभ से अिंत तक प्रमोद एक क्षण के हलए भी तनाव मुक्त हदखाई नहीं देता । इस तरह
प्रमोद का व्यहित्व एक हवहशि पररहस्थहत में हवहशि हवषय को लेकर हनरिंतर आत्म सिंघषि
करने वाले व्यहि का चररत्र है । प्रमोद पात्र के माध्यम से स्वतिंत्रपूवि काल के पररवार के हलये
वात्सल्य रखनेवाले युवक के चररत्र को हचहत्रत हकया गया है ।
१.६.१ उपन्यास की मुख्य पात्र मृणाल बुआ :
मृणाल बुआ इस उपन्यास की मुख्य पात्र है । उपन्यास के प्रारिंभ से लेकर अिंत तक लेखक
ने मृणाल के जीवन सिंघषि का बड़ा ही रृदयस्पशी हचत्रण हकया है । वह इस उपन्यास की
नाहयका है । यह उपन्यास मृणाल के चररत्र के हवहवध पहलुओिं को बड़े ही हजज्ञासापूणि ढिंग
से प्रस्तुत करता है । बुआ एक आम लड़की की तरह अपने भाभी-भाई तथा भतीजी के साथ
पररवार में रहती है, स्कूल जाती है, शरारत करते है । स्कूल की कक्षाओ में बदमाशी भी
करती है । वह एक भावुक लड़की है । वह अपनी सहेली के भाई से प्रेम करती है, उसका प्रेम
एक तरफा है । इसहलए वह उसमे सफल नहीं होती | उसके इसे प्रेम के मामले से ही उसके
जीवन में पररवतिन आता है । लोकलाज के कारण मृणाल के भाभी और भाई उसकी शादी
करते है । बुआ अनमेल हववाह क हशकार होती है । हववाह के उपरािंत मृणाल के जीवन की
शोकािंहतका का काल शुरू होता है । पहले तो वह ससुराल ही जाना नहीं चाहती, लेहकन
भाई-भाभी के सामने उसकी एक नहीं चलती है, और उसे ससुराल भेज हदया जाता है ।
उसका वैवाहहक जीवन उसके हलए अहभशाप बन जाता है । वह मािं तो बनती है लेहकन वहािं
भी उसका दुभािग्य पीछा नहीं छोडता, वह एक मृत कन्या को जन्म देती है । पहत द्रारा
अत्याचार सहते हुए वह बेहाल हो जाती है । पहत दुश्चररत्र का आरोप लगाकर मृणाल को
मायके च जाने के हलये कहता है । मृणाल के न मानने पर पहत उसे घर से हनकाल देता है।
कुछ समय तक पहत उसे गािंव के हकसी कोने में रखता है, प्रारिंभ में उसका पहत उसे आहथिक
सहायता देता है, हकिंतु कुछ समय बाद आहथिक सहायता देना बिंद कर देता है । आहथिक
सहायता के हबना मृणाल का बेहाल हो जाता है, हववशता में वह कोयले वाले की रखेल बन
जाती है । कोयले वाले से भी उसे कन्या होती है, आहथिक अभाव के कारण कन्या मर जाती
है, कुछ समय के हलये वह हशक्षक बन जाती है । हकिंतु वहािं से भी हनकाले जाने पर, जीवन
के आखरी समय में वह हकसी गिंदे इलाके में बस जाती है । वहीं उसकी मौत होती है |
ऊपर हलहखत पात्रो के साथ मृणाल की सहेली शीला, मृणाल का यार तथा शीला का बड़ा
भाई, प्रमोद का हमत्र सतीश, कोयलेवाला, राजनिंहदनी, राजनिंहदनी के हपता, प्रमोद का
वकील हमत्र आहद पात्रों का गौण रुप में पररचय हमलता है ।
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हवशेष अध्ययन : जेनेंद्र
8 १.७ त्यागपत्र उपन्यास का साराांश साहहत्यकार जैनेंद्र कुमार हहिंदी उपन्यास के इहतहास में मनोहवश्लेषणात्मक परिंपरा के
प्रवतिक के रूप में हवख्यात रहे है । उनका समग्र साहहत्य मानवीय मनोहवज्ञान और अिंतमुिखी
प्रवृहत्तको उद्घाहटत करने वाला साहहत्य है । उनका उपन्यास साहहत्य भी इसके हलए
अपवाद नहीं है । उनका त्यागपत्र उपन्यास भी इसी परिंपरा का प्रहतहनहधक उपन्यास है ।
केवल दो पात्रो को केंद्र मे रखकर हलखे गए इस उपन्यास में, उपन्यास का केंद्रीय पात्र व
सूत्रधार प्रमोद न्यायाधीश है, तथा न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देकर अपनी बुआ के जीवन
की ददि भरी कहानी को पूवि हदप्ती शैली में प्रस्तुत करता है । प्रमोद उपन्यास के शुरुआत में
ही तीव्र मानहसक सिंघषाि से गुजरते हुए अपनी बुआ तथा अपने पररवार का पररचय देता है |
प्रमोद के पररवार में प्रमोद और बुआ सबसे छोटे सदस्य है, मृणाल भले ही प्रमोद की बुआ
हो हकिंतु उन दोनो में केवल चार-पािंच वषो का अिंतर है, बुआ प्रमोद से केवल चार पािंच वषि
से ही बड़ी है । प्रमोद और मृणाल में बड़ा स्नेहमयी सिंबिंध है, बुआ, प्रमोद को अपने स्कूल
की हर छोटी बड़ी घटना बताती है, और प्रमोद भी बुआ की बातों को सरसता से सुनता है ।
इस तरह बचपन से ही प्रमोद और बुआ में आत्मीयता का घहनष्ठ सिंबिंध होता है । प्रमोद
अपने माता-हपता की अकेली सिंतान है, प्रमोद के घर में तत्कालीन पाररवाररक व्यवस्था के
अनुरूप अनुशासन की व्यवस्था है। वैसे तो प्रमोद के दो चाचा है और अन्य तीन बुआ भी
थी, हकिंतु आज घर मे वह केवल अपने माता-हपता और मृणाल बुआ के साथ रहता है ।
प्रमोद की मािं अनुशासन हप्रय गृहहणी है ।
मृणाल बचपन में बड़ी शरारती रही है । वह अपने भतीजे से बड़ा स्नेह रखती है । मृणाल
अपनी सहेली शीला के बड़े भाई से प्यार करती है । तत्कालीन समाज व्यवस्था तथा
पाररवाररक बिंधनों के कारण मृणाल का प्रेम असफल होता है । मृणाल के प्रेम की खबर
पररवार वालों को होते ही उसे स्कूल भेजना बिंद कर हदया जाता है, और उसकी यथाशीघ्र
शादी कर कर दी जाती है। मृणाल का हववाह अनमेल हववाह है, मृणाल को अपना पहत
हबल्कुल सुहाता नहीं है । मृणाल ससुराल जाना नहीं चाहती है, हकतु सनातनी आयि पररवार
की सनातनी परिंपरा की हशकार हो जाती है, मृणाल को ससुराल भेज हदया जाता है । प्रमोद
मृणाल को ससुराल भेजने के हखलाफ है, हकिंतु वह छोटा है इसहलए वह बेबस हो जाता है ।
मृणाल सप्ताह भर में ही ससुराल से लौट आती है, अनेक बहाने बनाकर ससुराल जाना नहीं
चाहती है, इसी बीच वह शीला के भाई को हचट्ठी हलखती है और हचट्ठी के जवाब में उदास हो
जाती है । अिंततः एक हदन मृणाल का अधेड़ उम्र का पहत उसे अपने घर ले जाता है ।
मृणाल के ससुराल जाने के बाद प्रमोद के घर से मृणाल की चचाि पर पूणि हवराम लग जाता
है, लेहकन प्रमोद मृणाल बुआ को हमेशा याद करता रहता है । ससुराल में मृणाल के जीवन
का अत्यिंत कहठन सिंघषि का अध्याय शुरू होता है, पहत उसे हपटता है, उसे मानहसक
यातनाएिं देता है, नौबत यहािं तक आ जाती है हक उसे मायके जाने के हलए कहा जाता है ।
इसी बीच वह एक मृत कन्या को जन्म देती है । मृणाल मायके जाने के हलये तैयार न होने
पर उसे घर से बाहर हनकाल कर हकसी और जगह रखा जाता है । शुरुआत में उसका पहत
उसका खचाि उठाता है । हकिंतु कुछ समय बाद पहत के मदद के सारे द्रार बिंद हो जाते है ।
णाल के हलए जीना मुहश्कल हो जाता है । इस हस्थहत में मृणाल हकसी कोयलेवाले की
रखैल बन जाती है । प्रमोद बड़ा हो जाता है बी. ए. की कक्षा में पढता है । हकिंतु बुआ को munotes.in

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम, पात्रों का पररचय और उपन्यास का सारािंश
9 लेकर हमेशा हचिंहतत रहता है । एक हदन उसे अपने हमत्र से बुआ के घर का पता हमल जाता
है, प्रमोद यथाशीघ्र बुआ के पास चला जाता है । बुआ एक गिंदी बस्ती के बदबूदार कोटरी में
रहती है । उसी कोटरी के बाहर कोयले की दुकान मैं कोयलेवाला व्यवसाय करता है, वह
बुआ की हालत देखकर अत्यिंत दुखी होता है और बुआ को अपने साथ चलने का आग्रह
करता है, बुआ को हपताजी के मृत्यु की खबर भी देता है । बुआ उसे अपनी कमि कहानी
सुनाते हुए कहती है हक अब वह सभ्य समाज में जाने के योग्य नहीं रही है । वह जानती है
हक एक हदन कोयलेवाला भी उसे छोड़ देगा, तब वह भगवान भरोसे जीवन हबताएगी | अब
उसकी दुहनया अलग हो गई है । प्रमोद बुआ की कुहटया से खाली हाथ लौट आता है |
कुछ समय बाद प्रमोद हफर से बुआ के गिंदे इलाके में जाता है, तब उसे वहािं वह कोयलेवाला
और बुआ दोनो हदखाई नहीं देते । वह जानता था हक बुआ मािं बनने वाली है, इसहलए वह
अस्पताल चला जाता है । अस्पताल की नसों द्रारा उसे पता चलता है की बुआ वहािं आई
हुई थी, और उसने कन्या को जन्म हदया था | वह अस्पताल वालों से नौकरी मािंग रही थी ।
अस्पताल की नसि ने बुआ को ईसाई धमि अपनाने का आग्रह हकया था और इसाई बनने के
बाद ही नौकरी हमलने की शति रखी गयी थी । बुआ ने उस शति को अस्वीकार करते हुए
अस्पताल छोड़ हदया था | प्रमोद अपने हलए आए हुए लड़की के ररश्ते के हसलहसले में
हकसी अन्य शहर जाता है तब उसे उसकी बुआ उस लड़की के घर में हदखाई देती है ।
लड़की की मािं बुआ तारीफ करते हुए बताती है हक बुआ उनके यहािं बच्चों को पढाने आती
है, और यहािं पास के स्कूल में वह अध्याहपका है | अगले हदन प्रमोद बुआ के घर चला जाता
है और बता देता है हक उसने बुआ को खूब ढूूँढा, अस्पताल भी गया, वहािं से भी पता चला
हक वहािं बुआ नहीं है । हफर एक बार प्रमोद बुआ को घर चलने का आग्रह करता है । हकिंतु
अब की बार भी बुआ प्रमोद के साथ जाने से इिंकार करती है ।
प्रमोद बुआ की कहानी कहते हुए थक जाता है, और अिंतमुिख होकर सोचने लगता है हक
उसके बुआ ने समिंदर रूपी समाज में छलािंग लगा दी है, और पानी के थपेड़ो से समिंदर की
गहराई में उतर गई है | अब उसका समिंदर के हकनारे लौटना सिंभव नहीं है । समाज के लोग
तो समुद्र के हकनारे ही बस जाते हैं वे समिंदर के गहराई में जाने से डरते हैं ।
उपन्यास के उत्तराधि मे प्रमोद कहता है हक उसने हफर एक बार अपनी बुआ को घर ले जाने
की कोहशश की थी हकिंतु जब वह बुआ के स्कूल चला गया, तब उसे वहािं बुआ नहीं हमली |
उसने अिंततः बुआ को एक ऐसी बस्ती में पाया जो सामाहजक प्रहतष्ठा की दृहि से बहहष्कृत
थी | प्रमोद ने वहािं भी बुआ को घर चलने की याचना की थी । हकिंतु बुआ ने कहा था हक अब
वह यहािं से तभी जा सकती है जब प्रमोद यहािं के लोगों को भी उसके साथ घर ले जाएगा |
इस तरह प्रमोद हर बार मृणाल बुआ को अपने घर ले जाने की कोहशश करता रहा और
बुआ हर बार जाने से इिंकार करती रही | बुआ के बीमार हो जाने पर प्रमोद उसे अस्पताल में
भती करना चाहता है हकिंतु बुआ मना करती है । प्रमोद आहखर अपने पररहचत वकील को
पैसे देकर बुआ की देखभाल के हलये कहता है ।
उपन्यास के अिंत में प्रमोद अपने और बुआ के ररश्ते को लेकर अत्यिंत सिंवेदनशीलता से
सोचने लगता है हक वह बुहद्धमान था या मूख था हजसने अिंत तक बुआ को घर ले जाने में munotes.in

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हवशेष अध्ययन : जेनेंद्र
10 सफलता नहीं पाई । अपनी इस आत्मग्लाहन में बुआ की मृत्यु की खबर से आत्मकेंहद्रत
होकर प्रमोद अपने न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देता है ।
त्यागपत्र उपन्यास आत्मकथनात्मक शैली मे हलखा गया लघु उपन्यास है । आठ खिंडो मे
हलखे गए इस उपन्यास का प्रारिंभ बुआ की मृत्यु की खबर से मानहसक रूप से अस्वस्थ
प्रमोद के पाप और पुण्य की समीक्षा करने से होता है । उपन्यास की कथा पूविहदपहत शैली मे
हलखी गई है ।
उपन्यास के प्रारिंभ से पूवि लेखक ने 'प्रारिंहभक, शीषिक देकर यह हलखा है हक यह कथा सर
एम. दयाल नामक प्रािंत के चीफ जज की कथा है, हजन्होंने जजी त्याग कर कई वषाां तक
हररद्रार में हवरि जीवन हबताया था | उनके स्वगिवास के दो महीनो बाद उनके सामान से
पाई गई पािंडुहलहप का ही प्रस्तुतीकरण यह उपन्यास है । उपन्यास में आवश्यकतानुसार
स्थानों और व्यहििंयो के नाम बदले या कम कर हदए हैं । इससे पता चलता है हक यह
उपन्यास बुआ-भतीजे के अद्भुत आत्मीय सिंबिंधों की कथा है, हजसमें मृणाल बुआ के
जीवन सिंघषि की अद्भुत कथा है ।
१.८ लघुत्तरीय प्रश्न १. त्याग-पत्र उप स का प्रकाशन कब हुआ है?
उत्तर: १९३७
२. त्याग-पत्र उप स की नाहयका हकस से प्रेम करती है?
उत्तर: सहेली शीला के भाई से ।
३. त्याग-पत्र उप स का पात्र प्रमोद हकस पद से इस्तीफा देता है?
उत्तर: याधीश
४. त्याग-पत्र उप स का पात्र प्रमोद उप स के प्रारिंभ में हकस की समीक्षा को लेकर
अपनी असमथिता प्रकट करता है?
उत्तर: पाप-पूण्य की ।
५. ग-पत्र उप स की पात्र मृणाल की सहेली हकस अ पक की कुसी की गद्दी में
हपन चुभोकर रख देती है?
उत्तर: गहणत हवषय के अ पक ।
६. ग-पत्र उप स का पात्र हकसके जीवन की कमि कहानी वणिन करता है?
उत्तर: अपनी बुआ की ।
७. ग-पत्र उप स के पात्र मृणाल और प्रमोद के बीच रर था?
उत्तर: बुआ-भ जे का रर । munotes.in

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त्याग पत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम, पात्रों का पररचय और उपन्यास का सारािंश
11 १.९ दीघोत्तरीय प्रश्न १. ग-पत्र उप स के क य पात्र प्रमोद की मनोदशा और मनोव्य पर प्रकाश
डाहलए ।
२. ग-पत्र उप स की नाहयका मृणाल बुआ की चाररहत्रक हवशेषताएिं हलहखए ।
३. त्यागपत्र उपन्यास की प्रमुख पात्र पर हवस्तृत हववरण दीहजए ।
४. त्यागपत्र उपन्यास की पृष्ठभूहम को समझाइए ।
५. त्यागपत्र उपन्यास का सारािंश अपने शब्दों में हलहखए ।


*****


munotes.in

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12 २
Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत
समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
इकाई कì łपरेखा
२.१ इकाई का उĥेÔ य
२.२ ÿÖ तावना
२.३ उपÆ यास का शीषªक
२.४ Â याग-पý उपÆ यास म¤ िचिýत समÖ याएं
२.४.१ łिढवाद पåरवार ÓयवÖथा म¤ नारीवगª कì भावनाओं कì उपे±ा कì समÖया
२.४.२ अनमेल िववाह कì समÖया
२.४.३ आिथªक Öतर पर परा®ियता कì समÖया
२.५ Â याग-पý उपÆ यास का उĥेÔ य
२.६ संदभª सिहत Ó या´ या
२.७ लघुÂ तरी ÿÔ न
२.८ दीघōÂ तरी ÿÔ न
२.९ अÅ ययन हेतु संदभª úंथŌ कì सूची
२.१ इकाई का उĥेÔ य इस इकाई के माÅ यम से छाý िनिÌ न िलिखत मुĥŌ से अवगत हŌगे ।
१. Â याग-पý उपÆ यास के संदभª म¤ रचना का शीषªक तथा उसकì साथªकता तथा समी±ा
का पåरचय ।
२. Â याग-पý उपÆ यास म¤ िचिýत मनोवै²ािनक तथा सामािजक समÖ याओं का पåरचय ।
३. उपÆ यास तÂ वŌ के आधार पर Â यागपý उपÆ यास कì समी±ा तथा उĥेÔ य का पåरचय ।
४. पåर±ा कì ŀिÕ ट से उपÆ यास पर लघु तथा दीघōÂ तरी ÿÔ नŌ का Ö वłप ।
५. Â यागपý के उपÆ यास के िवÖ तृत अÅ ययन हेतु संदभª úंथŌ कì सूची ।
२.२ ÿÖ तावना िहंदी उपÆ यास का उĩव और िवकास आधुिनक काल म¤ हòआ है । मुþण कला का अिधकार,
लेखन सामúी कì सुलभता से उपलÊ धता, पाÔ चाÂ य सािहÂ य का देशीय भाषाओं म¤
अनुवाद, आधुिनक काल म¤ राजनीितक सामािजक सांÖ कृितक आंदोलनŌ का ÿभाव और
नई िश±ा पĦित का ÿारंभ इन सबकì िøया ÿितिøया के łप म¤ गī सािहÂ य का उĩव munotes.in

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Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
13 और िवकास हòआ माना जाता है । िहंदी उपÆ यास भी इसके िलए अपवाद नहé है । िहंदी
उपÆ यास कì परंपरा म¤ इन सबका ÿभाव िदखाई देता है । िहंदी उपÆ यास का भले ही सवा
सौ वषō से भी कम काल का रहा हो, िकंतु उपÆ यास का िवकास िजस सं´ याÂ मक और
गुणाÂ मक łप म¤ हòआ है उतना अÆ य िवधाओं का संभवत: नहé है । िहंदी उपÆ यास म¤ िजस
गित से कÃ य िशÐ प और रचना शैली म¤ पåरवतªन हòए उतनी गī कì अÆ य िवधाओं म¤
िदखाई नहé देते । िहंदी उपÆ यास म¤ समय-समय पर कÃ य िशÐ प म¤ पåरवतªन होते हòए
िदखरई देते ह§ । इस पåरवतªन ÿिøया के ÿणेता के łप म¤ अनेक ÿितभा संपÆ न
सािहÂ यकारŌ का िहंदी उपÆ यास सािहÂ य म¤ आिवभाªव हòआ । जैन¤þ कुमार उनम¤ से एक
उÐ लेखनीय सािहÂ य का र रहे है ।
इÆ हŌने िहंदी उपÆ यास सािहÂ य म¤ मनोवै²ािनक और मनोिवÔ लेषणाÂ मक परंपरा का आगाज
िकया, और उसम¤ सफल रहे ।
इनके सािहÂ य म¤ तÂ कालीन समय कì बदलती हòई पåरिÖ थ ितयŌ के फल Ö वłप पाýŌ के
मानस म¤ होने वाले अंतगªत संघषª को शÊ दबध् द िकया गया है । इनके पाýŌ के िचýण म¤
भौितक गितिविधयŌ कì अपे±ा मानवीय मनोिव²ान को अंिकत करने का ÿयास िकया गया
है । ‘Â यागपý’ उपÆ यास उनकì ÿितिनिध रचना है, इस उपÆ यास के केिÆþय पाý ÿमोद के
मानिसक संघषª और ĬंĬ के माÅ यम से तÂ कालीन समाज Ó य वÖ था कì ओर संकेत िकया
गया है । आठ खंडŌ म¤ िलखे गए इस उपÆ यास म¤ ÿारंभ से अंत तक ÿमोद के मानिसक ĬंĬ
को शÊ दबĦ िकया गया है । उपÆ यास म¤ िचिýत सामािजक समÖ याएं ÿमोद के मानिसक ĬंĬ
को गितशील बनाती ह§, और ÿमोद अपनी इसी सामािजक समÖ या कì ओर पाठकŌ का
Å यान क¤िþत करता है । वैसे तो इसम¤ पाåरवाåरक Ö तर तक कì चुिनंदा समÖ याओं कì
झलक िदखाई देती है, िकंतु वे ÿमोद के मानिसक संघषª के पीछे छुपी हòई नजर आती है ।
२.३ ‘ यागपý’ उपÆ यास का शीषªक शीषªक रचना का ÿवेशĬार होता है । काÓ यशाÖ ý कì माÆ यता नुसार शीषªक संि±È त,
आकषªक, िज²ासापूणª, कुतूहलतावधªक तथा कथावÖ तु का संकेत देनेवाला होना चािहए ।
शीषªक पढ़कर पाठक उपÆ यास पढ़ने के िलए उÂ सुक होना चािहए । इन सभी ŀ िĶयŌ से
शीषªक का रचना के िलए अपना महÂ व होता है । इसीिलए रचनाकार रचना के शीषªक के
संदभª म¤ अिध क सतकª, सचेत होता है । रचना कì समी±ा म¤ शीषªक का अपना महÂ व होता ।
जैन¤þ के ÿाय: सभी रचनाओं के शीषªक उपयु³ त माÆ यता के अनुसार संि±È त आकषªक
कुतुहलतापूणª और िज²ासापूणª िदखाई देते ह§ । Â याग-पý उपÆ यास भी इसके िलए अपवाद
नहé है ।
‘Â याग-पý’ उपÆ यास का शीषªक उपयु³ त सभी माÆ यताओं का िनवाªह करनेवाला शीषªक है ।
 याग-पý शीषªक को पढ़ते ही पाठकŌ के मन म¤ िकसका, कैसा, और ³ यŌ आिद ÿÔ न
उÂ पÆ न होते ह§ । िसफª साडे चार शÊ दŌ म¤ इस शीषªक कì रचना हòई है । Â यागपý यह शÊ द
िकसी गंभीर िÖ थित का संकेत भी करता है, तथा इस उपÆ या स म¤ उÂ पÆ न हòई गंभीरता का
संकेत देता है । इस तरह कलाÂ मक और भावाÂ म क दोनŌ ŀिÕ ट यŌ से यह शीषªक साथªक
लगता है । उपÆ यास का क¤þीय पाý ÿमोद अपनी मृणाल (बुआ) को लेकर मानिसक संघषª munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
14 से गुजरते हòए उपÆ यास कì कथा के अंत म¤ Æ यायाधीश पद से अपने Â यागपý कì घोषणा
करता है । इस तरह उपÆ यास कì पूरी कथा म¤ Â यागपý का संकेत और अंत म¤ ÿÂ य±
पåरचय के माÅ यम से Â यागपý शीषªक साथªक ÿतीत होता है । उपÆ यास के अंत म¤ ÿमोद कì
कहé गयी अंितम पंि³ त याँ –“अब सुनो म§ यह जजी छोड़ता हóं । जगत का आरंभ समारंभ ही
छोड़ दूंगा । औरŌ के िलए रहना तो शायद नए िसरे से िसखा न जाय । पुनÔ च इसी के साथ
अपनी जजी से अपना Â यागपý म§ने दािखल कर िदया है ।‘’ यह अंितम पंि³ त याँ पाठकŌ कì
िज²ासा का समाधान करती ह§ ।
 यागपý उपÆ यास का शीषªक उपÆ यास कì कथा वहन करता है । क¤þीय पाý ÿमोद कì
मानिसक संघषª का कथा के अंत म¤ एक अलग ढंग से समाधान ÿÖ तुत िकया गया है ।
वÖ तुत: यह Â यागपý ÿमोद के िसफª Æ यायाधीश पद का Â या ग पý नहé है, बिÐ क भौतक
और पाåरवाåरक जगत के समÖ त संबंधŌ का भी Â यागपý ÿतीत होता है । ÿमोद के अपनी
मृणाल बुआ के जीवन संघषª से मन म¤ उÂ पÆ न मानिसक ĬंĬ को भी इस Â याग पý के साथ
 याग देने का संकेत िमलता है । उपÆ यास कì कथा के मÅ य म¤ ÿमोद Ö वयं कथा क हते
कहते थक जाता है, िकंतु Â यागपý कì खबर देने के िलए िक वह मÅ य से कथा के समािÈ त
कì ओर बढ़ता है । उपÆ यास का शीषªक Â यागपý तÂ कालीन समाज म¤ नारी समाज पर होने
वाली उपे±ा, ÿताइना, अÆ याय, अÂ याचार, शोषण आिद का Â या गपý देने कì तरफ भी
संकेत करता है । इस तरह काÓ यशाÖ ý कì माÆ यता तथा कलाÂ म कता और भावाÂ म कता
आिद सभी ŀिÕ ट यŌ से ‘Â यागपý’ शीषªक साथªक ÿतीत होता है, तथा अपनी सा थªकता का
पåरचय देता है ।
२.४ Â यागपý उपÆ यास म¤ िचिýत समÖ याएं सािहÂ य समाज का दपªण होता है । सािहÂ य म¤ समाज कì łिढ़यŌ, परंपराओं, माÆ यताओं,
जीवन-यापन पĦितयŌ तथा कथा से संबंिध त समÖयाओं का िचýण होता है । इस तरह
सािहÂ यकार अपनी कथा , पाý, पåरवेश, घटनाओं, और ÿसंगŌĬारा अपने समय कì
समÖ याओं का ÿÂ य± या परो± łप से िचýण करता है । उपÆ यास को ग़ī का महाकाÓ य
माना जाता है । इस ŀिÕ ट से उपÆ यास म¤ अपने समय को समाज कì िविवध पåरिÖ थ ितयŌ
का िचýण िवÖ ता र से िकए जाने कì गुंजाइश रहती है । उपÆ यासकार इसका लाभ उठाते हòए
अपने कथानक म¤ मु´ य कथा के साथ अनेक उप-कथाओं के माÅ यम से समाज कì िविभÆ न
समÖ याओं का िचýण कर सकता है । उपÆ यास को वाÖ तिवक समाज का काÐ प िनक िचý
माना जाता है । इसिलए उपÆ यास म¤ ग़ī कì अÆय िवधाओं कì तुलना म¤ समाज का अÂ यंत
िनकटता से िचýण िदखाई देता है । उपÆ यास अपनी रचना म¤ अपने समाज के िविवध
समÖ याओं का िचýण करता है । िवशेषता सामािजक उपÆ यासŌ म¤ समाज के िविवध
समÖ याओं का िवÖ तार से िचýण िदखाई देता है । जैन¤þ जी के उपÆ यासŌ म¤ सामािजकता
के Ö थान पर मनोिव²ान और मनोिवÔ लेषण का सूà म िचýण िदखाई देता है । उनके
उपÆ यासŌ म¤ सामािजकता के Ö थान पर बाĻ पåरिÖ थ ितयŌ से उÂ पÆ न मानवीय मानस कì
ĬंĬाÂ मक संघषªशील मनिÖ थ ित का िचýण िदखाई देता है । जैन¤þ ने मानवीय मानिसक
संघषª का मूल कारण पाýŌ से जुड़ी हòई बाĻ पåरिÖ थितयŌ को माना है । जैन¤þ के पाý
िविशÕ ट बाĻ पåरिÖ थ ित म¤ फंसकर आÂ म क¤िþत हो जाता है, और अपने अंतमªन म¤ उÂ पÆ न
संघषª, ĬंĬ और आÂ म क¤िþत िÖ थित कì अिभÓ य ि³ त करते ह§ । वÖ तुत: पाýŌ के मानिसक munotes.in

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Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
15 संघषª का मूलाधार बाĻ पåरिÖ थितयां होती ह§, यह पåरिÖ थितयां असल म¤ तÂ कालीन
समाज म¤ उÂ पÆ न िविवध समÖ या एं ही होती ह§ । मनोवै²ािनक िवÔ लेषणाÂ मक उपÆ यास के
पाý, बाĻ पåरिÖ थितयŌ के पåरणाम Ö वłप आÂ म क¤िþत होकर आÂ म संघषª म¤ उलझे हòए
िदखाई देते ह§ । पाýŌ कì मानिसक िÖ थितयŌ का मूलाधार सामािजक समÖ याएं होती ह§ ।
इस तरह लेखक पाýŌ कì मानिसक संघषª Ĭारा समाज कì िविवध समÖ याओं का िचýण
करता है । इस तरह जैन¤þ कì औपÆ यािसक कृितयŌ म¤ तÂ कालीन समाज के िविवध
समÖ याओं का िचýण िकया गया है ।
 यागपý उपÆ यास आ मकथा मक शैली म¤ िलखा गया नाियका ÿधान उपÆ यास है ।
उपÆ यास कì नाियका मृणाल (बुआ) के िनरंतर संघषªशील अिभशÈ त जीवन कì कमª कहानी
को कथा सूýधार तथा मृणाल बुआ का भतीजा ÿमोद िविशÕ ट मानिसक संघषªरत िÖ थित म¤
वणªन करता है । उपÆ यास के ÿारंभ से लेकर अंत तक ÿमोद अपनी बुआ के जीवन संघषª
कì कथा वणªन करता है । ÿमोद Ö वयं को बुआ के अिभशÈ त जीवन के िलए उÂ तरदायी
अनुभव करता है, और तÂ कालीन सामािजक Ó य वÖ था को भी बुआ कì अिभशÈ त िÖ थित के
िलए िजÌ मेदार मानता है । इस तरह ÿमोद, बुआ के अिभशÈ त जीवन के माÅ यम से
तÂ कालीन सामािजक Ó य वÖ था म¤ उÂ पÆ न िविभÆ न समÖ याओं कì ओर पाठकŌ का Å यान
आकिषªत करता है । लेखक ने बुआ के माÅ यम से तÂ कालीन समाज म¤ िदखाई देनेवाली
नारीजगत कì िविभÆ न समÖ याओं को बुआ के अिभशÈ त जीवन के माÅ यम से उजागर िकया
है । ÿमोद बुआ कì कमª कहानी के माÅ यम से Â यागपý उपÆ यास म¤ पाåरवाåरक Ö तर से
सामािजक Ö तर तक कì नारी जीवन से संबंिधत िविभÆ न समÖ याओं का िचýण करता है ।
 यागपý उपÆ यास म¤ िचिýत समÖ याएं िनÌ निलिखत ह§।
२.४.१ łिढवादी पåरवार Ó य वÖ था म¤ नारी वगª कì भावनाओं कì उपे±ा कì समÖ या:
भारतीय पåरवार Ó य वÖ था भले ही िवÔ व म¤ गौरवशाली Ó यवÖ था मानी जाती हो । पाåरवाåरक
Ö तर पर पåरवार के सदÖ यŌ के बीच घिनÕ ठता आÂ मीयता परÖ पर समपªण भाव जैसे पåरवार
के आदशª गुण हो, िकंतु पाåरवाåरक Ö तर पर नारी के ÿित उपे±ा भाव िदखाई देता है ।
पाåरवाåरक Ö त र पर नारी का िनणªय स±म नहé माना जाता । उसे केवल पåरवार कì इº जत
के ÿतीक के łप म¤ देखा जाता है । उसकì मजê का कोई खयाल नहé रखा जाता ।
तथाकिथत पाåरवाåरेक माÆ यताओं, परÌ पराओं, łिढयŌ का पालन उसके िलए पाåरवाåरक
Ö तर पर अिनवायª हो जाता है । आज आधुिनक समाज म¤ भी इसका ÿचलन िदखाई देता है।
लेखक ने उपÆ यास के पाý मृणाल के माÅ यम से पाåरवाåरक Ö तर पर उÂ पÆ न नारी कì इस
गंभीर समÖ या को अधोरेिखत िकया है । मृणाल मातृ-िपतृ िवहीन के łप म¤ अपने भाई-भाभी
और भतीजे ÿमोद के साथ रहती है । उसका अपनी भाभी के साथ वही åरÔ ता है, जो
सिदयŌ से भारतीय पåरवारŌ म¤ बना हòआ है । मृणाल के पåरवार म¤ उसके भाभी कì िनरंकुश
सता होती है । िजसके फलÖ वłप मृणाल पर कठोर अनुशासन लगा होता है । जब मृणाल
का अपनी सहेली शीला के भाई के साथ का ÿेम का मामला पåरवार को पता चलता है, तब
मृणाल का Ö कूल जाना बंद कर िदया जाता है । उसे अपने ÿेम संबंध के कारण पåरवार म¤
शारीåरक और मानिसक यातनाएं दी जाती ह§ । और अंत म¤ िकसी अधेड़ उă के िवधुर के
साथ उसका िववाह िकया जाता है यतीम मृणाल पर कोई दया नहé िदखाता । उसके जीवन
का बड़ी कठोरता से िनणªय िलया जाता है । मृणाल ससुराल जाना नहé चाहती है, िकंतु munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
16 पåरवार म¤ से कोई मृणाल को ससुराल म¤ न जाने कì वजह तक नहé पूछता है । उसे
ससुराल जाने के िलए मजबूर िकया जाता है । मृणाल कì पåरवार Ó यवÖ था के माÅ यम से
तÂ कालीन समय म¤ सनातनी भारतीय पåरवारŌ म¤ िदखाई देने वाली नारी के ÿित उपे±ा का
भाव समÖ या का बड़े ही मािमªक ढंग से िचýण िकया है । तÂ कालीन समाज म¤ पाåरवाåरक
Ö तर पर नारी कì आशाओं इ¸ छाओं मनोरथŌ कì अपे±ा सामािजक पूरानी परंपरा को
अिधक महÂ व िदया जाता था । इस तरह पाåरवाåरक Ö त र पर नारी कì गंभीर समÖ या
उÂ पÆ न हो गई थी । लेखक ने इस समÖ या कì ओर पाठकŌ का Å यान क¤िþत िकया है ।
वÖ तुत: यह समÖ या उपÆ यास कì क¤िþय समÖ या है ।
२.४.२ अनमेल िववाह कì समÖ या:
Ö वतंý पूवª िहंदी कथा सािहÂ य म¤ अनमेल िववाह कì समÖ या पर अनेक उपÆ यास िलखे
गएह§ । जैन¤þ ने ‘Â यागपý’ उपÆ यास म¤ तÂ कालीन समाज कì इस गंभीर समÖ या और उसके
दुÕ पåरणाम कì ओर पाठकŌ का Å या न क¤िþत िकया है । जमéदारी ÿथा, बहòपिÂनÂ व कì ÿथा,
एकािधकार शासन Ó य वÖ था तथा पूłष ÿधान पåरवार Ó यवÖ था आिद के कारण उÂ पÆ न
अनमेल िववाह कì समÖ या तथा असके भीषण दुÕ पåरणाम का बड़ा ही Ćदय Ö प शê िचýण
इस उपÆ यास म¤ िदखाई देता है । मृणाल के ÿेम कì सजा मृणाल का िववाह बन जाती है,
और मृणाल के पåरवार वाले मृणाल का िववाह िकसी अधेड़ उă के िवधुर Ó यि³ त से कर देते
है । तÂ कालीन समाज म¤ ÿचिलत यह भीषण समÖ या से नारी जीवन िकस तरह है तबाह
और बबाªद हो जाता था, इसका ĆदयÖ प शê िचýण इस उपÆ या स म¤ िकया गया है । मृणाल
िववाह के समय से ही अपने पित से नफरत करती है, िकंतु उसी पित के पास जबरदÖ ती
उसे भेज िदया जाता है । वैसे तो मृणाल के पित का चåरý उपÆ यास म¤ िचिýत नहé िकया
गया है, िकंतु मृणाल और ÿमोद के संवादŌ Ĭारा मृणाल के पित कì कठोरता और पÂ नी पर
आिधपÂ य जमाने कì वृिÂ त का पåरचय िमलता है । िववाह उपरांत पÂ नी के चåरý पर लांछन
लगाकर घर से िनकालने त क ही पित का पåरचय िमलता है । पित कì कठोरता से मृणाल
का वैवािहक जीवन समाÈ त हो जाता है । उसके बाद वह कटी पतंग कì तरह पåरिÖ थितयŌ
से िहलकोरे खाती हòई वेÔ या बÖ ती तक पहòंच जाती है । इस तरह मृणाल कì अिभशÈ त
वैवािहक जीवन के माÅ यम से लेखक ने अनमेल िववाह कì गंभीर समÖ या का िचýण िकया
है ।
 पåरवाåरक Ö त र पर नारी को जीवन के अहम् िनणªय लेने के अिधकार से वंिचत रखे
जाने कì समÖ या:
भारतीय पåरवार Ó य वÖ था म¤ नारी के ÿित उदासीनता का भाव िदखाई देता है । पåरवार म¤
उसके Ö थान, मान सÌ मान को लेकर हमेशा से उपे±ा कì भावना िदखाई देती है । नारी
जीवन के हर छोटे-बड़े िनणªय पाåरवाåरक Ö तर पर पुłष वगª Ĭारा ही िलए जाते है । पुłष
वगª हमेशा से और इस पुłषÿधान ÓयवÖ था के िलए अनुकूल ही िनणªय लेता आ रहा है ।
इस िनणªय का भीषण पåरणाम नारी को ही भुगतना पड़ता है । जीवन म¤ िववाह जैसे अÂ यंत
महÂ वपूणª िनणªय के संबंध म¤ नारी को पूछा तक नहé जाता रहा है । Â यागपý उपÆ यास म¤
इसी पाåरवाåरक Ö त र कì समÖ या को अधोिलिखत िकया गया है । Â यागपý उपÆ यास के
पाý मृणाल के साथ भी ऐसा ही होता है । जीवनसाथी का चयन करने कì बात तो दूर munotes.in

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Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
17 मृणाल का िववाह ऐसे Ó यि³ त के साथ िकया जाता है िजससे वह नफरत करती है । िववाह
के बाद भी मृणाल ससुराल जाना नहé चाहती है, िकंतु जोर जबरदÖ ती से मृणाल को
ससुराल भेज िदया जाता है । Ö वतंýपूवª काल कì यह एक महÂ वपूणª समÖ या थी, िजसे
लेखक ने सूचकता के साथ अधोरेिखत िकया है । मृणाल नारी सुलभ भावजगत म¤ जगत म¤
ÿेम िववाह के सपने देखती है, िकंतु वाÖ तव म¤ उसे अपने मन के िवłĦ अधेड़ उă के िवधुर
से िववाह करना पड़ता है ।
२.४.३ आिथªक Ö तर पर परा®ियता कì समÖ या :
Ö वतंýपूवª काल म¤ भारतीय नारी कì दुिनया चार िदवारी के अंदर होती थी । वह पूणªत:
आिथªक ŀिÕ ट से पåरवार के पुłष पर िनभªर होती थी । इसिलए उसे पåरवार के मुिख या
पुłष के हर अ¸ छे बुरे आदेश का चुपचाप पालन करना पड़ता था । उपÆ यास कì नाियका
मृणाल अपने घर पåरवार से लेकर ससुराल तक के जीवन म¤ आिथª क ŀिÕ ट से आÂ म िनभªर
नहé होती है । पित के घर से िनकाल िदए जाने पर अपने पापी पेट कì आग बुझाने के िलए
उसे िकसी कोयलेवाले कì रखैल बनना पड़ता है । कोयलेवाले के Â याग देने पर वह कुछ
समय के िलए Ö कूल कì अÅ यािपका बनकर तथा आसपास के ब¸ चŌ कì पढ़ाई लेकर आÂ म
िनभªर बनने का ÿयास करती है, िकंतु वह सफल नहé होती । अंतत: मृणाल को वेÔ या बÖ ती
म¤ शरण लेनी पड़ती है । इस तरह जैन¤þ ने Ö वतंýपूवª काल कì आिथª क ŀिÕ ट से परावलंबी
होने कì नारी समÖ या को तथा उसके पåरणामŌ को उĦृत िकया है ।
इस तरह Â याग-पý उपÆ यास म¤ तÂ कालीन पाåरवाåरक Ö त र से लेकर सामािजक Ö तर तक
उÂपÆ न नारी जीवन कì िविभÆ न समÖ याओं का िचýण िकया गया है ।
२.५ Âयाग-पý उपÆ यास का उĥेÔ य सािहÂ य का उĥेÔ य ‘मनोरंजन करना’ माना जाता है । िकंतु सािहÂ य केवल मनोरंजन नहé
करता बिÐ क मनोरंजन के साथ-साथ Ó यि³ त और समिÕ ट का ÿबोधन और मागªदशªन
करता है । आचायª हजारी ÿसाद िĬवेदी ने सािहÂ य को ‘मनुÕ य कì सवōÂ तम कृित’ कहा है ।
वैसे तो सािहÂ य मानवीय अनुभूित कì अिभÓ यि³ त होता है । िकंतु वह मानवीय जीवन मूÐ यŌ
कì ÿितÕ ठान करने का ÿयास होता है । रचनाकार अपनी अनुभूित को संवेदना और भावना
के माÅ यम से तरह ÿÖ तुत करता है िक वह साधारणीकरण को ÿाÈ त करती है । लेखक कì
अनुभूित पाठकŌ कì अनुभूित से एकाकार हो जाती है । रचनाकार अपनी रचना म¤ िकसी न
िकसी उĥेÔ य पूितª जłर करता है । युग ÿवतªक सािहÂ यकार मनोरंजन के साथ अपने युग
का बोध कराता है । उसके सािहÂ य म¤ उसका संपूणª युग समािवÕ ट होता है । जैन¤þ कुमार
को भी युग ÿवतªक सािहÂ यकार माना जाता है । उÆ हŌने अपने उपÆ यासŌ म¤ सामािजक
समÖ याओं के Ö थान पर मनोवै²ािनक, मनोिवÔ लेषणाÂ मक िवषय को लेकर मनोवै²ािनक
सािहÂ य कì परंपरा का िवकास िकया । जैन¤þ कुमार के सभी उपÆ यास सोĥेÔ यपूणª उपÆ यास
है । इÆ हŌने अपने उपÆ यास म¤ जहां एक ओर मानवीय मानस कì संघषªशील िÖ थित का
िचýण िकया वहां दूसरी ओर तÂ कालीन सामािजक समÖ या ओं कì ओर भी संकेत िकया है ।
‘Â याग-पý’ उपÆ यास उनकì इसी परंपरा का पåरचय देने वाला उपÆ यास है । इस उपÆ यास
का क¤िþय पाý ÿमोद िविशÕ ट आÂ म संघषª म¤ फंसकर, अपनी बुआ कì मृÂ यु से आहत munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
18 होकर आÂ मµ लािन म¤ अपनी नौकरी से Â यागपý देता है । पूरे उपÆ यास म¤ ÿमोद का
मानिसक संघषª गितशील होता है । ÿमोद बुआ कì मृÂ यु कì खबर से आÂ म क¤िþत होकर
बुआ के िबताए गए जीवनपट को पाठकŌ के सामने रखता है । बुआ के जीवन को लेकर वह
समझ नहé पाता िक बुआ पापी थी या पुÁ यवान थी । इसका िनणªय वह पाठकŌ पर छोड़
देता है । ÿमोद अपनी बुआ के बचपन से लेकर मृÂ यु तक कì ÿमुख घटनाओं को पाठकŌ के
सामने रखते हòए Ö वयं का बुआ के साथ होने वाला घिनष् ठ संबंध उजागर करता है । ÿमोद
बुआ के जीवन कì शोकांितका के िलए जहां एक ओर खुद को अपराधी मानते अपराध बोध
से Â यागपý देता है, वहां दुसरी ओर बुआ के जीवन कì शोकांितका के िलए पाåरवाåरक
Ó यवÖ था से लेकर łिढ़यŌ परंपराओं ओर सामािजक Ó यवÖ था को कटघरे म¤ खड़ा करता है।
लेखक ने इस उपÆ यास के माÅ यम से मृणाल बुआ के अिभ शÈ त जीवन संघषª से संबंधीत
अनेक पहलुओं का िचýण िकया है । जैसे िक Ö वयं कì दाियÂ वहीनता, अपने िपता कì
łिढवािदता, अपनी माता कì आयª समाज गृिहणी कì अनुशासन Ó यवÖ था, मृणाल के जीवन
म¤ उÂपÆन िविवध पåरिÖ थ ितयां तथा Ö वयं मृणाल कì शंकाओं और ÿÔ नŌ को उĤािटत
करने म¤ लेखक सफल रहा है । लेखक ने उपयुª³ त मुĥŌ के माÅ यम से भारतीय आयª समाज
म¤ पुरानी परंपराओं और माÆ यताओं के पåरणाम Ö वłप भारतीय समाज Ó य वÖ था म¤
पाåरवाåरक Ö त र से लेकर सामािजक Ö तर पर Ó यि³ त यŌ के जीवन म¤ होने वाली िविवध
समÖ याओं को उĤािटत िकया है । इस तरह Â यागपý उपÆयास पाýŌ के मनोवै²ािनक
मनोिवÔ लेषणाÂ मक िचýण के साथ तÂ कालीन समाज म¤ उÂ पÆ न नारी जाित कì समÖ या ओं
का यथाथª िचýण करने वाला सोĥेÔ यपूणª उपÆ यास है ।
२.६ संदभª सिहत Ó या´ या- (उदाहरण सिहत ) “हाँ िचिड़या । उसके छोटे छोटे पंख होते है, पंख खोल वह आसमान म¤ िजधर चाहे उड़
जाती है । ³ यŌ रे कैसी मौज है । नÆ ही-सी िचिड़या, नÆ हé सी पूँछ । म§ िचिड़या बनना चाहती
हóं ।”
ÿसंग: संदभª के िलए िदया गया अवतरण “Â याग-पý उपÆ यास का गīांश है । इसके
रचनाकार आधुिनक िहंदी सािहÂ य के मनोवै²ािनक िवÔ लेषणाÂ मक उपÆ यासकार जैन¤þ है ।
आÂ मकथनाÂ मक शैली म¤ िलखे गए इस उपÆ यास म¤ मृणाल नामक पीिड़ता के जीवन संघषª
कì कथा का िचýण िकया गया है । Â याग-पý लघु उपÆ यास है । ८ लघु खंडŌ म¤ िलखे इस
उपÆ यास म¤ Ö वतंýपूवª काल कì भारतीय नारी के जीवन से जुड़ी हòई अनेक समÖ याओं का
उĤाटन िकया गया है । संदभª का अवतरण उपÆ यास ÿथम खंड से िलया गया संवाद है।
यह संवाद उपÆ यास के दो महÂवपूणª पाýो के बीच का संवाद है । यह उपÆ यास के दो ÿमुख
पाý - एक कथा सूýधार ÿमोद और उपÆ यास कì नाियका मृणाल के बीच का संवाद है ।
उपÆ यास कì नाियका मृणाल यतीम है । उसके मां-बाप नहé है । वह अपने भाई और भाभी
के साथ अपने भतीजे ÿमोद के साथ रहती है । ÿमोद उससे केवल चार-पांच साल से ही
छोटा है । पाåरवाåरक कठोर अनुशासन के बीच मृणाल और ÿमोद एक दूसरे के स¸ चे िमý
और िहतेषी बन जाते ह§ । बुआ अपनी पढ़ाई िलखाई से लेकर Ö कूल म¤ हòई हर छोटी बड़ी
घटना ÿमोद को बताती है, और ÿमोद भी बड़े लगाव से बुआ कì बात¤ सुनता है । इस तरह
बुआ और भतीजे के बीच घिनÕ ठ आÂ मीयता का संबंध िवकिसत हो जाता है । ÿमोद इस munotes.in

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Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
19 आÂ मीयता के संबंध को बुआ के साथ भी और बुआ के बाद भी िनभाता हòआ िदखाई देता
है। बुआ ऐसे ही एक फुसªत के समय म¤ संदभª के िलए िदया गया संवाद ÿमोद से कहती है ।
Ó या´ या: उपÆ यास के ÿथम खंड म¤ उपÆ यास का क¤þीय पाý तथा कथा सूýधार ÿमोद
अपने घर पåरवार का पåरचय देते हòए, घर म¤ रहने वाली बुआ के साथ िबताए गए अनेक
ÿसंगो, घटनाओं, अ¸ छे बुरे अनुभवŌ को पाठकŌ के सामने खोल कर रखता है । ऐसी ही एक
घटना का वणªन करते हòए वह अपने और बुआ के बीच हòए वाताªलाप का पåरचय देते हòए
बताता है िक एक बार बुआ ने उसे कहां था िक वह िचिड़या कì तरह अपने पंख खोल कर
आसमान म¤ िजधर चाहे उधर उड़ना चाहती है । वह िचिडया बनना चाहती है । अथाªत वह
अपने जीवन म¤ आजाद होकर जीना चाहती है । वह अपनी िजंदगी को अपनी इ¸ छा से
जीना चाहती है ।
िवशेष: संदभª के िलए िदया गया अवतरण मृणाल बुआ का संवाद है । इस संवाद Ĭारा
मृणाल बुआ का जीवन िवषयक ŀिÕ ट कोण Ö पÕ ट हो जाता है । मृणाल बुआ तÂ कालीन
समाज म¤ नारी पर लगाए गए पाåरवाåरक सामािजक बंधन से मु³ त होकर आजाद िजंदगी
जीने कì इ¸ छा ÿकट करती है ।
मृणाल बुआ कì Ö वभावगत िवशेषता के साथ, बुआ के जीवन िवषयक Ö वातंÞयिÿयता का
सहज पåरचय िमलता है ।
 संदभª सिहत Ó या´ या के संभािवत ÿÔ न:
१. ‘बड़Ō कì आ²ा सदा माननी चािहए । सबका आदर करना चािहए । सदा सच बोलना
चािहए । अ¸ छे लड़के ऐसे ही बनते ह§ ।’ (पृ.ø.१२)
२. ‘ÿमोद स¸ ची स¸ ची कहóं तो म§ ही पराई हो गई हóं । तुम सब लोगŌ के िलए म§ पराई हóं ।
तेरी मां ने मुझे ध³ का देकर पराया बना िदया है ।’ (पृ.ø.१६)
३. ‘पर आन देिख एगा िक वहां पहòंचकर थोड़े िदनŌ म¤ ही तबीयत हरी हो जाती है । और
सच पूिछए तो छोटे-मोटे रोगŌ कì परवाह करना उन कì परवåरश करना है । सौ दवाओं
कì एक दवा है बेिफकरी ।’ (पृ.ø.३८)
४. ‘फेल होने से ढरना चािहए भाई । जो मन लगाकर शुł म¤ पढ़ते ह§ वे ही आगे जाकर
िजंदगी म¤ कुछ करते ह§ । समझे?’ (पृ.ø.४०)
५. ‘यो तो यह कहानी आरंभ कì है तो पूरी भी करनी होगी । जीना एक बार शुł करके,
मौत आकर छुĘी ना दे दे तब तक, जीना ही होता है । बीच म¤ छुĘी कहाँ?’ (पृ.ø.४५)
६. ‘बहòत कुछ जो इस दुिनया म¤ हो रहा है वह वैसा ही कयŌ होता है, अÆ यथा ³ यŌ नहé
होता - इसका ³ या उÂ तर है? उÂ तर हो अथवा न हो , पर जान पड़ता है भिवतÓ य ही
होता है’ (पृ.ø.४५) munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
20 ७. ‘िनयित का लेख बंधा है । एक भी अ±र उसका यहाँ से वहाँ न हो सकेगा । वह बदलता
नहé, बदलेगा नहé । पर िविध का वह अत³ यª लेख िकस िवधाता ने बनाया है, उसका
उसम¤ ³ या ÿयोजन है-’ (पृ.ø.४५)
८. ‘लीला तेरी है, जीते-मरते हम ह§ । ³ यŌ जीते, ³ यŌ मरते ह§? हमारी चेÕ टा ÿयÂ न ³ या
है? ³ यŌ है? .... पूछे जाओ, उÂ तर कोई नहé िमलता । ’ (पृ.ø.४६)
९. ‘बहòत कुछ देखा है, बहòत कुछ पढ़ा है । लेिकन वह सब झूठ है । सच इतना ही िक ÿेम
के भार से भारी रह कर जो जीवन के मूल म¤ पैठा है, वह धÆ य है ।’ (पृ.ø.४८)
१०. ‘मानव चलता जाता है और बूंद-बूंद ददª इकęा होकर उसके भीतर भरता जाता है ।
वही सार है । वही जमा हòआ ददª मानव कì मानस-मिण है । उसी के ÿकाश म¤ मानव
का गित-पथ उº वल होगा ।’ (पृ.ø.४८)
११. ‘िजंदगी है, चलती जाती है कौन िकसके िलए थमता है? मरते हòए मर जाते ह§, लेिकन
िजन को जीना है वे तो मुदŎ को लेकर व³ त से पहले मर नहé सकते । िगरते के साथ
कोई िगरता है? यह तो च³ कर है ।’ (पृ.ø.५३)
१२. ‘िजनको तन िदया , उससे पैसा कैसे िलया जा सकता है, यह मेरी समझ म¤ नहé आता।
तन देने कì जłरत म§ समझ सकती हóं । तन दे सकूगी । शायद वह अिनवायª हो । पर
लेना कैसा? दान Ö ýी का धमª है ।’ (पृ.ø.६८)
१३. ‘….³ या होगा भगवान ही जानता ह§, ³ या होगा । मुझे और कोई दूसरा आसरा नहé है ।
पर भगवान अǁतयामी है, सवªशि³ त मान है । मुझे कोई और आसरा ³ यŌ चािहए? ---’
(पृ.ø.७६)
१४. ‘चला जाऊं उसे अपनी दुिनया म¤ जहां वÖ तुओं का मान बंधा हòआ है और कोई झमेला
नहé है । जहां राÖ ता बना-बनाया है और खुद को खोजने कì जłरत नहé है । िज²ासा
जहां शाÆ त है । और ÿÔ न अव²ा का īोतक है ।’
१५. ‘म§ समाज को तोड़ना-फोड़ना नहé चाहती हóं । समाज टूटी कì िफर हम िकस के भीतर
बन¤गे? या िक िकसके भीतर िबगड़¤गे? इसिलए म§ इतना ही कर सकती हóं िक समाज से
अलग होकर उसके मंगलाका±ाओं म¤ खुद ही टूटती रहóं ।’ (पृ.ø.८०)
२.७ लघुÂ तरी ÿÔ न १. Â याग-पý उपÆ यास का ÿमोद के पåरवार म¤ काम करनेवाले नौकर का नाम ³ या था?
उ°र: बंसी ।
२. Â याग-पý उपÆ यास िकस शैली म¤ िलखा गया है?
उ°र: आÂ मकथनाÂ मक शैली । munotes.in

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Âयाग पý उपÆयास का शीषªक, उपÆयास म¤ िचिýत समÖयाएँ और उपÆयास का उĥेÔय
21 ३. Â याग-पý उपÆ यास कì पाý मृणाल पित के Â यागने के बाद िकस कì रखैल बन जाती
है?
उ°र: कोयलेवाले कì ।
४. Â याग-पý उपÆ यास कì पाý मृणाल अपने ससुराल म¤ िकसे जÆ म देती है?
उ°र: मृत कÆ या को ।
५. Â याग-पý उपÆ यास कì पाý ÿमोद िकस खबर से अÖ वÖ थ होकर मानिसक संघषª से
पीिडत होता है?
उ°र: मृणाल बुआा कì मृÂ यु कì खबर से ।
६. Â याग-पý उपÆ यास कì पाý नसª मृणाल को िकस धमª को Ö वीकार करने का आúह
करती है?
उ°र: इसाई धमª को ।
७. Â याग-पý उपÆ यास िकतने खंडŌ म¤ िलखा गया है?
उ°र: आठ खंडŌ म¤ ।
८. Â याग-पý उपÆ यास के पाý मृणाल बुआ उपÆ यास के अंत म¤ िकस बÖ ती म¤ िदखाई
देती है?
उ°र: वेÔ या-बÖ ती म¤ ।
२.८ दीघōÂ तरी ÿÔ न १. Â याग-पý उपÆ यास म¤ िचिýत िविवध सामािजक समÖ या ओं कì चचाª कìिजए -
२. Â याग-पý उपÆ यास के शीषªक कì साथªकता Ö पÕ ट कìिजए -
३. उपÆ यास के तÂ वŌ के आधार पर Â याग-पý उपÆ यास कì समी±ा कìिजए -
४. Â याग-पý उपÆ यास म¤ िचिýत तÂ कालीन समाज कì ł िढंयŌ तथा परंपराओं का
पåरचय दीिजए -
५. Â याग-पý उपÆ यास के पाý ÿमोद के मानिसक संघषª पर ÿकाश डािलए -
६. Â याग-पý उपÆ यास के पाý ÿमोद का चåरý िचýण कìिजए -
७. Â याग-पý उपÆ यास के आधार पर जैन¤þ कुमार कì औपÆ यािसक रचनाओं कì
िवशेषताएं िलिखए -
८. Â याग-पý उपÆ यास का उĥेÔ य Ö पÕ ट कìिजए - munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
22 २.९ अÅ ययन हेतु संदभª úंथŌ कì सूची १. Â याग-पý (उपÆ यास)- जैन¤þ -िहंदी-úंथ-रÂ नाकर मुंबई
२. जैन¤þ उपÆ यास और कला-डॉ.िवजय कुल®ेÕ ठ-पंचशील ÿकाशन िफÐ म कालोनी
जयपुर
३. जैन¤þ के कथा सािहÂ य म¤ युग चेतना- अजय ÿताप िसंह-इलाहाबाद िवÔ व िवīालय
४. जैन¤þ के उपÆ यासŌ का िशÐ प- ओमÿकाश शमाª
५. जैन¤þ का जीवन दशªन-कुसुम क³ कड


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23 ३
मुिĉबोध उपÆयास िववेचन, िवशेषताँए और सामािजक
संदभª
इकाई कì Łपरेखा
३.१ उĥेÔय
३.२ ÿÖतावना
३.३ उपÆयास का कथानक
३.४ मुि³ त बोध उपÆयास का तÂवŌ के आधार पर िववेचन
३.५ मुि³ त बोध उपÆयास कì िवशेषताँए
३.६ मुि³ त बोध उपÆयास का सामािजक सÆदभª
३.७ सÆदभª सिहत Óया´या
३.८ लघुउ°रीय ÿÔ न
३.९ दीघō°री ÿÔ न
३.१० बोध ÿÔ न
३.११ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतक¤
३.१२ सारांश
३.१ उĥेÔय मुि³ त बोध उपÆयास के कथानक के बारे म¤ समझाना । उपÆयास के तÂवŌ के आधार पर
उसका िववेचन-िवÔ लेषण करना । मुि³ त बोध उपÆयास कì िवशेषताओं के बारे म¤ समझाना ।
उपÆयास के सामािजक सÆदभŎ को ÖपĶ करना । मुि³ त बोध उपÆयास म¤ िनिहत सामािजक
समÖया के बारे म¤ समझाना ।
३.२ ÿÖतावना िहÆदी सािहÂय म¤ गहन मानवीय संकट कì बात मÅययुगीन पåरवेश म¤ भी उठाई गई थी ।
ÿेमचÆद युगीन उपÆयासकार होने के बावजूद जैनेÆþ ने ÿचिलत परÌपराओं और माÆयताओं
से िहÆदी उपÆयास को मु³ त करके उसे आधुिनकता के साथ जोड़ने का महÂवपूणª कायª
िकया था । ÿेमचंद समाज के भीतर जी रहे पाýŌ को लेकर सामािजक समÖयाओं को वाणी
ÿदान कर रहे थे, लेिकन जैनेÆþ कुमार ने Óयि³ त के मन का संघषª Óय³ त कर वैयि³ त क
जीवन कì समÖया ओं को वाणी ÿदान कì । इसिलए युगीन संदभō कì ŀिĶ से एक नयी
िवचारधारा कì ÿÖथापना आधुिनकता कì ŀिĶ से महÂवपूणª मानी जा सकती है ।
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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
24 ३.३ उपÆयास का कथानक जैनेÆþ कुमार ने मुि³ त बोध शीषªक उपÆयास म¤ परÌपरागत कथानक के अÆतगªत
आकिÖमकता और कौ तूहल कì िÖथितयŌ को न अपनाते हòए उसके कथानक को बड़े ही
सहज ढ़ंग से मुि³ त बोध उपÆयास के पाýŌ के माÅयम से आगे बढ़ाया है, िजससे इस
उपÆयास कì ÿभावािÆव ित और भी ºयादा बढ़ जाती ह§ । Öवयं जैनेÆþ कुमार का ही मानना
है िक इस िवÔ व के छोटे से छोटे खÁड को लेकर हम अपना िचý बना सकते ह§ और उसम¤
सÂय के दशªन पा सकते ह§, उनके माÅयम से हम सÂय के दशªन करा भी सकते ह§ । जो
āÌहाÁड म¤ है वही िपÁड म¤ भी है । इसिलए जैनेÆþ कुमार जी ने ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के
पाýŌ का मनोिवÔ लेषण कर उनकì वैयि³ त कता को ही महÂवपूणª माना है । साथ ही साथ
आÂमापªण और ÿेम को वैयि³ त क और सामािजक सुधार कì बुिनयाद माना है । ‘मुि³ त बोध’
शीषªक उपÆयास म¤ राजनीित से ýÖत सहाय के राजनैितक जीवन से मुि³ त के संघषª को
िदखाया गया है ।
जैनेÆþ का उपÆयास ‘मुि³ त बोध’ सन् १९६५ म¤ ÿकािशत हòआ । इस उपÆयास पर जैनेÆþ
कुमार को सािहÂय अकादमी का पुरÖकार भी ÿदान िकया गया था । इसके ÿमुख पाý
सहाय, उसकì पÂनी राज®ी और सहाय कì ÿेिमका नीिलमा है । राज®ी खुले िवचारो कì
ľी है, वह सहाय कì ÿेिमका से िबÐकुल भी नहé िचढ़ती है, वरन् उससे हमेशा खुश ही
रहती है । उपÆयास के नायक सहाय को मंýी पद िदया जा रहा है, िजसे वे Öवीकार नहé
करना चाहते ह§ । सहाय के इस िनणªय से उसके समÖत Öवजन और पåरजन नाराज हो
जाते ह§, ³यŌिक मंýी बन जाने से सबके Öवाथª कì पूितª आसानी से हो सकती है । सहाय का
जामाता उīोगपित है, उसकì कई मील¤ है, एक नई मील भी Öथािपत होने वाली है । उसके
िखलाफ जाँच चल रही है । मंýी बनने पर जामाता को सारी सरकारी सुिवधाएँ सुलभता से
ÿाĮ हो जाएँगी । सहाय जानते ह§ और इसी कलंक से बचने के िलए वे इस पद को लेने से
इनकार कर देते ह§ । वे घर म¤ िकसी कì भी बात नहé सुनते ह§ । यहाँ तक िक पÂनी राज®ी
और ÿेिमका नीिलमा के अनुरोध को भी वे ठुकरा देते ह§ ।
आगे चलकर जैनेÆþ के इन पाýŌ के भीतर गाँठ पड़ जाती है, जो उसे मंýी का पद लेने से
रोकती है । नीिलमा इस गाँठ को खोलने का ÿयÂन करती है । सहाय यह मानता है िक
राजनीित हमेशा से अनीित पर ही चलती आई है । उस अनीित को देखकर वह उसम¤
िबÐकुल भाग नहé लेना चाहता है । राज®ी, नीिलमा औव अÆय पाåरवाåरक जन इसे सहाय
कì खोजली आदशªवािदता मानते ह§, बावजूद इसके सहाय इन सबसे कतई सहमत नहé
होता है । इस उपÆयास म¤ आगे चलकर उसकì बेटी अंजिल कì िÖथित काफì खराब होने
लगती है । इतने सारे पाåरवाåरक और भावाÂमक दबाव के आगे अÆततः सहाय झुक जाता
है और न चाहते हòए भी मंýी पद Öवीकार कर लेता है । अब उसके शेष पåरवार वाले ÿसÆन
ह§, परÆ तु ‘मुि³ त बोध’ उपÆ यास का नायक सहाय ही ÿसÆ न नहé है । वह आÂ मपीड़ा जैसी
िÖथित म¤ आ जाता है । यही तो जीवन कì गित है । बहòधा हम ऐसे काम करते जाते ह§ । जो
हम कभी नहé करना चाहते ह§ । इस उपÆयास का अÆत भी इस घोषणा से होता है िक ‘म§
िमिनÖटर हो गया हóँ’ । अब हम इसे सुखाÂमक अÆत कह¤ या दुखाÂमक यह हमेशा अिनणªय
कì िÖथित म¤ ही रहता है । इस ÿकार जैनेÆþ कुमार के उपÆयासो म¤ Óयि³ त का जीवन ही
अिधक महÂवपूणª है । munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास िववेचन, िवशेषताँए और सामािजक संदभª
25 ३.४ मुि³ त बोध उपÆयास का तÂवŌ के आधार पर िववेचन मुि³ त बोध उपÆयास का कथातÂव ÿेम और िववाह से संबंिधत ÿÔ नŌ से ही नहé है, िफर भी
उसके वातावरण, उĥेÔय और चåरý िचýण म¤ ÿेम और िववाह संबंधी धारणाओं का ÖपĶ
ÿितफिलत है । मुि³ त बोध म¤ राजनीित के सिøय सांसद सहाय का राजनैितक जीवन से
मुि³ त के भाव को लेकर संघषŎ को िदखाया गया है । जैनेÆþ कुमार िववाह को एक अिनवायª
तÂव तथा पÂनीÂव कì संÖथा को अथªयु³ त आवÔयकता मानते हòए पÂनी को िसफª पÂनी ही
बने रहते देना जाहते ह§ । साथ-साथ पित कì दुिIJंतताओं को दूर करने, उसे मानिसक सुख
शांित देने अथवा आकिÖ म क Öफूितª देने के िलए एक ÿेिमका को ही अिनवायª तÂव के Łप म¤
मानते ह§ जो अिववािहत हो अथवा िववािहत हो । मुि³ त बोध उपÆयास म¤ चौवन वषª के
सहाय के भरे-पूरे पåरवार के होते हòए भी सहाय का नीिलमा के साथ ÿेम-संबंध बना हòआ है।
पूरा पåरवार नीिलमा को पåरवार कì िहतैिषणी के Łप म¤ देखता है । कथातÂव कì ŀिĶ से
िववाह के पÔ चात् पित-पÂनी औरतो म¤ संबंध बना रहे, इसिलए उदारता भी अÂयावÔयक है ।
नीिलमा और उसके संबंधŌ का िवÔ लेषण नीिलमा Öवयं करते हòए कहती है- ‘वह अपने को
आजाद रखते ह§, और म§ इसम¤ उनकì सहायता करती हóँ । इसी मे मेरी आजादी अपने आप
बन जाती है । अपने से पूछो, मेरी आजादी का ®ेय ³या तुम दर को दोगे, मुझे नहé दोगे ।’
'मुि³ त बोध’ उपÆयास कì नाियका राज®ी पÂनीÂव के परÌपåरत आदशŎ का ÿतीक है । वह
पतीÂव म¤ सवªÖव खोजती है । परÆतु पÂनीÂव असफल है । उसका पित सहाय िसफª और
िसफª नीिलमा कì ओर ही आकृĶ है । राज®ी का पती ब ड़ा िववश, दुलªभ, Öवतंý Óयि³ त Âव
हीन, परावलÌबी एवं िनजêव सा िचिýत हòआ है । उपÆयास के तÂवŌ के आधार पर यिद
िववेचन-िवÔ लेषण िकया जाए तो जैनेÆþ ने अपने उपÆयास के ÿितिनिध पाý ‘ľी’ को ही
बनाया है, तथा नायक के Öथान पर म§ कì ही ÿितķा कì गई है । नारी ‘मुि³ त बोध’ जैसे
उपÆयासŌ म¤ पुरानी परÌपरा से हटकर यथाथª कì और मुड़ने का ÿयÂ न करती देखी जाने
लगी है । ‘मुि³ त बोध' आÂमकथाÂमक शैली म¤ िलखा गया एक लघु उपÆयास भी है ।
आÂ मिवÔ लेषण परक शैली म¤ िलखा गया यह पहला एक एैसा उपÆयास है, िजसम¤ लेखक
नायक सहाय और उसके पाåरवाåरक सदÖयŌ कì चचाª भी इसम¤ कì गई है । इसम¤ राजनीित
के सिøय सांसद सहाय का राजनैितक जीवन से मुि³ त के भाव को लेकर संघषª िदखाया
गया है । समसामाियक तÂवŌ के बोध से अनुÿेåरत इस उपÆयास म¤ Öवतंýता के बाद के
पÆþह वषŎ म¤ खéचातानी, आदशª के ÿितउÂसगª कì भावना, मंýी पद हेतु Öवाभािवक ममÂव
के संघषª कì अनुभूित का बड़ा ही यथाथª िनŁपण उपÆयास के ÿमुख तÂवŌ कì ŀिĶ
से कथाकार जैनेÆþ ने अपने उपÆयास ‘मुि³ त बोध’ म¤ बड़ी बारीकì के साथ िकया है ।
३.४.१ ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास कì िवशेषताँए:
‘मुि³ त बोध’ उपÆयास कì सबसे बड़ी िकÆतु महÂवपूणª िवशेषता यह है िक-
१) यह ‘आÂमकथाÂमक शैली’ म¤ िलखा गया एक लघु उपÆयास है । रेिडयो ÿसारण के
िलए िलखी गई इस रचना को ‘सािहÂय अकादमी ’ नई िदÐली Ĭारा पाँच हजार Łपए
का पुरÖकार ÿाĮ हो चुका है । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
26 २) आÂमिवĴेषण शैली म¤ िलखा गया जैनेÆþ कुमार का यह पहला उपÆयास है, िजसम¤
लेखक, नायक, सहाय औव उसके पाåरवाåरक सदÖयŌ कì चचाª भी िवÖतृत Łप से हòई
है।
३) ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ सहाय जैसे राजनीित के सिøय सांसद का राजनैितक जीवन
से मुि³ त के भाव को लेकर संघषª को भी बखूबी िदखाया गया है।
४) समसामियक बोध से अनुÿेåरत जैनेÆþ जी के ‘मुि³ त बोध उपÆयास’ म¤ Öवतंýता के
बाद के पÆþह वषŎ म¤ खéचातानी, आदशª के ÿित उÂसगª कì भावना, मंýी पद हेतु
Öवाभािवक ममÂव के संघषª कì अनुभूित का िनŁपण इस उपÆयास म¤ हòआ है।
५) भारत कì केÆþीय शिĉ म¤ एक समय िविशĶ पåरवतªनŌ कì आवÔयकता अनुभव कì
गई और पåरणाम ÖवŁप ‘कामराज योजना ’ आरÌभ हòई थी , िजसम¤ मंýी पद से
Âयागपý देने कì िÖथित आवÔयक समझी गई थी ।
६) कथानायक सहाय कामराज योजना के अÆतगªत आदशªवाद एवं अहंवाद के कारण
िमले हòए अपने पद को अÖवीकृत कर देता है । िफर भी उ¸चशि³ त उसे मंýी पद दे
रही है ।
७) जैनेÆþ के ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ अÆय उपÆयासŌ कì तरह ÿेम और िववाह से
संबंिधत ÿij नहé है । केवल एक राजनीित² जीवन से उठी दुिवधा के माÅयम से
मुि³ त के बोध का िवĴेषण ‘मुि³ त बोध’ का कÃय है ।
८) ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के वातावरण एवं चåरý िनमाªण म¤ जैनेÆþ जी कì ÿेम और िववाह
संबंधी धारणाओं का ÖपĶ ÿितफलन है ।
९) ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ मु´य पाý, सहाय के अलावा, पÂनी राज®ी, िनिलमा, कुँअर,
ठाकूर, िवøम, िवरेĵर और सहाय कì बेटी अंजिल इÂयािद ÿमुख पाý ह§ ।
१०) सहाय का पाåरवाåरक जीवन दुिवधापूणª है । ³यŌिक न तो वे सामािजक बंधनŌ को
तोडकर पÂनी से ही मुँह मोड़ सकते है, और न ही वे नीिलमा के ÿित अपने ÿेम पूणª
Ńदय का गला ही घोट सकते ह§ ।
११) सहाय पÂनी और ÿेिमका के बीच िहचकोले खाने वाला ऐसा Óयि³ त Âव है, जो
सामािजक मयाªदाओं को जानते हòए भी ÿेिमका के ÿित ढ़लते रहने के कारण संघषªरत
ह§ ।
१२) सहाय अपनी पÂनी राज®ी और ठाकुर महादेव िसंह के बीच पनप रहे ÿेम के कारण
हीन भावना से úÖत है, िफर भी वे उन दोनो के बीच बाधा नहé बनना चाहते ह§ ।
३.६ मुि³ त बोध उपÆयास का सामािजक सÆदभª जैनेÆþ के उपÆयास ‘मुि³ त बोध’ म¤ िववाहे°र ÿेम संबंधो को बाँधे रखने म¤ कथाकार का
सामािजक भाव यहाँ कारण के Łप म¤ िवīमान है, जो िववाह म¤ ÿाĮ नहé होता वह munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास िववेचन, िवशेषताँए और सामािजक संदभª
27 अलौिकक आनÆद म¤ ÿाĮ होता है । ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ राज®ी, नीिलमा के ÿेिमका
Łपी शि³ त से भली भाँित पåरिचत है । पित के सोए हòए ईĵरीय भाव को वह ÿेयसी नीिलमा
के सामािजक संबंधो के सहारे ही जगाना चाहती है । सहाय जी जहाँ मंýी पद से Âयागपý
देना चाहते ह§, उनम¤ कमª के ÿित आÖथा का संचार ÿेिमका नीिलमा ही करती है ।
सामािजक ŀिĶ से ľी-पुŁष संबंधो म¤ Óयĉ संघषŎ म¤ एक तरफ जहाँ बुिĦ का संघषª होता
है, तो वहé दूसरी तरफ भावना का बौिĦक धरातÂव पर पाý पåरिÖथितयŌ से सामािजक Łप
से ट³कर लेता है । िकÆतु यहाँ सामािजक भावना कì ÿबलता इतनी तीĄ होती है िक
भावना कì िवजय पर पी ड़ा का अनुभव भी सामािजक ŀिĶ से होने लगता है ।
नीिलमा िमÖतर दर साहब कì पÂनी होते हòए भी वह सहाय से ÿेम करती है । सामािजक
जीवन संदभŎ म¤ अÆततः दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है । पिÂनयाँ अपने ÿेिमयŌ को
छोड़कर अपने अपने गृहÖथ जीवन म¤ लौट जाती ह§ । िमÖटर सहाय को मंýी पद Öवीकृत
करने के िलए मजबूर करती नीिलमा भी अपने गृहÖथ जीवन म¤ लौट आती है । सामािजक
ŀिĶ से ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ पित-पÂनी के आिÂमक संबंधŌ कì अपे±ा ÿेिमका के संबंध
को अिधक गहन माना गया है । राज®ी सहाय कì पÂनी होते हòए भी नीिलमा के ÿेयसी Łप
को Öवीकार करती है । जब-जब वह अपने पित सहाय को उिĬµन देखती है, तब-तब वह
सहाय को नीिलमा के पास भेज देती है ।
सहाय को जब अपने जीवन म¤ åर³ त ता महसूस होने लगती है, अपनŌ से अपनÂव टूटता
िदखाई देने लगता है, बावÆन वषª कì अवÖथा म¤ जब वे अकेलापन महसूस करते ह§ तब
पÂनी राज®ी को समझाते ह§ । यिद जीवन म¤ से Èयार गया तो हमारे पास ³या रह जाएगा,
Èयार के िबना जीवन Óयथª है । इस उă म¤ हम केवल माया और ममता म¤ पडे रह¤गे तो हमारी
³या गित होगी । पुŁष के जीवन म¤ पÂनी सामािजक जीवन कì पूणªता एवं ÿेयसी आिÂमक
तृिĮ का माÅयम है । इसिलए नीिलमा से जो आÂमीय Öफूितª सहाय को िमलती है, वह
राज®ी से नहé, और सहाय के िमý ठाकूर को िमý कì पÂनी राज®ी भा भी ही अिधक
िनकट मालूम पडती है । डॉ. वांिदववडेकर के िवचारŌ से -‘‘नीिलमा तो ÿेयसी ही है और जो
पित को पÂनी से नहé िमला, वह सहाय को नीिलमा म¤ िमला । रस, सौÆदयª, समान Öतर पर
िÖथत उÂकट बंधन रिहत ÿेम । यहाँ भी उन दोनŌ के संबंधो का आधार काम, वासना, शरीर
माý ही नहé है । वह है जŁर, पर उतना ही िजससे ľी-पुŁष के संबंध मांसल और रसवान
बनते ह§ । अिधकतर दोनŌ म¤ वह उ¸च मानिसक या आिÂमक संबंध ह§ जो शरीर के माÅयम
से ही परÆतु ऊपर चढ़कर िवल±ण चैतÆय ÿदान करनेवाले हो जाते ह§ और िजÆह¤ Öथूल
ÿचिलत शÊदŌ से पåरभािषत नहé िकया जा सकता – काम, ÿेम बन जाता है ।’’ सामािजक
जीवन म¤ पåरवार के ÿÂयेक Óयिĉ पर पåरवार का पूरा अिधकार होता है, Óयिĉ के ÿÂयेक
फैसलो पर पåरवार कì अनुमित न हो तो िवरोध खड़ा हो उठता है । िम. सहाय मंýी पद पर
ÿितिķत ह§, समाज म¤ उनका बड़ा ही ऊँचा Öथान ह§, पर अपने िसĦाÆतŌ और आचरण पर
कायम रह¤ तो पåरवार वालŌ के िलए मुिÔकल खडी होने लगती है । सहाय को उनके पåरवार
वालो ने Öवाथªवश ही घेर रखा ह§ । यिद सहाय जी मंýी पद से Âयागपý दे द¤ तो दामादजी के
उīोग का ³या होगा ? इसिलए वीरेĵर को इÆडÖůीज म¤ रखने का ÿÖताव रखते ह§ । बेटी
अंजिल भी िशकायत करती है िक आपके मंýी पद से हम¤ ³या लाभ ? हमारे िलए सारी
उमर पडी है । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
28 अपने सामािजक िसĦाÆतŌ पर कायम रहने वाला सहाय कì वीरेĵर िशकायत करता है । वह
नीिलमा से कहता है- ‘आप मेरा कĶ नहé समझेगी आंटी इनका नाम है, और म§ इनका बेटा
समझा जाता हóँ । और बाहर सब इन के नाम के िहसाब से मुझे नापते ह§, और म§ छोटा बन
जाता हóँ, और लौटकर अपनी भी ड़ म¤ आ जाता हóँ ।’
यहाँ ľी-पुŁष संबंधŌ के अÆतगªत जैनैÆþ कुमार कì ŀिĶ से पåरवार म¤ पुŁष के जीवन म¤
ÿेयसी का Öथान महÂवपूणª है । भले ही सामािजक ŀिĶ से न हो । नीिलमा सहाय कì ÿेयसी
के Łप म¤ होते हòए भी पाåरवाåरक-सामािजक समÖया ओं के िलए मजबूर करती है ।
‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ राजनीित से मुि³ त पाने कì कशमकश िमÖतर सहाय म¤ है । सहाय
जी एक मंýी होने के नाते उनसे उनके पåरवार वाले सगे संबंधी, िमý सभी Öवाथªवश कुछ न
कुछ लाभ तो जŁर उठाना चाहते है । उन सबकì ŀिĶ म¤ महÂव सहाय का नहé, उनके
मंýीÂव पद का है । इसी कुÁठा के कारण सहाय मंýी पद से Âयागपý देना चाहते है । सहाय
और राज®ी के दाÌपÂय जीवन म¤, नीिलमा ÿेम पर अपना एकािधकार रखती है, पर राज®ी
से उसको कोई िशकायत नहé है । वह पाåरवाåरक िजÌमेवारी और दुखŌ को ढोकर नीिलमा
को सहाय कì ÿेरणा मानकर उÆहे सुलझाने का पूरा अवसर देती है । वाÖतव म¤ सामािजक
मयाªदाओं के कारण वह न तो नीिलमा के कारण राज®ी का हो पाता है और न राज®ी के
कारण नीिलमा का । राज®ी समझदार और कुशल पÂनी होने से सहाय के दोहरे जीवन कì
गृहÖथी बडी शालीनता औह कुशलता से चलाती है । ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ राज®ी जैसी
सुÆदर, सुशील, पÂनी, बेटी अंजिल और बेटा वीरेĵर, दोनो वयÖक होते हòए भी सामािजक
बंधनŌ को Âयागकर सहाय , नीिलमा जैसी Öव¸छÆद ÿकृित वाली युवती के सौÆदयª Łपी
आकषªण म¤ बँध जाते है । नीिलमा के दशªन माý से ही उसम¤ Öवतः Öफूितª का संचार होने
लगता है । नीिलमा के आकषªण म¤ कही न कहé चुंबकìय वैिशĶ्य अवÔय है ।
३.७ सÆदभª संिहत Óया´या संकेत:
काफì िजÆदगी म¤ चला आया हóँ । ³या चाहता था म§ जब यह िजÆदगी खुली? यूिनविसªटी से
िनकला और देश के काम म¤ पड़ गया । देश को आजाद होना था, लेिकन सच यह था, अब
देखता हóँ िक मुझे आजाद होना था । घर-गृहÖथी कì िजÆदगी बंधी जैसी होती है । आजादी
के आÆदोलन म¤ पड़कर लगा िक म§ बँधा नहé हóँ, खोल रहा हóँ और खुल रहा हóँ । वहाँ से
³या-कैसे मोड़ खाता हòआ मेरा जीवन अब यहाँ तक आया है । इसकì बात आगे हो सकती ।
लेिकन ³या अब भी अनुभव हो सका है मुझे उसका िक िजसे मुिĉ कहते है? म§ जानना
चाहता हóँ िक मुि³ त का वह बोध ³या है? वह पåरिÖथितक है या नहé । आिÂमक है या….?
सÆदभª:
ÿÖतुत गīांश सािहÂय अकादमी Ĭारा पुरÖकृत रचनाकार और मनोिवĴेषणवादी कथाकार
जैनेÆþ के अित चिचªत, लोकिÿय उपÆयास ‘मुि³ त बोध’ से उĦृत है । ‘मुि³ त बोध’ रचना पर
ही जैनेÆþ कुमार को सािहÂय अकादमी सÌमान ÿाĮ हòआ है । उपरोĉ पंि³ त याँ ‘मुि³ त बोध’
शीषªक उपÆयास के पृķ सं´या तेरह से ली गई ह§ ।
munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास िववेचन, िवशेषताँए और सामािजक संदभª
29 Óया´या:
कथाकार जैनेÆþ कुमार इन पंि³ त यŌ के माÅयम से यह बताने का ÿयÂन करते है िक हम भी
अपने जीवन म¤ अ³सर िकसी सपने के पीछे ही भागते ह§ । लेिकन भागते-भागते जब हम उसे
हािसल कर लेते ह§, और देखते है िक हमने आिखर ³या खोया और ³या पाया । तो अÆततः
हम यही पाते ह§ िक हम खुद (Öवयं) को ही कहé खो चुके ह§ । वह सपना हम¤ कभी वो सुख
नहé ÿदान करता िजस सपने कì हमने कभी उÌमीद कì थी । यही बात हम इस उपÆयास के
नायक सहाय जी के साथ भी देखते ह§ । इसके अलावा जब कभी आपके पास ताकत आती
है, तो आपके आस-पास कई लोक एकिýत हो जाते ह§ । भले ही आप खुद अ¸छे हो, लेिकन
ऐसे कई लोग िजसम¤ अपने और पराए दोनŌ होते ह§, वही आपके साथ आते ह§, िजनका
Öवाथª, िसफª और िसफª आपकì ताकत म¤ ही िनिहत होता है । ऐसे म¤ िकस पर िवĵास
करना है, और िकस पर िवĵा स नहé करना है, शायद यहé िनणªय कर पाना हमारे िलए बहòत
किठन हो जाता है । ये सारी चीजे और समÖत जानकारी हम¤ जैनेÆþ जी के उपÆयास
‘मुि³ त बोध’ के पाýŌ यथा सहाय राज®ी और नीिलमा के माÅयम से देखने को िमलती है ।
कई बार हमारे नाते-åरÔतेदार ही अपने Öवाथª िसिĦ के िलए हमारा भरपूर इÖतेमाल करते
ह§। कई बार तो बाहर के लोग ही ऐसे होते ह§ जो हमारे स¸चे िहतैषी बनकर हमेशा हमारी
सहायता के िलए तÂपर रहते ह§ । ऐसे समय म¤ हम¤ इन दोनŌ ही िहतैिषयŌ के åरÔतŌ के बीच
एक सामंजÖय बनाने कì जŁरत पड़ती है । यहé जैनेÆþ कुमार के इस उपÆयास का ÿमुख
Åयेय रहा है । इस उपÆयास के पाýŌ के बीच म¤ भी समीकरण बड़ा ही Łिच कर बन प ड़ा है ।
उपÆयास का ³लेवर देखने म¤ भले ही बहòत होता है, लेिकन åरÔतो के अÆवेषण के िलहाज से
बहòत बड़ा मालूम पड़ता है । िफर भी िजतना कुछ भी है, वह Łिचकर है, और इन महÂवपूणª
िवषयŌ पर सोचने को िववश करता है ।
३.८ सारांश ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ कथाकार जैनेÆþ ने राÕů कì संकुिचत सीमाओं को तोड़कर वैिĵक
मानवतावाद कì भावना को Óयĉ िकया है । आज भौगोिलक सीमाओं के आधार पर िवĵ
िविवध देशो और ÿांतो म¤ िवभĉ हो गया है । परÆतु िवĵ के िकसी भी कोने म¤ बसने वाले
मनुÕय के अिÖतÂव को उसके मानवीपन को कभी भी नहé बाँटा जा सकता है, ³यŌिक
इंसान तो आिखर इंसान ही होता है । ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के ÿमुख पाý सहाय आिटªÖट
तमारा को इसी बात को समझाते हòए कहते ह§- ‘³यŌ समझती हो िक देश के आगे म§ सÂय
को नहé मान सकता हóँ? तुम Łसी हो म§ िहÆदुÖतानी हóँ । पर सच मे तो दोनो इंसान ही ह§ ।
यह मानने म¤ ³यŌ मुझे मुिÔकल होनी चािहए ।’
‘मुि³ त बोध’ उपÆयास राजनेताओं के इदª-िगदª खूमता है तो इसम¤ ³या-³या गठ जोड़ होता है
यह भी देखने को िमलता है । उपÆयास हर ŀिĶयŌ से पठनीय है । मु´य िकरदार के पशो पेश
को यह बखुबी िदखलाता है । हम मुि³ त कì तलाश म¤ होते है लेिकन शायद ही हम¤ यह
मुि³ त िमल पाती हो । जब तक हम ह§ तब तक अपने कमō को करते जाने म¤ ही मुि³ त है ।
कमª से भागना भी कायरता है । शायद इसी बात को ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास भी दशाªता है ।
अÆत म¤ लेखक ही इस उपÆयास म¤ कहता है िक जग का जंजाल कभी खÂम होने के िलए munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
30 नहé होता है । परÌपरा िवÖतृत होती चली जाती है, िक सब अÆत म¤ मुि³ त म¤ पयªवसान
पाएँगे । अथाªत् मुि³ त और सृिĶ परÖपर समिÆवत (लगा हòआ) शÊद है ।
िनÕकषªतः हम यह कह सकते है िक जैनेÆþ के मुि³ त बोध शीषªक उपÆयास के केÆþ म¤ मानव
और मानवतावाद रहा है, और इसी मानवतावाद के केÆþ म¤ वे मानव कì मनोवृि°यŌ एवं
उनके िøयाकलापŌ को िदखाकर मानव मन कì दुवृªि³ त यŌ को पåरÕकृत करने और सद् मागª
पर लाने के िलए वे हमेशा ÿयÂनशील िदखाई देते ह§ । जैनेÆþ जी अपने मुि³ त बोध उपÆयास
म¤ ľी-पुŁष संबंधŌ को एक नया आ याम देते ह§, और यह आयाम है मनोिव²ान का । जैनेÆþ
ने घर और बाहर कì समÖया को नारी पाýŌ के माÅयम से उठाया है िक घर और बाहर के
सÌपकª म¤ आने के बावजूद घर टूटता नहé बिÐक और भी सुŀढ होता है ।
३.९ लघुउ°रीय ÿÔ न १. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के कथानक को सं±ेप म¤ िलिखए ।
२. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के ÿमुख तÂवŌ को सं±ेप म¤ ÖपĶ िकिजए ।
३. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के ÿमुख पाý सहाय का चåरý-िचýण िकिजए ।
४. उपÆयास म¤ िववेिचत पंि³ त यŌ कì सÆदभª सिहत Óया´या िकिजए ।
५. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ आए नैितक िवचारो को ÖपĶ िकिजए ।
३.१० दीघō°री ÿij १. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास कì कथावÖतु को िवÖतार से समझाइए ।
२. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास का तािÂवक िववेचन िकिजए ।
३. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास कì ÿमुख िवशेषताओं को ÖपĶ िकिजए ।
४. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के सामािजक सÆद भŎ पर ÿकाश डािलए ।
३.११ बोध ÿij १. जैनेÆþ कुमार का पहला उपÆयास कौन सा है?
२. जैनेÆþ कुमार को उनके िकस उपÆयास पर सािहÂय अकादमी पुरÖकार िमला था?
३. जैनेÆþ कुमार का अिÆतम उपÆयास कौन सा है?
४. सहाय और नीिलमा के बीच कैसा संबंध है?
५. राज®ी का सहाय से ³या åरÔता है? munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास िववेचन, िवशेषताँए और सामािजक संदभª
31 ६. ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ अंजिल कौन है?
७. ‘दर साहब’ और ‘नीिलमा’ के बीच ³या åरÔता है?
३.१२ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतके १. आज का िहÆदी उपÆयास - इÆदुनाथ मदान, राजकमल ÿकाशन नई िदÐली
२. आधुिनक कथा सािहÂय और मनोिव²ान - डॉ. देवराज उपाÅयाय- सािहÂयभवन,
इलाहाबाद १९९८
३. उपÆयास कì संरचना – गोपाल राय, राजकमल ÿकाशन , नई िदÐली संÖकरण
२००६
४. उपÆयासकार जैनेÆþ के पाýŌ का मनोवै²ािनक अÅययन- बलराजिसंह राणा संजय
ÿकाशन िदÐली १९७८
५. जैनेÆþ और उनका सािहÂय - डॉ. राजेÆþ मोहन भटनागर- भारतीय úंथ िनकेतन, नई
िदÐली
६. जैनेÆþ के उपÆयासो म¤ नारीपाý- डॉ. सािवýी मठपाल - मंगल ÿकाशन, जयपुर
७. जैनेÆþ के कथा सािहÂय म¤ िचिýत सामािजक समÖयाएँ- डॉ. सुरेश गायकवाड, सा.
रÂनाकर कानपुर
८. जैनेÆþ के उपÆयासो कì िववेचना- डॉ. िवजय कुल®ेķ- पूवōदय ÿकाशन-१९७६
९. जैनेÆþ उपÆयास और कला- डॉ. िवजय कुल®ेķ- पंचशील ÿकाशन जयपुर १९७८
१०. जैनेÆþ के उपÆयास ममª कì तलाश- चंþकांत बांिदवडेकर- पूवōदय ÿकाशन-१९८४
िदÐली
११. जैनेÆþ और उनके उपÆयास- डॉ. परमानÆद ®ीवाÖतव - लोकभारती ÿकाशन -
इलाहाबाद १९९३
१२. जैनेÆþ के उपÆयासŌ का िशÐप- डॉ. ओम ÿकाश शमाª- पाÁडु िलिप ÿकाशन १९६३
१३. िहÆदी उपÆयासो म¤ सामािजक चेतना- डॉ. लाल सािहब िसंह नमन ÿकाशन िदÐली
१९९८
१४. िहÆदी उपÆयास ÿेम और जीवन- डॉ. शांित भारĬाज- सुशील ÿकाशन अजमेर
१९६९
१५. िहÆदी उपÆयास एक सव¥±ण- महेÆþ चतुव¥दी- नेशनल पिÊलिशंग हाऊस- १९६२
िदÐली munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
32 १६. आलोचना अंक- १३, उपÆयास िवशेषांक, मÅयमवगêय वÖतुतÂव का िवकास-
ब¸चनिसंह
१७. धमªयुग- जैनेÆþ के उपÆयासो पर आलेख- सं. धमªवीर भारती
१८. िहÆदी सािहÂयकोश - भाग-२ भोलानाथ ितवारी
१९. जैनेÆþ – सृजन और धमª- डॉ. रामकमल राय
२०. मुि³ त बोध- जैनेÆþकुमार, पूवōदय ÿकाशन, नई िदÐली १९६५

*****
munotes.in

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33 ४
मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष
सÌबÆधŌ का łप , ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर
सÌबÆधŌ के िविवध łप
इकाई कì łपरेखा
४.१ उĥेÔय
४.२ ÿÖतावना
४.३ मुि³ त बोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý-िचýण
४.४ मुि³ त बोध उपÆयास म¤ ľी-पुŁष संबंधŌ का łप
४.५ पीड़ा का भाव और ĬंĬाÂमक अिभÓयि³ त
४.६ मुि³ त बोध उपÆयास म¤ िववाहेतर संबंधŌ के िविवध łप
४.७ सामािजक ŀिĶ से ľी-पुŁष संबंध
४.८ लघुउ°रीय ÿÔ न
४.९ दीघōÂ तरी ÿÔ न
४.१० बोध ÿÔ न
४.११ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतक¤
४.१२ सारांश
४.१ उĥेÔय  मुि³ त बोध उपÆयास के पाýŌ के चåरý िचýण को समझने म¤ ।
 ľी-पुŁष संबंधŌ के łप को ÖपĶ łप से समझने म¤ ।
 ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ अिभÓय³ त पीड़ा के भावŌ को समझने हेतु ।
 ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ िववाहेतर संबंधŌ के बारे म¤ समझने हेतु ।
 सामािजक ŀिĶ से ľी-पुŁष संबंधŌ को समझने म¤ उपयोगी ।
४.२ ÿÖतावना कथाकार जैनेÆ þ जी Ĭारा रिचत उपÆयास ‘मुि³ त बोध’ आÂमकथाÂमक शैली म¤ िलखा गया
एक लघु उपÆयास है । आÂमा िवĴेषणाÂमक शैली म¤ िलखा गया जैनेÆ þ जी का यह पहला
उपÆयास है । इस उपÆयास म¤ लेखक जैन¤þ जी ने उपÆयास के नायक सहाय और उनके
पाåरवाåरक सदÖयŌ कì खूब चचाª कì है । ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ राजनीित के सिøय
सांसद िमÖटर सहाय का राजनीितक जीवन से मुि³ त के संघषª को िवÖतृत łप से िदखाने munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
34 का ÿयास जैनेÆ þ जैसे लोकिÿय कथाकार ने िकया है । समकालीन भावबोध से अनुÿेåरत
‘मुि³ त बोध’ जैसे उपÆयास म¤ Öवतंýता के बाद के लगभग पÆ þह वषŎ म¤ खéचातानी, आदशª
के ÿित उÂसगª कì भावना, मंýी पद हेतु Öवाभािवक महÂव के संघषª कì अनुभूितयŌ का
िनłपण भी इस उपÆयास म¤ हòआ है ।
भारत जैसे िवÖतृत देश कì केÆ þीय शि³ त म¤ एक समय िविशĶ पåरवतªनŌ कì आवÔयकता
अनुभव कì गई और पåरणाम Öवłप ‘कामराज’ योजना कì शुŁआत हòई थी, िजसम¤ मंýी
पद से Âयागपý देने कì िÖथित आवÔयक समझी गई थी । इस उपÆयास के नायक सहाय
कामराज योजना के अÆ तगªत अपने आदशªवाद तथा अहंवाद के कारण अपने िमले हòए पद
को अÖवीकार कर देता है ।
ľी-पुŁष संबंधŌ म¤ Óय³ त संघषŎ म¤ एक और बुिĦ का संघषª होता है तो दूसरी ओर भावना
का बौिĦक धरातल पर पाý पåरिÖथितयŌ से ट³कर होता है । िकÆतु भावना कì ÿबलता
इतनी तीĄ होती है िक भावना कì िवषय पर पीड़ा का अनुभव होने लगता है ।
नीिलमा िम. दर कì पÂनी होते हòए भी वह सहाय से ÿेम करती है । सामािजक जीवन म¤ अंत
म¤ दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है । पिÂ न यॉं अपने ÿेिमयŌ को छोड़कर अपने
गृहÖथ जीवन म¤ लौट जाती है । िम. सहाय को मंýी पद Öवीकृत करने के िलए मजबूर करती
नीिलमा भी अपने गृहÖथ जीवन म¤ लौट आती है । जैनेÆ þ के अनुसार आकषªण पिवý और
सवªÓयापी है । ‘मुि³ त बोध’ म¤ राज®ी जैसी सुंदर, सुशील पÂनी, बेटी अंजिल, और बेटा
वीरेÔ वर, दोनŌ वयÖक होते हòए भी सामािजक बंधनŌ को Âयागकर सहाय नीिलमा जैसी
Öव¸छंद ÿवृि°वाली युवती के सŏदयª łपी आकषªण म¤ बंध जाते ह§ । नीिलमा के दशªन माý
से ही उसम¤ Ö फूितª का संचार होने लगता है । उसके आकषªण म¤ चुंबकìय वैिशÕ ट्य है ।
४.३ मुि³ त बोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण मुि³ त बोध उपÆयास के ÿमुख पाý सहाय के अलावा पÂनी राºय®ी, नीिलमा, कुंवर,
ठाकुर, िवøम, वीरेÔ वर आिद पाý अपना महÂवपूणª Öथान रखते ह§ ।
१. सहाय:
िमÖटर सहाय इस उपÆयास म¤ चौपन वषª कì आयु का ÿौढ़ राºय के मंýी पद पर आłढ़
लोकिÿय नेता ह§ । कमªठ एवं इमानदार सहाय िवचारŌ के ĬÆ Ĭ म¤ उलझा हòआ है । उसे ऐसा
लगता है िक िजस पåरवार के ÿित उसने अपना कतªÓय पूरी ईमानदारी से िनभाया, वे सब के
सब िसफª उसके मंýी पद से ही अपना Öनेह रखते ह§ । राजनीित म¤ Öवाथª भावना के फल
ÖवŁप कामराज योजना के अÆ तगªत वे अपने पद से मु³ त होना चाहते ह§ । िमÖटर सहाय
का दाÌ पÂय जीवन भी सवªदा ĬÆ Ĭ यु³ त रहा है । पÂ नी राज®ी जो एक सुंदर, समझदार, एवं
सुशील है, वह िनķापूवªक अपने पÂनीÂव कमª को िनभाती है । िकÆ तु सहाय एक नीिलमा
नामक प§तीस वषêय युवती से ÿेम करते ह§, इसिलए कभी वे अपनी पÂनी को स¸चा ÿेम नहé
दे सके । केवल सामािजक ÿितķा एवं एक पाåरवार कì सुख-सुिवधा कì ŀिĶ से ही राज®ी
का महÂव समझा जाता है । सहाय का पाåरवाåरक जीवन बहòत ही दुिवधापूणª है, ³यŌिक न
तो वे सामािजक बंधनŌ को तोड़कर पÂनी से ही मुँह मोड़ सकते ह§, और न तो वे अपनी munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष सÌबÆधŌ का łप, ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर सÌबÆधŌ के िविवध łप
35 ÿेयसी नीिलमा के ÿित अपने ÿेम पूणª Ćदय का ही गला घोट सकते ह§ । िमÖटर सहाय
अपनी पÂनी और ÿेिमका के बीच िहचकोले खाने वाला एक ऐसा Óयि³ त Âव है, जो
सामािजक मयाªदाओं को जानते हòए भी ÿेिमका के ÿित अनवरत ढलते रहने के कारण भी
िनरÆ तर संघषªरत रहता है । सहाय अपनी पÂनी राज®ी और ठाकुर महादेव िसंह के बीच
पनप रहे ÿेम के कारण भी हीन भावना से úÖत हो जाता है । िफर भी वह ठाकुर महादेव
और पÂनी राज®ी के बीच कभी बाधा नहé बनना चाहते ह§ । डॉ. अÆनपूणाª िसंह के अनुसार,
‘सहाय का अहं अÂयÆ त ÿबल है । हर व³ त सबके साथ Ó यवहार म¤ उसका अहम् उपिÖ थत
हो जाता है । ÿेयसी नीिलमा के साथ ÿेमालाप, Ăमण आिद ÿसंगŌ म¤ उसका अहं उसे पूणª
सुख नहé लेने देता ।
अपने अहंúÖत कमजोर Óयि³ त Â व एवं अहंकार के कारण ही उसकì कमªठता म¤ भी कमी
आ गई है । िसĦाÆ तŌ के फल ÖवŁप पुý वीरेश् वर के मामले म¤ ठाकुर महादेव िसंह एवं
उसके जामाता कुँअर साहब म¤ िवरोध लगातार बढ़ता जा रहा है, िजसका कोई हल या
िवकÐप सहाय के पास िबÐकुल भी नहé है । सहाय चौवन वषª कì अवÖथा म¤ भी शारीåरक
आकषªण úÖत है, नीिलमा के भरे-पूरे शरीर को देखकर वह बेचैन हो उठता है, और यह
सोचता है िक ‘देह म¤ भरती आती हòई नीला पहले से अ¸छी लग रही है । जरा बाँह को
दबाकर देखूँ, पूँछू िक नीिलमा तुम पर से उă ³या कपूर कì तरह आकर उड़ जाती है?
िसफª सुगंध छोड़ जाती है । सच म¤ िजÖम तुÌहारा गदराया जा रहा है ।
सहाय का मुि³ त बोध का भाव जीवन के ÿित आसि³ त को नहé Â यागता, बिÐक वह कहé न
कहé उनके अहं का ही Ĭन् Ĭ है । इसीिलए नीिलमा के ÿयÂ नŌ से वह Ĭन् Ĭ िमट जाता है,
और वे पुनः मंýी जैसे पद को Öवीकार कर उस पर आसीन हो जाते ह§ ।
२) राज®ी:
मुि³ त बोध उपÆयास कì नाियका राज®ी भारतीय मÅयवगêय पåरवार कì आदशª पÂनी के
समान पित को ही सवªÖव मानने वाली पूणªत: िनķावान एवं समिपªता नारी और एकिनķ
भाव वाली पÂनी है । सुख और दुख दोनŌ ही िÖथित म¤ साथ िनभाने वाली वह िमÖटर सहाय
के आÆ दोलन म¤ भाग लेते समय घर कì आिथª क िवपÆनता म¤ भी और मंýी पद पर भी हमेशा
सहाय का ही साथ देने वाली है । राजे®ी ने अपने घर का संचालन पूरे ही मनोयोग से िकया,
³यŌिक पित सहाय कì ÿसÆनता म¤ उसकì अपनी भी ÿसÆनता भी छुपी हòई है । पितधमª
और पåरवार के ÿित कतªÓय भावना से पूणª राज®ी बावÆ न वषª कì अवÖथा म¤ सहाय Ĭारा
मंýी पद Âयागने कì बात पर बेचैन हो जाती है, परÆतु वह यह भी जानती है िक मंýी पद का
अÖवीकार उनको अपनी Óयि³ त गत िनवृि° का भाव नहé हो सकता, ³यŌिक वे बड़े ही
महÂवाकां±ी Öवभाव वाले Óयि³ त माने जाते ह§ ।
उपÆयास म¤ राज®ी का पÂनीÂव इतना सश³ त नहé है िक वह अपने पित सहाय का खुलकर
या मुखर होकर िवरोध कर सक¤ । इसिलए राज®ी सहाय कì ÿेयसी नीिलमा को भी Ćदय से
Öवीकार करती है । नीिलमा के ÿित भी उसे पूणª िवÔ वास है िक वह सहाय को कभी नीचे
नहé िगरने देगी । राज®ी सहाय से कहती है, ‘हाँ आदमी म¤ देवता होता है, और पÂनी नहé
ÿेयसी उसे जगाती है । तुम अपने देवÂव से लड़ते ³यŌ हो? तुमको तृĮ और ÿसÆन आते
देखूँ तो ³या इसम¤ मुझे ÿसÆनता नहé होगी? राज®ी कुशल होने के साथ-साथ बड़ी ही munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
36 होिशयार भी है, वह ठाकुर के राजनीितक महÂव को जानकर उनसे बड़ा ही आÂमीय
Óयवहार भी रखती है । नीिलमा का भेद वह ठाकुर से छुपाकर रखती है । ठाकुर कì सहाय
के ÿित नाराजगी बड़ी ही चतुराई से दूर कर िवप± के नेता भानुÿताप के वहाँ आने के बाद
भी उनसे छुपाती है । राज®ी के पित के ÿित समिपªता वाला भाव होने के कारण ही सहाय
के Ćदय म¤ ÿेम भाव जागृत होता है । राज®ी कì पाåरवाåरक तपÖया का ±ेय भी नीिलमा को
ही जाता है । वीरेÔ वर को समझाने और सहाय को िमिनÖůी Öवीकार करने का कायª भी
नीिलमा के Ĭारा ही पूणª होता है । राज®ी के चåरý म¤ मÅयवगêय ÓयिĉÂव वाली नारी ही
छुपी हòई है । जो अपने पित म¤ ®Ħा और पåरवार कì मंगलाकां±ा म¤ जीती है ।
राज®ी सहज, Öवाभािवक और एक बड़ी ही िवÔ वसनीय पÂनी के łप म¤ िचिýत कì गई है ।
३) नीिलमा:
‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ जैनेÆþ जी ने नीिलमा का Öवłप पÂनीÂ व और ÿेयसीÂ व दोनŌ ही
łपŌ म¤ िदखाने का ÿयास िकया है । मुि³ त बोध म¤ नीिलमा का पाý एक नाियका के łप म¤
बड़ा ही िनखरा-सँवरा हòआ ÿÖतुत िकया गया है । नीिलमा सहाय कì ÿेरणामूितª भी मानी
जाती है, िजसे सहाय कì पÂनी राज®ी भी Öवीकार करती है । नीिलमा िमÖटर दर कì पÂनी
होते हòए भी पित और ÿेमी दोनŌ को आ¸छािदत, ÿभािवत करने कì शि³ त उसम¤ िवīमान
है । नीिलमा अपने ÿेमी सहाय के मंýीपद को Âयागने कì बात सुनकर उÆह¤ रोकना चाहती है
। वह सहाय कì महÂवाकां±ाओं कì याद िदलाते हòए कहती है, ‘पुरानी बात¤ याद करो । तुम
म¤ सपने थे, और तुÌहारी नजर म¤ से उन सपनŌ को म§ अपने सई देखने लगी थी ।’ आदमी
सपने के िलए जीता है और औरत उस सपने के आदमी के िलए जीती है ।’
नीिलमा एक आधुिनक नारी है, और आधुिनकता उसम¤ कूट-कूटकर भरी हòई है । झूठी
मयाªदाओं पर उसे िबÐकुल ऐतराज है । सूरज कुंड म¤ वेिडंग सूट म¤ सूयª Öनान करती देख
सहाय उससे नाराज हो जाते ह§ । सहाय कì नाराजगी को वह कमजोरी समझ वह उसे
कहती है, ‘सूयª Öनान म¤ ÿकृित Öनान हो सकता था । मेरे शरीर के साथ म§ ³या सहज नहé
हो सकती थी । िकसी का मन डोले तो डोले मुझे उससे ³या?’ नीिलमा सहाय के ÿित
अपने ÿेम को राज®ी से नहé छुपाती । नीिलमा पर राज®ी को भी अटूट िवÔ वास है,
इसिलए सहाय को नीिलमा से िमलने कì छूट देती हòई वह कहती है िक- ‘नीिलमा को म§
जानती हóँ । वह मामूली औरत नहé है । अपने को िगरा नहé सकती । इसिलए पुŁष को भी
िगरा नहé सकती । तुम उसके बारे म¤ िन:शंक रह सकते हो ।’
नीिलमा अपने पित पर पूरा ÿभाव जमाए सहाय कì पाåरवाåरक समÖया को सुलझाकर
तथा मंýीÂव पद से मुि³ त के भाव को भी पåरवितªत कर देती है । इस ÿकार से नीिलमा का
ÿेयसीÂ व अÂयािधक सफल जान पड़ता है, ³यŌिक इस ÿेयसीÂ व का िनवाªह करते हòए न तो
उसका पÂनीÂव सफल होता है, और न तो उसका नारीÂव ही नीिलमा को चोट पहòँचाता है ।
४) कुँअर:
िमÖटर सहाय का जामाता कुँअर एक सफल उīोगपित, धन के वैभव म¤ िलÈ त पाÔ चाÂ य
िवचारधारा को मानने वाला Óयि³ त है । वा³चातुयª म¤ िनपुण कुँअर िववािहत होते हòए भी
अÆय कई िľयŌ से संपकª रखता है । अपनी पÂनी अंजिल म¤ वह धन के ÿित आकषªण पैदा munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष सÌबÆधŌ का łप, ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर सÌबÆधŌ के िविवध łप
37 करने म¤ बड़ी ही कुशलता के साथ काफì हद तक सफल भी हो जाता है । सहाय के जामाता
कुँअर का लàय िसफª और िसफª धन ÿािĮ ही है । मंýी पद पर आłढ़ िमÖटर सहाय उसके
Ô वसुर है । वह इस अवसर से अपने वा³चातुयª के बल पर ही उनसे अिधकािधक लाभ
उठाना चाहता है । उसका साला वीरेÔ वर िकसी अÆय राजनीितक नेता का आ®य लेता है,
तब वह अपनÂव का भाव ÿकट कर उÆह¤ वापस बुलाने जाता है ।
५) ठाकुर:
इस उपÆयास के एक और ÿमुख पाý ठाकुर महादेव िसंह कì गॉंव म¤ बहòत बड़ी जमéदारी है।
सहाय के पåरवार से भी महादेव ठाकुर कì बड़ी ही घिनķता है । सहाय का पुý वीरेÔ वर
उसके फामª पर रहता है । वह इलाके का बड़ा ही ÿभावशाली Óयि³ त होने के कारण
राजनीित म¤ भी उसकì गहरी Łिच है । सहाय जी कì मंýी पद कì उदासीनता से वह बहòत
गहरे łप से िचिÆ त त है । ठाकुर महादेव िसंह Ó यवहार कुशल एवं िवनोदी Öवभाव का Óयि³ त
है । सहाय के पुý वीरेÔ वर को सहाय का जामाता Óयवसाय म¤ लगाना चाहते है । महादेव िसंह
के फामª पर रहता वीरेÔ वर कहां रहे? इस ÿij पर कुँअर और महादेव िसंह म¤ िववाद हो
जाता है । कुँअर भी धन के अहंकार के मद म¤ कटु हो जाता है, िजससे अपमािनत ठाकुर
सहाय को कुँअर कì ŀĶता के िवषय म¤ कहता है- ‘सुनो सहाय, कुँअर बड़े हŌगे तो अपने घर
के हŌगे । मुझे घर पर दोÖत जमाते हो, तो िकस बात कì ।
महादेव िसंह ठाकुर ÖपĶवादी होने से राजनीित म¤ सफल नहé होता है ।
६) वीरेÔ वर:
मुि³ त बोध उपÆयास म¤ वीरेÔ वर सहाय का पढ़ा-िलखा पुý है, िशि±त होने के बावजूद अपने
िपता सहाय के मंýी पद पर रहते, कोई लाभ न उठा पाने के कारण वह अपनी ÿितिøया के
łप म¤ िपता के आदशŎ एवं आचरण से कुिपत है, और अपने िपता सहाय से दूर जाकर
ठाकुर महादेव िसंह के फामª पर रहता है । वीरेÔ वर अपने िपता के ÿित िवþोह कì भावना के
फलÖवłप उसका बहनोई कुँअर उसम¤ धन ÿािĮ कì अपार लालसा उसके भीतर जागृत
करता है, िपता का सालस Öवभाव वीरेÔ वर को िबÐकुल भी Łिचकर नहé लगता है, वह
चाहता है िक उसके िपता सहाय उसे कभी-कभी डांटे-डपट¤ । िमÖटर सहाय मंýी जैसे बड़े
पद को अÖवीकार कर देते ह§, उससे जन समूह अटकलŌ पर उ°र देते समय सहाय कहते
ह§ िक उÆह¤ आिÂमक शांित चािहए । वे ‘मुि³ त के बोध’ का अहसास करने के िलए ही पद कì
अÖवीकृित चाहते ह§ । वीरेÔ वर अपने िपता के इस तरह के Óयवहार का िवÔ लेषण कुछ इन
शÊदŌ म¤ करता है, ‘लेिकन उनका यह ढ़Ōग है िक पद नहé चािहए । पद के िलए तो सारा
Âयाग, तपÖया का यह łप है, ऊपरी जो है वह नखरा है, इसिलए है िक आúह अनुरोध हो
और वे यह जािहर कर सके िक पद ने नहé बिÐक इÆहŌने पद पर Öवयं कृपा कì है ।
७) िवøम:
िवøम िसंह ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ िमÖटर सहाय का एक राजनीितक िवरोधी है । िवøम
िसंह जैसे ÿभावशाली Óयि³ त कहé पािलªयाम¤ट म¤ न चले जाएँ, इसिलए िमÖटर सहाय के
सभी िहतेषी उÆह¤ मंýी पद से Â यागपý देने के िलए बहòत समझाते रहते ह§ । िवøम िसंह का munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
38 नाम माý लेने से ही ठाकुर महादेव िसंह जी िवफल हो जाते ह§ । िवøम िसंह और महादेव
िसंह के आगमन से िमÖटर सहाय कì ÿितिøयाएँ खुलकर सामने आने लगती ह§ ।
४.४ मुि³ त बोध उपÆयास म¤ ľी पुŁष संबंधŌ का łप सहज आकषªण: कथाकार जैनेÆ þ जी के अनुसार आकषªण पिवý और सवªÓयापी होता है ।
‘मुिĉबोध’ म¤ राज®ी जैसी सुंदर और सुशील पÂनी, बेटी अंजली और बेटा वीरेÔ वर, दोनŌ
वयÖ क होते हòए भी सामािजक बंधनŌ को Âयागकर सहाय और नीिलमा जैसी Öवछंद ÿकृित
वाली युवती के सौÆदयª łपी आकषªण म¤ बंध जाते ह§ । नीिलमा के दशªन माý से ही उसम¤
Öफूितª का संचार होने लगता है । उसके आकषªण म¤ कहé न कहé चुÌबकìय आकषªण भी
िवīमान है ।
४.५ पीड़ा का भाव और ĬÆ ĬाÂ मक अिभÓयि³ त जैनेÆ þ के उपÆयासŌ कì िविशĶता यह है िक उनम¤ ĬÆ Ĭ िसफª नाåरयŌ म¤ ही िदखाई देता है,
³यŌिक वह पÂनी और ÿेिमका दोनŌ ही łपŌ म¤ इस ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास म¤ मौजूद है ।
‘मुि³ त बोध’ म¤ एक असफल ÿेम कì पीड़ा से सहाय अपना मंýी पद छोड़ना चाहता है, तब
वह िववािहत होने के बावजूद अपने ÿेयसी धमª का िनवाªह करने के िलए िनलीमा सहाय को
समझाने के िलए जाती है । उससे कहती है- ‘मालूम नहé लगा िक तुम मूड़ रहे हो, मुझसे
नहé, सबसे ही मुड़ रहे हो । िजधर दुिनया है, उससे उÐटी तरफ जाना चाहते हो । डर तो
पहले भी था मुझे तुÌहारे बारे म¤, लेिकन इस बार ³या बात है कॉंटा ³या है?
राज®ी अपने पित सहाय कì पीड़ा को भली भांित समझती है, इसिलए वह अपना कतªÓय
Âयाग कर भी उसे नीिलमा के पास िमलने हेतु भेजती है ।
पित के ÿित िवþोह भाव:
मुि³ त बोध उपÆयास म¤ ľी के सामने ÿेमी के łप म¤ तथा एक ÿभावशाली Óयि³ त के łप म¤
कोई पुłष यिद आता है तो उस ľी का अपने पित के ÿित िवþोह भाव भी झलक उठता है।
सूरज कुंड म¤ वेिडंग सूट म¤ सूयª Öनान करना उसके पित के ÿित असंतोष या िवþोह भाव को
ÿकट करता है । इसी तरह से राज®ी का अपने पित से असंतोष उसे ठाकुर कì और
खéचकर ले जाता है । इस उपÆयास म¤ लेखक जैनेÆ þ कुमार ने ÿेम कì अिनवायªता को भी
आवÔयक माना है । उनका मानना है िक जीवन ÿेम करने के िलए ही बना है, यिद ÿेम न हो
तो इस जीवन का कोई भी मतलब नहé है । ‘मुि³ त बोध’ जैसे लोकिÿय उपÆयास म¤ चौवÆ न
वषêय िमÖटर सहाय को भी अपनी ÿेयसी नीिलमा के Èयार कì Èयास बनी हòई है । और
सहाय कì यह Èयास कहé ना कहé राज®ी को भी Öवीकार है । वह यह मानती भी है आदमी
म¤ देवता होता है और पÂनी नहé हमेशा एक िÿयसी ही उसे जगाती है । डॉ³टर वांदीवाडेकर
के अनुसार नीिलमा तो वह ÿेयसी है, और जो पित को पÂनी म¤ नहé िमला, वह सहाय को
नीिलमा म¤ िमला, रस, सौÆदयª, समान Ö तर पर िÖ थ त उÂकट बंधन रिहत ÿेम । ‘मुि³ त बोध’
जैसे उपÆ यास म¤ दाÌ पÂ य संबंधो का िचýण भी बड़े ही खुले łप से हòआ है । यथा
समझौतावादी दाÌ प Â य इस संबंध म¤ पित-पÂ नी के बीच ऊपरी तौर से भी अÆ य Ö ýी या
पुłष के कारण संबंधŌ म¤ थोड़ा सा भी अलगाव आ जाये िकÆ तु जीवन म¤ एक समय तो ऐसा munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष सÌबÆधŌ का łप, ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर सÌबÆधŌ के िविवध łप
39 भी आ जाता है िक पÂ नी का महÂ व खुद-ब-खुद Ö थािपत हो जाता है । िमÖ टर सहाय इस
उपÆ यास म¤ जीवन भर नीिलमा से ही ÿेम करते रहे, िकंÆ तु चौपÆ न वषª कì अवÖ था म¤ उÆ ह¤
पÂ नी का महÂ व और उसकì उपयोिगता उÆ ह¤ समझ म¤ आने लगती है । सचमुच अगर देखा
जाए तो इधर पÂ नी Â व कì संÖ था म¤ इसका अथª ÿतीत होने लगा है । पÂ नी ब¸ चŌ कì मॉं हो
सकती है, पर उमर हो जाने पर उसकì गहरी वÂ सलता उसके पित को ही ÿाÈ त होती है ।
अथाªत् िववाह जैसी पĦित का सार वय कì नवीनता म¤ नहé िमलता है, बिÐ क अिधकता म¤
ही हािसल होता है । सामािजक जीवन म¤ एक पÂ नी के łप म¤ ÿितÕ ठा राज®ी को ही िम लती
है, भले ही सहाय ÿेरणा मूितª नीिलमा बनी रही है । आने वाले हर Óयि³ त से भाभी का
सÌ मान और ÿितķा कì असली हकदार तो राज®ी ही है । सहाय और राज®ी के दाÌपÂय
जीवन म¤ नीिलमा जैसी नारी ÿेम पर अपना एकािधकार रखना चाहती है, िकÆतु राज®ी को
भी उससे िकसी भी तरह कì कोई िशकायत नहé है । वह पाåरवाåरक िजÌमेदाåरयŌ और
दुखŌ को ढोकर, नीिलमा को ही सहाय कì ÿेरणा मानकर उÆह¤ सुलझाने का पूरा अवसर
देती है । वाÖतव म¤ सामािजक मयाªदाओं के कारण सहाय जैसा राजिनितक Óयि³ त न तो
नीिलमा के कारण राज®ी का ही हो पाता है, और न ही राज®ी के कारण नीिलमा का ।
राज®ी के एक समझदार एवं कुशल पÂनी होने से सहाय के इस दोहरे जीवन कì गृहÖथी भी
राज®ी बड़े ही सुचाŁ łप से चलाती है ।
४.६ मुि³ त बोध उपÆयास म¤ िववाहेतर संबंधŌ के िविवध łप िववाहेतर ÿेम संबंधŌ को बाँधे रखने म¤ जैनेÆþ का आÅयािÂमक भाव भी कारण łप म¤
िवīमान है । जो कुछ भी िववाह म¤ ÿाĮ नहé होता वह अलौिकक आनंद म¤ ही ÿाĮ हो जाता
है । 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ राज®ी एवं नीिलमा के ÿेिमका łप कì शि³ त को भली भाँित
जानती है । पित के सोए हòए ईÔ वरीय भाव को वह ÿेयसी Ĭारा ही जगाना चाहती है । सहाय
मंýी पद से Âयागपý देना चाहते ह§, और सहाय म¤ कमª के ÿित आÖथा जगाने का सबसे बड़ा
कारण नीिलमा ही बनती है । संघषªमय जीवन कì अिभÓयि³ त से भी िनिमªत संबंधŌ को इस
उपÆयास के माÅयम से दशाªया गया है । ľी-पुŁष संबंधो म¤ Óय³ त संघषō म¤ एक तरफ जहाँ
बुिĦ का संघषª होता है तो दूसरी ओर भावना का बौिĦक धरातÂव पर पाý किहं न किहं
पåरिÖथितयŌ से ट³कर लेता हòआ भी नजर आता है । िकÆतु भावना कì ÿबलता इतनी तीĄ
होती है िक भावना कì िवजय पर ही पीड़ा का अनुभव भी होने लगता है। नीिलमा
'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ िम. दर कì पÂनी होते हòआ भी वह िमÖटर सहाय जैसे Óयि³ त से ही
ÿेम करती है । सामािजक जीवन के अंत म¤ सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है
। पिÂनयाँ अपने ÿेिमयŌ को छोड़कर अपने गृहÖथ जीवन म¤ ही वापस लौट जाती ह§ । िमÖटर
सहाय को मंýी पद Öवीकार करने के िलए मजबूर करती रहने वाली नीिलमा भी अपने
गृहÖथ जीवन म¤ वापस लौट आती है । इस उपÆयास म¤ ľी-पुŁष संबंधो का िवÔ लेषण भी
बड़ी ही बारीकì के साथ िकया गया है । जैिवकìय ŀिÕ ट से भी इस उपÆ यास म¤ Ö ýी-पुłष
संबंधŌ का िववेचन-िवÔ लेषण िकया गया है ।
‘मुि³ त बोध’ उपÆ यास म¤ पित-पÂनी के आिÂमक संबंधŌ कì अपे±ा ÿेमी-ÿेमीका के संबंधŌ
को ही अिधक गहरा माना गया है । राज®ी िमÖटर सहाय कì पÂनी होते हòए भी नीिलमा के
ÿेयसी łप को सहषª Öवीकार करती है, जब-जब वह अपने पित िमÖटर सहाय को उिĬµन
देखती है तो उसे वह तब-तब नीिलमा के पास ही भेजने कì पूरी कोिशश करती है । िमÖटर munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
40 सहाय को भी जब जीवन म¤ åर³ तता महसूस होने लगती है, अपनŌ से अपनÂव टूटता
िदखाई देता है, बावन वषª कì उă म¤ जब सहाय अकेलापन महसूस करने लगते है तो वे
अपनी पÂनी राज®ी को ही समझाने लगते है । यिद जीवन म¤ से Èयार चला गया तो िफर
हमारे पास ³या रह जाएगा, Èयार के िबना तो सारा जीवन ही Óयथª मालूम पड़ता है । इस
उă म¤ हम केवल माया और ममता म¤ ही पड़े रह¤गे तो हमारी ³या गित होगी । पुŁष के जीवन
म¤ पÂनी सामािजक जीवन कì पूणªता तथा ÿेयसी आिÂमक संबंधŌ कì तृिĮ का माÅयम है ।
इसीिलए ÿेयसी नीिलमा से जो आÂमीय Öफूितª सहाय को िमलती है, वह राज®ी से नहé
िमल पाती है, और सहाय के िमý ठाकुर को िमý सहाय कì पÂनी राज®ी भाभी ही अिधक
िनकट महसूस होती है । अपनी ÿेिमका के संबंधŌ म¤ खोए सहाय नीिलमा से कहते ह§, कì
नीिलमा तुÌहारे संपकª म¤ म§ न तो अपने ऊपर आवरण ले सकता हóँ, न धमª या िसĦान् त का
आदशª ही ले सकता हóँ । अ¸छा, बुरा, Öवाथª, िन:Öवाथª जो भी होगा सब ठीक ही होगा, और
यही हम दोनŌ को भी Ö वीकायª होना चािहए एक ऐसा कृितÂ व िजसम¤ हम दोनŌ नहé, बस एक
ऐसी अिनवायªता हो िजसमे या म§ रहóँ या तुम । डॉ. चंþकांत वांिदवडेकर के िवचारŌ से यह
ÖपĶ कहा जा सकता है कì, नीिलमा तो ÿेयसी ही है और जो पित को पÂनी से नहé िमला
वह सहाय को नीिलमा म¤ ÿाĮ हो गया । रस, सौÆदयª, समान Öतर पर िÖथत उÂकट बंधन
रिहत ÿेम । यहाँ भी उन दोनŌ के संबंधŌ का आधार काम, वासना और शरीर माý ही नहé है।
वह है परÆतु उतना ही िजससे ľी-पुŁष के संबंध मांसल और रसवान बनते है । अिधकतर
दोनŌ म¤ वह उ¸च मानिसक या आिÂमक संबंध है जो शरीर के माÅयम से ही सही परÆतु
ऊपर चढ़कर िवल±ण चैतÆय ÿदान करनेवाले हो जाते है, और िजÆह¤ Öथूल ÿचिलत
आसान शÊदŌ से पåरभािषत नहé िकया जा सकता है, काम ÿेम बन जाता है ।
४.७ सामािजक ŀĶी से ľी-पुŁष संबंध सामािजक जीवन म¤ पåरवार के ÿÂयेक Óयि³ त पर पåरवार का पूरा अिधकार होता है ।
Óयि³ त के ÿÂयेक फैसलŌ पर पाåरवाåरक अनुमित यिद न हो तो िवरोध कì संभावनाएँ हो
उठती है । िमÖटर सहाय इस उपÆयास म¤ मंýी पद पर ÿितिķत है, समाज म¤ उसका Öथान
ऊँचा है पर अपने िसĦांतो और आचरण पर कायम रहे तो पåरवार वालŌ के िलए मुिÔकल
खड़ी होती है। िमÖटर सहाय को भी पåरवार वालŌ ने अपने Öवाथªवश ही घेर रखा है । यिद
सहाय अपने मंýी पद से Âयागपý दे द¤ तो दामाद को इंडÖůीज का ³या होगा, इसिलए
वीरेÔ वर को इंडÖůीज म¤ रखने का ÿÖताव रखा जाता है । सहाय को बेटी अंजिल भी यह
िशकायत करती है िक आपके इस मंýी पद से हमे ³या लाभ? हमारे िलए तो सारी कì सारी
उमर पड़ी है ।
िसĦांतो पर कायम रहने वाले सहाय जी से वीरेश् वर को भी िशकायत है । वह नीिलमा से
कहता है, आप मेरा कĶ नहé समझोगी आंटी, इनका नाम है, और मै इनका बेटा समझा
जाता हóँ, और बाहर सब लोग इनमे नाम के िहसाब से मुझे नापते है, और मै छोटा बन जाता
हóँ, और लौटकर अपनी ही भीड़ म¤ आ जाता हóँ । ľी पुŁष संबंधो के अÆतगªत जैनेÆþ कुमार
कì ŀĶी से पåरवार म¤ पुŁष के जीवन म¤ ÿेयसी का Öथान ही अिधक महÂवपूणª है, भले ही
वह सामािजक ŀĶी से न हो । नीिलमा सहाय को ÿेयसी के łप म¤ होते हòए भी पåरवाåरक
समÖयाओं के िलए मजबूर करता है । 'मुि³ त बोध' शीषªक उपÆयास म¤ राजनीित से मुि³ त
पाने कì कÔमकश िमÖटर सहाय म¤ बनी हòई है । सहाय एक मंýी होने के कारण उनसे उनके munotes.in

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मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष सÌबÆधŌ का łप, ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर सÌबÆधŌ के िविवध łप
41 पåरवार वाले सगे-संबंधी, िमý सभी Öवाथªवश कुछ न कुछ लाभ उठाना चाहते है, उनकì
ŀĶी म¤ महÂव सहाय का नहé, उनके मंिýÂव का है । इसी कुंठा के कारण सहाय मंýी-पद
Âयागपý देना चाहते ह§ । िमÖ टर स हाय मंýी पद Â यागने के अलावा पÂनी तथा ÿेिमका के
िबच उलझे हòए ĬंĬ úÖत नजर आते है । पÂनी के ÿित कभी पूणªता का अनुभव इसिलए नहé
जगता िक नीिलमा का ÿेम उÆह¤ चारो ओर से घेरे हòए है । िकÆतु नीिलमा के साथ सूरजकुÆड
म¤ वेिड़ंग सूट म¤ सहाय उसे कतई बदाªÔत नहé कर पाते है, वहाँ उनके सम± अपने िववािहत
होने कì मयाªदा सामने आ जाती है ।
सहाय नीिलमा कì इस तरह कì हरकतŌ कì वजह से ही उसे अपमािनत भी करते ह§,
नीिलमा भी िमÖटर सहाय के मन कì कुंठा को जान, समझ लेती है, और यह कहती भी है
िक, ‘मरीज और इलाज सब शरीर म¤ ही होते है । बंद म¤ मरीज खुले म¤ इलाज इसी तरह से
'मुि³ त बोध' उपÆयास ľी-पुŁष के बीच शारीåरक संबंधो का ÿÔ न तब उठता है, जब वो
नीिलमा सहाय कì पÂनी राज®ी से कहती है, सच बताऊँ राज भाभी तुमने अब तक इनम¤
ľी के शरीर का डर ³यŌ रहने िदया है । डरते खुद है, माफ़ì मुझसे माँगते है । सहाय का
भरा-पूरा पåरवार है, काफì लÌबा वैवािहक जीवन भी है, िफर भी ÿौढ़ावÖथा म¤ शारीåरक
आकषªण का रोमांस का ºवार बढ़ जाता है, भले ही उसम¤ वासना कì गंध न हो । िमÖटर
सहाय के िलए राज®ी का मूÐय घर के सामान िजतना ही है, पर ठाकुर के साथ पÂनी के
लगाव को देखकर एक नया आकषªण पैदा होता है । उसकì नजर म¤ वह पड़ोसी हो गयी है ।
िबÖतर पर जाते समय उसकì मुÖकान एवं चाल से िपघलकर सहाय िबलकुल मोम बन
जाते ह§ ।
ÿेमी-ÿेिमका कभी शारीåरक संबंधŌ म¤ मयाªदाओं का उÐ लंघन भी कर बैठते ह§ । सहाय कì
ÿेिमका नीिलमा एक बार कì घटना कì याद िदलाती हòई कहती है िक एक बार हम दोनŌ
भूले थे, वह ±ण ³या मर सकता है । इसीिलए खुद को या अपने फजª को बहòत ºयादा याद
रखने कì जŁरत भी नहé है । एक बार जो उनसे भूल हòए थी उसके पåरणाम ÖवŁप िमÖटर
सहाय बार-बार नीिलमा के ÿित खéचे चले आते ह§ । परÆतु वे मयाªदाओ म¤ भी बंधे रहते है ।
अपने पÂनी राज®ी के होते हòए भी नीिलमा के ÿित शारीåरक आकषªण उनकì शारीåरक
अतृिĮ को Óय³ त करता है । 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ िववािहत सहाय और उसकì ÿेरणा
मूितª ÿेयसी के संबंधŌ को ľी-पुŁष संबंधŌ के मÅय नैितक माÆयता भी ÿाĮ हòई है । इस बात
को सहाय जी कì पÂनी राज®ी भी सहषª Öवीकार करती है । वह िमÖटर सहाय को कई बार
अचेतन या अशांत देखकर कहती भी है कì अब तो नीिलमा आ गई है, िबगड़े हòए ³यŌ हो,
खुश रहने कì बात है । िववाह के माÅयम से ÿेम करने का अिधकार पित को िसफª पÂनी से
होता है, इसिलए जैनेÆþ सहाय और उनकì पÂनी, ÿेयसी दोनŌ को ही देखते ह§ । कभी-कभी
पÂनी के आगे ऐसे ÿेम के कारण कमजोर ही होना पड़ता है ।
इसीिलए सहाय कì पÂनी राज®ी से कहती है, पित ÿेम म¤ कायर हो जाया करते ह§, और
अपनी पÂनी से ही चोरी करने लगते ह§ । तुम को कभी उसकì जŁरत ही नहé है राज®ी ।
डॉ. ºयोितष जोशी इस नैितक माÆयता के िवषय म¤ िलखते है, 'नीिलमा पराई ľी होकर भी
सहाय को जीवन ±ेý के संघषª म¤ पुनः लाती ह§, पर रोचक बात यह है कì नीिलमा से सहाय
के संबंध म¤ सहाय कì पÂनी राज®ी कì भूिमका महÂवपूणª है । वह अपने पित कì िÖथित
समझती है तथा नीिलमा को भी अपनी तरफ से िनिÔ च ंत करती है । पित-पÂनी संबंधŌ म¤ munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
42 जीवन म¤ इस गैर नारी का ÿवेश ÿितक नहé लगता, पर जैनेÆþ जी ने नीरस जीवन
िÖथितयŌ म¤ एक नारी के ÿवेश से नई जीवन ऊजाª ÿवािहत कì है ।
४.८ सारांश 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ यह दशाªया गया है कì दाÌपÂय संबंधŌ म¤ पित-पÂनी के Öवभाव म¤
सरलता का और िवनăता का होना बहòत जŁरी है । अलग-अलग ÿकृितयŌ वाले पित-पÂनी
के दाÌपÂय जीवन म¤ हमेशा संघषª ही बना रहता है । दाÌपÂय संबंध वाÖतव म¤ बहòत ही
मजबूत होते है । 'मुि³ त बोध' उपÆयास िववािहत सहाय और उसकì ÿेरणा मूितª ÿेयसी के
संबंधŌ को ľी-पुŁष संबंधŌ म¤ नैितक माÆयता भी िदखाई देती है । इस उपÆयास म¤ सहाय
का भरा-पूरा पåरवार है, लÌबा वैवािहक जीवन भी है, िफर भी ÿौढ़ावÖथा म¤ शारीåरक
आकषªण का, रोमांस का, ºवार बढ़ जाता है, भले ही उसमे वासना का लेश माý भी न हो ।
इस उपÆयास म¤ शारीåरक संबंधŌ को भी माÆयता दी है ।
४.९ लघु°रीय ÿÔ न १) ‘मुि³ त बोध’ उपÆयास के ÿमुख पाýŌ का चåरý-िचýण कìिजए |
२) 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ आए ľी-पुŁष संबंधŌ को िवĴेिषत कìिजए |
३) 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ पीड़ा के भावŌ कì अिभÓयि³ त को ÖपĶ कìिजए |
४) 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ िववाहेतर संबंधŌ पर ÿकाश डािलए |
४.१० दीघō°री ÿÔ न १) िमÖटर सहाय पर िटÈपणी िलिखए |
२) सामािजक ŀĶी से ľी-पुŁष संबंध को समझाइए |
३) 'मुि³ त बोध' उपÆयास म¤ ĬंĬाÂमक अिभÓयि³ त को ÖपĶ कìिजए |
४) नीिलमा पर िटÈपणी िलिखए |
४.११ बोधÿÔ न १) 'मुि³ त बोध' उपÆयास के लेखक कौन ह§ ?
२) 'मुि³ त बोध' उपÆयास को कौन सा पुरÖकार िमला है ?
३) नीिलमा िकसकì ÿेयसी है ?
४) 'मुि³ त बोध' उपÆयास का ÿकाशन वषª ³या है ?
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मुिĉबोध उपÆयास के पाýŌ का चåरý िचýण ľी पुłष सÌबÆधŌ का łप, ĬंĬाÂमक अिभÓयिĉ और िववाहेतर सÌबÆधŌ के िविवध łप
43 ४.१२ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतके १) िहंदी उपÆयास एक सव¥±ण - महेÆþ चतुव¥दी, नेशनल पिÊलिशंग हाउस, १९६२
िदÐली
२) धमªयुग - जैनेÆþ के उपÆयासŌ पर आलेख - सं. धमªवीर भारती
३) जैनेÆþ - सृजन और धमª - डॉ. रामकमल राय
४) जैनेÆþ के उपÆयासŌ का िशÐप - डॉ. ओमÿकाश शमाª - पांडुिलिप ÿकाशन - १९६३
५) जैनेÆþ के उपÆयास ममª कì तलाश - चंþकांत वांिदवडेकर - पूवōदय ÿकाशन -
१९८४ िदÐली


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44 ५
जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ
कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
इकाई कì łपरेखा
५.१ इकाई का उĥेÔय
५.२ ÿÖतावना
५.३ łिकया बुिढ़या मूल संवेदना
५.३.१ łिकया बुिढ़या : सामािजक िनयमŌ से िवचलन कì दुदªशा
५.४ दो सहेिलयाँ मूल संवेदना
५.४.१ दो सहेिलयाँ : परÌपरा और łिढ़यŌ के बदलाव का संकेत
५.५ सारांश
५.६ वैकिÐपक ÿij
५.७ लघु°रीय ÿij
५.८ बोध ÿij
५.९ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतक¤
५.१ इकाई का उĥेÔय जैन¤þ िहंदी के अÂयंत महÂवपूणª कथाकार ह§, िजÆहŌने कÃय और संवेदना कì ŀिĶ से सवªथा
नवीन कहािनयŌ के साथ ÿेमचंद के समय म¤ ही लेखन के ±ेý म¤ ÿवेश िकया था। उनकì
कहािनयŌ कì संवेदना और िशÐप के कारण तÂकालीन समी±कŌ ने उÆह¤ न केवल लि±त
िकया बिÐक ÿशंसा भी पायी । सािहÂय जगत को थोड़ा आंदोिलत भी िकया । आगे चलकर
मनोवै²ािनक सािहÂय कì महÂवपूणª धारा को िवकिसत करने म¤ उनका अÂयंत महÂवपूणª
और युगांतरकारी योगदान माना गया । इस इकाई के अंतगªत जैन¤þ कì अÂयंत महÂवपूणª
कहािनयŌ का अÅययन िकया जाएगा । पाठ्यøम म¤ सिÌमिलत कुल दस कहािनयŌ म¤ से
'Łिकया बुिढ़या' और 'दो सहेिलयाँ' कहािन याँ इस इकाई के अंतगªत सिÌमिलत ह§ । यह दोनŌ
ही कहािनयां जैन¤þ कì ÿितिनिध कहािनयŌ म¤ सिÌमिलत कì जाती ह§ । इस इकाई के
अंतगªत जैन¤þ कì िविशĶ संवेदना और कथािशÐप को िवĴेिषत िकया जाएगा , िजससे जैन¤þ
कì समेिकत िवशेषताओं को देख पाना संभव हो सकेगा। इन कहािनयŌ के अÅययन से छाý-
छाýाएँ Öवयं िकसी कहानी कì समी±ा के कायª को समझने और करने म¤ समथª हो सक¤गे ।
५.२ ÿÖतावना िहंदी कहानी का जÆम सन १९०० से माना जाता है और उस दौर म¤ िहंदी कहानी के
िवकास म¤ 'सरÖवती ' और 'इंदु' जैसी पिýकाओं का अÂयंत महÂवपूणª योगदान था । िहंदी
कहानी का पहला दशक उसकì शैशवावÖथा का समय था । दूसरे दशक के मÅय म¤ चंþधर munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
45 शमाª 'गुलेरी', मुंशी ÿेमचंद जैसे कहानीकारŌ के चलते कहानी म¤ गंभीरता और िशÐप कì
ŀिĶ से नवीनता आने लगी । डावाँडोल कदमŌ के साथ बढ़ रही िहंदी कहानी अचानक दौड़
लगाने म¤ समथª हो गयी । िहंदी कहानी के ±ेý म¤ मुंशी ÿेमचंद का आगमन एक महÂवपूणª
घटना कì तरह माना जाता है । उÆहŌने अपनी कहािनयŌ म¤ देश और समाज को क¤þ म¤ रखा
और यही उस समय कì आवÔयकता भी थी । उनकì कहािनयŌ म¤ úामीण समाज अपनी
समÖयाओं के साथ सिचý łप म¤ सामने आया उÆहŌने पूणª िनĂा«त ŀिĶ से समाज का
अवलोकन और मूÐयांकन िकया । अकुंठ भाव से उस सÂय को अपनी कहािनयŌ के माÅयम
से पाठकŌ के सामने रख िदया । समूचा उ°र भारत अपनी संपूणª संवेदना के साथ उनकì
कहािनयŌ म¤ धड़कता िदखाई देता है ।
िहंदी कहानी के िवकास के तीसरे दशक के अंत म¤ कथाकार जैन¤þ का आगमन हòआ और
िहंदी को एक नए संवेदना-बोध से पåरिचत कराने का काम उÆहŌने िकया । उनकì कहािनयŌ
म¤ Óयिĉ का मानिसक जगत खुलकर सामने आया । Óयिĉ का अपना मानिसक ĬंĬ और
संघषª कहािनयŌ म¤ िचिýत हòआ। कहािनयां Óयिĉ क¤िþत बनने लगé । यहां Óयिĉ क¤िþत कहे
जाने का अथª कदािप समाज िनरपे± नहé है । Óयिĉ, समाज से अलग नहé है, समाज कì ही
एक इकाई है और अंततः Óयिĉ का जगत, समेिकत łप म¤ सामािजक जगत का ही िनमाªण
करता है । इस तÃय के मĥेनजर जैन¤þ कì कहािनयां भले ही Óयिĉ-मनस को क¤þ म¤ रखती
ह§ परंतु समाज िनरपे± नहé है । यह अवÔय है िक उÆहŌने कहानी कì िदशा को एक और
मोड़ िदया जो Óयिĉ और समाज दोनŌ कì ही ŀिĶ से अÂयंत महÂवपूणª था ।
सामािजक जी वन जीते हòए Óयिĉ कई तरह के सामािजक दबावŌ और तना वŌ से होकर
गुजरता है । सकाराÂमक िÖथित म¤ तो Óयिĉ का अपना िवकास होता है, परंतु सामािजक
संÖथाओं और Óयिĉ के बीच नकाराÂमकता आ जाने के कारण Óयिĉ के मनोजगत म¤
तमाम úंिथयां िवकिसत हो जाती ह§, िजनके कारण Óयिĉ का जीवन असहज और
अÖवाभािवक हो जाता है । यह भी एक बेहद महÂवपूणª ÿij है िक सामािजक संÖथाओं के
इÆहé ÿभावŌ और दुÕÿभावŌ कì चचाª - पåरचचाª आवÔयक हो जाती है । इन úंिथयŌ का
खुलना और खुलकर उन पर चचाª होना भी आवÔयक हो जाता है । 'दो सहेिलयां' जैसी
कहानी िलखकर उÆहŌने ľी जगत कì िजन िवडंबनाओं को उजागर िकया, वह कभी गिहªत
िवषयŌ म¤ सिÌमिलत था । परंतु यह इसी समाज कì कटु स¸चाई है । ऐसी न जाने िकतनी
िवडंबनाएँ, मानिसक ĬंĬ तथा संघषª उनकì कहािनयŌ म¤ देखने को िमलते ह§ । इसीिलए
गोिवंद िम® कहते ह§, "जैन¤þ कुमार िहंदी सािहÂय म¤ ÿेमचंद के बाद के सबसे बड़े कथाकार
के łप म¤ जाने जाते ह§ । उÆह¤ ÿेमचंद के समानांतर भी खड़ा िकया जाता है - िक अगर
ÿेमचंद ने िहंदी कहानी उपÆयास को कÐपना और मनोरंजन लोक से िनकालकर यथाथª कì
जमीन पर खड़ा िकया तो जैन¤þ ने उÆह¤ मनुÕय कì भीतरी दुिनया म¤ ले जाकर ÿौढ़ता ÿदान
कì ।" इस तरह जैन¤þ ने Óयिĉ मनोजगत के तमाम गिहªत ÿijŌ को अपनी कहािनयŌ के
माÅयम से उठाया और उस पर अÂयंत गंभीर िवचार-िवमशª भी ÿÖतुत िकया । भले ही वे
िकसी स माधान तक नहé पहòंचते या अपनी तरफ से कोई समाधान नहé देना चाहते, पर एक
गंभीर चचाª और िवचारणीय िबंदु उनकì कहािनयŌ का अंग हमेशा रहते ह§ ।
munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
46 ५.३ łिकया बुिढ़या : मूल संवेदना Łिकया बुिढ़या जैन¤þ कì अÂयंत महÂवपूणª कहानी मानी जाती है । यह कहानी Łि³मणी
नामक एक लड़कì के पåरिÖथितयŌ वश Łिकया के łप म¤ पåरवतªन कì कहानी है । इस
पåरवतªन से गुजरते हòए Łि³मणी के अपने जीवन के सही-गलत फैसले और समाज से परे
हटकर जाने का ĬंĬ, संघषª और पåरणाम िदखाया गया है । जैन¤þ पाýŌ कì मनोदशा के साथ
डूबने-उतराने वाले कहानीकार ह§ । इस कहानी म¤ भी Łिकया कì मनोदशा का सहज और
Öवाभािवक िचýण देखने को िमलता है । अपने जीवन के गलत फैसलŌ के चलते और दीना
के Ĭारा िकए गए िवĵासघात के कारण वह ऐसी अÿितरो Åय मुþा म¤ िदखती है, िजससे
पIJाताप और ÿायिIJत - दोनŌ कì छिव िद खाई देती है । एक कहानीकार के łप म¤ जैन¤þ
अपना काम कुछ इस तरह से करते ह§ िक वे जीवन कì िविवध िवडंबनाओं को लि±त कर,
उÆह¤ कथाÂमक सांचे म¤ ढालकर और पाýŌ के मानिसक घात-ÿितघात के Ĭारा वे समÖत
पåरिÖथितयŌ का उĤाटन करते ह§ । कताª होते हòए भी वे अपनी भूिमका को यहé तक सीिमत
रखते ह§ । जीवन कì इन िविवध िवसंगितयŌ और िवडंबनाओ तथा इनम¤ फंसे हòए पाýŌ के
ÿित वे िकसी भी तरह के िनणªय को आरोिपत नहé करते ह§ । उनका मु´य काम है,
पåरिÖथितयŌ के घात-ÿितघात म¤ फंसे हòए पाýŌ को िचिýत कर देना और मूÐयांकन वे
पाठकŌ पर छोड़ देते ह§ । यह कहानी भी कुछ इसी तरह घिटत होती है, िजसम¤ वे Łि³मणी
से Łिकया तक के सफर को समÖत घातŌ-ÿितघा तŌ के साथ िचिýत करते ह§, परंतु िकसी
भी ÿकार के िनणªय का उĤाटन वे नहé करते। इसे वे पाठकŌ पर ही छोड़ देते ह§ । आगे
कहानी का िवĴेषण करते हòए इन सभी िÖथितयŌ पर िवचार-िवमशª िकया जाएगा ।
५.३.१ łिकया बुिढ़या : सामािजक िनयमŌ से िवचलन कì दुदªशा:
जैन¤þ िहंदी के ऐसे अनूठे कहानीकार ह§ िजÆहŌने अपने समय म¤ शÊद और िशÐप कì ŀिĶ से
िहंदी कथा सािहÂय को िनतांत िभÆन भावबोध से पåरिचत कराया और एक अलग ही तरह
के यथाथª को अपनी रचनाओं म¤ ÿामािणकता के साथ ÿÖतुत िकया । जैन¤þ कì कहािनयŌ म¤
अलग-अलग उă के पाý और ÿसंग मौजूद ह§ जो िनतांत िभÆन - िभÆन सामािजक ,
राजनीितक , आिथªक, सांÖकृितक िÖथितयŌ म¤ रहते हòए मानिसक संघषª कर रहे ह§ ।
मनोिव²ान सÌमत मनुÕय कì िविभÆन िÖथितयŌ को िजस तरीके से उÆह¤ ÿÖतुत करने म¤
सफलता िमली तो ऐसे म¤ यिद उÆह¤ मनोिव²ान को सशĉ ढंग से िहंदी सािहÂय से आबĦ
करने और आरंिभक ÿÖतोता होने का जो ®ेय ÿाĮ है, वह अकारण नहé है । जब वे कहानी
और उपÆयास के ±ेý म¤ अपना सबसे महÂवपूणª िलख रहे थे, उस समय पåरवेश कì
सामािजक , राजनीितक और आिथªक पåरिÖथितयां िभÆन तरह कì थé । पूरे िहंदी सािहÂय
के िलए Öवतंýता-पूवª कì संवेदना अÂयंत महÂवपूणª ढंग से समसामियक पåरिÖथितयŌ से
ÿभािवत थी । ऐसे समय म¤ उस ÿभाव से दरिकनार होकर िनतांत िभÆन िÖथितयŌ म¤ Óयिĉ
को महÂव देना, उसके ÿाकृितक मनोभावŌ के साथ संघषª को कथा सािहÂय म¤ ÿÖतुत
करना , यह सब कुछ जैन¤þ को उस पूरे पåरवेश म¤ अÂयंत िविशĶ बनाता है ।
जैन¤þ कì कहािनयŌ और उपÆयासŌ म¤ ÿेम और दांपÂय कì िविभÆन िÖथितयां अलग - अलग
ढंग से िचिýत हòयी ह§ । उनकì अलग -अलग कहािनयŌ म¤ ÿेम अपने सामािजक संघषª के
साथ तथा दांपÂय भी संघषª करता हòआ िचिýत हòआ है । गोिवंद िम® िलखते ह§ "िहंदी munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
47 कहानी म¤ जैन¤þ कì पहचान िजन कहािनयŌ से बनती है, वे उनकì ÿेम संबंधी कहािनयां है ।
ÿेम Óयिĉ कì सहज, Öवाभािवक मनोवृि° है, पर आिथªक, सामािजक , राजनीितक ,
धािमªक, मनोवै²ािनक आिद अनेक कारणŌ से वह मुĉ नहé होता और बाहरी िÖथितयŌ से
उसका संघषª अपåरहायª होता है । जैन¤þ कì कहािनयŌ म¤ यह संघषª अनेक łपŌ म¤ िचिýत
हòआ है ।" जैन¤þ कì कहानी 'Łिकया बुिढ़या' ÿेम और उसके सामािजक संघषª को कई
ŀिĶकोण से देखने कì कोिशश करती है । जब हम यह कहते ह§ िक जैन¤þ Óयिĉ-मनस के
कुशल िचतेरे ह§ तो कहé न कहé मन म¤ यह धारणा बनने लगती है िक वे समाज कì तुलना म¤
Óयिĉ को कहé ºयादा महÂव देते िदखाई पड़ते ह§ । परंतु ऐसा है नहé । जैन¤þ कì कहािनयŌ
कì िविशĶ भंिगमाओं को भलीभांित लि±त करने पर यह देखा जा सकता है िक इन िविभÆन
पåरिÖथितयŌ कì Öवाभािवक पåरण ित सामािजक þोह कì अंितम पåरणित अथाªत बरबािदयŌ
और जीवन कì तबािहयŌ के łप म¤ ही देखने को िमलती है । जैन¤þ का इस तरह से
ÿÖतुतीकरण िनिIJत łप से उनकì सामािजक ÿितबĦताओं को ÿÖतुत करता है । Łिकया
बुिढ़या कहानी को इसी िविशĶ ŀिĶकोण से देखने कì आवÔयकता है ।
Łिकया बुिढ़या कहानी कì ÿधान पाý Łि³मणी है िजसके माÅयम से जैन¤þ जी ने अपने
िनिहताथŎ को पाठकŌ के सम± ÿÖतुत िकया है । कहानी अपने अनूठे िशÐप के चलते भी
Łिचकर बनती है । पहले वतªमान, िफर अतीत और पुनः वतªमान - तक लाकर इस कहानी
के माÅयम से जैन¤þ ने अपने उĥेÔयŌ को ÖपĶ िकया है । जैन¤þ कì कहािनयŌ को पढ़ते हòए
यह महसूस होता है िक जैसे वह कहानी पाठकŌ के िलए नहé बिÐक ®ोताओं के िलए तैयार
करते ह§ । िजस िसलिसलेवार ढंग से वे अपनी बात कहते चले जाते ह§, वह एक मुकÌमल
संवाद कì तरह महसूस होती है । जैन¤þ कहानी िलखते नहé, दरअसल कहते ह§ और कही
गई बात बस उसी ढंग से सुनी जा सकती है । घटनाओं को कहने का उनका अपना तरीका
है और कहते हòए वे घटनाओं कì तािकªकता-अतािकªकता को लेकर बहòत ºयादा िचंता
करते िदखायी नहé देते ह§ । बस बात कही जा रही है और सुनने वाले को सुनना है और उस
कहे हòए से ही िनिहताथŎ कì िसिĦ करनी है ।
अपने वतªमान म¤ फूल बेचने वाली Łिकया बुिढ़या, अतीत म¤ Łि³मणी थी, जो खाते-पीते
खýी पåरवार कì इकलौती बेटी थी, "सो यह łिकया नहé थी , Łि³मणी थी । फूल नहé ले
जाकर ब¤चती थी, Öवयं बोलते फूल कì नाईं घर के आंगन म¤ चहकती िफरती थी और मां-
बाप को धÆय करती थी । मां-बाप पैसे से हीन न थे, अ¸छे खाते-पीते थे । उनकì यह पहली
लड़कì थी , और अब तक आिखरी भी थी ।" अ¸छे ढंग से पालन पोषण के बाद उस दौर म¤
जैसा िक हर माता-िपता कì सामा िजक समझदारी और िजÌमेदारी बेटी के िववाह कर देने म¤
ही थी , Łि³मणी भी िववाह योµय हो जाने पर माता िपता के िलए िचंता का िवषय बनती है,
"इस भांित उमर वह हो आयी िक मां बाप को सोच होने लग गया । Êयाह करके अपने घर से
दूर कर द¤ इसे, तब उÆह¤ चैन कì नéद िमले । और पड़ोस म¤ रहता था एक बढ़ई । ये लोग
खýी थे, और वह खाती और उस खाती के एक लड़का था । बड़ा होिशयार उठा था ।
िदÐली आए हÉते आया-जाया करता था और कल -पुज¥ कì बड़ी बात¤ सीख गया था । नाम
था दीना ।" िववाह तय होता है, परंतु माता-िपता का तय िकया हòआ िववाह हो नहé पा ता है
"पर, िविध कì गित अपरंपार है । Êयाह नहé हòआ और Êयाह से एक रोज पहले, उसने देखा,
अपने मां बाप के घर से टूटकर, रोती हòई , दीना के कंधे से लगी और बाहòओं म¤ थमी, वह
उसके साथ चली जा रही है। नहé, उसको सुख नहé है, उसके जी म¤ ददª है; कहां जा रही है, munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
48 उसको पता नहé है; िफर ³या होगा , कुछ उसको खबर नहé है; पर वह उसके हाथŌ म¤ थमी,
कंधे से लगी, जा रही है । वह समुþ म¤ ले जा के पटक देगा ? ³या बुरा है, पटक दे, वह आंख
मूंदकर, उसका नाम लेती, डूब जाएगी। वह जा रही है ।" यहé से Łि³मणी के सामाÆय जीवन
म¤ असामाÆय ता आनी शुł होती है, जो बढ़ते - बढ़ते अंत म¤ Łिकया बुिढ़या, फूल बेचने
वाली, िनतांत गरीबी म¤ गुजर बसर करने वाली Łिकया बुिढ़या तक आकर समाĮ होती है ।
अपनी कहािनयŌ म¤ जैन¤þ बहòत कुछ अÓयĉ ढंग से कहते चलते ह§ । घटनाओं के साथ
चलते-चलते पाठक को यह समÖत तÃय अÿÂय± łप से भाँपने होते ह§ । Łि³मणी के
िववाह न हो पाने का कारण Łि³मणी और दीना के बीच ÿेम है । दोनŌ पåरवारŌ के घर
अगल-बगल ह§ और कहानी यह संकेत करती है िक Ł³मणी और दीना एक दूसरे से बेहद
ÿेम करते ह§ । िववाह तय हो जाने के कारण Łि³मणी बहòत दुखी है और िववाह के एक िदन
पहले दीना Łि³मणी से िमलता है । इसके बाद जैन¤þ अचानक िववाह रĥ होने कì सूचना
देते ह§ और Łि³मणी दीना के साथ िदÐली के िलए िवदा होती है । इस बहाने जैन¤þ उस
आøोश को Óयĉ कर देते ह§ जो संभवत: Łि³मणी के पåरवार म¤ इस घटनाøम से रहा
होगा।
िकशोरवय का ÿेम समझदारी नहé बिÐक आवेग का पåरणाम होता है । दीना और Łि³मणी
िबÐकुल िभÆन ÿकृित के थे । Łि³मणी के बारे म¤ लेखक िलखता है "Łि³मणी सुंदरी है,
लºजाशील है, सावन -भादŌ म¤ जैसे पली है। ÿेम जैसी भारी चीज से भरी है, इससे Öवयं
हÐकì नहé है । इसिलए ÿेिमका नहé है, úिहणी है । सेवा म¤ उसका ÿेम तुĶ है, उÂसगª म¤ उसे
तृिĮ है। अिधकारशील उसका ÿेम कम है, इसिलए उसम¤ लग सकता है िक चमक कम है,
धार कम है, नमक कम है । फुहारे उसम¤ नहé ह§, ³यŌिक गहराई अिधक है ।.... वह úिह णी है,
úिहणी नहé बन सकì , इसिलए अभािगन है । वह ÿेमभरी है, इससे ÿेिमका होना उससे नहé
संभलेगा ।" वहé दीना िबÐकुल िभÆन ÿकृित का युवा है । उसम¤ उतावलापन है । उसम¤ ÿेम
को पा लेने कì ललक तो थी, पर िनभा लेने कì शिĉ नहé थी । दीना के संबंध म¤ कहानी
सूचना देती है "और दीना ! दीना उतावला है, इससे जÐदी अघा जाने वाला है । उसे अतृिĮ
चािहए , तृिĮ झेलने कì उसम¤ सामÃयª नहé। इसी से तृिĮ - तृिĮ कì भूख उसम¤ लपट¤ मारती
रहती है । और अब यहां वह बहòत सर पटक चुका है । उसे रोजी के िलए कोई काम भी नहé
िमल सका है । वह असंतुĶ है । असंतोष भीतरी है, इससे सब और फैल रहा है, और
आसपास जो है, उन सभी पर अपने फन पटकता है ।" इस तरह िनतांत िभÆन ÿकृित का
होने के कारण उन दोनŌ का िववाह िजस पåरणित को ÿाĮ होता है, वह आIJयª का िवषय
नहé था। दीना आवेगमय िÖथित के कारण Łि³मणी से िववाह कर तो लेता है, उसे िदÐली
लेकर चला भी जाता है परंतु कोई कामकाज न िमल पाने के कारण फाँके पड़ने कì नौबत
आ जाती है । ऐसे म¤ ÿेम का वायवीय बादल गायब हो जाता है और यथाथª का कठोर
धरातल सामने आ खड़ा होता है । जहां समÖत आकषªण धुआं हो जाता है । और यहé से
Łि³मणी का जीवन भी रसातल कì ओर जाने लगता है ।
Łि³मणी , जो एक पÂनी कì तरह अपने ÿेम को िनभाना चाहती थी, अपने ÿेमी कì कायरता
के कारण अब हारी हòई थी । असफलता के अवसाद म¤ दीना लंपटता का िशकार हो जाता है
। यह बात भी संकेत łप म¤ कहानीकार पाठकŌ तक ÿेिषत करता है । दीना चÌपो भाभी कì
ओर आकिषªत हो जाता है । यह बात Łि³मणी भी जानती -समझती है । पर ऐसा लगता है,
जैसे वह अपने िकए पर बेहद पछता रही है । वह अपने को तकलीफ देकर शायद दंड देना munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
49 चाहती है । जीवन के कठोर धरातल ने उसके फैसले को गलत िसĦ कर िदया है और ऐसी
िÖथित म¤ सब कुछ देखकर भी वह अनदेखा कर रही है और दीना से गािलयां खा रही है,
िपटना चाहती है "Łि³मणी अंधी न थी । पर उसने सŏदयª को अपने सजाकर न रखा ।
हारती गई और हार अपनाती गई - पर यह न िकया । अपना कुछ भी, अिधकार के साथ
संर±ण कर रखने कì बुिĦ, चेĶा उसम¤ नहé हòई, नहé जागी । वह अपना सब -कुछ खो देने
को तैयार होती जाने लगी । और चुपचाप एक-एक घड़ी काटकर उस िदन को जोहने सी
लगी, जब उससे कह िदया जाए - िनकल यहां से ।" उसम¤ इतना साहस नहé है िक वह
अपनी भूल को सुधार सके । वह भीतर ही भीतर अपने मन म¤ खुद को तरह-तरह कì सजाएं
देती है व सज़ा भोगना चाहती है । वह इस åरÔते को बोझ कì तरह बस ढो रही है । उसे
लगता है िक उसे खुद कह िदया जाए िक वह यहां से िनकल जाए और उसे अपनी इस
गलती से िनजात िमले । माता िपता का आ®य छूट जाने के बाद आसान नहé था िक इस
जगह को भी यूं ही छोड़ िदया जाए पर जैन¤þ मन के इÆहé आघातŌ और संघषŎ को ÿÖतुत
करने म¤ िसĦहÖत ह§ । िविभÆन िÖथितयŌ म¤ एक Óयिĉ अपने मन म¤ ³या सोच सकता है,
िवचारŌ का उलझाव ³या हो सकता है, इन िÖथितयŌ म¤ वह ³या कर सकता है ? इन सभी
को जैन¤þ अपनी कहािनयŌ म¤ भली-भांित ÿÖतुत करते ह§ । łिकया बुिढ़या कहानी म¤ भी
Łि³मणी के मानिसक संघषª के Ĭारा वे इसी को िचिýत करते िदखाई देते ह§ । संकटŌ ने ÿेम
को चंद िदनŌ म¤ ही भुला िदया और नौबत यह आ गयी िक "Łि³मणी को लगा जैसे लात से
सुनाया जाएगा, तभी उसके िलए अिधक ठीक होगा । वह सच , खूब िपटना चाहती है इस
समय । जी के भीतर असĻ िनराशा का उĦत मुँह इसी भांित कुचलकर कुछ देर नीचा रहे
तो तिनक चैन तो उसे िमले। वह कुछ नहé बोली ।"
िवपरीत पåरिÖथितयŌ के Ĭारा पैदा हòई यह खटास िफर भरी नहé और जैसा िक दीना फरेबी
Öवभाव का िनकला , वह Łि³मणी को अकेला और बेसहारा छोड़कर भाग िनकला । एक
िदन दीना और चंपो दोनŌ ही घर पर नहé थे । बस यही Łि³मणी के पåरणय का अंत हो गया
और उसने अिभशĮ होकर दंड भुगतने हòए अपने अंधकारमय भिवÕय को Öवीकार कर
िलया, "ऐसे िदन बीते िक जÐदी वह िदन आ गया , जब कहने कì आवÔयकता ही जड़ - मूल
से नĶ हो गयी िक 'तू िनकल जा' । उसने पाया िक वह वहां अकेली है, दीना नहé है, चंपो भी
नहé है, जाने कहां चले गए ह§। और वह बे-पैसा है, और िपछले चार महीनŌ का मकान का
िकराया उससे ही िलया जाने वाला है ।" इस मोड़ प र आकर Łि³मणी का जीवन Łि³मणी
के łप म¤ समाĮ हो गया और आगे वह Łिकया बुिढ़या म¤ तÊदील हो गयी । उसका जीवन
िजस दर¥ म¤ बंध गया, उसका कहानीकार ने कहानी म¤ फूलवाली के łप म¤ वणªन िकया है ।
जहां उसका घर िदन म¤ रात कì तरह लगता है और रात म¤ नरक कì तरह । उस मोहÐले म¤
कुछ ब¸चे बाल-सुलभ Öवभाव वशव उसे नानो कह कर बुलाते ह§ । वह नानी , नानो आिद के
łप म¤ बदलती हòई जीवन म¤ आगे िघसटती रहती है । दीना ने िजस ढंग से उसकì अपे±ाओं
का अंत िकया था, उसके बाद उसे िकसी से जैसे कोई अपे±ा ही नहé रह जाती । वह फूल
और ÿसाद बेचती है । अपनी जगह पर चुपचाप िसर झुकाए बैठी रहती है । आने-जाने
वािलयŌ को फूल और ÿसाद का दोना पकड़ा देती है । नजर¤ उठाकर भी नहé देखती । पैसे
कì अपे±ा भी नहé करती । िकसी ने पैसे उसके सामने डाल िदए तो डाल िदए, कोई िबना
िदए िनकल गया तो िनकल गया । एक भµन Ńदय जीवन अब उसकì पूंजी था और इसी के
साथ Łिकया बुिढ़या कì कहानी समाĮ हो जाती है । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
50 जैन¤þ के िवषय म¤ यह माना जाता है िक वे Óयिĉ मनोिव²ान के कुशल िचतेरे ह§ । Óयिĉ -मन
कì परतŌ को उधेड़ने का साथªक ÿयास उनकì कहािनयŌ म¤ िमलता है पर िजस भी वगª कì
बात वे अपनी कहानी म¤ कह रहे होते ह§, वह पाý िवशेष अपने मन के साथ साकार हो जाता
है । यह भी माना जाता है िक उनकì कहािनयां Óयिĉ-क¤िþत ह§ । समाज Óयिĉ के पीछे कहé
रह जाता है परंतु यह तÃय उतना ठीक नहé लगता । łिकया बुिढ़या कहानी इस बात का
साथªक उदाहरण है । िजस ढंग से यह पूरी कहानी चलती चली जाती है, łिकया िजस
मनोदशा म¤ पूरी कहानी म¤ िदखाई देती है, वह कहé -न-कहé समाज को क¤þ म¤ रखता ही है ।
माता-िपता और समाज का ितरÖकार कर उसने दीना को अपनाया था । ±िणक आवेग म¤
िलए गए इस फैसले को आने वाले समय ने गलत सािबत कर िदया । बहòत समय तक दीना
िवपरीत पåरिÖथितयŌ को झेल नहé पाया और अंततः एक दूसरी ľी के साथ Łि³मणी को
अकेला और बेसहारा छोड़कर भाग गया । इस िÖथित के बाद दीना से िववाह के बाद जैसे-
जैसे Łकमणी को जीवन कì कटु स¸चाई समझ म¤ आती गयी, वैसे-वैसे िनिIJत łप से एक
अपराधबोध उसके भीतर भरता चला गया । यह अपराध बोध, माता िपता और समाज सभी
के ÿित था । इसी के कारण उसम¤ खुद को दंिडत करने कì ÿवृि° का िवकास हòआ और
पहले दीना तथा िफर बाद म¤ अकेले रहते हòए आजीवन वह खुद के साथ यही करती रही ।
खुद को दंिडत करने कì ÿवृि° के चलते ही संभवत वह अपने घर-पåरवार से पुनः संपकª
नहé करती । उसे मालूम है िक उसने जो िकया है, वह ठीक नहé है। इन िनिहताथŎ को िलए
हòए यह कहानी केवल Óयिĉ क¤िþत कहानी नहé रह जाती है। बिÐक समाज Öवतः इसम¤
क¤þ म¤ आ जाता है । Łिकया के łप म¤ जैन¤þ उस दुÖसाहस का पåरणाम ÿÖतुत करते
िदखायी देते ह§, जो समाज म¤ अब आम-सा हो गया है । इस तरह Łिकया बुिढ़या कहानी
जहां एक तरफ Łि³मणी के संघषª और Ĭंद को ÿÖतुत करती है, वहé एक साथªक संदेश देने
का भी ÿयास करती है ।
५.४ दो सहेिलयाँ : मूल संवेदना कहानीकार जैन¤þ कì कहानी 'दो सहेिलयां' अपने समय-संदभŎ म¤ ľी मनोदशा को
अिभÓयĉ करने वाली साथªक कहानी है । जसोदा और वसुधा नामक दो सहेिलयŌ के
माÅयम से कहानीकार ने ľी जीवन कì िवसंगितयŌ, िवडंबनाओं और इनके ÿित ĬंĬ तथा
संघषª को बखूबी अिभÓयĉ िकया है । जसोदा और वसुधा नामक दो सहेिलयŌ पर आधाåरत
यह कहानी दोनŌ के जीवन का मूÐयांकन सा करती िदखाई देती है । िववाह के बाद कì
िनतांत अलग-अलग पåरिÖथितयŌ के बावजूद वे अपनी-अपनी िÖथितयŌ से संतुĶ नहé
िदखाई देतé । दोनŌ के जीवन म¤ पåरिÖथितयां अलग तरीके से घिटत हो रही ह§ । जसोदा
जहां अपने पित के िदखावे और वैचाåरक दुिवधाओं के कारण तालमेल नहé िबठा पाती, वहé
वसुधा अपने पित कì अÂयिधक लगाव के चलते ऊब और घुटन महसूस करती है और
सारी सुिवधाओं के बावजूद वह कहé न कहé अपने जीवन से असंतुĶ िदखाई देती है । जैन¤þ
ने इÆहé समÖत िÖथितयŌ का उĤाटन समÖत वैचाåरक सरोकारŌ के साथ इस कहानी म¤
िकया है । इस कहानी म¤ दोनŌ सहेिलयां दो अलग-अलग ňुवŌ म¤ खड़ी िदखाई देती ह§ । एक
तरफ जसोदा जहां अपने असंतुĶ वैवािहक जीवन के बावजूद उÆमुĉ िनणªय ले पाने म¤
अपने को असमथª पाती है, वहé दूसरी तरफ वसुधा कì संतुिĶ का कोई Óयवहाåरक कारण
तो समझ म¤ नहé आता परंतु उसकì असंतुिĶ से एक बदलाव का संकेत अवÔय िमलता है munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
51 और वह बदलाव है अपनी िÖथितयŌ म¤ रहकर ÖवातंÞय चेतना को जीिवत और िवकिसत
करना । वसुधा म¤ ÖवातंÞय-चेतना अिधक मुखर है, जो नवीन िÖथितयŌ कì ओर संकेत
करती िदखाई देती है, पåरवेश के बदलाव को िचिÆहत करती िदखाई देती है । जैन¤þ ने इस
कहानी म¤ इस समÖत घटनाøम को दोनŌ सहेिलयŌ के संवादŌ के माÅयम से बखूबी
अिभÓयĉ िकया है, िजसे आगे कहानी के िवĴेषण म¤ देखा जा सकेगा ।
५.४.१ दो सहेिलयाँ : परÌपरा और łिढ़यŌ के बदलाव का संकेत:
ÿÂयेक लेखक का सािहÂय अपनी िनजी अिभŁिचयŌ और वैचाåरक ÿाथिमकताओं से बेहद
ÿभािवत होता है । जैन¤þ कì अपनी अिभŁिच वाĻ-पåरिÖथितयŌ के ÿभाववश उÂपÆन हòयी
Óयिĉ-मन कì आंतåरक Óयथा को अिभÓयĉ करने म¤ रही है और अलग-अलग समुदाय और
वगª के पाýŌ के सहारे उÆहŌने अलग-अलग पåरिÖथितयŌ के ĬÆĬ और संघषª को अपनी
कहािनयŌ म¤ पåरपूणªता के साथ अिभÓयĉ िकया है । यह कहािनयां जहां एक तरफ पåरवेश
के ÿित िविशĶ िचंतन को अिभÓयĉ करती ह§, वहé दूसरी तरफ समाज म¤ हो रहे बदलावŌ
कì ओर भी संकेत करती ह§ ।
भारतीय समाज म¤ ľी वगª ऐसा वगª रहा है, जो अपने िलए िनणªय लेने कì िÖथित म¤ नहé
रहा। उसके जीवन और िवचारŌ पर सदा पुŁष-स°ाÂमक मानिसकता हावी रही है । उसकì
अपनी Łिच यŌ - अिभŁिच यŌ का कोई मतलब नहé रहा है । शाľŌ और सामािजक परंपराओं
- łिढ़यŌ के अनुसार उसका जीवन एक िनिIJत िदशा कì ओर गमन करता रहा है । इन
परंपराओं - łिढ़यŌ के चलते उसके अपने ÖवातंÞय-बोध और अिÖतÂव -बोध का ÿij सदैव
गौण ही रहा है । जैन¤þ ने अपनी कहािनयŌ म¤ िविवध पåरिÖथितयŌ म¤ ľी जगत कì िविशĶ
सोच को भी भरसक िचिýत करने का ÿयास िकया है । उनकì कहानी 'दो सहेिलयां' इस
ŀिĶ से अÂयंत उÐलेखनीय कहानी है। यह कहानी बदलते समय और संदभŎ म¤ ľी कì
इ¸छाओं - आकां±ाओं, उसके मानिसक ĬÆĬ और संघषª तथा उसके जीवन कì
िवडÌबनाओं को अिभÓयĉ करती है ।
जसोदा और वसुधा नामक दो अिभÆन सहेिलयŌ कì यह कहानी िľयŌ कì मानिसक ĬंĬ
और संघषª को Óयĉ करने वाली कहानी है । स°र Łपये तन´वाह पाकर िकसी तरह से
जीवन Óय विÖथत करने वाली जसोदा और हजार Łपए तन´वाह खुद घर ले आने वाली
वसुधा का जीवन अÂयंत िभÆन पåरिÖथितयŌ से गुजर रहा है । एक िजसकì हर भौितक चाह
टूटकर खÂम हो चुकì है और दूसरी जो भौितकता और सुिवधाओं से इतनी िघरी है िक
घुटन महसूस करती है । दोनŌ सहेिलयां लगभग प§तालीस वषª कì अधेड़ अवÖथा म¤ है ।
कॉलेज के समय कì िमýता बीच के समय-अंतराल म¤ खÂम नहé हòयी और वह जब दोबारा
िमलé तो उसी अनौपचाåरक और अपनÂव के भाव से। दोनŌ कì अपनी तरह कì Óयथाएं ह§,
िजÆह¤ जैन¤þ उनके आपसी संवाद के Ĭारा बड़ी सहजता से अिभÓयĉ कर देते ह§ । जसोदा
अथाªत जसु का वैवािहक जीवन ±त -िव±त है और अपने सबसे छोटे बेटे मोहन को साथ
रखे हòए वह िश±क कì नौकरी करके िकसी तरह जीवन यापन कर रही है । कहानी म¤
उसका वणªन करते हòए कहानीकार कहता है, "छः ब¸चे जसोदा के भी थे, लेिकन िववाह
असफल हो गया था । पित कहé थे, यह यहां थी। बाल-ब¸चे सब अपनी जगह जम गए थे,
एक मोहन पास रहता था । बाप कभी के मर चुके थे िक िजनके रहते सब हरा-ही-हरा था । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
52 अब बानक सब िबगड़ चुका था । कहé Öकूल म¤ पढ़ा कर जीिवका चलाती थी और ºयŌ-ÂयŌ
सबसे छोटे मोहन को पास रखकर कॉलेज पढ़ा रही थी ।" इस तरह जसोदा एक ऐसे पाý के
łप म¤ िचिýत है, जो पित से अलग रहते हòए संघषªपूणª आÂमिनभªरता के साथ अपने
Öवािभमान को सुरि±त िकए हòए है । महÂवपूणª यह देखना है िक उसके अकेलेपन का कारण
³या है ? उसका वैवािहक जीवन िबना िकसी िहंसा के अलगाव के łप म¤ ³यŌ उपिÖथत है ।
कहानीकार जसोदा कì इस समÖया को Óयĉ करते हòए इसके पीछे अनमेल िवचारŌ को
देखता है । दरअसल जसोदा के पित के ÓयिĉÂव म¤ एक जबरदÖत िवरोधाभास है । िदन
और रात म¤ िनतांत िभÆन ÓयिĉÂव म¤ िदखाई देने वाला यह िलजिलजा ÓयिĉÂव संभवतः
जसोदा को पच नहé रहा था । एक लंबे समय तक इसी वेदना और असहज åरÔते को सहन
करते हòए अंततः वह अलगाव को अपना लेती है। कहानी म¤ इन िÖथितयŌ को कहानीकार ने
कुछ इस ढंग से दशाªया है, "वे उपदेश देते ह§ । जी से चाहते ह§, मुँह से उपदेश देते ह§ ! संयम
का उपदेश ! अपने और मेरे बीच 'सÂयाथªÿकाश' रखते ह§ । सÂय के अथª के ÿकाश को
सामने पाती हóँ, तो जानती नहé िक म§ उसे कैसे उलांघू और उन तक कैसे पहòँचूँ ? िफर जब
एकाएक उनका बढ़ा हòआ हाथ मेरी तरफ आता है तो म§ िकसी तरह नहé समझ पाती हóँ िक
यह िकस सÂय के अथª का ÿकाश है, खोई रह जाती हóँ । तो ³या तू कहेगी िक यह मेरी भूल
है ? छः ब¸चŌ कì म§ मां बन गयी - कैसे बन गयी, अब यही अचरज होता है ।"
दूसरी तरफ वसु अथाªत वसुधा है । वसुधा एक ÿितिķत संÖथान म¤ नौकरी कर रही है, जहां
से उसे हजार Łपए ÿितमाह वेतन िमलता है । िदन और रात उसका ´याल रखने के िलए
उसका पित है, जो उसकì हर छोटी मोटी जłरत के िलए मुंह ताकते पहले से ही सामने
बैठा रहता है । पÂनी के ÿित अपने उ°रदाियÂव को वह इतना ºयादा िनभा रहा है िक
वसुधा को इन िÖथितयŌ से ही घृणा है । उसे अपना पित िलजिलजे Öवभाव का लगता है,
िजसे सहन करना उसके िलए बेहद मुिÔकल है । उसने वैवािहक समझौते को िकसी और
जłरत के िलए ही बनाए रखा है । जसोदा कì अपे±ा वसुधा कì िÖथितयां िनतांत िभÆन है ।
जसोदा अपने वैवािहक जीवन कì कृिýमता और दोगलेपन से घुटन महसूस करती है, परंतु
वसुधा कì िÖथितयां िनतांत िभÆन ह§ । उसके पित का पूणª समपªण उसके िलए उलझन का
कारण बन जाता है । वह थोड़ा फासला चाहती है, परंतु यह फासला उसे िमल नहé पाता
और इसीिलए वह मौका पाते ही जसु के घर भाग आती है । आज भी मौका िमलने पर वह
भागी। कहानीकार बसु कì उलझन को Óयĉ करते हòए िलखता है, "पर इस उमर म¤ तो वह
सहारा भी है । एक उमर थी, म§ घूमा करती थी। लेिकन अब ³या यह आराम कì बात नहé है
िक घर पहòंचती हóं िक सब िकया -कराया िमलता है ? बस इतना है िक कभी उस सेवा से मन
इस कदर तंग आ जाता है िक बस ³या कłं ? मदª एक काम म¤ मदª हो तो उतने से तो
चलता नहé है । बाकì िजंदगी म¤ भी तो उसे मदª होना चािहए । पर उÆह¤ बस ³या कहóँ ।"
कहानीकार दोनŌ सहेिलयŌ कì पåरिÖथितयŌ को िजस ढंग से अिभÓयĉ करता है, उसम¤
जसु कì पåरिÖथितयŌ के अनुसार उसकì Óयथा का कारण तो समझ म¤ आता है परंतु वसु
का वणªन करते समय िसवाय इसके िक ºयादा परवाह उसे सहन नहé हो रही और कोई
कारण समझ म¤ नहé आता । वसु िनिIJत łप से ऐसे म¤ बंधन ºयादा महसूस कर रही है और
ÿतीत होता है िक, वह इनसे मुिĉ चाहती है । यानी बंधी-बंधाई िदनचयाª से अलग हटकर
कुछ अपना Óयिĉगत जीने और करने कì चाह उसकì Óयथाओं का कारण है । munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
53 इस कहानी म¤ जैन¤þ ने दोनŌ सहेिलयŌ के एकांत वाताªलाप के Ĭारा जहां उनकì मानिसक
Óयथा और संघषª को अिभÓयĉ िकया है, वहé एक खास तरह कì ÖवातंÞय-चेतना दोनŌ
सहेिलयŌ के वाताªलाप म¤ देखने को िमलती है । और इस वाताªलाप का आयोजन कहानीकार
ने अकारण नहé िकया है । दरअसल यह ÖवातंÞय-चेतना युग संदभª से िनकल कर आयी है ।
िनिIJत łप से जैन¤þ िजस समय रचना कमª म¤ रत थे, उस दौरान सैĦांितक łप म¤ भले ही
ľी ÖवातंÞय को लेकर िकतनी ही बात¤ कì जाती थé, परंतु Óयवहाåरक ŀिĶ से एकमाý यही
तÃय ÿधान łप से देखने को िमलता था िक वे सभी पुŁष स°ाÂमक िदशािनद¥शŌ के Ĭारा
संचािलत होने को बाÅय थé । कहानी कì संवेदना िनिIJत łप से इसी पुŁष-स°ाÂमक
मानिसकता के ÿित एक िवþोह ÿकट करती है । परंतु जैन¤þ यहां भी सावधान ह§। वे मयाªदाएँ
लांघने को तैयार नहé है ।
कहानी म¤ जसु के अकेलेपन को देखते हòए वसु उसे अपने कॉलेज के दौरान के पुŁष िमý के
ÿित झुकाव के िलए ÿेåरत करती है । जसु, िजसे परंपराएं और łिढयाँ तोड़ने म¤ कहé न
कहé संकोच है, उसके संकोच को तकª से संतुĶ करते हòए वसु कहती है, " उसकì आंखŌ म¤
खोज और भटकन देखी तो भागी आयी हóं तेरे पास । अरी, मेरे कमीशन को ही पकाने के
खाितर एक बार िपघल आ । नहé तो जानती है ³या होगा ? होगा यह है िक म§ जगह ले लूंगी
और मुझे बंधन नहé है । पित ह§, और वे इतने ÿेमी ह§ िक कुछ पूछना-जानना नहé चाहते। मेरे
िलए वह इतनी सुिवधा है िक सब कुछ मेरे िलए संभव है ।" जैन¤þ कì शैली और Öवभाव के
अनुłप कहानी एक साथ एक दुिवधा को जीती हòई आगे बढ़ती है । एक तरफ परंपरा से
अिभÆनता को लेकर एक आøोश सा िदखाई पड़ता है, वहé दूसरी तरफ पåरवतªन के संकेत
भी देखने को िमलते ह§ । पåरवतªन जो अभी मानिसक धरातल पर घिटत हो रहे ह§ । परंतु
ऐसी िÖथित म¤ ÖवातंÞय चेतना पूरी तरह से मुĉ भी नहé है । इसी कì अिभÓयिĉ वसु के
Ĭारा कहे गए इस संवाद म¤ देखने को िमलती है, जो जीवन जीने कì िववशता को अिभÓयĉ
करता है, "जी के काबू म¤ भी ³यŌ होती है ! मुझे देख, म§ भी अपने को संभाले हóं िक नहé ?
उनको तो तैने देखा है । है िक नहé चÔमेबĥूर । लेिकन िनभाये जा रही हóं । सच कहती हóं, जी
म¤ भी कभी ऐसी िघन होती है िक आÂम-हÂया कर लूं । पर नहé , रोज पलंग पर साथ सोना
पड़ता है । यही कहती हóं, जसु, मन के अलावे म¤ रहने से फायदा नहé है । मन मार कर ही
रहना हो पाता है ।"
इस कहानी म¤ परंपरा से िवचलन न कर पाने का ĬंĬ और संघषª जसु के माÅयम से
अिभÓयĉ हो रहा है । वहé Öवतंýय - चेतना कì िवकलता वसु के ÓयिĉÂव से ÿकट हो रही
है । कहानीकार ने इन दोनŌ सहेिलयŌ के माÅयम से दो िभÆन ÿकृितयŌ और मंशाओं को
अिभÓयĉ करने वाले चåरýŌ का सृजन िकया है । परंपरा से िवचलन न कर पाने कì जो बात
है, वह ज सु के इस संवाद से Óयĉ होती िदखाई पड़ती है, "तुझे सौगंध है िक तुम न कभी
पित कì बात करोगी , न उस चेहरे कì बात करोगी जो मेरे सारे कĶŌ का कारण रहा । उसका
Èयार न होता तो म§ तिनक से ही कĶ से कभी कì िडग चुकì होती और अब तक बड़े आराम
से होती । िजससे आराम पास फटक भी नहé सका और कĶ को संपूणª साथªक भाव से
अपनाये चली आयी हóँ - उस चेहरे को म§ िकसी तरह सामने नहé पाना चाहती हóँ ।" जसु के
ÓयिĉÂव म¤ कहé न कहé परंपरा से मढ़ िदए गए संÖकार भी िदखाई दे रहे ह§ परंतु वसु इन
सभी से मुĉ है । यहां गौर करने वाली एक महÂवपूणª बात यह भी है िक आिथªक
आÂमिनभªरता कहé न कहé इन के िवचारŌ को आकार देने म¤ अपना काम कर रही है । जसु munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
54 म¤ वसु कì तरह िवþोह कर पाने का साहस नहé है । उसके पीछे उसकì अपनी आिथªक
पåरिÖथितयां और िववशताएँ ह§ । दूसरी तरफ वसु कì आÂमिनभªरता उसे इस तरह के
फैसले लेने म¤ स±म बनाती िदखायी पड़ती है ।
इन सभी िÖथितयŌ को अिभÓयĉ करते हòए जैन¤þ िकसी िनणªय तक नहé पहòंचना चाहते या
कह ल¤ वे िकसी तरह का िनणªय देना नहé चाहते । वह तो बस िÖथितयŌ का िचýण करते ह§
और संभवत पाठकŌ पर ही अंितम िनणªय छोड़ देते ह§ । जसोदा कì िÖथितयां ³या ह§ ? ³यŌ
ह§ ? यह तो वे िदखा देते ह§, पर ³या और ³यŌ के मĥेनजर ³या होना चािहए, इस पर वे
िकसी तरह कì बात नहé रखते । ³या पाठकŌ को यह कहानी पढ़ते हòए और जसोदा के
ÓयिĉÂव से गुजरते हòए यह सोचना चािहए िक जसोदा के वैवािहक असफलता के पीछे
िजतना हाथ जसोदा के पित के दुिवधापूणª ÓयिĉÂव का है, उतना ही जसोदा कì मन:िÖथित
का भी नहé है । ³यŌिक जसोदा कॉलेज के िदनŌ के अपने एक िमý को िववाह के इतने समय
के बाद भी लगातार याद रखती है । पित और पÂनी के बीच म¤ यह तीसरा कहé न कहé
लगातार िÖथितयŌ के मूÐयांकन का कारण भी बन रहा है । ³या कहानीकार िदखाना चाहता
है िक जसोदा का वैवािहक िनणªय गलत था ? िनिIJत łप से िजस समय और पåरवेश कì
यह कहानी है, उस समय िववाह के संबंध म¤ Öवतंý िनणªय एक ľी के िलए बहòत बड़ा
दुÖसाहस था । कम से कम मÅयमवगª तो इस बेड़ी म¤ बुरी तरह जकड़ा हòआ ही था । ऐसी
िÖथित म¤ ³या वह यह िनणªय ले सकती थी ? िनिIJत łप से नहé परंतु इन समÖत
िÖथितयŌ को एक लंबे समय तक सहन करने के बाद अंततः िववाह संÖथा के ÿित वह
िवþोह कर देती है । उसे कृिýम नैितकता से बेहद घृणा है और इसी के चलते उसे अपने
पित से अलग रहना कहé ºयादा ठीक लगता है । भले ही उसके िलए उसे िकतनी भी
तकलीफ और परेशािनयां उठानी पड़ रही ह§ । इसीिलए वह िकसी िवīालय म¤ स°र Łपये
तन´वाह पर िश±ण कायª कर रही है । िजÌमेदारी के łप म¤ छः संतानŌ म¤ से सबसे छोटा
मोहन इसके साथ ही रह रहा है, िजसे कॉलेज म¤ िजस-ितस िकसी भी तरह से वह पढ़ा-
िलखा रही है । उसे यह सारा संघषª अपने वैवािहक जीवन के कृिýमता, दुिवधा और
दोगलेपन से कहé ºयादा सहज लगता है ।
दूसरी तरफ वसुधा कì िÖथितयŌ को लेकर ³या िचंतनीय हो सकता है ? वसुधा या वसु,
िजसके पास कोई आिथªक अभाव नहé है । पित के łप म¤ िजसके पास अ¸छा भावनाÂमक
सहारा है । जो गृहÖथी म¤ कंधे से कंधा िमलाकर उसका साथ दे रहा है । नौकरी पेशा वसुधा
के ÓयिĉÂव को पूणªता देने का काम कर रहा है । इन सब िदखा यी दे रही िÖथितयŌ के पीछे
और ³या है, जो वसुधा कì असंतुिĶ का कारण है । जसोदा कì िÖथितयां ऐसी ह§ िक
सचमुच तनाव और संघषª कì िÖथित को समझा जा सकता है । वैचाåरक łप से अनमेल
होना एक लंबे समय तक साथ देने के िलए काफì बुरी िÖथित है और संभवतः इसी के
चलते जसोदा को रोज-रोज होने वाली घुटन से मुिĉ आवÔयक लगी और इसके साथ-साथ
पित का नकारा पन, खोखली वैचाåरकता के चलते लगातार आिथªक अभावŌ कì िगरÉत म¤
आते जाना, छः ब¸चŌ कì िजÌमेदाåरयां न िनभा पाना इतने कारण काफì ह§ वैवािहक
असंतुिĶ के िलए। परंतु कहानीकार दो सहेिलयां कहानी के माÅयम से ľी जीवन कì
िवषमताओं को िचिýत करने का ÿयास कर रहे ह§। एक तरफ जहां िÖथितयां ÿितकूल ह§,
सचमुच िववाह एक बोझ है, वहé दूसरी तरफ ³या अनुकूल पåरिÖथितयŌ से वसुधा इतनी munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
55 आघाई है िक उसे असंतुिĶ और बेचैनी महसूस हो रही है ? यह भी एक अÂयंत िवकट
िÖथित है । िजसका आभास कहानी पढ़ते हòए िनरंतर होता है ।
वसुधा नए जमाने कì कामकाजी ľी है । वह समाज म¤ ľी वगª म¤ हो रहे नए पåरवतªनŌ का
ÿितिनिधÂव करने वाली पाý है । उसका िजस तरह का Óयवहार लेखक के Ĭारा िदखाया
गया है, वह कहé न कहé बड़े पåरवतªनŌ का सूचक है । वह अपनी सहेली जसोदा के दुखŌ
और तनावŌ को समझती है और उसके बाद वह सुझाव देते हòए कहती है, "अरे तू उस
आदमी को ले जो जी से चाहता है, उस पर ³यŌ अटकती है जो मुंह से ²ान बघारता है ।"
जसोदा के वैवािहक जीवन कì टूटन और िवडंबना पर वह उसे जो मागª अपनाने के िलए
कहती है, वह अमूमन परंपरा से िवþोह का सूचक और ÿतीक है । वह इस बात का भी
ÿतीक है िक समाज म¤ िकस तरह के बदलावŌ कì आवÔयकता है । िववाह जैसी संÖथा कì
łढ़ता को लेकर भी यह एक िवकÐप ÿÖतुत करती है । जो चीज जीवन म¤ सहज नहé है,
उसको बनाए रखने का भी कोई मतलब नहé है । सहज जीवन के िलए मोह को उतार
फ¤कना आवÔयक है और इसीिलए वसुधा जसोदा को बार-बार ÿेम के ÿित समिपªत हो जाने
कì ओर धकेलना चाहती है । यīिप कहानी म¤ जसोदा ऐसा करते िदखाई नहé गई परंतु यह
एक बड़े बदलाव का संकेत है । ľी जीवन कì िवसंगितयŌ का संकेत है और उन िवसंगितयŌ
से िनकलने के िलए ³या करना चािहए , इसका संकेत है । यह łिढ़यŌ के िवŁĦ खड़े हो
जाने का ÿतीक है । इस तरह यह कहानी अपने समय संदभŎ को अिभÓयĉ करती है ।
५.५ सारांश इस इकाई के अंतगªत जैन¤þ कì दो कहािनयां Łिकया बुिढ़या और दो सहेिलयां के संवेदना
प± का िवशद अÅययन िकया गया है जैन¤þ कì शैली है िक दे महÂवपूणª और अंतिवªरोध ही
मुĥŌ को अपनी कहािनयŌ म¤ Öथान देते हòए 2 तरह से साथªक कायª करते ह§ पहला तो यह
िक वे अंतिवªरोध पूणª जीवन कì िवडंबन आÂमक िÖथितयŌ म¤ फंसे हòए पाýŌ के प± का
िवशद अÅययन करते हòए यह िदखाने का ÿयास करते ह§ िक उनके पाý अपने जीवन के
ÿित िकस तरह का ŀिĶकोण रखते ह§ जीवन को भी िकतनी इमानदारी से िनभा पाते ह§ और
िफर दूसरा प± िक उनके पाý और समाज के बीच जो ĬंĬ और संघषª कì िÖथितयां ह§
उनको भी ÖपĶ करते िदखाई देते ह§ Łिकया बिढ़या कहानी म¤ Łपया Łकमणी से Łिकया
तक पहòंचने कì पåरिÖथितयŌ और िवसंगितयŌ को तो उÆहŌने िदखाया ही है साथ ही
Łकमणी के कृÂय को िजस तरह घटते हòए अंजाम तक िदखाया है वह कहé ना कहé
सामािजक आÖथाओं से िवचलन के दुÕपåरणाम के łप म¤ देखा जा सकता है इसी ÿकार दो
सहेिलयां कहानी म§ उÆहŌने जसोदा और वसुधा के मानिसक संघषª को समÖत वैचाåरक
सरोकारŌ के साथ अिभÓयĉ िकया है इस कहानी म¤ आधुिनक बदलते हòए संदभŎ म¤ जीवन
के ÿित बदलता हòआ नजåरया मौजूद है िववाह संÖथा को लेकर दो िभÆन िÖथितयŌ म¤ फंसी
हòई िľयŌ कì उă और घुटन को उÆहŌने पाýŌ के मानिसक ĬंĬ और संघषª के Ĭारा ही
अिभÓयĉ िकया है यह जैन¤þ कì अपनी िविशĶ शैली है वे अपने वैचाåरक सरोकारŌ को इसी
भांित िसĦ करते िदखाई देते ह§ इस इकाई म¤ जैन¤þ कì अित महÂवपूणª मानी जाने वाली चंþ
कहािनयŌ म¤ से दो कहािनयŌ Łिकया बुिढ़या और दो सहेिलयां का िवĴेषण िकया गया है ।
munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
56 ५.६ वैकिÐपक ÿij १. जैनेÆþ िकस ÿकार के कथाकार माने जाते ह§ ?
(A) मनोवै²ािनक (B) मा³सªवादी
(C) ÿकृतवादी (D) उ°र-आधुिनकतावादी
२. Łि³मणी ने िकससे िववाह िकया ?
(A) मोहन (B) सोहन
(C) दीना (D) राघव
३. łिकया का वाÖतिवक नाम ³या है ?
(A) लàमी (B) Łि³मणी
(C) सुिमýा (D) मृणािलनी
४. वसुधा कì सहेली का ³या नाम है ?
(A) जसोदा (B) िवशाखा
(C) लàमी (D) Łि³मणी
५. जसोदा को िकतनी तन´वाह िमलती थी ?
(A) पचास Łपये (B) स°र Łपये
(C) अÖसी Łपये (D) सौ Łपये
६. जसोदा के बेटे का ³या नाम है ?
(A) रोहन (B) मोहन
(C) सोहन (D) बोधन
५.७ लघु°रीय ÿij १. Łिकया के जीवन कì िवसंगितयां ³या है ?
२. जसोदा के वैवािहक जीवन के अंतिवªरोध ³या है ?
३. दीना के चåरý पर िटÈपणी िलिखए ?
४. वसुधा के जीवन कì िवडंबना का िवĴेषण कìिजए ?
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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - łिकया बुढीया और दो सहेिलयाँ
57 ५.८ बोध ÿij १. Łिकया बुिढ़या कहानी के आधार पर Łकमणी के चåरý का वणªन कìिजए ?
२. Łि³मणी के जीवन कì समÖयाओं का िवÖतार से िवĴेषण कìिजए ?
३. Łिकया बुिढ़या कहानी के ÿितपाī का वणªन कìिजए ?
४. 'दो सहेिलयाँ' कहानी म¤ िचिýत समÖयाओं का िवĴेषण कìिजए ?
५. जसोदा के मानिसक ĬंĬ और संघषª का िचýण कìिजए ?
६. वसुधा के चåरý का िवĴेषण करते हòए कहानीकार के मंतÓय को िसĦ कìिजए ?
५.९ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतक¤ १. चतुव¥दी, रामÖवłप - िहंदी गī : िवÆयास और िवकास; लोकभारती ÿकाशन ,
इलाहाबाद
२. ®ीवाÖतव , परमानंद - कहानी कì रचना ÿिøया ; लोकभारती ÿकाशन , इलाहाबाद
३. मधुरेश - िहंदी कहानी का िवकास; लोकभारती ÿकाशन , इलाहाबाद
४. चौधरी , सुर¤þ - िहंदी कहानी ÿिøया और पाठ ; राधाकृÕण ÿकाशन, नई िदÐली
५. मंडलोई, लीलाधर (संपादक) - जैन¤þ कì सवª®ेķ कहािन याँ; भारतीय ²ानपीठ , नई
िदÐली
६. िम®, गोिवंद - जैन¤þ कुमार; सािहÂय अकादमी , नई िदÐली
७. राय, गोपाल - िहंदी कहानी का इितहास; राजकमल ÿकाशन , नई िदÐली


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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ
कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
इकाई कì łपरेखा
६.१ इकाई का उĥेÔय
६.२ ÿÖतावना
६.३ अपना -अपना भाµय : मूल संवेदना
६.३.१ अपना अपना भाµय : िनमªम अमानवीयता का बयान
६.४ खेल : मूल संवेदना
६.४.१ खेल : बचपन को साकार करती कहानी
६.५ सारांश
६.६ उदाहरण -Óया´या
६.७ वैकिÐपक ÿij
६.८ लघु°रीय ÿij
६.९ बोध ÿij
६.१ इकाई का उĥेÔय आपके पाठ्यøम म¤ जैन¤þ कì िनधाªåरत दस कहािनयŌ म¤ से इस इकाई के अंतगªत 'अपना
अपना भाµय ' और 'खेल' इन दो कहािनयŌ का िवĴेषण िकया गया है । जैन¤þ कì कहािन याँ,
िवषय-वैिवÅयता कì ŀिĶ से अनोखी ह§ । हालांिक एक कथाकार के łप म¤ उनकì ÿेम और
दांपÂय संबंधŌ को लेकर िलखी गई कहािन याँ कहé ºयादा चिचªत हòयé । इस इकाई के
अंतगªत िनधाªåरत दोनŌ कहािनयां िभÆन िवषयŌ पर आधाåरत ह§ । 'अपना अ पना भाµय '
सामािजक िवडंबना और मनुÕयŌ म¤ बढ़ रही असंवेदनशीलता कì ÿवृि° को उजागर करने
कì ŀिĶ से उÐलेखनीय कहानी है । जैसा िक जैन¤þ मानवीय मनोभावŌ के यथाथª को
ÿÖतुत करने हेतु समथª कथाकार माने जाते रहे ह§, इस कहानी म¤ भी उÆहŌने मनुÕयŌ म¤
खोखली सहानुभूित कì ÿवृि° को क¤þ म¤ रखा है और उस पर तीàण Óयंग िकया है ।
आधुिनक जीवन के नµन और बेशमª यथाथª को ÿÖतुत करने कì ŀिĶ से यह कहानी जैन¤þ
कì अÂयंत िविशĶ कहािनयŌ म¤ िगनी जाती है । इस इकाई म¤ ÿÖतुत दूसरी कहानी 'खेल'
1929 म¤ ÿकािशत जैन¤þ कì आरंिभक कहानी है, िजसम¤ जैन¤þ ने बाल मनोिव²ान को बड़ी
खूबसूरती से िचिýत िकया है । ब¸चŌ का सहज भोलापन इस कहानी कì शिĉ है, िजसे
जैन¤þ भली-भांित ÿÖतुत कर सके ह§ ।
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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
59 ६.२ ÿÖतावना जैन¤þ सािहÂय के अÅयेताओं ने यह बात उÆह¤ पढ़ते हòए ÖपĶ łप से महसूस कì है िक
जैन¤þ अपने समय से कुछ आगे के सािहÂयकार ह§ । उनके पास ऐसी दूरदिशªता है िक वे
भिवÕय कì संभावनाओं का पूवाªनुमान कर लेते ह§ । जैन¤þ कì कहािनयŌ और उपÆयासŌ के
िवषय कुछ इसी ÿकार के ह§ । बहòत सारी सामािजक और वैयिĉक जीवन कì कई सारी
वजªनाएँ और गिहªत िवषय उनकì कहािनयŌ म¤ िवĴेषण का िवषय बने ह§ । जैन¤þ समÖयाओं
पर िवचार करते समय कई बार दाशªिनक अंदाज म¤ ऐसे िवकÐपŌ कì तरफ बढ़ जाते ह§, जो
संभवतः वाÖतिवक जीवन म¤ काफì किठन होती ह§ । परंतु एक सािहÂयकार का कतªÓय ही
है, समÖयाओं का िवĴेषण और उनके संदभª म¤ िनराकरण हेतु िवकÐप । ऐसी िÖथित याँ
िवशेष łप से ľी जीवन कì जुड़ी हòई िवडंबनाओं पर उनके सािहÂय म¤ देखने को िमलती ह§
। पाठ्यøम म¤ िनधाªåरत दस कहािनयŌ म¤ से जैन¤þ कì कुछ कहािन याँ ऐसी ह§, जो मानव
जीवन कì ऐसी िÖथितयŌ का खुलासा करती ह§, िजनसे बढ़ रही असंवेदनशीलता और
अमानवीय ता का पåरचय िमलता है । 'अपना -अपना भाµय ' ऐसी ही कहानी है ।
इसके अितåरĉ जैन¤þ अपनी कहानी रचना के आरंभ से ही संवेदना और िशÐप दोनŌ ही
ÖतरŌ पर अपने समकाली न कहानीकारŌ से कुछ अलग थे । उनकì कहािनयŌ म¤ वाĻ-
पåरिÖथितयŌ के िचýणŌ और िवĴेषण के बजाय मानवीय पाýŌ कì आंतåरक िÖथितयŌ का
सा±ाÂकार अिधक हòआ है । जैन¤þ के दौर म¤ पाýŌ के मानिसक जगत से जĥोजहद करने
वाले, अपनी शैली म¤ वे अकेले थे, िजÆहŌ ने इतना Łिच लेकर और डूबकर मनुÕय के
मानिसक जगत म¤ िवचरण िकया था । उनकì कहािनयŌ म¤ हर उă और वगª के पाý इस
तरह कì िÖथितयŌ म¤ देखने को िमलते ह§ । जैन¤þ कì 'खेल' कहानी ब¸चŌ के आपसी खेल
और उनसे जुड़ी हòई मानिसक उथल -पुथल कì कहानी है । यह कहानी अपनी कसावट
और संवेदना से पाठकŌ को अिभभूत करती है । इस इकाई म¤ जैन¤þ कì इÆहé दो कहािनयŌ
का िवÖतृत िवĴेषण िकया गया है ।
६.३ अपना अपना भाµय : मूल संवेदना एक सािहÂयकार का मु´य कायª अपने समय-संदभŎ को लि±त करना और अपने सािहÂय
के माÅयम से पाठकŌ का Åयान उस ओर क¤िþत करना होता है । समय-संदभŎ के अंतगªत
जीवन म¤ बढ़ता हòआ नकाराÂमकता का ÿभाव , िवसंगितयाँ और िवडÌबनाएँ ÿमुख होती ह§
। कहानी 'अपना अपना भाµय' जैन¤þ कì अÂयंत यथाथªपरक और ®ेķ कहानी है । इस
कहानी म¤ नैनीताल कì सुरÌय वािदयŌ के बीच जीवन कì किठनाई और भयावहता का
िचýण लेखक के Ĭारा िकया गया है । यह िचýण एक तरफ आधुिनक समय म¤ जिटल होते
जीवन को अिभÓयĉ करता है, वहé दूसरी तरफ मानवीय समाज म¤ बढ़ती असंवेदनशीलता
कì तरफ भी Åयान आकिषªत करता है । एक दस वषêय पहाड़ी लड़का , जो अितशय गरीबी
के वातावरण म¤ जÆमा है, अपने पåरवार कì गरीबी न देख पाने के कारण गांव से भागकर
प¸चीस िकलोमीटर दूर नैनीताल शहर म¤ कामकाज कì तलाश म¤ आ जाता है । एक होटल
म¤ कुछ िदन काम करने के बाद वहां से िनकाल िदया जाता है और बस काम कì तलाश म¤
इधर-उधर भटकते हòए उसका समय बीतता है । एक काली रात भयंकर शीत म¤ वह कुछ
सैलािनयŌ को िमलता है । यह सैलानी उसकì मदद करने का ÿयास करते ह§ । पर ÿयास munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
60 फलीभूत नहé होता । कहानी म¤ यही वह Öथल है जहां आधुिनक पåरवेश म¤ धीरे-धीरे दूर
होते मानवीय सरोकारŌ से समाज का चåरý उजागर होता है । यह भयंकर शीत कì रात
उस लड़के के जीवन कì आिखरी रात िसĦ होती है । उसका मरना कोई बड़ी खबर नहé
था । सैकड़Ō-हजारŌ इÆहé िÖथितयŌ म¤ रोज मरते ह§ । जैन¤þ ने इस कहानी म¤ अÂयंत
यथाथªपरक ढंग से हमारे समाज म¤ छा गई इसी जड़ता और संवेदनहीनता को अिभÓयĉ
िकया है ।
६.३.१ अपना अपना भाµय : िनमªम अमानवीयता का बयान:
जैन¤þ कì कहािनयŌ कì शिĉ अपने पåरवेश को साथªक ढंग से िचिýत करने म¤ है । उनका
सबसे महÂवपूणª योगदान यह है िक, उÆहŌने ऐसे समय म¤ जबिक , भारतीय समाज परंपरागत
मानिसकता और łिढ़वािदता म¤ आकंठ डूबा हòआ था, िľयŌ के संदभª म¤ एक नई सोच का
सृजन िकया । वह भी अपनी तरह का अनोखा यथाथª था, िजसके संदभª म¤ कोई
सावªजिनक ढंग से बात नहé करना चाहता था परंतु यह जैन¤þ ही थे, िजÆहŌने न केवल
वाĻ-प± बिÐक बेहद अंतरंग प± को भी अपनी कहािनयŌ म¤ िचिýत िकया । एक ľी कì
आशाएँ-आकां±ाएँ ³या हो सकती ह§, समाज के िविभÆन संदभŎ पर उसकì सोच और
उसकì करनी ³या हो सकती है, वह समाज से ³या चाहती है, वह अपने पाåरवाåरक संबंधŌ
से ³या अपे±ा करती है । इन सभी संदभŎ को उÆहŌने अÂयंत सूàम ढंग से अपनी कहािनयŌ
म¤ िचिýत िकया । इसी भांित िवषय-वैिवÅयता कì ŀिĶ से देख¤ तो समाज के अÆय प±Ō का
भी उÆहŌने इतनी ही सूàमता से िचýण िकया है । जैन¤þ का महÂवपूणª सािहÂय Öवतंýता से
पहले के समय से गहरा ताÐलुक रखता है । उसी पåरवेश म¤ उसका सृजन हòआ और वह
ÿकािशत भी हòआ । Öवतंýता के बाद कì ÿकािशत उनकì कुछ कहािनयां भी उÆहé संदभŎ
और पåरवेश को साथªक ढंग से िचिýत करती ह§ । 'अपना अपना भाµय ' ऐसी ही कहानी है ।
िजसम¤ उÆहŌने हमारे समाज कì आडंबर-वृि° और खोखली संवेदनशीलता का िनमªम
िचýण िकया है । समाज के कटु और िनमªम यथाथª को अिभÓयĉ करने कì ŀिĶ से यह
उनकì अÂयंत िविशĶ और संवेदनशील कहानी है ।
'अपना अपना भाµय ' कहानी नैनीताल के खूबसूरत पåरवेश म¤ िÖथत बेहद ददªनाक और कटु
सÂय को उजागर करती है । पहाड़Ō कì अपनी एक अलग िवडंबना है । थोड़ा समय िबताने
के िलए वे िजतने खूबसूरत ह§, वहां रहने वाले बािशंदŌ के िलए वहां का जीवन उतना ही
ýासद और शापúÖत है । इसका कारण है - वहां कì भयंकर गरीबी । पूरी तरह से पयªटन
पर आधाåरत उनकì अथªÓयवÖथा म¤ एक छोटा तबका ही सुखी और संपÆन है, शेष बड़ी
आबादी धनोपाजªन के िलए िवकÐपही न िÖथित म¤ रहती है । रोजगार कì अनुपिÖथित के
चलते बड़े-बूढ़े और यहां तक िक छोटे बालकŌ को भी मोह-माया से मुĉ हो, जÐद ही इधर -
उधर पलायन कर काम कì तलाश म¤ जूझना पड़ता है । ऐसा ही एक दस वषêय बालक इस
कहानी म¤ उपिÖथत होता है । पहाड़Ō कì भीषण और कड़ाके कì ठंड म¤ जजªर वľ पहने
वह दधीिच -हड्डी से युĉ, रोजी-रोटी के संघषª म¤ लगा है । घर-पåरवार कì गरीबी न देख
पाने के कारण वह घर से भाग आया है । उसके साथ, उससे तीन-चार वषª बड़ा एक और
साथी भी है, जो इसी िनयित का िशकार है । पहाड़Ō के पåरवेश म¤ नैनीताल, अÐमोड़ा ,
रानीखेत जैसे शहर और मैदानी इलाकŌ के बड़े शहर इन जैसŌ कì रोजी-रोटी का जåरया
बनते ह§ । वह बालक रोजगार कì उÌमीद म¤ नैनीताल आया है । munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
61 जैन¤þ ने अपनी इस छोटी सी कहानी म¤ इस ब¸चे के माफªत इस जीवन कì कई िवडंबनाओं
को साथªक तरीके से ÿÖतुत िकया है । एक तो िकसी तरह से रोजगार पाने कì जĥोजहद ,
और रोजगार िमला तो वही साफ-सफाई , बतªन धोना या िकसी होटल रेÖटोर¤ट म¤ बैरे का
काम करना - यही कुछ काम उÆह¤ िमलते ह§ । अिश±ा के कारण इÆहé कामŌ के लायक ही
समझे जाते ह§ । काम देने वाले लोग, काम देते हòए जैसे उन पर भारी एहसान करते ह§ । न
तो ढंग कì पगार िमलती है और न सÌमानजनक तरीके से भोजन । एक Łपए पगार और
झूठे भोजन पर यह बालक भी एक होटल म¤ कुछ समय काम करता है और िफर वहां से भी
िनकाल िदया जाता है । वह पुन: िनयित के हाथŌ इधर-उधर भटकने को िववश है ।
ऐसे ही बेकार भटकते हòए अनायास कुछ सैलािनयŌ कì नजर उस पर पड़ती है । वह उसकì
िÖथित को देखकर हतÿभ ह§ । रात एक बजे का वĉ, कड़ाके कì ठंड और टप-टप टपकता
हòआ कोहरा अथाªत जीवन के ÿित सारी ÿितकूल िÖथित याँ और ऐसे म¤ भूख से Óयाकुल यह
लड़का उÆह¤ सड़क पर घूमता हòआ िमलता है । उसकì दशा का वणªन करते हòए जैन¤þ
िलखते ह§, "तीन गज दूरी से दीख पड़ा, एक लड़का िसर के बड़े-बड़े बालŌ को खुजलाता
हòआ चला आ रहा है । नंगे पैर है, नंगे िसर । एक मैली-सी कमीज लटकाए है । पैर उसके न
जाने कहाँ पड़ रहे थे, और वह न जाने कहाँ जा रहा है - कहाँ जाना चाहता है ! उसके
कदमŌ म¤ जैसे न कोई अगला है, न िपछला है; न दायाँ है, न बायाँ है ।" जैन¤þ कì यह
िविशĶता है िक वह ऐसी िÖथितयŌ के पीछे िछपे मनोवै²ािनक सÂय को उजागर करने म¤
िसĦहÖत ह§ । िजस तरह वे ÿेम और दांपÂय के अलग-अलग संदभŎ पर अपने पाýŌ के
माÅयम से िविशĶ मनोदशाओं को ÿÖतुत करते ह§, उसी ÿकार समाज कì ऐसी िवþूप
िÖथितयŌ के ÿित भी वे इसी शैली म¤ अपना मंतÓय सामने रख देते ह§ । सैलािनयŌ के छोटे
िकंतु अथªपूणª संवादŌ के सहारे वे समाज कì कटु-यथाथª दशा को ÿÖतुत कर देते ह§ ।
मनुÕय िकतना असंवेदनशील हो चुका है, जनमानस म¤ अशĉ और िनधªन लोगŌ के ÿित
िकस तरह कì मनोवृि° िवकिसत हो चुकì है, वह इन सैलािनयŌ के संवादŌ से जाना जा
सकता है । सैलािनयŌ के पूछने पर वह अपनी िÖथित को बताते हòए कहता है, "मेरे कई
छोटे भाई-बहन ह§, सो भाग आया । वहाँ काम नहé, रोटी नहé । बाप भूखा रहता था और
मारता था । माँ भूखी रहती थी और रोती थी । सो भाग आया । एक साथी और था । उसी
गांव का था - मुझसे बड़ा । दोनŌ साथ यहाँ आए । वह अब नहé है ।" यह पूछने पर िक वह
साथी अब कहाँ गया, बड़ी सहजता से वह कह देता है, "मर गया ।" उसका यह संवाद बेहद
मािमªक है । मृÂयु जैसे उसके िलए बेहद करीब और जाना हòआ सच है, जैसे उसके िलए
बेहद आम बात है । उस जैसे ब¸चŌ कì यह िनयित जैसे उसे पता है । 'उसके साथ आया
लड़का िकसी साहब के पीटने पर मर गया ।' यह दुघªटना कोई बड़ी दुघªटना नहé है ।
उसका जीवन िकसी के िलए कोई मायने नहé रखता है या कह ल¤ इन जैसŌ का जीवन पूरे
समाज के िलए कोई मायने नहé रखता , मरे या िजए या जो भी । उस छोटे अबोध मन कì
यह दशा हमारे समाज कì बड़ी हार है ।
सैलानी उसे अपने साथ होटल लेकर आए, इस उÌमीद म¤ िक शायद उनके साथ के अÆय
सÌपÆन सैलािनयŌ म¤ से कोई उसे काम पर रख ले । पर वहां यह जवाब था िक, "अजी, ये
पहाड़ी बड़े शैतान होते ह§ । ब¸चे - ब¸चे म¤ गुन िछपे रहते ह§ । आप भी ³या अजीब ह§ - उठा
लाए कहां से - लो जी, यह नौकर लो ।" रात के उस पहर काम िदलाने कì जो उÌमीद थी,
वह जÐद ही हताशा म¤ बदल गयी । मदद करना चाहते थे, परंतु उनकì मदद और उनकì munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
62 संवेदनशीलता का यथाथª आगे देखने को िमलता है, जब दोनŌ सैलािनयŌ म¤ से एक अपनी
जेब म¤ हाथ डालता है और चंद िस³के उसे देना चाहता है । पर दुभाªµय से उसके पास छुĘे
पैसे नहé ह§ । दस-दस के नोट ह§ । दूसरा िमý भी देखता है और उसकì जेब म¤ भी नोट ही
थे और इस आúह पर िक दस का नोट ही दे दो, िमý का उ°र था, "अरे यार, बजट िबगड़
जाएगा । Ńदय म¤ िजतनी दया है, पास उतने पैसे तो नहé ।" तब दूसरा िमý कहता है, "तो
जाने दो; यह दया ही इस जमाने म¤ बहòत है ।" और अंततः वह ब¸चा इस आĵासन पर िक
आज तो कुछ नहé हो सकता पर कल िमलना , कुछ-न-कुछ काम का बंदोबÖत हो जाएगा ।
परंतु यह रात उस ब¸चे के जीवन कì अंितम रात सािबत होती है । भयानक शीत म¤ वह
खुले म¤ कहé सोने का जतन करता है और उसका यह सोना हमेशा के िलए सो जाना िसĦ
होता है । समाज के बड़े, संपÆन और संवेदनशील लोगŌ के बीच वह न तो रोजगार पा सका
और न ही एक वĉ का भोजन । अगले िदन वह ब¸चा इन सैलािनयŌ को बताई गई जगह
पर नहé िमलता और वे भी अपनी वापसी कì तैयाåरयŌ म¤ मशłफ हो जाते ह§ । पर उÆह¤
एक खबर िमलती है, "िपछली रात, एक पहाड़ी बालक , सड़क के िकनारे, पेड़ के नीचे
िठठुरकर मर गया ।........ पर बताने वालŌ ने बताया िक गरीब के मुँह पर, छाती, मुåęयŌ
और पैरŌ पर बरफ कì हÐकì -सी चादर िचपक गयी थी । मानŌ दुिनया कì बे हयाई ढकने के
िलए ÿकृित ने सबके िलए सफेद और ठंडे कफन का ÿबंध कर िदया था ।.....सब सुना
और सोचा - अपना -अपना भाµय !" और इस तरह यह संवेदनशील कहानी समाĮ होती है ।
पर समाĮ होते-होते यह कहानी पाठक के मन-मिÖतÕक को झकझोर देती है और तमाम
सवाल छोड़ देती है ।
इस कहानी कì मु´य संवेदना हमारे समाज म¤ आ चुकì इसी जड़ता को ÿकट करने म¤ है ।
वाÖतव म¤ आधुिनक समय म¤ जैसे-जैसे जीवन जिटल होता गया है, वैसे-वैसे मानवीयता
और संवेदनशीलता घटती गयी है । आधुिनक सËयता ने सोचने, समझने और जीवन जीने
के िजस तरीके को िवकिसत िकया है, उसके चलते समाज Öवाथª भावना से अÂयिधक
पåरचािलत होने लगा है । और इसी का पåरणाम इस तरह कì असंवेदनशीलता के łप म¤
देखने को िमलता है । िहंदी कहानी के िवकास øम को देखा जाए तो ÖवातंÞयो°र युग म¤
इस तरह के यथाथª को सूàमŁप से लि±त कर कहानीकारŌ ने अपनी कहािनयŌ म¤
अिभÓयĉ िकया है । बेहद सामाÆय तरीके से घिटत होने वाली यह कहानी हमारे समाज कì
अÂयंत असामाÆय िÖथित कì ओर संकेत करती है । यह झूठी और खोखली सहानुभूित का
माखौल उड़ाती नजर आती है ।
जैन¤þ कì कहािनयां इस संदभª म¤ थोड़ी िविशĶ हो जाती ह§ िक एक मु´य संवेदना के साथ-
साथ जैन¤þ पåरवेशगत अÆय बातŌ को भी उजागर करते हòए कहानी म¤ आगे बढ़ते ह§ । यह
उनकì शैली कì िविशĶता है । यह िवशेषता कभी पåरवेशगत राजनीित को उभारती है और
कभी सामािजक यथाथª से जुड़ी अÆय िवþूपताओं को । जैन¤þ का सािहिÂयक संÖकार
ÖवातंÞयो°र युग के पहले िवकिसत हो चुका था, पक चुका था, अतः वह ÿभाव अिधक
संवेदनशील ढंग से उनके सािहÂय म¤ देखने को िमलता है । इस कहानी म¤ भी उÆहŌने
तÂकालीन पåरवेशगत कई िवडंबनाओं को िचिýत िकया है । िāिटशकालीन भारत म¤
भारतीयŌ कì िÖथित दोयम दज¥ कì थी । उÆह¤ Óयावहाåरक łप से बराबरी का दजाª ÿाĮ
नहé था । इस अंतर को इस कहानी म¤ उÆहŌने बेहतर तरीके से ÿकट िकया है । िहंदुÖतानी
और अंúेज पुŁषŌ के संदभª म¤ तंज करते हòए वे िलखते ह§, "अिधकार -गवª म¤ तने अंúेज उसम¤ munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
63 थे, और िचथड़Ō से सजे, घोड़Ō कì बाग थामे वे पहाड़ी उसम¤ थे, िजÆहŌने अपनी ÿितķा
और सÌमान को कुचलकर शूÆय बना िलया है, और जो बड़ी तÂपरता से दुम िहलाना सीख
गए ह§ ।" पåरवेश वणªन के इस øम म¤ उÆहŌने Öथानीय लोगŌ कì वाÖतिवक िÖथित को बड़ी
सहजता से ÖपĶ कर िदया है । हजारŌ वषŎ से जो लोग उस धरा पर रहते आए थे, जुÐम
और जोर के बल पर उनकì िÖथित पशुओं से भी बदतर हो गयी ।
इसी भांित िľयŌ और ब¸चŌ के संदभª म¤ भी वे यथाथª को ÖपĶ करते ह§ । अंúेजी युवितयŌ
और भारतीय नाåरयŌ म¤ अंतर को ÖपĶ करते हòए वे िलखते ह§, "अंúेज रमिणयाँ थé, जो धीरे
नहé चलती थé, तेज चलती थé । उÆह¤ न चलने म¤ थकावट आती थी, न हंसने म¤ लाज
आती थी । कसरत के नाम पर घोड़Ō पर भी बैठ सकती थé, और घोड़े के साथ-ही-साथ
जरा जी होते ही, िकसी िहंदुÖतानी पर भी कोड़े फटकार सकती थé ।...... उधर हमारी
भारत कì कुल-लिàमयाँ, सड़क के िबÐकुल िकनारे-िकनारे, दामन बचाती और संभालती
हòई, साड़ी कì कई तहŌ म¤ िसमट -िसमट कर, लोक-लाज, ľीÂव और भारतीय गåरमा के
आदशª को अपने पåरवेĶनŌ म¤ िछपाकर , सहमी -सहमी धरती म¤ आंख¤ गाड़े, कदम-कदम बढ़
रही थé ।" इसी भांित ब¸चŌ के संदभª म¤ वे कहते ह§, "भागते, खेलते, हंसते, शरारत करते,
लाल-लाल अंúेज ब¸चे थे और पीली-पीली आंख¤ फाड़े िपता कì उंगली पकड़कर चलते हòए
अपने िहंदुÖतानी नौिनहाल भी थे ।" इस पåरवेश वणªन म¤ बड़े सूàम ढंग से उÆहŌने अंúेज
और भारती य जीवन -शैली को ÿसंगवश उभारा है । भारतीयŌ कì आिथªक िÖथित , अंúेजŌ
कì िवĬेषपूणª आिथªक नीितयŌ के कारण िगरती ही जा रही थी । खान-पान तथा पहनने-
ओढ़ने आिद के ÖतरŌ पर भी वे अभाव झेलने को िववश थे । भारतीयŌ का सबसे बड़ा वगª
उस समय कृिष-कायŎ म¤ संलµन था । परंतु कृिष के ±ेý म¤ इतनी तरह कì जिटलता एँ थé,
इतनी तरह के कर थे, िक वे कभी अपने जीवन को संपÆन िÖथित म¤ नहé पहòंचा सकते थे ।
तÂकालीन भारत म¤ भारतीयŌ का एक वगª ऐसा था, जो अंúेिजयत के सामने नतमÖतक था
। ºयादा -से-ºयादा अंúेजी तौर-तरीकŌ को अपनाकर वह अÆय भारतीयŌ से अपने को
िविशĶ बनाना चाहता था । इसी वगª को साधकर अंúेजŌ ने भारत को अपने पंजे म¤ दबोचे
रखा था । इस वगª के ºयादातर लोग कुलीन वगª से थे । जो जमीदारŌ साहóकारŌ आिद कì
®ेणी से आते थे । ये पूंजीपित थे और अपने पूंजीगत िहतŌ को सवōपåरता देते थे । इÆह¤
देश कì अÆय िÖथितयŌ से बहòत ºयादा लेना-देना नहé था । राजनीितक गितिविधयŌ म¤ भी
यह केवल और केवल अपने Öवाथªिहत कामना के कारण ही जुड़े हòए थे । इनकì लालसा
थी िक यह अंúेज साहबŌ के िनकटतम बने रह¤ । ऐसा करके वे अपने िलए सÌमािनत दजाª
Öवत: ही बना लेते थे । भारतीयŌ म¤ कुछ िविशĶ हो जाते थे । इÆहé लोगŌ को Åयान म¤
रखकर जैन¤þ िलखते ह§, "इनके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था । अपने
कालेपन को खुरच-खुरचकर बहा देने कì इ¸छा करने वाले अंúेजी-दाँ पुŁषो°म भी थे, जो
नेिटव को देखकर मुँह फेर लेते थे और अंúेज को देखकर आंख¤ िबछा देते थे, और दुम
िहलाने लगते थे । वैसे वह अकड़कर चलते थे - मानो भारत-भूिम को इसी अकड़ के साथ
कुचल-कुचलकर चलने का उÆह¤ अिधकार िमला है ।"
इस तरह यह कहानी एक तरफ तो हमारे समाज कì िनमªम स¸चाई को बयान करती है, वहé
दूसरी तरफ ÿसंगवश पåरवेशगत वणªनŌ से उस समय के रहन-सहन और पåरिÖथितयŌ का
भी अंदाजा सहज ही हो जाता है । जैन¤þ कì यह कहानी उनकì चंद ®ेķ कहािनयŌ म¤ िगनी munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
64 जाती है । यह कहानी अपने गठन म¤ इतनी मािमªक है िक पाठकŌ के मन-मिÖतÕक को
झकझो र कर रख देती है और एक शिम«दगी-सी िदलŌ म¤ तारी हो जाती है । बदलती दुिनया
का बेहद कटु सÂय है िक जैसे-जैसे मनुÕय भौितकता के नए नए साधनŌ का िवकास कर रहा
है, िवकास के नए-नए दावŌ के साथ इस दुिनया को बदलने कì बात कर रहा है, वैसे-वैसे वह
असंवेदनशील होता जा रहा है । यह समाज अब ºयादा से ºयादा सुिवधा भोगी हो चला है ।
इंसािनयत भी सुिवधा कì ही श³ल म¤ बस िजंदा है ।
कलाÂमक ŀिĶ से भी यह कहानी जैन¤þ कì ®ेķ कहानी है । अपनी ºयादातर कहािनयŌ म¤
जैन¤þ Öवयं ही िववरण के Ĭारा तमाम िज²ासाओं कì पूितª करते ह§ परंतु इस कहानी म¤
मु´य संवेदना को उÆहŌने िजस ढंग से छोटे-छोटे संवादŌ के माÅयम से उभारा है, वह
िनिIJत ही कलाÂमक ŀिĶ से अÂयंत ®ेķ है । कहानी कì मु´य संवेदना उस दस वषêय ब¸चे
कì भयंकर गरीबी, िववशता और जीवन जीने के ÿित जĥोजहद है । इन सभी िÖथितयŌ को
कहानीकार ने दो सैलािनयŌ के संवादŌ के माÅयम से बेहद कुशलता और मािमªक अंदाज म¤
ÿकट िकया है । यह कहानी अपने अंत को िजस ढंग से ÿाĮ करती है, वह भी अÂयंत
ÿभावशाली बन पड़ा है । कहानी के अंत म¤ वह लड़का अनुपिÖथत है, परंतु खबर िजस
ÿतीकाÂमक ढंग से उस बालक के Ńदयþावक अंत को सूिचत करती है, उससे हमारे समाज
कì अ-संवेदनशीलता Öवत: ÿकट हो जाती है । इस कहानी का उĥेÔय भी यही है, िजसे
जैन¤þ एकदम सटीक ढंग से पाठकŌ तक ÿेिषत कर सके ह§ । कहानी के लघु-संवाद,
मािमªकता और ÿवाह म¤ तीĄता इस कहानी कì शिĉ ह§ ।
६.४ खेल : मूल संवेदना कथाकार जैन¤þ ÿेम और दांपÂय जैसे िवषयŌ को अिभÓयĉ करने कì ŀिĶ से िहंदी के
सवाªिधक समथª कथाकारŌ म¤ से एक माने जाते ह§ । उनकì िविभÆन कहािनयŌ और कई
उपÆयासŌ म¤ िचिýत ľी-पाý, ľी-मनोजगत कì साथªक अिभÓयिĉ करते िदखाई देते ह§ ।
इस ŀिĶ से जैन¤þ ने काल का अितøमण भी िकया है । इन कहािनयŌ और उपÆयासŌ म¤
अिभÓयĉ उनके िवचार अपने समय से आगे के िवचार माने जाते ह§ । और इÆह¤ ÿकट करते
हòए जैन¤þ ने अपनी लेखकìय ÿितबĦता का ईमानदारी से अनुसरण िकया है । अपने िवचारŌ
को ÿकट करते हòए उÆहŌने खुद को समय के दबावŌ से अलग रखा है । उनकì यह
दुÖसाहसी ÿवृि° उनके समú सािहÂय म¤ िदखाई देती है । अपनी इस िसिĦ के अितåरĉ
जैन¤þ को बालमन का कुशल िचतेरा भी माना जा सकता है । उनकì कहानी 'खेल' इस ŀिĶ
से सवाªिधक उÐलेखनीय है । इस कहानी म¤ जैन¤þ ने सुरबाला और मनोहर - इन दो पाýŌ के
माÅयम से बाल मनोजगत कì िविभÆन दशाओं को कुशलता से अिभÓयĉ िकया है । कहानी
पढ़ते हòए पाठक सुरबाला के िवचार और िचंतन के अनुłप अपने बचपन को जैसे जीने
लगता है । बचपन कì छोटी-छोटी शरारत¤, िचंताएँ, खुिशयाँ और दुख - यह सभी एक साथ
इस छोटी कहानी म¤ िचिýत ह§ । कहानी कì संवेदना अÂयंत घनीभूत है और इस संवेदना को
जैन¤þ ने एक कुशल िशÐपी कì भांित आकार िदया है ।

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
65 ६.४.१ खेल : बचपन को साकार करती कहानी:
कहानी 'खेल' जैन¤þ कì आरंिभक कहािनयŌ म¤ से एक है । िकसी भी सािहÂयकार के िवकास
म¤ उस समय कì पåरिÖथितयŌ और अÆय सािहिÂयक ÿभावŌ का बड़ा योगदान होता है ।
जैन¤þ म¤ भी ऐसे ÿभाव काफì िमले-जुले łप म¤ देखने को िमलते ह§ । इस कहानी का आरंभ
कुछ ÿसाद शैली म¤ करते हòए जैनेÆþ आरÌभ करते ह§, "मुनमुन संÅया िÖमथ ÿकाश से हंस
रही थी उस समय गंगा के िनजªन बालू का Öथल पर एक बालक और एक बािलका अपने को
और सारे िवĵ को भूल गंगा तट के बालू और पानी को अपना एकमाý आÂमीय बना उनसे
िखलवाड़ कर रहे थे ÿकृित इन िनदōष परमाÂमा खंडŌ को िनÖतÊध और िनणªय िनहार रहे
थे बालक कहé से एक लकड़ी लाकर तट के जल को छटा छठ उछाल रहा था पानी मानो
चोट खाकर भी बालक से िमýता जोड़ने के िलए िवमल हो उछल रहा था ।" इस तरह
तÂसम ÿधान भाषा और संवाद कì शैली ÿसाद भी अपनी कहािनयŌ के आरंभ म¤ अपनाते ह§
और यहé से वे कहानी के ÿित िज²ासा उÂपÆन करते ह§
पाýŌ के łप म¤ इस कहानी म¤ छः-सात वषª कì एक बािलका है, िजसे सुरê, सुरō, सुरबाला
आिद नामŌ से संबोिधत िकया गया है । और दूसरा मनोहर , जो सुरबाला से कोई दो साल
बड़ा है । यही दोनŌ मु´य पाý ह§ । छोटी सी कहानी म¤ इन दो पाýŌ के माÅयम से जैन¤þ ने
ब¸चŌ कì चंचल मनोवृित का बेहतरीन िचýण िकया है । गंगा के तट पर दोनŌ अकेले खेल
रहे ह§ । मनोहर वहé रहते हòए नहé होता है । सुरबाला नदी िकनारे बालू म¤ अपने ही खेल म¤
मगन है । और मनोहर दूसरी तरफ लहरŌ के साथ अपने खेल म¤ मगन है । दोनŌ बालक एक
दूसरे के साथ िमलकर खेलते भी ह§, और बालह ठ के अनुसार लड़ते-झगड़ते भी ह§ । परंतु
दोनŌ को एक-दूसरे से बेहद Öनेह है । जैन¤þ ने इस कहानी म¤ बालमन कì इÆहé जिटलताओं
को सहज तरीके से उभारा है ।
सुरबाला नदी िकनारे रेत म¤ बैठी रेत से आकृित बना रही है और आकृित के łप म¤ वह भाड़
को आकार दे रही है । भाड़ का िनमाªण करते-करते उसके मन म¤ कई तरह के सवाल , कई
तरह के िवचार आते-जाते ह§ और वह अकेले इÆहé िवचारŌ म¤ डूबी हòई भाड़ भी बनाती जा
रही है और खुद से बात¤ भी करती जा रही है । उसके िवचारŌ के क¤þ म¤ मनोहर है । बालमन
पूरी सरलता और सहजता के साथ इस कहानी म¤ िचिýत है । भाड़ बनाते-बनाते वह भाड़ से
ही बात¤ करते हòए कहती है, "बनाते बनाते भाड़ से बािलका बोली, 'देख ठीक नहé बना, तो
म§ तुझे फोड़ दूंगी ।' िफर बड़े Èयार से थपका-थपका कर उसे ठीक करने लगी । सोचती जाती
थी - इसके ऊपर म§ एक कुटी बनाऊंगी । वह मेरी कुटी होगी । और मनोहर ?... नहé वह
कुटी म¤ नहé रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ म¤ प°े झŌकेगा । जब वह हार जाएगा , बहòत
कहेगा, तब म§ उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी ।" भाड़ बन रहा है और अंतमªन म¤ मनोहर
भी आ-जा रहा है । मनोहर के िलए तमाम िचंताएं भी हो रही ह§ । उसका राग-Ĭेष भी याद
िकया जा रहा है । इस समÖत कायª-Óयापार के माÅयम से जैन¤þ बालमन का अÂयंत साथªक
िचýण करते ह§ । सुरबाला, मनोहर के बारे म¤ सोचती है, "बािलका सोच रही थी - मनोहर
कैसा अ¸छा है, पर वह दंगई बड़ा है । हम¤ छेड़ता ही रहता है । अबके दंगा करेगा, तो हम
उसे कुटी म¤ साझी नहé कर¤गे । साझी होने को कहेगा, तो उससे शतª करवा ल¤गे, तब साझी
कर¤गे ।" munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
66 मनोहर कì उă इतनी नहé है िक वह शैतािनयां छोड़ चुका हो । सुरबाला उसकì चंचल
शरारतŌ से तंग है । वह उसका साथ भी चाहती है और उससे परेशान भी िदखाई देती है ।
पर मनोहर चाहे िजतना दंगई हो, िजतना शरारती हो, उसकì सारी कामनाओं म¤ और
िनमाªण म¤ उसका िÿय साथी भी है । भाड़ बनता जा रहा है और उसके ऊपर कुटी भी बन
रही है । भाड़ का धुआं कैसे िनकले, इसके िलए िचमनी भी बन रही है । और िफर यह िचंता
भी होती है िक नीचे भाड़ तो बहòत गमª होगा और म§ तो रह लूंगी, पर मनोहर कैसे रहेगा,
"भाड़ कì छत तो गरम होगी । उस पर मनोहर रहेगा कैसे ? म§ तो रह जाऊंगी । पर मनोहर
तो जलेगा । िफर सोचा -उससे म§ कह दूंगी भई, छत बहòत तप रही है, तुम जलोगे, तुम मत
आओ । पर वह अगर नहé माना ? मेरे पास वह बैठने को आया ही - तो ? म§ कहóंगी - भाई
ठहरो, म§ ही बाहर आती हóँ ।" मनोहर दंगई है, शरारती है, परंतु सुरबाला के Ńदय म¤ उसके
िलए मातृ-तुÐय िचंता भी है । वह अचानक मनोहर को लेकर बहòत िचंितत हो जाती है । उसे
लगता है, िक मनोहर िबना उसके नहé रहेगा, वह िजद करेगा िक वह भी भाड़ म¤ रहेगा और
भाड़ बहòत गरम होगा । तब भला िफर कैसे होगा, तब वह मनोहर को कैसे रोकेगी, "बेचारा
तपेगा । भला कुछ ठीक है ! ºयादा कहेगा, म§ ध³का दे दूंगी, और कहóंगी - अरे जल जाएगा
मूरख ? यह सोचने पर उसे बड़ा मजा-सा आया, पर उसका मुंह सूख गया । उसे मानो
सचमुच ही ध³का खाकर मनोहर के िगरने का हÖयोÂपादक और कŁण ŀÔय सÂय कì
भांित ÿÂय± हो गया ।"
इÆहé िवचार øमŌ म¤ चलते-चलते अंततः सुरबाला कì सबसे सुंदर कृित तैयार भी हो जाती
है । ब¸चे अपनी बनायी िकसी अनगढ़ चीज पर भी बेहद अिभभूत रहते ह§ । उनकì सुंदरता
म¤ मगन रहते ह§ । वे अपनी सजªना से संतुĶ होते ह§ । उनम¤ िनमाªण करने का एक संतोषी भाव
पैदा होता है । ऐसा ही भाव सुरबाला के मन म¤ भी पैदा होता है, जब उसका भाड़ बनकर
तैयार हो जाता है, "āĺांड का सबसे संपूणª भाड़ और िवĵ कì सबसे सुंदर वÖतु तैयार हो
गयी ।..... परमाÂमा कहाँ िबराजते ह§, कोई इस बाला से पूछे, तो वह बताए - इस भाड़ के
जादू म¤ ।" सुरबाला के िलए यह पूरे āĺांड कì सबसे सुंदर वÖतु है और उसके बनाए इस
जादुई घर म¤ Öवयं परमाÂमा िवराजते ह§ । और इसके बाद अपनी बनाई इस कलाकृित को
अपने सबसे अ¸छे सखा, मनोहर को िदखाने कì िज²ासा और उÂसाह । वह मनोहर को
खुशी -खुशी बुलाती है । ब¸चŌ म¤ एक Öवाभािवक वृि° होती है, वह सराहना चाहते ह§ । परंतु
मनोहर तो शरारती है, दंगई है । भाड़ देखने का आमंýण पाते ही वह उÂसाहपूवªक आता है
परंतु अपनी ÿकृित से िववश है और शरारत करते हòए वह अपने पैरŌ के एक ही वार से
āĺांड कì सबसे सुंदर कलाकृित को नĶ कर देता है ।
ऐसे म¤ सुरबाला के हाल का वणªन करते हòए कहानीकार कहता है, "सुरō रानी मूक खड़ी थé ।
उनके मुंह पर जहां अभी एक िवशुĦ रस था, वहां अब एक शूÆय फैल गया । रानी के सामने
एक Öवगª आ खड़ा हòआ था । वह उÆहé के हाथ का बनाया हòआ था और वह एक Óयिĉ को
अपने साथ लेकर उस Öवगª कì एक -एक मनोरम ता और Öवगêय ता को िदखलाना चाहती थé
। हा, हÆत ! वही Óयिĉ आया और उसने अपनी लात से उसे तोड़-फोड़ डाला ! रानी हमारी
बड़ी Óयथा से भर गयी ।" सुरबाला, िजसके िवचारŌ म¤ डूबी हòई इस सुंदर कलाकृित का
िनमाªण कर रही थी और िनमाªण करने के बाद िजसे वह सबसे उÂसुकता के साथ िदखाना
चाहती थी, उसी ने उसके इस सुंदर महल को नĶ कर िदया । munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
67 मनोहर ने भाड़ तोड़ तो िदया परंतु उसे एहसास भी हो गया िक उसने सुरबाला का जी
िकतना दुखाया है । वह अपराध बोध और पIJाताप से भर जाता है । वह चाहता है िक
उसकì सुरō उसको कुछ कहे, वह अपने अपराध का दंड पाना चाहता है और कहता है,
"सुरê, मनोहर तेरे पीछे खड़ा है । वह बड़ा दुĶ है । बोल मत, पर उस पर रेत ³यŌ नहé फ¤क
देती, मार ³यŌ नहé देती ! उसे एक थÈपड़ लगा - वह अब कभी कसूर नहé करेगा ।" पर
सुरबाला तो łठ गई है और खूब मनाने के बाद वह अपनी बाल सुलभ चेĶा से मनोहर को
वैसा ही भाड़ बनाने का आदेश देती है, तब मनोहर खुशी-खुशी भाड़ बनाने म¤ जुट जाता है ।
वह अपने पIJाताप को जÐदी से जÐदी िनभा लेना चाहता है और जब मनोहर Ĭारा भाड़
बनकर तैयार हो जाता है, तो सुरबाला भी बाल-चेĶावश उस भाड़ को नĶ कर देती है,
"गंगाजल से कर-पाýŌ Ĭारा वह भाड़ का अिभषेक करना ही चाहता था िक सुरō रानी ने एक
लात से भाड़ के िसर को चकनाचूर कर िदया ।" इस तरह सुरबाला मनोहर से अपना बदला
ले लेती है ।
बालमन अपनी छोटी-छोटी खुिशयŌ से बहòत खुश हो जाता है और छोटे-छोटे दुखŌ से बहòत
दुखी भी हो जाता है । ब¸चे िनमªल Ńदय होते ह§ । अपनी भावनाओं को आवरण म¤ ढककर ,
आवृतकर ÿकट नहé करते । सहज ढंग से अपनी भावनाओं को Óयĉ कर देते ह§ । सुरबाला
के चåरý के माÅयम से जैन¤þ ने बालमन कì इÆहé ÿवृि°यŌ का अÂयंत सुंदर िचýण िकया है
। वाÂसÐय कì इस सरल और मोहक अनुभूित को जैसे सारी ÿकृित भी देख रही है और
आनंिदत हो रही है । जैसे इस समÖत कायª Óयापार को देखकर ÿकृित भी वाÂसÐय पूणª भाव
से आवृत हो गई थी, "उस िनजªन ÿांत म¤ वह िनमªल िशशु-हाÖयरव लहर¤ लेता हòआ ÓयाĮ
हो गया । सूरज महाराज बालकŌ जैसे लाल-लाल मुंह से गुलाबी-गुलाबी हँसी हँस रहे थे ।
गंगा मानो जान-बूझकर िकलकाåर याँ मार रही थी । और..... और वे लंबे ऊँचे-ऊँचे िदµगज
पेड़ दाशªिनक पंिडतŌ कì भाँित, सब हाÖय कì सार-शूÆयता पर मानो मन-ही-मन गंभीर
तÂवालोचन कर, हँसी म¤ भूले हòए मूखŎ पर थोड़ी दया ब³शना चाह रहे थे ।" और इस तरह
यह कहानी समाĮ हो जाती है ।
'खेल' कहानी भले ही जैन¤þ कì आरंिभक कहानी है परंतु जैन¤þ ने िजस कुशलता से
सुरबाला और मनोहर के माफªत बाल-मन कì िविभÆन दशाओं को साथªक ढंग से िचिýत
िकया है, उससे उनकì कुशलता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है । सुरबाला और
मनोहर का पहले तो अपने म¤ खोए रहकर अपने-अपने खेलŌ म¤ ÓयÖत होना, िफर सुरबाला
Ĭारा भाड़ बनाते हòए िविभÆन तरह कì बात¤ सोचना - ऐसी बात¤ ह§ जो हम¤ बचकानी लग
सकती ह§ । परंतु यही बचपन कì िनमªलता है िक िजÆह¤ हम बचकाना समझते ह§, वही उनके
िलए सबसे महÂवपूणª होता है । उसी सरलता म¤ बचपन कì सारी खुिशयां समाई होती ह§ ।
सुरबाला का मन एक ममÂव से भरा हòआ ľी-मन है । उसम¤ िनमाªण का उÂसाह है । भाड़
बनाते हòए वह बेहद खुश है और बनाते-बनाते तमाम तरह कì िचंताओं का आना-जाना, यह
सब बचपन म¤ सहज łप से हम सबने भी िकया और समझा है । अपने सखा मनोहर के ÿित
उसकì िचंताएँ, इन सभी का िचýण कहानीकार ने अÂयंत कुशलता से कहानी म¤ िकया है ।
बालक अपनी ±िणक चेĶाओं म¤ ही खुश होते ह§, दुखी होते ह§ और िफर खुश हो जाते ह§ ।
यही उनका बचपन है । घंटŌ कì मश³क त के बाद सुरबाला भाड़ बनाती है और कुछ ही ±ण
म¤ शरारती मनोहर घंटŌ कì मेहनत को धूल-धुसåरत कर देता है । सुरबाला गुÖसा हो जाती munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
68 है परंतु यह गुÖसा भी ±िणक है । मनोहर पछतावे म¤ उसे मनाने कì कोिशश करता है और
जब सुरबाला उसे वैसा ही भाड़ बनाने के िलए कहती है, तो वह खुशी-खुशी इस काम म¤
जुट जाता है । पूरी लगन से वह भाड़ को पुनः तैयार करता है और जब सुरबाला को देखने
के िलए कहता है, तो सुरबाला जैसे-को-तैसा का िनयम अपनाते हòए मनोहर के बनाए भाड़
को ÅवÖत कर देती है और खुशी से नाचने लगती है । जैसा मनोहर ने िकया, वैसा ही
सुरबाला ने मनोहर के साथ िकया । इसी म¤ उसकì तृिĮ है । इस समूचे कायª-Óयापार का
जैन¤þ ने िजस तरह सिचý वणªन िकया है, वह पाठकŌ को अिभभूत कर लेता है । सुरबाला
और मनोहर के łप म¤ पाठकŌ के Ńदय म¤ भी कुछ ±ण के िलए बचपन जीिवत हो जाता है ।
६.५ सारांश जैन¤þ िहंदी कहानी के इितहास म¤ अनूठे कलाकार ह§ । वे अपनी धारा म¤ अÿितम ह§ । उनके
जैसे िसफª वही ह§, और कोई नहé । कहानी कहने कì उनकì शैली भी अनोखी है । वे कहानी
िलखते नहé, बिÐक कहते ह§ । कहानी कहते हòए जैन¤þ के िलए यह सबसे महÂवपूणª बात
होती है िक संवेदना िकतनी सफलता से पाठकŌ तक अंतåरत हòई है । िशÐप को लेकर वे
उतने जागłक या िचंितत नहé होते । इस इकाई म¤ जैन¤þ कì दो कहािनयŌ 'अपना अपना
भाµय' और 'खेल' का िवĴेषण िकया गया है । दोनŌ ही कहािनयाँ अपनी िविशĶ संवेदना कì
ŀिĶ से अÂयंत अनोखी कहािनयाँ ह§ । 'अपना अपना भाµय' जहां आधुिनक जीवन के नµन
यथाथª पर आधाåरत है, वहé 'खेल' कहानी बालकŌ के खेलकूद का वणªन करते हòए उनके
मनोजगत को जानने-पहचानने कì ŀिĶ से महÂवपूणª कहानी है । दोनŌ ही कहािनयाँ संवेदना
ÿधान कहािनयाँ ह§ । दोनŌ ही कहािनयाँ आकार कì ŀिĶ से छोटी कहािनयाँ ह§ । ³यŌिक
कहानी िवधा का कलेवर िकसी एक भाव या घटना को क¤þ म¤ रखकर ही आगे बढ़ता है, इन
कहािनयŌ म¤ भी ऐसा ही देखने को िमलता है । अपनी कारीगरी के संदभª म¤ जैन¤þ कहते ह§,
"कहानी मेरे िलए िशÐप नहé है, वह संवेदन और संवेद है । िशÐप अनावÔयक नहé ।
कारीगरी को िकसी तरह छोटी चीज नहé समझा जा सकता , लेिकन उससे िकनारे बनते ह§,
नदी का पानी नहé बनता ।"
जैन¤þ के उपरोĉ कथन से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है िक कहानी के गढ़न और
गठन के बजाय उनका Åयान संवेदना के अंतरण कì तरफ ºयादा रहता है । कहानी म¤ ÿij
उपिÖथत करना और िफर लगातार उस संवेदना को िवकिसत करते-करते अंत कì तरफ ले
जाना, यह उनकì कहने कì ÿिøया रही है । 'अपना अपना भाµय ' और 'खेल' दोनŌ ही
कहािनयŌ म¤ इस िÖथित को देखा जा सकता है । 'अपना अपना भाµय ' का सबसे मािमªक
±ण वह है, िजसम¤ एक आम खबर के łप म¤ शीत से उस लड़के कì हòई मृÂयु के बारे म¤
कहानीकार सूिचत करता है । और 'खेल' का सबसे महÂवपूणª ±ण वह है, िजसम¤ सुरबाला
मनोहर के Ĭारा बनाए गए भाड़ को तोड़कर नाचते हòए हँसती है । दोनŌ ही कहािन याँ अपने-
अपने मंतÓयŌ को भली-भांित ÿेिषत करने म¤ सफल रही ह§ । दोनŌ ही कहािनयŌ को जैन¤þ कì
सवª®ेķ कहािनयŌ म¤ सिÌमिलत िकया जाता है ।

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
69 ६.६ उदाहरण-Óया´या Óया´या: अंश 1. मोटर म¤ सवार होते ही थे िक समाचार िमला - िपछली रात, एक पहाड़ी
बालक , सड़क के िकनारे, पेड़ के नीचे िठठुरकर मर गया । मरने के िलए उसे वही जगह, वही
दस बरस कì उमर और वही काले िचथड़Ō कì कमीज िमली ! आदिमयŌ कì दुिनया ने बस
यही उपहार उसके पास छोड़ा था । पर बताने वालŌ ने बताया िक गरीब के मुंह पर, छाती,
मुåęयŌ और पैरŌ पर बफª कì हÐकì - सी चादर िचपक गई थी । मानŌ दुिनया कì बेहयाई
ढकने के िलए ÿकृित ने शव के िलए सफेद और ठंडे कफन का ÿबंध कर िदया था !
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì यथाथªपरक कहानी 'अपना -अपना भाµय' से उĦृत है ।
ÿसंग: इस कहानी म¤ एक दस वषêय गरीब पहाड़ी बालक कì भूख और बेरोजगारी के चलते
भयंकर शीत म¤ मृÂयु हो जाती है । उसकì मृÂयु का कारण पूरे मानवीय समाज कì उपे±ा
और संवेदनहीनता है । इÆहé कì ओर इस उĦरण म¤ संकेत िकया गया है ।
Óया´या: कहानीकार के Ĭारा समाज के नµन यथाथª पर इस कहानी कì रचना कì गई है ।
आधुिनक समय म¤ हमारे समाज म¤ खोखले चåरý वाले लोगŌ कì कोई कमी नहé है, जो
सहानुभूित का िदखावा तो बहòत करते ह§, परंतु जłरतमंद और बेसहारा लोगŌ के िलए
साथªक ढंग से कुछ भी नहé करते ह§ । िदखावे कì यह ÿवृि° आम जनता और राजनीित²Ō
आिद सभी पर समान łप से लागू होती है । 'अपना-अपना भाµय ' कहानी म¤ गरीबी से
लाचार दस वषêय पहाड़ी ब¸चा, पढ़ने-िलखने और खेलने कì उă म¤ पåरवार कì गरीबी के
चलते अपनी िजÌमेदारी महसूस करता है और अपने गांव से प¸चीस िकलोमीटर दूर
नैनीताल शहर म¤ कामकाज कì तलाश म¤ आ जाता है । जहां काम तो उसे ³या िमलता है,
यह अलग बात है, परंतु घोर अमानवीय ता और संवेदनहीनता से उसका पåरचय होता है ।
सैलािनयŌ से भरे उस शहर म¤ कोई भी ऐसा नहé होता जो सचमुच उसकì मदद करना चाहे
। कुछ लोग जो उसकì िÖथित को देखते हòए उसकì मदद करने का ÿयास करते ह§, वह भी
सचमुच मदद नहé करते बिÐक िदखावा करते ह§ । मृÂयु कì रात वह िजन सैलािनयŌ से
िमलता है, वे उसकì मदद से कहé ºयादा दस Łपये के नोट का मूÐय समझते ह§ । भयंकर
शीत म¤ भूख से बेहाल उस बालक को मदद के łप म¤ केवल 'कल िमलने का आĵासन '
िमलता है और वह कल उस बालक के जीवन म¤ कभी नहé आता । इस संवेदनहीन समाज
कì संवेदनहीनता के चलते अंततः भयंकर शीत म¤ सड़क पर ही उसकì मृÂयु हो जाती है ।
कहानीकार ने समाज कì इस खोखली सहानुभूित पर तीखा Óयंग िकया है ।
िवशेष: १.समाज कì संवेदनहीनता का िचýण िकया गया है ।
२.खोखले चåरý के मनुÕयŌ पर तंज िकया गया है ।
Óया´या: अंश 2. बािलका को अचानक Åयान आया - भाड़ कì छत तो गरम होगी । उस पर
मनोहर रहेगा कैसे ? म§ तो रह जाऊंगी । पर मनोहर तो जलेगा । िफर सोचा - उससे म§ कह
दूंगी भई, छत बहòत तप रही है, तुम जलोगे, तुम मत आओ । पर वह अगर नहé माना ? मेरे
पास वह बैठने को आया ही - तो ? म§ कहóंगी - भाई ठहरो, म§ ही बाहर आती हóँ । पर वह मेरे
पास आने कì िजद करेगा ³या ? जłर करेगा, वह बड़ा हठी है । पर म§ उसे आने नहé दूंगी । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
70 बेचारा तपेगा । भला कुछ ठीक है ! ºयादा कहेगा, म§ ध³का दे दूंगी, और कहóंगी - अरे जल
जाएगा मूरख ?
संदभª: ÿÖतुत उĦरण बाल मनोिव²ान पर आधाåरत जैन¤þ कì कहानी 'खेल' से उĦृत है ।
ÿसंग: ÿÖतुत उĦरण म¤ कहानीकार ने कहानी के ÿमुख पाý सुरबाला कì खेल के दौरान
कì िविवध मनोदशाओं को ÿÖतुत िकया है । एक बालक कì अपनी समÖयाएँ ³या होती ह§
और िकस तरह से वह उनका िनराकरण िवचारता है, यह सारी िÖथितयाँ अÂयंत मोहक ढंग
से कहानीकार ने यहां पर विणªत कì ह§ ।
Óया´या: 'खेल' कहानी मनोहर और सुरबाला नाम के दो बालकŌ पर आधाåरत है ।
सुरबाला िजसकì उă छः या सात बरस होगी और मनोहर जो उससे कोई दो वषª बड़ा है ।
दोनŌ बालक गंगा तट के िकनारे िनजªन म¤ खेल रहे ह§ । मनोहर नदी कì धारŌ म¤ ÓयÖत है,
वहé दूसरी तरफ, गंगा िकनारे रेत म¤ बैठी सुरबाला रेत से अपने भाड़ का िनमाªण कर रही है,
िजसके ऊपर वह कुटी भी बनाती है । िजसम¤ वह रहेगी । कुटी बनाते-बनाते उसे अपने सखा
मनोहर का ´याल आता है िक जब वह कुटी म¤ रहेगी तो मनोहर भी तो कुटी म¤ रहने कì
िजद करेगा । और यह िवचार उसके मन म¤ आते ही वह दुिवधा म¤ तरह-तरह के िवकÐप
खोजने लगती है । कभी उसे लगता है िक वह मनोहर को आने देगी और कभी उसे लगता है
िक भाड़ बहòत गमª होता है, मनोहर कैसे उसम¤ रहेगा । वह जलेगा । कभी वह मनोहर पर
अपना øोध Óयĉ करती है और कभी मनोहर पर उसे ममÂव आता है । इस तरह के आते-
जाते भावŌ से सुरबाला के मनोहर के ÿित Öनेह का पता चलता है । सुरबाला खुद से तकª-
िवतकª कर रही है । मनोहर अपने खेल म¤ मµन है और वह भाड़ बनाते हòए अपने और मनोहर
के बीच के संवाद कì भी खुद ही कÐपना करती जा रही है । सुरबाला िक यह दशा वाÂसÐय
कì अĩुत सृिĶ करती है और जैन¤þ ने इसके माÅयम से बालकŌ के मन म¤ चलने वाली
दुिवधाओं और बालसुलभ िचंताओं आिद को साथªक तरीके से ÿÖतुत िकया है ।
िवशेष: १. उĦरण म¤ जैन¤þ ने ब¸चŌ के मन का साथªक िचýण िकया है ।
२. बाल मनोिव²ान कì ŀिĶ से यह जैन¤þ कì उÐलेखनीय कहानी है ।
६.७ वैकिÐपक ÿij १. सुरबाला के बनाए भाड़ को िकसने तोड़ िदया ?
(क) राकेश (ख) सुरेश
(ग) रमेश (घ) मनोहर
२. सुरबाला िकसके जल जाने कì कÐपना से िचंितत है ?
(क) सुरेश (ख) राकेश
(ग) रमेश (घ) मनोहर
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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - अपना अपना भाµय और खेल
71 ३. सुरबाला िकसे अपना टूटा हòआ भाड़ पुनः बनाने के िलए कहती है ?
(क) रमेश (ख) सुरेश
(ग) राकेश (घ) मनोहर
४. 'अपना अपना भाµय ' कहानी म¤ िकस शहर का वणªन है ?
(क) अÐमोड़ा (ख) रानीखेत
(ग) ®ीनगर (घ) नैनीताल

५. रािý म¤ भयंकर शीत म¤ घूमते हòए सैलािनयŌ को कौन िमलता है ?
(क) शेर (ख) बुिढ़या
(ग) वृĦ (घ) बालक
६. 'अपना अपना भाµय' कहानी म¤ बालक कì उă िकतनी है ?
(क) सात (ख) आठ
(ग) नौ (घ) दस वषª
६.८ लघु°रीय ÿij १. 'अपना अपना भाµय ' कहानी म¤ िचिýत संवेदनहीनता
२. 'अपना अपना भाµय ' कहानी का उĥेÔय
३. 'खेल' कहानी म¤ सुरबाला का ÓयिĉÂव
४. 'खेल' कहानी का उĥेÔय
६.९ बोध ÿij १. 'अपना अपना भाµय ' कहानी म¤ िचिýत यथाथª का वणªन कìिजए ?
२. 'अपना अपना भाµय ' कहानी के मंतÓय को िवÖतार से Óयिĉ कìिजए ?
३. 'खेल' कहानी बाल मनोिव²ान कì ®ेķ कहानी है ।' कथन का िवĴेषण कìिजए ?
४. कहानी 'खेल' का सारांश अपने शÊदŌ म¤ Óयĉ कìिजए ?
*****
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72 ७
जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ
कहानी - एक रात और प Âनी
इकाई कì łपरेखा
७.१ इकाई का उĥेÔय
७.२ ÿÖतावना
७.३ एक रात : मूल संवेदना
७.३.१ एक रात िवĴेषण
७.४ पÂनी : मूल संवेदना
७.४.१ पÂनी : भारतीय गृिहणी का अंतःसंवाद
७.५ सारांश
७.६ उदाहरण Óया´या
७.७ वैकिÐपक ÿij
७.८ लघु°रीय ÿij
७.९ बोध ÿij
७.१ इकाई का उĥेÔय जैन¤þ कì कहािनयŌ पर आधाåरत इस इकाई म¤ 'एक रात' और 'पÂनी' कहािनयŌ का
अÅययन एवं िवĴेषण सिÌमिलत है । दोनŌ ही कहािनयाँ जैन¤þ कì महÂवपूणª कहािनयŌ म¤
िगनी जाती ह§ । जैन¤þ कì कहािनयŌ का मु´य िवषय िľयŌ के जीवन कì िविभÆन िवडंबनाएँ
ह§ । इस ŀिĶ से यह दोनŌ कहािनयाँ ľी जीवन कì अलग-अलग िवडंबनाओं को अलग-
अलग ढंग से ÿÖतुत करने वाली कहािनयाँ ह§ । 'एक रात' कहानी कई तरह के ÿijŌ को
समेटकर चलने वाली जैन¤þ कì लंबी कहानी है । जैन¤þ ने जो भी लंबी कहािनयाँ िलखी ह§,
उनम¤ यह सवाªिधक महÂवपूणª है । िववाहे°र संबंधŌ जैसे िवषय को लेकर इस कहानी म¤
जैन¤þ ने सुदशªना और जयराज के माÅयम से इसके िविभÆन प±Ō पर तकª-सिहत िवचार-
िवमशª ÿÖतुत िकया है । दूसरी तरफ 'पÂनी' कहानी मÅयवगêय जीवन कì िवडंबना को
ÿÖतुत करने वाली कहानी है, िजसम¤ एक ľी कì आशाएँ-आकां±ाएँ, उसका सुख-दुख
िनĂा«त łप म¤ ÿकट हòआ है । इस इकाई म¤ इÆही दो कहािनयŌ का िवÖतार से अÅययन
सिÌमिलत है ।
७.२ ÿÖतावना जैन¤þ एक दुÖसाहसी कथाकार माने जाते रहे ह§ । उÆहŌने जब कहानी लेखन आरंभ िकया,
वह समय िहंदी कहानी के इितहास म¤ ÿेमचंद युग के नाम से जाना जाता है । ÿेमचंद सवªथा munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
73 नवीन चेतना के साथ िहंदी कहानी के ±ेý म¤ आए थे और िहंदी कहानी म¤ उÆहŌने आमूल
पåरवतªन उपिÖथत िकया था । अपने समय कì सामािजक समÖयाओं से लड़ने के िलए
उÆहŌने कलम को महÂवपूणª जåरया बनाया था । और समाज और जीवन के सभी ±ेýŌ से
चुन-चुन कर ऐसे िवषयŌ का सा±ात पाठकŌ को कराया था, िजनसे वे पåरिचत तो थे, पर
भली-भांित जानते नहé थे । अपनी कहािनयŌ म¤ उÆहŌने ऐसे चåरýŌ के सिचý वणªन
उपिÖथत कर समाज कì वाÖतिवक दशा से सभी को पåरिचत कराया । जैन¤þ जब िहंदी
कहानी के ±ेý म¤ अवतåरत हòए तो ऐसा ही अंतर उÆहŌने भी Öथािपत िकया । जैन¤þ कì łिच
समÖत समÖयाओं के साथ-साथ Óयिĉ के मनोजगत को िवÖतार देने म¤ थी । उनके लेखन
के क¤þ म¤ वैसे तो समाज का हर प± था, परंतु िľयŌ को लेकर उनके कथा सािहÂय म¤ एक
िवशेष ŀिĶकोण देखने को िमलता है । इस इकाई म¤ 'एक रात' और 'पÂनी' कहािनयŌ का
िवĴेषण सिÌमिलत है । ľी जीवन म¤ जैन¤þ ने जहाँ सहज łप से जीवन जीती हòई
मÅयवगêय ľी को क¤þ म¤ रखा है, वहé एक रात जैसी कहािनयŌ के माÅयम से नैितकता-
अनैितकता के ÿij को भी क¤þ म¤ रखा है । इन दोनŌ कहािनयŌ का िवशद िववेचन आगे
सिÌमिलत है ।
७.३ कहानी एक रात : मूल संवेदना 'एक रात' कहानी ÿेम और दांपÂय के ĬÆĬ और संघषª पर आधाåरत जैन¤þ कì एक लंबी
कहानी है । संभवतः जैन¤þ ने सबसे ºयादा यिद िकसी िवषय को अपनी सजªना म¤ छुआ है,
तो वह यही िवषय है । सामािजक और वैयिĉक łप से इस ÿij को उÆहŌने िविभÆन
ŀिĶकोणŌ से देखने और एक नई ŀिĶ देने का काम िकया है । जयराज और सुदशªना को क¤þ
म¤ रखकर िलखी गई इस कहानी म¤ दरअसल वैवािहक संबंधŌ को एक नवीन ŀिĶ से देखने
का ÿयास िकया गया है । िववाह संÖथा के पीछे के ľी मनोजगत के सÂय भी क¤þ म¤ ह§ । यह
कहानी अपने समकालीन पåरवेश को भी ÿÖतुत करती है । परंतु जयराज और सुदशªना का
ĬंĬ एवं संघषª इसम¤ सवाªिधक उÐलेखनीय है । इनके ĬंĬ और संघषª को लेकर जैन¤þ ने
कहानी म¤ िजस कायª-Óयापार का सृजन िकया है, वह इस कहानी कì मूल संवेदना के łप म¤
úहण िकया जा सकता है ।
७.३.१ कहानी एक रात : िवĴेषण:
कहानी 'एक रात' जैन¤þ कì आरंिभक कहािनयŌ म¤ से एक है । 'एक रात' नाम से उनका एक
कहानी संúह सन १९३४ म¤ छपा था । इसका अथª है िक यह कहानी सन् १९३४ के पूवª ही
िलखी गई थी । अपने िवषय को लेकर यह कहानी चमÂकृत करती है ³यŌिक जैन¤þ ने इसम¤
ऐसे िवषय को िलया है, िजस बारे म¤ बात करना भी उस वØत ठीक नहé समझा जाता था ।
इस तरह के िवषयŌ को जैन¤þ लगातार अपने कथा सािहÂय म¤ उठाते रहे ह§, जो एक ľी
और पुŁष के सीिमत संबंधŌ के दायरे को तोड़कर उÆमुĉ ढंग से ÿकट होते ह§ । जयराज
और सुदशªना नामक दो पाýŌ पर आधाåरत यह कहानी ऐसे ही िवषय को लेकर िलखी गई
है, िजसम¤ जयराज का भीषण ĬंĬ और अंतःसंघषª िचिýत हòआ है । ÖपĶ łप से तो यह
कहानी िववाहे°र संबंधŌ को उभारती है, साथ ही उस समय के राजनीितक पåरवेश पर भी
आनुषंिगक łप से िवचार-िवमशª करती िदखाई देती है । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
74 जयराज और सुदशªन इस कहानी के मु´य पाý ह§ । जयराज राÕůीय आंदोलन से ÿभािवत
होकर युवावÖथा म¤ ही औपचाåरक िश±ा का मागª छोड़कर आंदोलन म¤ सिÌमिलत हòआ
युवक है । उसकì अवÖथा कोई तीस वषª के आसपास है और वह पूरी तरह से अपने को
पाटê कायªøम के िलए समिपªत िकए हòए है । देशसेवा का जुनून उस पर इस कदर हावी है
िक उसने पाåरवाåरक जीवन भी देशोĦार हेतु Âयाग िदया है । कहानीकार उसके बारे म¤
जानकारी देते हòए िलखता है, "िबना ताले और िबना ÿाइवेसी जयराज सबका बनकर
अकेला रहता है । अब तक जीवन के पाँच वषª जेल म¤ िबता चुका है । खाली रहता ही नहé ।
कॉलेज के चौथे वषª से पढ़ना छोड़ िदया, तभी सगाई भी तोड़ दी ।" चौबीसŌ घंटे वह अपने
इसी कायª म¤ संलµन रहता है । ±ेý के िविभÆन ÖथानŌ म¤ जा-जाकर भाषण देना, पाटê के
राÕůीय कायªøमŌ के संदभª म¤ लोगŌ को सूिचत करना, उÆह¤ जागłक बनाना - यही उसका
मु´य काम है । कहानी का आरंभ इसी िसलिसले को लेकर शुł होता है । िबलासपुर से
लगभग एक घंटे रेलयाýा-मागª पर िÖथत हरीपुर नामक Öथान से एक ÿितिनिध-मंडल
जयराज को अपने यहाँ सभा के िलए आमंिýत करने आता है । अपनी ÓयÖतता के चलते,
समय न होने का हवाला देते हòए, जयराज आ सकने म¤ अिन¸छा जािहर करता है । परंतु
अंततः अपने नैितक दबाव के कारण उसे जाना पड़ता है । इसी ÿितिनिध-मंडल से संवाद
के िसलिसले म¤ कहानीकार जैन¤þ ने उस समय के राजनीितक पåरवेश को िचिýत करने का
अवसर बना िलया । िजस बारे म¤ वे िलखते ह§, "देिखए नेतृÂव के मामले म¤ गांवŌ को आÂम-
िनभªर बनना होगा । नेताओं का भरोसा आप ³यŌ रख¤ ? इस तरह सरकार हम¤ हरा सकती
है । चुन-चुनकर कुछ आदिमयŌ को जेल म¤ डाल िदया और राÕů कì रीढ़ टूट गयी । नहé,
नहé, ÿÂयेक Óयिĉ कृत-िनIJय हो तभी तो Öवराºय िमलेगा । नहé तो अगर Öवराºय िमला
भी, तो जनता का Öवराºय वह कब हòआ ? हम लोगŌ का आसरा अब छोड़ दीिजए । म§
आप-सा ही आदमी हóँ ।"
उस दौर म¤ भारतीय समाज एक शहरी समाज के łप से ºयादा एक úामीण समाज के łप
म¤ जाना जाता था । िāिटश ÓयवÖथा से úामीण ±ेý का पåरचय िसफª शोषण तक ही था ।
अÆय सामािजक कायŎ को लेकर सरकार उतनी जागłक नहé थी । úामीण ±ेý नई िश±ा
ÓयवÖथा के अनुसार अिशि±त था । राजनीित कì बड़ी-बड़ी बात¤ और कायªøम उनकì
समझ म¤ नहé आते थे । इस हेतु ही उस समय के राÕůीय चåरý के संगठन कांúेस ने
जागłकता कायªøम चलाए और जयराज जैसे युवकŌ कì मदद से इस ÿिश±ण कायªøम
को संभव बनाया । आम जनता को ºयादा से ºयादा आÂमिनभªर बनाना, ऐसे कायªøमŌ का
उĥेÔय था । ÿÂयेक Óयिĉ अपने पåरवेश के ÿित जागłक हो, समÖयाओं को ठीक ढंग से
समझे और उन पर अपनी ÿितिøया दे, यह आवÔयक था । जयराज जैसे युवक अपने
कायªøमŌ म¤ लगातार इस बात पर बल देते थे िक िसफª नेतृÂव ही सारी िजÌमेदारी नहé
िनभा सकेगा बिÐक आम जनता को भी देशिहत के ÿित अपनी िजÌमेदारी को समझना
होगा। कांúेस ने राजनीितक जागłकता के साथ-साथ सृजनाÂमक कायŎ का भी ÿचार-
ÿसार िकया और यह सभी कुछ महाÂमा गांधी कì ÿेरणा से संभव हòआ । जैन¤þ Öवयं
महाÂमा गांधी के कायªøमŌ से बहòत ºयादा मुतमईन थे, इसीिलए उनके कथा सािहÂय म¤
इस संदभª म¤ अवसर िमलते ही वे इनकì बात भी िनकालते ह§ । जयराज के माÅयम से इस
िवचारधारा को ÖपĶ करते हòए जैन¤þ िलखते ह§, "कांÖůि³टव वकª ही वकª है । हम¤
राजनीित² नहé चािहए, सेवक चािहए । सेवक अपने को सेवा म¤ खो दे । अपने को खोने का munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
75 अथª ÿाण-रस को जनता के मूल म¤ सéच देने का है । भूखे के साथ, बेरोजगार के साथ अपने
को िमला देने कì कोिशश हम¤ करनी है । भूखे को खाना, बेकाम को काम और आशंिकत को
ढाढस हम¤ देना है । चरखा यह सब देता है ।" इस तरह कहानी के माÅयम से हम¤ तÂकालीन
पåरवेश कì भी जानकारी जैन¤þ देते ह§ ।
यह समÖत राजनीितक कायª-Óयापार कहानी म¤ आनुषंिगक ढंग से आया है । अपनी
वाÖतिवक संवेदना का वहन कहानी तब करना आरंभ करती है, जब जयराज हरीपुर
पहòंचता है और सभा म¤ सिÌमिलत होता है । सभा म¤ ही उसे सुदशªना के दशªन होते ह§ ।
माÐयापªण कì िजÌमेदारी सुदशªना को ही सŏपी गई थी । सुदशªना और जयराज के संबंधŌ को
लेकर कहानी म¤ सांकेितक łप से बात कहते हòए जैनेÆþ आगे बढ़ते ह§ । लगभग आधी
कहानी समाĮ हो जाने के बाद िजस ढंग से वे एक दूसरे से िमलते ह§, उससे यही अंदाजा
सहज ढंग से लगता है िक वे पूवª-पåरिचत ह§ । परंतु कहानीकार इसे सांकेितक ही बनाए रहते
ह§ । ÖपĶ łप से इसका कोई वणªन नहé करते । माÐयापªण के दौरान जयराज, सुदशªना के
बारे म¤ जो सोचता है, उससे पूवª-पåरचय कì दुिवधा भी समझ म¤ आती है, "यह Öवागत-गान
ÿदान करने वाली, माý नारी शिĉ कì ही ÿितिनिध होकर, मेरे गले म¤ यह माला डाल गयी
है । यह माला न मेरे िलए है, न उसकì है । वह कौन है ? उसका नाम सुदशªना है । पर
सुदशªना नाम ही है । वह इस समय भारतीय नारी कì गåरमा को अपने कल-कंठ के गुंजार से
मुझको उपलàय बनाकर भारत माता के पद-पĪŌ म¤ भ¤ट देने ÿÖतुत हòयी एक सेिवका है ।"
कहानीकार Ĭारा ÿÖतुत इस कथन से जयराज िजस ढंग से सुदशªना को लेकर दुिवधा ÿकट
करता है, उससे उसके पूवª-पåरिचत होने का संकेत िमल जाता है । लगभग ऐसी ही
सांकेितक मुþा म¤ जयराज और सुदशªना के संबंधŌ को लेकर पूरी कहानी म¤ एक Ăामक
िÖथित बनी रहती है । जैसे जैन¤þ ÖपĶ łप से कहने के बजाय संकेितक ढंग से अपनी बात
कहना ºयादा ठीक समझते ह§ ।
जयराज अपनी सभा खÂम करके उसी िदन िबलासपुर लौटना चाहता है और इसी उहापोह
म¤ सभा म¤ वĉÓय देते हòए देरी हो जाने के कारण उसकì पहली गाड़ी छूट जाती है । Öटेशन
पहòंच जाने के बावजूद वह Öटेशन म¤ Łकने से बेहतर यह समझता है िक कायाªलय म¤ कुछ
और कांúेसी पाटê ÿितिनिधयŌ से िमल िलया जाए और वह पुनः वापस आता है । इसी øम
म¤ मौसम िबगड़ जाने के कारण पुनः जब वह Öटेशन कì ओर लौटता है तो िकसी साधन कì
ÓयवÖथा न हो पाने के कारण उसे पैदल ही Öटेशन कì ओर लौटना पड़ता है । उस अंधेरे
और भारी बाåरश म¤ सुदशªना भी आ िमलती है । इस सूý को जोड़ने से पूवª कहानीकार
सुदशªना कì िÖथित को भी कहानी म¤ ÖपĶ करता है । परंतु यह ÖपĶीकरण भी सांकेितक
मुþा म¤ है, िजससे पाठक उहापोह कì िÖथित म¤ बना रहता है । जयराज से िमलने के िलए
सुदशªना आपने पित से िजस łप म¤ बात¤ कहती है, उससे जयराज के ÿित उसके आकषªण
और मोह का संकेत िमलता है । सुदशªना और उसके पित के बीच लंबे संवादŌ के Ĭारा
कहानीकार ने सुदशªना कì िÖथित को Óयĉ िकया है । वह अपने पित से कहती है, "तुमसे
मैन¤ बहòत ÿेम पाया है, बहòत आदर िलया है । वह सब म§ने चोरी कì है । ठगी कì है । म§
उसकì बननेवाली कोई न थी । म§ अपाý थी । आज मुझे पता चल गया है िक अपना सब-
कुछ म§ तुम पर नहé वार चुकì । भीतर-ही-भीतर कुछ बच गया था, जो आज देखती हóँ,
तुÌहारे चरणŌ म¤ म§ अपªण नहé कर सकì थी । यŌ न देखो..... मुझे देखो । म§ तुÌह¤ धोखा देती
रही । तुमसे पाती सब कुछ रही, देने म¤ चोरी करती रही ।" सुदशªना का यह कथन वैवािहक munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
76 जीवन के ÿित उसके पूणª समपªण के ÿित संदेह ÿकट करता है । दरअसल सुदशªना का पित
नशेड़ी और ऐबी है । िजसके चलते संभवत: उनका वैवािहक जीवन ³लेषमय है और िजतना
इस बात को सुदशªना समझती है, उतना ही उसका पित भी जानता है ।
आगे कहानी के वणªनŌ के अनुसार यह पता चलता है िक सुदशªना लगभग एकाकì जीवन
Óयतीत कर रही है । और संभवतः इसीिलए वह सावªजिनक जीवन म¤ भी ÿिवĶ हòई है । पित
कì इस नकाराÂमक िÖथित के चलते वह पूणª गृिहणी नहé बन सकì । अथाªत वह इस
वैवािहक जीवन को िबना संतान के आगे ढकेल रही है । उसके संÖकार ऐसे ह§ िक वह िकसी
भी तरह का कपट या चोरी करने के बजाए अपने पित को वाÖतिवकता बताकर िफर कोई
कदम उठाना चाहती है । उसे कुछ अपराध-बोध भी है । वह अपने पित से कहती है, "म§
तुÌहारे घर से िनकाल देने लायक हóँ । म§ सच कहती हóँ, जान-बूझकर म§ तुÌह¤ धोखा देने
वाली न थी । लेिकन यह मुझे आज ही मालूम हòआ िक म§ पूरी तरह समिपªत नहé हóँ । सो
आज ही तुÌहारे सामने खड़ी हो िक मुझे काला मुंह कर जाने दो । अपनी कृपा के नीचे मुझे
एक ±ण भी मत िटकने दो । तुम अपनी कृपा कì छाया तो उठाओगे नहé, तब मुझे ही
इजाजत दो िक म§ उसे कलंिकत न कŁँ ।" वह जानती है िक वह जो कुछ भी करने जा रही
है, उसके बाद उसका कोई नैितक दावा अपने पित पर नहé बनता है । इसिलए वह अपने
सच को कहकर जैसे अपने िदल के बोझ को हÐका कर लेना चाहती है ।
इस पूरी कहानी से गुजरते हòए पाठकŌ को कई तरह के िवरोधाभासŌ का सामना करना
पड़ता है । सबसे मु´य िवरोधाभास और दुिवधा तो जयराज तथा सुदशªना को लेकर पाठकŌ
के मन म¤ कहानी के शुł से अंत तक बनी रहती है । उनके åरÔते के Öवłप को कहानीकार
पूरी कहानी के दौरान मुखर ढंग से ÖपĶ नहé करता और न ही सुदशªना तथा उसके पित कì
िÖथित को । कभी तो सुदशªना के संवादŌ से ऐसा लगता है जैसे पित ही उसकì सभी
समÖयाओं का कारण है, परंतु कहé उसके संवाद इस तरह ÿÖतुत होते ह§, िजससे िÖथित
अÂयंत अÖपĶ हो जाती है, "जानकर मुझसे तुÌहारा अमंगल न होगा । तुÌहारे ÿेम को म§
िवफल नहé कर सकती । तुÌहारे-से पित को पाकर म§ घर को आनंद से भरा ³यŌ न रख
सकì ? घर पर ³यŌ सदा उदासी कì छाया आ-आ मंडराती रही ? ³यŌ हमारे घर म¤ शूÆयता
जमी रहती थी, जबिक वहां पूणªता उमगी रहनी चािहए थी ? कारण म§ने आज जाना है । मेरे
समपªण म¤ ýुिट थी, मेरे पितĄत म¤ शÐय था । मेरे मन म¤ चोरी थी, चलन म¤ खोट थी । अब म§
तुÌहारे दान को लांिछत नहé कłंगी ।"
इस िÖथित के बाद िवÖफोटक िÖथित को जÆम लेना चािहए था, परंतु वह न होकर
कहानीकार बेहद संयत ढंग से कहानी को ऐसी िदशा कì ओर मोड़ देता है जो पाठकŌ को
भी असहज कर देती है । सुदशªना का पित सुदशªना के Öवीकार के सामने िजस तरह ÿÖतुत
होता है, वह िÖथित ÿकट करते हòए कहानीकार िलखता है, "सुदशªना, मुझे बताओ ³या है?
इस तुÌहारे धड़कते हòए िदल को म§ समझना चाहता हóँ, समझ नहé सकता । म§ नहé
समझता, आÂमा । म§ नहé समझता, धमª । म§ नहé समझता, सदाचरण । लेिकन म§ समझता
हóँ, ÿेम । सुदशªना म§ तुÌह¤ ÿेम करता हóँ । जानता हóँ, तुम मेरी समझ से बाहर रही हो । मुęी
कì पकड़ म¤ समायी नहé । तुम मुझे सदा बचा ही गयी हो । लेिकन सुदशªना, म§ तुÌह¤ ÿेम
करता हóँ । म§ शराबी हóँ, ठीक है । म§ ऐबी हóँ, ठीक है । म§ झूठा हóँ, ठीक है । लेिकन म§ तुÌह¤ ÿेम
करता हóँ । सुदशªना, तुम यह जानती हो । म§ने कभी पितĄत के बारे म¤ पूछा है ? म§ने ³या munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
77 अपने म¤ उसकì िलयाकत पैदा कì है ? कुछ चाहóँ, इससे पहले म§ अपनी तरफ िबना देखे
कैसे रहóँ ? मुझे नहé चािहए कुछ सुदशªना, बस तुम मुझे ÿेम कì Öवीकृित भर दो ।"
सुदशªना के पित का यह संवाद ÖपĶ łप से यह संकेत करता है िक दोनŌ का वैवािहक
जीवन बेहद असंगत पåरिÖथित म¤ चल रहा है और यह जो कुछ भी हो रहा है, उसे उसका
पित भी मानिसक łप से Öवीकार कर चुका है । उसकì आÖथा केवल और केवल सुदशªना
के बने रहने म¤ है, अवाÆतर बातŌ म¤ नहé, "सुदशªना, म§ तुमसे कम बोला । तुमसे अलग-अलग
रहा । ³यŌिक मेरा मुंह न खुलता था । मुझे िहÌमत न होती थी । ³यŌिक म§ जानता था - म§
खोटा हóँ । लेिकन तुम छूटने या छोड़ने कì बात करोगी, तो खोटा िदल भी थोड़ा-बहòत तुम
पर अपना दावा बताना चाहेगा, सुदशªना । आज इसका गरजते आसमान के नीचे खड़े होकर
म§ कहता हóँ, तुम पितपन का कोई दावा नहé है । मेरे ÿेम का ही जो समझो दावा है । और यह
ÿेम िकसी तरह कì कैिफयत तुमसे नहé माँगता ।" इस तरह सुदशªना के वैवािहक जीवन कì
िÖथितयŌ का खुलासा कहानीकार करता है । इस तरह कì अपुĶ िÖथितयां जैन¤þ कì
कहािनयŌ म¤ भरी पड़ी ह§ । शायद कहानीकार का अंदाज मूल-मंतÓय कह देना तो है, परंतु
उसके पीछे िजस ढंग कì पåरिÖथितयाँ होती ह§, उनका अंदाजा लगाना बहòत कुछ वह
पाठकŌ पर छोड़ देते ह§ । जैन¤þ कì इस ÿवृि° के संदभª म¤ गोपाल राय अपनी पुÖतक 'िहंदी
कहानी का इितहास' म¤ िलखते ह§, "जैन¤þ इस बात कì िचंता नहé करते िक......... ÿसंगŌ म¤
कोई तकª या तारतÌय है या नहé; वे पाठक से अपे±ा करते ह§ िक वह उसे िबना िकसी ननु-
नच के Öवीकार कर ले ।" जैन¤þ कì संवेदनाÂमक सूýबĦता को ÖपĶ करने कì ŀिĶ से
गोपाल राय का यह कथन अÂयंत ÿासंिगक है ।
कहानीकार यह संकेत तो ÖपĶ łप से कर देता है िक सुदशªना का वैवािहक जीवन बेहद
असंतोषÿद है और इस िवभीिषका को वह लंबे समय से सहन भी कर रही है । िजस ÿकार
वह अपने पित से ±मा मांगती है, इससे यह भी लगता है िक जयराज के ÿित एक आकषªण
उसके मन म¤ सदा से रहा है और इसीिलए वह अपराध बोध महसूस करती है । िजसके िलए
वह अपने पित से ±मा मांगती है और आज जब वह सामने आता है, तो अपने को न रोक
पाने कì िÖथित म¤ वह अपने पित से संभवत: जयराज से िमलने कì अनुमित चाहती है ।
और ऐसा हो जाने पर वह जयराज से िमलने के िलए Öटेशन कì ओर िनकल पड़ती है,
"सुदशªना सब ओर से छुटी, इस समूचे अंधेरे, सÆनाटे भरे शूÆय के बीच म¤ से िनŁĥेÔय
अनजानी राह पर िजसके साथ चली जा रही है, उसी के ÿित वह अपने म¤ शंका कहां से
लाए ? वह चली ही जा रही है, शÊदहीन, संदेहहीन, िनÓयाªज और सÌयग भाव से, िजसे
करने को न ÿij कì आवÔयकता है, न उ°र कì अपे±ा है । िजसम¤ िज²ासा का अवकाश
नहé है । भिवतÓयता के संबंध म¤ िकसी ÿकार कì आशंका के िलए गुंजाइश नहé है । संपूणª
असंिदµध, िनःकांàय और िन:शंक, वह चली ही जा रही है । कहां ? - नहé जानती । ³यŌ ? -
नहé जानती । और जानने कì इ¸छा भी हो, इतना भर भी अभाव, इतना भी åरĉ उसम¤ नहé
है ।" इस तरह पित कì सहमित ÿाĮ कर सुदशªना जयराज से िमलने के िलए िनकल जाती है
और बेहद नाटकìय पåरिÖथितयŌ म¤ वह सड़क पर जाते हòए जयराज से िमलती है और िफर
उसके साथ-साथ Öटेशन आ जाती है । इसके बाद कì सभी िÖथितयŌ का नाटकìय सृजन
कहानीकार के Ĭारा िकया गया है, जो िबÐकुल भी सहज नहé लगता । परंतु जैसा िक गोपाल
राय जैन¤þ के संदभª म¤ िलखते ह§ िक पåरिÖथितयŌ का सृजन करते हòए जैन¤þ इस बात कì
िबÐकुल भी परवाह नहé करते िक पाठकŌ को यह िकतनी सहज या असहज लगेगी । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
78 Öटेशन म¤ जयराज और सुदशªना के संवाद से कहानीकार यह सूिचत करता है िक जैसे
जयराज को अपने पूवª म¤ िलए गए िनणªयŌ पर बेहद पछतावा है । ÿेम का जो ितरÖकार उसने
िववाह को अÖवीकार करके िकया था, आगे चलकर अपने उस िनणªय पर उसे असंतुिĶ ही
होती है । सुदशªना से अपने अंतर-मन कì बात बांटते हòए वह कहता है, "म§ नहé जानता था
सुदशªना, िक मुझम¤ तुम अभी हो और तुमसे इस तरह िमलकर अपने भीतर वाली तुमको
मुझे पा लेना है । और इस तरह तुÌहारे Ĭारा ही म§ अपने को ºयादा पाऊँगा, म§ नहé जानता
था । अकेला चलता रहा । आशा हार-हार रहती थी और जीवन रेिगÖतान लगता था ।
लेिकन िफर-िफर कर म§ राÕů के नाम को पकड़ लेता रहा और चला चलता रहा । म§ चलता
ही चला आ रहा हóँ । म§ने पीछे कì तरफ नहé देखा, आगे राÕů को रखकर वहé पाँख गाड़ म§
भागता रहा । जी हारता और म§ आंख¤ मीच लेता । म§ कहता, 'राÕůदेवो भव ।" उसके इस
कथन से ऐसा लगता है, जैसे राÕů सेवा भी उसके जीवन म¤ एक पलायन कì िÖथित कì
तरह है । एक िÖथित से भागते हòए वह इसको िनभाता चला जा रहा है । सुदशªना उसके
साथ पूणª समपªण कì िÖथित म¤ उपिÖथत है और उसका मन दुिवधा म¤ इधर उधर भटक
रहा है । ÿािĮ और पलायन दोनŌ एक साथ उसके मन म¤ डेरा डाले बैठे ह§ । और वह सोचता
है िक, "दुिनया से हटा और उसके िविध-िनषेध से मुĉ, दो घड़ी Łककर वहां से चले जाने
के िलए जब सब आंखŌ के अभाव म¤ यहां वह Öटेशन कì ब¤च पर बैठा है, तब ³या है िजसकì
उसे आशंका हो ? ³या है िजसे उसे रोकने कì जłरत हो ? ³यŌ नहé िनभªय होकर वह सब
कुछ के ÿित वह अपने को खोल देता है ? ĬंĬ काहे का ? 'न' - कार िकसके ÿित ?" कहानी
के अंत म¤ लेखक ÿतीकाÂमक ढंग से यह सूिचत करता है िक जयराज और सुदशªना दोनŌ
अपने अधूरे ÿेम को ÿाĮ कर अपनी-अपनी राह कì तरफ िनकल जाते ह§ । इस तरह बेहद
नाटकìय घटनाओं के Ĭारा यह कहानी अंत तक पहòंचती है ।
एक रात कहानी जैन¤þ कì आरंिभक कहािनयŌ म¤ से एक है और जैसा िक हम देख चुके ह§
लंबी कहािनयŌ के दौरान जैन¤þ कुछ भटकाव कì िÖथित म¤ भी आ जाते ह§, इस कहानी म¤
भी ऐसा ही होता है । िजस तरह कì नाटकìय घटनाओं का सृजन उÆहŌने इस कहानी म¤
िकया है, वैसा जÐदी अÆय कहािनयŌ म¤ नहé िमलता है । परंतु जैन¤þ जो िदखाना चाहते थे,
वह िदखाने म¤ वे सफल रहे ह§ । िववाह के बाद कì असहज िÖथितयŌ म¤ इन सारी घटनाओं
का सूýपात होता है । यह कहानी जयराज और सुदशªना के मूÐयांकन हेतु नहé है । बिÐक
यह उन पåरिÖथितयŌ का सृजन करती है, िजसम¤ इस तरह कì घटनाएँ संभव हो जाती ह§ ।
सामािजक नैितकता-अनैितकता के आधार पर इनका मूÐयांकन Óयिĉगत न होकर
पåरिÖथितगत हो जाता है । ऐसी िÖथितयाँ वैवािहक संबंधŌ म¤ संभव है और ऐसे पåरणाम भी
। यही जैन¤þ िदखाना चाहते ह§ । यही उनका उĥेÔय है ।
७.४ कहानी पÂनी : मूल संवेदना समकालीन ľी संदभŎ म¤ अपने वैिवÅयपूणª लेखन के िलए जैन¤þ िविशĶ łप म¤ जाने जाते
ह§। उÆहŌने अपने समय और पåरवेश म¤ िľयŌ कì आशाओं, आकां±ाओं और उनके
मनोजगत को िवÖतार से खोलते हòए कई िविशĶ कहािनयाँ और उपÆयास िलखे ह§ । 'एक
रात', 'पÂनी', 'łिकया बुिढ़या', 'जाĹवी' आिद जैसी कहािनयाँ तथा 'परख', 'Âयागपý',
'सुनीता' जैसे उपÆयास इस बात का उदाहरण ह§ । जैन¤þ ने िबना िकसी लाग लपेट के या munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
79 अपने समय के नैितक दबावŌ को दरिकनार करते हòए अपनी बात अपनी कहािनयŌ और
उपÆयासŌ के माÅयम से पाठकŌ तक ÿेिषत कì है ।
कहानी 'पÂनी' के Ĭारा जैन¤þ ने सुनंदा के łप म¤ भारतीय úहणी कì सहज-सरल जीवनचयाª
और उसके अंतĬ«दŌ को ÿकट िकया है । सुनंदा जैसी िनयित अिधकतर युवितयŌ कì है ।
अपने पित कािलंदीचरण के साथ रह रही सुनंदा पåरिÖथितयŌ के साथ कैसे बसर कर रही
है, वह इन संदभŎ म¤ ³या और कैसा सोचती है ? इसका िचýण इस कहानी म¤ हòआ है ।
इसके साथ-ही-साथ पित-पÂनी के जीवन म¤ एक अÓयĉ ÿेम उनके संबंधŌ कì आधारिशला
होता है । रोजमराª के जीवन म¤ यह भावना åरÔते के ÖथाियÂव पर अनूठे ढंग से काम करती
है। भारतीय पÂनी के चåरý म¤ यह लगाव और ÿेम अनूठे ढंग से अनुÖयूत रहता है । वह Öवयं
भूखी रहती है, परंतु पित का पूरा Åयान रखती है । वह पित से Öवयं łठी रहती है पर उसके
सÌमान पर यिद कोई बात आती है, तो र±ा के िलए सबसे पहले वही खड़ी होती है । उसम¤
एक अजब ढंग कì अिधकार भावना होती है । इन सभी बातŌ का साथªक िचýण इस कहानी
म¤ जैन¤þ के Ĭारा िकया गया है ।
७.४.१ पÂनी : भारतीय गृिहणी का अंतःसंवाद:
ÿÂयेक सािहÂयकार अपनी िनजी Öवाभािवक ŁिचयŌ और आÖथाओं के अनुसार साथªक
और ÿभावोÂपादक रचनाओं का सृजन करने म¤ समथª होता है । जैन¤þ कì Öवाभािवक Łिच,
ÿेम और दांपÂय के िविभÆन अंतĬ«दŌ को अिभÓयĉ करने म¤ रमती है । जैन¤þ के सािहÂय म¤
िविभÆन ÿकार के ľी चåरýŌ कì सृिĶ हòई है । एक तरफ जहाँ उÆहŌने भारतीय परंपरागत
समाज म¤ िविभÆन ÿकार के ĬंĬ और तनावŌ के साथ संघषª करती ľी को ÿामािणक łप से
िचिýत िकया है, वहé दूसरी तरफ ľी का ऐसा łप भी िचिýत है, जो िविभÆन नजåरयŌ से
अपनी िनजी Öवतंýता को घोिषत करती िदखाई देती है । इन िÖथितयŌ म¤ जैन¤þ के पाý
िवþोह करते नहé िदखाई देते बिÐक वे सहज तरीके से घिटत होते ह§ और उनका मानिसक
अंत:जगत पाठकŌ के सामने उपिÖथत होता है । जैन¤þ उन चåरýŌ कì सहजता से िकसी
ÿकार कì छेड़-छाड़ नहé करते या िकसी ÿकार का िनणªय देते नहé िदखाई देते । िनणªय का
कायª वे पाठकŌ पर छोड़ देते ह§ । 'पÂनी' कहानी म¤ जैन¤þ ने एक तरफ तो समय संदभŎ के
अनुłप राÕůीय आंदोलन जैसे िवषय को रखा है और वहé दूसरी तरफ एक मÅयमवगêय
पåरवार कì ľी सुनंदा के अंतĬ«द को भी सामने रखा है । इन दोनŌ ही िÖथितयŌ के बीच का
ĬंĬ इस कहानी म¤ भली ÿकार से िचिýत हòआ है ।
कािलंदीचरण कì पÂनी सुनंदा कोई बीस-बाइस बरस कì युवती है । देशसेवा म¤ समिपªत
उसका पित कािलंदीचरण, देशसेवा संबंधी अपने कायŎ के कारण वĉ-बेवĉ घर आ पाता है
और अचानक आज आने वाले अितिथयŌ का संग-साथ भी होता है । सुनंदा कì िदनचयाª है
िक वह पूणª Łप से पित सेवा को ही समिपªत है । कोई अÆय िवशेष उĥेÔय उसके जीवन म¤
नहé है । पित कì इस ÓयÖतता के चलते उसके जीवन म¤ बहòत अकेलापन है । उसके
अकेलेपन म¤ उसकì पीड़ा को बढ़ाने वाली एक दुघªटना भी है, उसका एकमाý पुý जो िक
अब इस दुिनया म¤ नहé रहा । इस तरह सुनंदा एकाकì और अिनिIJत जीवन जीने को
अिभशĮ है । परंतु इन िÖथितयŌ के बावजूद कािलंदीचरण के ÿित उसके मन म¤ अनूठा Öनेह
है । वह कािलंदीचरण से असंतुĶ होते हòए भी Öनेह और सहानुभूित रखती है, "सुनंदा munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
80 सोचती है - नहé, सोचती कहाँ है, अलस-भाव से वह तो वहाँ बैठी ही है । सोचने को है तो
यही िक कोयले न बुझ जाएँ, वह जाने कब आ जाएंगे । एक बज गया है । कुछ हो, आदमी
को अपनी देह कì िफø तो करनी चािहए ।" कािलंदी अपने सावªजिनक जीवन म¤ अÂयंत
ÓयÖत है । परंतु सुनंदा कì यह अपे±ा होती है िक उसका पित यह सारी बात¤ उससे भी करे।
उसका अकेलापन उसे टीसता है । वह जानती है िक उसम¤ इतनी बुिĦ नहé है िक वह इन
बड़ी-बड़ी बातŌ को समझ सके परंतु उसे लगता है िक इस बहाने कम से कम वह पित से
संवाद तो कर सकेगी और िफर ³या वह भी थोड़े ÿयास से इन बातŌ को समझ ना सकेगी,
"उसने बहòत चाहा है िक पित उससे भी कुछ देश कì बात करे । उसम¤ बुिĦ तो जरा कम है,
िफर धीरे-धीरे ³या वह भी समझने नहé लगेगी ?" उसे कािलंदी कì अिनिIJत िदनचयाª पर
कोÉत होती है, िचड़िचड़ाहट होती है पर उसे सहानुभूित भी होती है । उसे इस बात का
संतोष होता है िक कहé-न-कहé उसका पित कुछ तो बड़ा काम कर रहा है । परमाथª भाव से
वह इतनी तकलीफ¤ सह रहा है । कोई जानबूझकर तो यह तकलीफ नहé सहेगा । वह ºयादा
नहé जानती-समझती है । उसे नहé मालूम िक देश और राÕů म¤ ³या चल रहा है । इनका
कारण ³या है । इनका िनवारण ³या है । पर उसे अपने पित कì आÖथा पर िवĵास है । और
अनायास भाव से वह इस आÖथा के साथ-साथ है, "वह अनायास भाव से पित के साथ
रहती है और कभी उनकì राह के बीच म¤ आने कì नहé सोचती । वह एक बात जानती है िक
उसके पित ने अगर आराम छोड़ िदया है, घर-मकान छोड़ िदया है, जान-बूझकर उखड़े-
उखड़े और मारे-मारे जो िफरते ह§, इसम¤ वे कुछ भला ही सोचते हŌगे ।"
सुबह से इंतजार करते-करते अंततः दोपहर एक बजे उसका पित कािलंदीचरण अपने तीन-
चार िमýŌ के साथ घर वापस आया । सब म¤ देशोĦार को लेकर बड़ी बहस चल रही है । इस
बहस कì आवाज¤ उसके कानŌ तक पहòंच रही ह§, " भारत माता को Öवतंý करना होगा और
नीित नीित िहंसा अिहंसा को देखने का यह समय नहé है मीठी बातŌ का पåरणाम बहòत देखा
मीठी बातŌ से बाघ के मुंह से अपना िसर नहé िनकाला जा सकता उस वĉ बाघ को मारना
ही एक इलाज है ।" इन बड़ी बातŌ के बीच उसकì दुिवधा यह है िक कािलंदी भोजन कर¤
और वह चौका समेटे । खाना पक चुका है पर इन िबन-बुलाए अितिथयŌ के िलए काफì नहé
है । घर वापस आने पर अनायास उसके पित को Åयान आता है िक न उसने खाना खाया है
और न ही अपने िमýŌ को पूछा है और भीतर सुनंदा से भोजन के संबंध म¤ पूछने पर वह चुप
लगा जाती है । वह भीतर ही भीतर øोिधत है । एक Óयिĉ के भोजन पर चार Óयिĉ का
भोजन तो कोई बनाकर नहé रखता है । कािलंदी का संकोची ÓयिĉÂव उसे नहé भाता है ।
वह सोचती है, "उसके मन म¤ बेहद गुÖसा उठने लगा । यह उससे ±मा-ÿाथê से ³यŌ बात
कर रहे ह§ । हँसकर ³यŌ नहé कह देते िक कुछ और खाना बना दो । जैसे म§ गैर हóँ । अ¸छी
बात है, तो म§ भी गुलाम नहé हóँ िक इनके ही काम म¤ लगी रहóँ । म§ कुछ नहé जानती खाना-
वाना और वह चुप रही ।" अंततः उसके चुप रहने पर कािलंदी थक-हार कर िक 'हम बाहर
खाना खा ल¤गे' कहकर िमýŌ के पास आ जाता है । और िफर सुनंदा चुपचाप सारा भोजन
एक थाली म¤ रखकर कािलंदी और उनके िमýŌ के सामने रख देती है । अपने िलए कुछ भी
बचा कर नहé रखती । उसे भीतर-ही-भीतर इस बात का बहòत ´याल है िक ऐसा नहé हो
सकता िक वह Öवयं तो भोजन कर ले और कािलंदी के िमýŌ को भूखा रहने दे । इन सभी
िÖथितयŌ के ÿित एक अÓयĉ øोध जो उसके मन म¤ है तो उसके कारण वह कािलंदी से
ऐसा Óयवहार करती है । उसकì इस Óयथा को कािलंदी भी समझते ह§ । वैसे भी कािलंदी munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
81 अपने दल समूह म¤ सुधारवादी और संकोची Óयिĉ माने जाते ह§, िववेकशील माने जाते ह§,
"कािलंदीचरण अपने दल म¤ उú नहé समझे जाते, िकसी कदर उदार समझे जाते ह§ । सदÖय
अिधकतर अिववािहत ह§ । कािलंदीचरण िववािहत ही नहé है, वह एक ब¸चा खो चुके ह§ ।
उनकì बात का दल म¤ आदर है । कुछ लोग उनके धीमेपन पर ŁĶ भी ह§ । वह दल म¤ िववेक
के ÿितिनिध ह§ और उ°ाप पर अंकुश का काम करते ह§ ।" परंतु िदन भर घर कì चारदीवारी
म¤ माथा खटने के बाद एक पÂनी कì एक सरल-सहज अपे±ा यह होती है िक उसका पित
उससे उसका दुख-सुख पूछे । उससे दो बात करे । भोजन समाĮ हो गया, कोई बात नहé पर
झूठे ही पूछ तो ले । इतना ही उसके िलए काफì है, "उÆहŌने एक बार भी नहé पूछा िक तुम
³या खाओगी । ³या म§ यह सह सकती थी िक म§ तो खाऊँ और उनके िमý भूखे रह¤ । पर
पूछ लेते तो ³या था । इस बात पर उसका मन टूटता-सा है । मानो उसका जो तिनक-सा
मान था वह भी कुचल गया हो ।" कहानी पढ़ते हòए एक बात जो बार-बार सुनंदा के ÓयिĉÂव
को लेकर महसूस होती है, वह यह है िक, सुनंदा एक मािननी ľी है । जीवन सुख और दुख
दोनŌ का सिÌमिलत नाम है और जीवन को लेकर उसके मन म¤ िकसी ÿकार के अंतिवªरोध
नहé ह§ परंतु उसम¤ अिधकार-बोध है । वह अिधकार लेना और खुद को अिधकार म¤ छोड़ना
जानती है । कालीचरण का ÓयिĉÂव संकोची और उदार ÓयिĉÂव है । वह अपनी पÂनी से
भी िजस संकोच भाव म¤ Óयवहार करता है, उससे यह पता चलता है िक कहé-न-कहé उसे
इस बात का बोध है िक वह सुनंदा को वह सब कुछ नहé दे पा रहा है, जो एक ľी कì
अपे±ा होती है । इसके चलते वह अिधकार जताने जैसा Óयवहार भी नहé करता है । यही
बात सुनंदा को खटकती है । वह चाहती है िक पित अिधकार-भाव से उससे Óयवहार कर¤ ।
भले ही वह देशकाल पåरिÖथितयŌ को उतना नहé समझ रही है, परंतु उन संदभŎ को भी वह
उससे साझा कर¤ । वह उसके हर सुख और दुख म¤ साथ देना चाहती है । और ऐसा न होने
पर ही वह कािलंदी के ÿित असंतोष भाव ÿकट करती है ।
इस तरह जैन¤þ इस कहानी म¤ एक पÂनी के िविभÆन मनोभावŌ को यथाथªपूणª ढंग से िचिýत
करते िदखाई देते ह§ । जैसा िक जैन¤þ कì शैली है िक, कहानी कì मूल संवेदना के साथ म¤
पåरिÖथितगत ÿभावŌ को भी िचिýत करते चलते ह§, इस कहानी म¤ भी ऐसा देखने को
िमलता है । कािलंदीचरण के बहाने जैन¤þ ने उस समय कì राÕůवादी गितिविधयŌ का िचýण
इस कहानी म¤ िकया है । जैन¤þ मूलतः गांधीवादी िवचारधारा के समथªक थे । अपने जीवन
का थोड़ा समय उÆहŌने राजनीितक गितिविधयŌ म¤ भी बताया था । युवावÖथा म¤ असहयोग
आंदोलन के समय से लेकर अगले कुछ वषŎ तक वे ऐसी गितिविधयŌ म¤ संलµन रहे । जेल
भी गए । परंतु कुछ समय बाद वे धीरे-धीरे इनसे कटते गए और सािहÂय-सजªना कì ओर
मुड़ते गए । परंतु उनकì वैचाåरक आÖथाएँ, शुł से अंत तक गांधीवाद के ÿित बनी रहé ।
यहाँ वे ऐसा कोई दुराúह ÿÖतुत करते नहé िदखाई देते परंतु उÆहŌने आजादी के संदभª म¤
øांितकारी और अिहंसावादी - दोनŌ ही मतŌ का उÐलेख िकया है । øांितकारी गितिविधयŌ
के संदभª म¤ कािलंदी के एक िमý कì माफªत वे िलखते ह§, "भारत माता को Öवतंý करना
होगा - और नीित-अनीित, िहंसा-अिहंसा को देखने का यह समय नहé है । मीठी बातŌ का
पåरणाम बहòत देखा । मीठी बातŌ से बाघ के मुंह से अपना िसर नहé िनकाला जा सकता ।
उस वĉ बाघ को मारना ही एक इलाज है । आतंक ! हाँ, आतंक । हम¤ ³या आतंकवाद से
डरना होगा ? लोग ह§ जो कहते ह§ आतंकवादी मूखª ह§, वे ब¸चे ह§ । हाँ वे ह§ ब¸चे और मूखª ।
उÆह¤ बुज़ुगê और बुिĦमानी नहé चािहए । हम¤ नहé अिभलाषा अपने जीने कì । हम¤ नहé मोह munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
82 अपने बाल-ब¸चŌ का । हम¤ नहé गज़ª धन-दौलत कì । तब हम मरने के िलए आजाद ³यŌ
नहé ह§ ? जुÐम को िमटाने के िलए कुछ जुÐम होगा ही । उससे वे डर¤ जो डरते ह§ । डर हम
जवानŌ के िलए नहé ह§ ।" दरअसल जैन¤þ जब अपनी सजªना म¤ ÓयÖत थे, उस समय भारत
म¤ øांितकारी गितिविधयाँ जोरŌ पर थé और चूंिक उस समय इन गितिविधयŌ कì वैचाåरक
आÖथाओं से आम जनमानस बहòत ºयादा पåरिचत नहé था, इसिलए ÿथम ®ेणी का
राजनीितक नेतृÂव ऐसी गितिविधयŌ को भारतीय Öवतंýता के संघषª के िलए ठीक नहé
समझता था । परंतु भगत िसंह, चंþशेखर आजाद जैसे øांितकारी इस मागª के समथªक थे
और वे ÿाणपण से इस हेतु लगे थे । दूसरी तरफ कािलंदी के Ĭारा उÆहŌने अिहंसावादी
नीितयŌ के संदभª म¤ उÐलेख करते हòए कहा है, "हम¤ आतंक को छोड़ने कì ओर बढ़ना
चािहए । आतंक से िववेक कुंिठत होता है और या तो मनुÕय उससे उ°ेिजत ही रहता है या
उसके भय से दबा रहता है । दोनŌ ही िÖथितयाँ ®ेķ नहé ह§ । हमारा लàय बुिĦ को चारŌ
ओर से जगाना है, उसे आतंिकत करना नहé । सरकार Óयिĉ और राÕů के िवकास के
ऊपर बैठकर उसे दबाना चाहती है । हम इसी िवकास के अवरोध को हटाना चाहते ह§ - इसी
को मुĉ करना चाहते ह§ । आतंक से वह काम नहé होगा । जो शिĉ के मद म¤ उÆम° ह§,
असली काम तो उनका मद उतारने और उनम¤ कतªÓय भावना का ÿकाश जगाने का है ।"
इस तरह जैन¤þ अपनी वैचाåरक आÖथाओं को भी कहानी के मूल-मंतÓय के साथ-साथ
ÿकट करते हòए चलते ह§ ।
िनिIJत łप से कहानी कì मूल संवेदना सुनंदा का जीवन और उसकì मानिसक उहापोह के
साथ तÂकालीन पåरिÖथितयŌ का संघषª है । एक गृिहणी के łप म¤ सुनंदा इस संघषª म¤ ³या
योगदान कर रही है और ³या योगदान कर सकती है ? जैन¤þ ने इस बात को ÖपĶ łप से
िदखलाने का ÿयास िकया है । ÿतीकाÂमक ढंग से यह कहानी राÕůीय आंदोलन म¤ भारतीय
िľयŌ के योगदान को लि±त और ÿकट करती िदखाई देती है । भले ही सुनंदा इतनी पढ़ी-
िलखी न थी िक वह इन बड़ी-बड़ी बातŌ को समझ सकती या िफर अपनी कोई राय दे
सकती पर वह सबसे बड़ा योगदान जो कर सकती थी, वह यह है िक कािलंदीचरण और
उसके िमýŌ को वह वातावरण और शांित दे सकती थी, िजससे वह अपना कायª सहज łप
से कर सक¤ और यह वह कर भी रही थी । राÕůीय आंदोलन म¤ ľी वगª कì भूिमका को
कमतर नहé आंका जा सकता । उÆहŌने िजस łप म¤ अपना योगदान इस आंदोलन को िदया
है, वह अिवÖमरणीय है । इस आंदोलन के िलए उÆहŌने अपनी आशाओं-आकां±ाओं कì
ितलांजिल दी है । उÆहŌने अपने सहज-सरल जीवन को जिटल बनाया है और खुशी-खुशी
उस जिटलता को अपनाया है । इस तरह यह कहानी उपरोĉ िविभÆन संदभŎ म¤ िलखी गई
एक ®ेķ कहानी है ।
जैन¤þ के कहानी लेखन के संदभª म¤ एक बात िविशĶ ढंग से लि±त कì जा सकती है िक
आकार कì ŀिĶ से जैन¤þ कì छोटी कहािनयाँ कसी हòई और एक िवशेष िदशा कì तरफ
ÿवाहपूणª ढंग से ÿवाहमान िदखाई देती ह§ । अपनी छोटी कहािनयŌ म¤ अपनी बात को वे बड़े
ÿभावपूणª ढंग से ÿेिषत कर सके ह§ । वहé दूसरी तरफ यह बात लंबी कहािनयŌ के संदभª म¤
नहé कही जा सकती । लंबी कहािनयŌ म¤ कहानी कì मूल संवेदना से उनका भटकाव सहज
ही लि±त िकया जा सकता है । एक रात कहानी इसका ÿमुख उदाहरण है, जो आकार कì
ŀिĶ से अपने लंबे होने के चलते िशÐप कì ŀिĶ से अÂयंत लचर कहानी है । िजस तरह कì
ÿभावोÂपादकता 'पÂनी', 'दो सहेिलयाँ', 'खेल', 'अपना अपना भाµय', 'łिकया बुिढ़या' आिद munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
83 कहािनयŌ म¤ देखने को िमलती है, वह उनकì लंबी कहािनयŌ म¤ नहé िदखाई पड़ती । 'पÂनी'
कहानी भी आकार कì ŀिĶ से एक छोटी कहानी ही कही जाएगी, िजसम¤ कहानी कì मूल
संवेदना को जैन¤þ अÂयंत ÿभावशाली तरीके से अिभÓयĉ करने म¤ समथª हòए ह§ ।
७.५ सारांश ÿेम और दांपÂय के जिटल संबंधŌ को ÿेिषत करने कì ŀिĶ से जैन¤þ िहंदी के पहले ऐसे
कथाकार माने जा सकते ह§, िजÆहŌने दुÖसाहस का पåरचय देते हòए ऐसे िवषयŌ को अपनी
कहािनयŌ और उपÆयासŌ म¤ Öथान िदया । िľयŌ के संदभª म¤ इन िवषयŌ के महßव को भली-
भांित समझते हòए उÆहŌने पूरी िशĥत से ľी-जगत कì िविभÆन मनोदशाओं को इनम¤ िचिýत
िकया है । इस इकाई म¤ 'एक रात' कहानी इस ŀिĶ से अÂयंत उÐलेखनीय कहानी है ।
िजसम¤ उÆहŌने जयराज और सुदशªना के चåरýŌ के माÅयम से िहंदी कहानी म¤ ÿेम और
दांपÂय के संबंध को एक नए आयाम से देखा है । जैन¤þ अपने सजªन के दौरान अपने मूल-
मंतÓयŌ को लेकर बेहद ÿेåरत रहते ह§ और वही ÿेिषत करना उनका मु´य उĥेÔय होता है ।
कायª-Óयापार के गुÌफन म¤ इसीिलए कहé कहé असहजता भी पाठक महसूस करता है । िजसे
लेकर आलोचक गोपाल राय कहते ह§, "ÿेम और दांपÂय का यह ĬंĬ समकालीन भारतीय
ľी कì अपåरहायª िनयित थी, िजसे क¤þीय महßव देने वाले ÿथम िहंदी कहानीकार जैन¤þ ही
ह§ । सच पूछ¤ तो ÿेम और दांपÂय के ĬंĬ का िचýण ही जैन¤þ कì कहािनयŌ कì मु´य पहचान
है ।........ यह ÿेम के बारे म¤ जैन¤þ कì ŀिĶ है । िकतने लोग इससे सहमत होते ह§ या िकतने
लोगŌ तक यह िवचार या भाव संÿेिषत होता है, जैन¤þ इसकì िचंता नहé करते । वÖतुतः
जैन¤þ तो इस बात कì भी परवाह नहé करते िक उÆहŌने अपनी बात कहने के िलए जो ÿसंग
िनिमªत िकया है, वह पाठक के सामाÆय अनुभव, इंिþय-बोध के िकतना अनुकूल है ।" इस
तरह ऐसे संदभŎ को ÿÖतुत करने कì ŀिĶ से जैन¤þ िहंदी कथा सािहÂय के इितहास म¤ अपने
आप म¤ अनोखे ह§ ।
इस इकाई म¤ सिÌमिलत दूसरी कहानी 'पÂनी' अलग तरह के संदभª और पåरÿेàय को
िचिýत करने कì ŀिĶ से महÂवपूणª है । सुनंदा जैसे पाý, पåरवार संÖथा म¤ हर जगह
उपिÖथत ह§ । जो पåरवार और समाज के िलए अपने योगदान के कारण बेहद उÐलेखनीय
ह§। परंतु िजनकì चचाª कहé भी नहé होती । इस कहानी म¤ जैन¤þ ने राÕůीय सरोकारŌ के साथ
सुनंदा जैसी िľयŌ के योगदान को िचिýत िकया है । समकालीन संदभŎ म¤ ľी-जगत कì
िविभÆन िवडंबनाओं, आÖथाओं और योगदानŌ को जैन¤þ ने अपने कथा सािहÂय म¤ भली-
भांित ÿÖतुत िकया है । सावªजिनक और िनजी जीवन म¤ िविभÆन तरह कì उनकì
सहभािगता और िनजी जीवन म¤ उनकì अपनी आशाएँ-आकां±ाएँ यह सभी कुछ यथाथª łप
म¤ उनके सािहÂय म¤ देखने को िमलता है । कथाकार का धमª है िक वह ऐसे सÂय को, जो
मौजूद तो है, पर िदखाई नहé देता - सबके सामने लाने कì चेĶा करे । जैन¤þ ने समाज और
Óयिĉ के मानिसक जगत को अपना कायª±ेý बनाया और इस तरह के तमाम सÂय सामने
लाने का काम िकया । इस इकाई के अंतगªत जैन¤þ कì एक रात और पÂनी कहािनयŌ के
माÅयम से जैन¤þ कì कहानी कला और उनकì संवेदनाÂमक पहòंच का अंदाजा लगाना सहज
हो सका है ।
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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
84 ७.६ उदाहरण Óया´या Óया´या-अंश 1: "देिखए नेतृÂव के मामले म¤ गांवŌ को आÂम-िनभªर बनना होगा । नेताओं
का भरोसा आप ³यŌ रख¤? इस तरह सरकार हम¤ हरा सकती है । चुन-चुनकर कुछ
आदिमयŌ को जेल म¤ डाल िदया और राÕů कì रीढ़ टूट गयी । नहé, नहé, ÿÂयेक Óयिĉ
कृत-िनIJय हो तभी तो Öवराºय िमलेगा । नहé तो अगर Öवराºय िमला भी, तो जनता का
Öवराºय वह कब हòआ ? हम लोगŌ का आसरा अब छोड़ दीिजए । म§ आप-सा ही आदमी हóँ ।
दो टाँग¤, दो हाथ । आप िदल म¤ इरादा पैदा कìिजए और मुÐक के िलए रिहए, तो आपम¤
मुझम¤ ³या फकª है ? तो यह ठीक है न ? आप मुझे छोड़¤ । सब बाहरी लीडरŌ कì आस
छोड़ो। खुद लीडर बनो । आपकì तहसील का आपकì तरह म§ ÿितिनिध हो सकता हóँ ?"
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì कहानी 'एक रात' से उĦृत है ।
ÿसंग: इस उĦरण म¤ कहानीकार ने जयराज के कथन के माÅयम से युगीन आवÔयकताओं
कì ओर Åयान खéचा है । तÂकालीन समय म¤ देश को जागłक करने के ÿयास गांव-गांव
चल रहे थे । िकसी भी िनणªय के िलए लोग िकंकतªÓयिवमूढ़ होकर नेताओं कì ओर देखते थे।
परंतु महाÂमा गांधी इस ŀिĶ से भी जन समाज को आÂमिनभªर बनाना चाहते थे । उनका
कहना था िक लोग अपने-अपने ±ेý के िवकास कायŎ आिद को समझ¤ और नई ÿवृि°यŌ को
अपनाएँ । इसी से Öवराºय जÐदी संभव होगा । जयराज इÆहé बातŌ का उÐलेख कर रहा है ।
Óया´या: 'एक रात' कहानी जब िलखी गई थी, उस समय भारत म¤ राÕůीय आंदोलन अपने
चरम पर था । महाÂमा गांधी के असहयोग आंदोलन, सिवनय अव²ा आंदोलन आिद के
कारण आजादी कì लहर गांव-गांव, घर-घर पहòंच चुकì थी । युवा वगª अपनी पढ़ाई छोड़कर
और नौकरीपेशा वगª अपनी नौकåरयां छोड़कर देश सेवा म¤ संलµन था । वालंिटयर गांव-गांव
घूमकर गांव के लोगŌ को Öवराºय संबंधी बातŌ कì जानकारी देते थे । जयराज भी पाटê कì
तरफ से इसी कायª हेतु िनयुĉ था । वह आसपास के गांवŌ म¤ जाकर वहां के िजÌमेदार लोगŌ
को कायªøमŌ कì जानकारी देता था और आम जनता को अपने भाषणŌ के Ĭारा जागłक
बनाने कì चेĶा करता था । पर यह कायª इतना आसान नहé था । यातायात के साधन इतनी
तेज नहé थे िक एक Óयिĉ हर जगह पहòंच सकता । इसको लेकर जयराजजैसे युवक यह
सोचते थे िक सभी को िमलकर इस तरह के ÿयास करने हŌगे । हर िनणªय के िलए बड़े
नेताओं कì ओर देखना ठीक नहé होगा । कुछ िनणªय Öवत: भी लेने हŌगे, तभी Öवराºय कì
ÿािĮ संभव होगी ।
िवशेष: जैनेÆþ ने तÂकालीन राÕůीय उĥेÔयŌ को ÖपĶ िकया है ।
Óया´या-अंश २: सुन रही है िक उसके पित कािलंदीचरण अपने िमýŌ के साथ ³यŌ और
³या बात¤ कर रहे ह§ । उसे जोश का कारण नहé समझ म¤ आता । उÂसाह उसके िलए
अपåरिचत है । वह उसके िलए कुछ दूर कì वÖतु है, Öपृहणीय और मनोरम और हåरयाली ।
वह भारत माता कì Öवतंýता को समझना चाहती है, पर उसको न भारत माता समझ म¤
आती है, न Öवतंýता समझ म¤ आती है । उसे इन लोगŌ कì इस जोरŌ कì बातचीत का
मतलब ही समझ म¤ नहé आता । िफर भी उÂसाह कì उसम¤ बड़ी भूख है । जीवन कì हŏस
उसम¤ बुझती-सी जा रही है, पर वह जीना चाहती है । उसने बहòत चाहा है िक पित उससे भी munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - एक रात और प
85 कुछ देश कì बात करे । उसम¤ बुिĦ तो जरा कम है, िफर धीरे-धीरे ³या वह भी समझने नहé
लगेगी ? सोचती है, कम पढ़ी हóँ, तो इसम¤ मेरा ऐसा कसूर ³या है ?
संदभª :ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì ÿिसĦ कहानी 'पÂनी' से उĦृत िकया गया है ।
ÿसंग: इस उĦरण म¤ कहानी कì नाियका सुनंदा के अंदर चल रही वैचाåरक उथल-पुथल
को िदखाया गया है । भारतीय ľी-वगª कì िनयित है िक उसकì सारी िजंदगी चौके म¤ िसमट
कर रह जाती है । सुनंदा भी इसका अपवाद नहé है । वह अपने पित के साथ कदम िमलाकर
सामािजक गितिविधयŌ म¤ भी िहÖसा लेना चाहती है, परंतु ऐसा संभव नहé है । इÆहé
िÖथितयŌ का िचýण यहां पर िकया गया है ।
Óया´या: 'पÂनी' कहानी सुनंदा और उसके पित कािलंदीचरण कì िÖथितयŌ को बयान
करने वाली कहानी है । सुनंदा एक घरेलू ľी है, जो अपने घर के कामकाज म¤ और कािलंदी
कì िचंताओं म¤ ÓयÖत रहती है । कािलंदीचरण देश उĦार म¤ अपने िमýŌ के साथ संलµन है ।
वĉ-बेवĉ घर आना, िमýŌ के साथ देश-उĦार कì नई-नई योजनाएँ बनाते रहना, पाटê
संगठन के िलए काम करना - यही उनका उĥेÔय है । सुनंदा चौके म¤ भीतर बैठे यह सारी
चचाªएं सुनती रहती है । उसको यह सबकुछ समझ म¤ नहé आता पर अपने पित को इन
गितिविधयŌ म¤ लगा हòआ देखकर वह इतना तो महसूस करती है िक कोई बहòत जłरी बात
या काम है िजसके िलए यह लोग मारे-मारे िफरते ह§ । वह खुद भी इन सभी म¤ शािमल होना
चाहती है । िÖथितयŌ-पåरिÖथितयŌ का उसे बहòत ºयादा ²ान नहé है । पर वह जानती है िक
यिद पित Ĭारा उसे बताया जाएगा तो वह भी उनका कुछ साथ दे सकेगी, कुछ हाथ बटा
सकेगी । हमारे तÂकालीन समाज कì यह िवडंबना थी िक लड़िकयŌ कì िश±ा का मतलब
यह था िक बस उÆह¤ गृहÖथी संभालना िसखा िदया जाए । इससे आगे उनसे और अपे±ाएं
नहé थé । इसी िपछड़ी मानिसकता का िशकार सुनंदा भी थी । सुनंदा के माÅयम से लेखक
ने यह िदखाने का ÿयास िकया है िक यिद वह भी िशि±त होती तो देशोĦार म¤ ľी-वगª भी
कुछ साथªक योगदान कर सकता था । हालांिक पुŁष वगª ने जो भी योगदान िदया, उसके
पीछे िľयŌ के महÂव से इनकार नहé िकया जा सकता ।
िवशेष: १. कहानीकार ने तÂकालीन समाज म¤ ľी-दशा का िचýण िकया है ।
७.७ वैकिÐपक ÿij १. सुनंदा के पित का नाम ³या है ?
(क) łपेश (ख) जयराज (ग) दीना (घ) कािलंदीचरण
२. कािलंदीचरण िकसकì सेवा म¤ संलµन है ?
(क) िपता (ख) माता (ग) पÂनी (घ) देश
३. कािलंदीचरण के साथ कौन घर आया ?
(क) िपता (ख) बहन (ग) भाई (घ) िमý
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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
86 ४. सुनंदा चौके म¤ बैठी िकसका इंतजार कर रही थी ?
(क) दीना (ख) सुरेश (ग) जयराज (घ) कािलंदीचरण
५. जयराज को कहां से आमंýण आया था ?
(क) िकशनपुर (ख) रामपुर (ग) िबलासपुर (घ) हरीपुर
६. जयराज ने अजनबी आदमी से कहां का िटकट लाने कì गुजाåरश कì ?
(क) िकशनपुर (ख) रामपुर (ग) हरीपुर (घ) िबलासपुर
७. हरीपुर म¤ जयराज से कौन िमला ?
(क) दशªना (ख) सुनयना (ग) सुलोचना (घ) सुदशªना
८. सभा म¤ Öवागत गान िकसके Ĭारा िदया गया ?
(क) सुनयना (ख) सुलोचना (ग) दशªना (घ) सुदशªना
७.८ लघु°रीय ÿij १. एक रात कहानी कì सुदशªना
२. जयराज का अंतĬ«द
३. एक रात कहानी का उĥेÔय
४. पÂनी कहानी का मूल मंतÓय
५. कािलंदीचरण के चåरý कì िवशेषताएँ
६. सुनंदा का ĬंĬ
७.९ बोध ÿij १. 'एक रात' कहानी के आधार पर जयराज के अंतĬ«द को ÖपĶ कìिजए ?
२. 'एक रात' कहानी के आधार पर सुदशªना का चåरý िचýण कìिजए ?
३. 'एक रात' कहानी कì संवेदना का िवÖतृत िवĴेषण कìिजए ?
४. कहानी 'पÂनी' का सारांश अपने शÊदŌ म¤ ÖपĶ कìिजए ?
५. कहानी 'पÂनी' के आधार पर सुनंदा के चåरý का िवĴेषण कìिजए ?
६. समकालीन ľी जीवन के यथाथª के संदभª म¤ 'पÂनी' कहानी का मूÐयांकन कìिजए ?


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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ
कहानी - पाजेब और इनाम
इकाई कì łपरेखा
८.० इकाई का उĥेÔय
८.१ ÿÖतावना
८.२ पाजेब
८. २.१ पाजेब कहानी : मूल संवेदना
८. २.२ पाजेब कहानी का िवĴेषण
८.३ इनाम
८.३.१ कहानी इनाम : मूल संवेदना
८.३.२ इनाम कहानी का िवĴेषण
८.४ सारांश
८.५ उदाहरण Óया´या
८.६ वैकिÐपक ÿij
८.७ लघु°रीय ÿij
८.८ बोध ÿij
८.९ अÅययन हेतु सहयोगी पुÖतक¤
८.० इकाई का उĥेÔय जैन¤þ कì कहािनयŌ पर आधाåरत इकाई - ४ के अंतगªत 'पाजेब' और 'इनाम' कहािनयŌ का
िवĴेषण एवं मूÐयांकन िकया गया है । जैन¤þ िविभÆन सामािजक , पाåरवाåरक और Óयिĉगत
समÖयाओं को एक अलग ŀिĶकोण से देखने के हामी रहे ह§ । एक कहानीकार के łप म¤ यह
उनकì िविशĶता है िक वे समÖयाओं के मनोवै²ािनक प± को अÂयंत महÂवपूणª ढंग से
उभरते और िचिýत करते ह§ । 'पाजेब' और 'इनाम' दोनŌ कहािनयाँ अलग-अलग
संवेदनाÂमक पृķभूिम कì कहािनयाँ ह§ । परंतु समान ढंग से दोनŌ कहािनयŌ के क¤þ म¤ ब¸चŌ
का मनोवै²ािनक प± है । 'पाजेब' कहानी जहाँ पाजेब खोने कì घटना से जुड़ी हòई है और
इस घटना के मĥेनजर ब¸चŌ के Óयवहार को जैन¤þ ने िचिýत िकया है, वहé 'इनाम' कहानी
कì संवेदना अÂयंत गंभीर है और ऐसी समÖयाओं के ब¸चŌ पर पड़ने वाले मनोवै²ािनक
ÿभावŌ का जैन¤þ ने कुशलतापूवªक िचýण िकया है । इन दोनŌ कहािनयŌ के अÅययन से हम
जैन¤þ कì संवेदनाÂमक पåरिध और िवĴेषण ±मता - दोनŌ के संदभª म¤ और अिधक अनुभव
हािसल कर¤गे । दोनŌ कहािनयŌ का िवशद िवĴेषण आगे के पृķŌ म¤ हम देख¤गे ।
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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
88 ८.१ ÿÖतावना पहले कì इकाइयŌ म¤ भी चचाª कर आए ह§ िक जैन¤þ एक िविशĶ भावबोध के साथ िहंदी
कहानी के ±ेý म¤ ÿिवĶ हòए थे । उनके लेखन के क¤þ म¤ Óयिĉ और समाज कì मनोवै²ािनक
ŀिĶ से देखी गई स¸चाईयाँ िनिहत थé । जैन¤þ कì ŀिĶ देश और राÕů कì अपे±ा घर और
पåरवार म¤ ºयादा ÿखर ढंग से िटकती है । वहां के सुख-दुख और उनके पीछे िनिहत
मनोवै²ािनक सÂय का उĤाटन करना उनकì सजªना कì िवशेषता और शिĉ रहा है । वैसे
तो उनका िÿय िवषय ÿेम और दांपÂय आधाåरत िविवध दशाएँ रही ह§, िजन पर उÆहŌने
ÿभूत माýा म¤ कहािनयŌ और उपÆयासŌ कì रचना कì है, परंतु जीवन के अÆय ±ेýŌ पर भी
उनकì ŀिĶ गई है । िवशेष Łप से कुछ कहािनयाँ उÆहŌने ब¸चŌ के Óयवहार को क¤þ म¤
रखकर िलखी ह§ । ऐसी ही कहािनयŌ म¤ 'पाजेब' और 'इनाम' कहािनयाँ भी सिÌमिलत ह§ ।
यह दोनŌ ही कहािनयाँ अलग-अलग संवेदना बोध को लेकर िवकिसत हòई ह§ । इन कहािनयŌ
के माÅयम से जैन¤þ कì सजªना के इस आयाम को भी देखने का ÿयास होगा । इन
कहािनयŌ म¤ उÆहŌने बाल मनोÓयवहार कì िविवध दशाओं को अÂयंत सफलतापूवªक अंिकत
िकया है । Óयवहाåरक ŀिĶ से देखने पर यह हमारे आपके बीच के घरŌ और पåरवारŌ के बीच
घटी घटना और ÿसंग कì तरह िदखाई पड़ता है । जैन¤þ कì कहािनयŌ म¤ एक सहज ÿवाह
लि±त िकया जा सकता है । उनकì कहािनयाँ घटनाøम को बेहद ÿवाहपूणª ढंग से बयान
करते हòए आगे बढ़ती ह§ । ÿसंगŌ को कहé भी बोिझल नहé होने देती ह§ । अवांतर वणªन या
िवĴेषण से वे बचते ह§ । उनकì कहािनयŌ म¤ भाषा का सुķò ÿयोग अÂयंत साथªक ढंग से
देखने को िमलता है । यथासंभव छोटे-छोटे वा³यŌ म¤ ºयादा से ºयादा अथª Åविनत होता है
। जैन¤þ कì िवशेषता है िक वे कहानी कहते-कहते अÂयंत गंभीर िवचार -सूý भी देते चलते ह§,
जो कहानी समाĮ हो जाने के बाद भी पाठकŌ को सोचने पर िववश करते ह§, उĬेिलत करते
ह§ । आगे के पृķŌ म¤ इन कहािनयŌ का िवÖतृत िवĴेषण िकया जाएगा ।
८.२ पाजेब ८.२.१ 'पाजेब' कहानी : मूल संवेदना:
'पाजेब' कहानी जैन¤þ कì अÂयंत महÂवपूणª कहािनयŌ म¤ शुमार कì जाती है । जिटल बाल
मनोिव²ान के सूýŌ को समझने कì ŀिĶ से यह कहानी अपने आप म¤ अनोखी कहानी है ।
कहानी कì मु´य संवेदना पाजेब खोने और उसके िमलने कì घटना से जुड़ी हòई है और इस
बीच म¤ समÖत कायª Óयापार को जैन¤þ ने अÂयंत सहज तरीके से विणªत िकया है । चार
वषêय ब¸ची मुÆनी कì पाजेब खो जाती है और उसे खोजने के øम म¤ तमाम लोगŌ पर संदेह
Óयĉ िकया जाता है । कभी बंसी नौकर , तो कभी आशुतोष और कभी छुÆनू । और पाजेब
इन म¤ से िकसी ने नहé ली होती । इस पूरी खोजबीन कì ÿिøया म¤ जैन¤þ ने आशुतोष और
छुÆनू के Ĭारा ऐसी समÖयाओं के ÿित ब¸चŌ कì िविशĶ सोच और Óयवहा र को अÂयंत
कुशलतापूवªक विणªत िकया है । पाजेब न तो आशुतोष ने ली और न छुÆनू ने, पर ये दोनŌ
इस पूछताछ से सकते म¤ थे । उÆह¤ यह उÌमीद नहé थी िक पाजेब के िलए इस तरह बहला -
फुसलाकर उनसे पूछा जाएगा और उÆह¤ कठघरे म¤ देखा जाएगा । आरंभ म¤ वे पाजेब के बारे
म¤ कोई जानकारी होने से इंकार भी करते ह§, परंतु बार-बार पूछे जाने पर वह अलग-अलग
तरह के जवाब से सभी को भटकाना शुł कर देते ह§ । आशुतोष कì मन:िÖथित तो यह थी munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - पाजेब और इनाम
89 िक उससे िजसका भी नाम लेकर पूछा जाता था िक, ³या पाजेब फलां को दी है, वह
Öवीकार कर लेता था । इसी िसलिसले म¤ उसने छुÆनू का भी नाम ले िलया । छुÆनू ने
उलटकर आशुतोष पर इÐजाम प³का कर िदया । जबिक वाÖतिवकता यह थी िक पाजेब
बुआ के साथ ही धोखे से चली गई थी और अगली बार बुआ के आने पर वह पाजेब िमल
गयी । परंतु बीच का समÖत घटनाøम , जहाँ एक तरफ हाÖय का सृजन करता है, वहé
दूसरी तरफ ब¸चŌ के Óयवहार के संबंध म¤ भी िविशĶ संकेत करता है । कहानी कì मूल
संवेदना ब¸चŌ के इसी Óयवहार पर आधाåरत है ।
८.२.२ 'पाजेब' कहानी का िवĴेषण:
पाजेब कहानी बेहद हÐकì -फुÐकì और भीतर तक गुदगुदा देने वाली कहानी है । मन से
खेलना जैन¤þ का सबसे िÿय शगल है और यहé से वे अपनी कहािनयŌ के िवषय म¤ ढूंढकर
लाते ह§ । 'पाजेब' कहानी म¤ उÆहŌने एक छोटी सी घटना को िजस तरह शÊदŌ म¤ गूंथा है,
उससे बालमन के कई रंगŌ का आभास िमलता है । ब¸चŌ का मन और ÿकृित समझ पाना
भी बड़ी टेढ़ी खीर है । सीधे राÖते को वे अपनी चंचल ÿकृित से िकस ओर घुमा द¤, कुछ
पता नहé चलता । यह कहानी पाजेब खो जाने कì एक छोटी सी घटना से आरंभ होती है
और कई मोड़ मुड़ती हòई जब अपने अंत पर पहòंचती है, तो पाठक िबना हंसे नहé रह पाता ।
जैन¤þ कì ÿकृित गंभीर िवषयŌ को उठाने और उÆह¤ एक नया ŀिĶकोण देने कì रही है ।
परंतु पाजेब जैसी कहािनयां िलखने म¤ भी वे समथª ह§, यह िसĦ हो जाता है । यह कहानी
ब¸चŌ के साथ-साथ बड़Ō के मानिसक रीतेपन को भी ÖपĶ करती है ।
चार बरस कì मुÆनी पाजेब पहनने कì िजद ले बैठती है । उसकì फरमाइश पर सभी उसे
समझाते ह§, परंतु मुÆनी का सौभाµय िक, घर म¤ बुआ का आगमन होता है और अपनी वही
फरमाइश वह बुआ से कहती है । बुआ उसे आĵासन देकर जाती है िक अगले रिववार जब
वह आएगी तो उसके िलए पाजेब लेकर आएगी । अगले रिववार मुÆनी कì पाजेब आ जाती है
और चार लिड़यŌ कì पाजेब पहनकर मुÆनी घर-पड़ोस म¤ इठलाती , सबको िदखाती घूमती है
। अपनी सहेिलयŌ Łकिमन , शीला सबको पाजेब िदखाई गई । कहानी म¤ तनाव तब आरंभ
होता है, जब रात म¤ मुÆनी कì मां पाजेब संभाल कर रखने के िलए मुÆनी के पैरŌ से पाजेब
खोलती है । उसका जी धक से रह जाता है ³यŌिक मुÆनी के पैर म¤ तो एक पाजेब थी ही
नहé । बस, यहé से कहानी का वाÖतिवक रस आरंभ होता है । पाजेब ढूंढने कì ÿिøया शुł
होती है ।
मुÆनी कì पाजेब आयी तो उसका भाई आशुतोष कैसे Łक जाता । उसने भी साइिकल कì
फरमाइश कì और इस आĵासन पर माना िक अगले जÆमिदन पर उसे साइिकल जłर
िमलेगी । ब¸चŌ म¤ यह ÿकृित बड़ी सामाÆय सी है, एक को कुछ िमलने पर दूसरा भी उसी
आशा से आशािÆवत रहता है । इससे पहले िक साइिकल का कुछ होता पाजेब कì समÖया
खड़ी हो गई । मुÆनी के माता-िपता तरह-तरह के कयासŌ म¤ डूबने-उतराने लगे । कभी उÆह¤
लगता िक पाजेब नौकर बंसी ने िनकाली है, कभी कुछ । इस तरह तÉतीश आरंभ हòई । पूरे
घर म¤ डटकर पाजेब खोज ली गई और अंततः नहé िमली । संदेह कì सुई आशुतोष कì
तरफ घूमी, कारण िक उसी शाम आशुतोष पतंग और डोर का नया बंडल लाया था और
इसी पर दोषारोपण शुł हो गया । मुÆनी कì माँ ने मुÆनी के िपता से कहा, "यह तुम ही हो munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
90 िजसने पतंग कì उसे इजाजत दी । बस, सारे िदन पतंग-पतंग, यह नहé िक कभी उसे
िबठाकर सबक कì भी कोई बात पूछो । म§ सोचती हóँ िक एक िदन तोड़-ताड़ दूँ उसकì सब
डोर और पतंग ।" अगले िदन सुबह आशुतोष से पूछताछ आरंभ हòई ।
बात आशुतोष पर आई तो िपता सोचने लगे, "मेरे मन म¤ उस समय तरह-तरह के िसĦांत
आए । म§ने िÖथर िकया िक अपराध के ÿित कŁणा ही होनी चािहए । रोष का अिधकार
नहé है । ÿेम से ही अपराध वृि° को जीता जा सकता है । आतंक से उसे दबाना ठीक नहé
है । बालक का Öवभाव कोमल होता है और सदा ही उससे Öनेह से Óयवहार करना चािहए
।" पर सारे िसĦांत एक तरफ । पाजेब जब आशुतोष ने ली हो, तब तो उसके पास िमले ।
पूछताछ पर जैसे उसे कुछ समझ ही नहé आया । िबना बात के ही इÐजाम पर उसे øोध
भी आया । इस अपमान पर उसके आंसू भी भर आए । मां और िपता कì पाजेब को लेकर
िचंता एक तरफ और आशुतोष कì मानिसक Óयथा दूसरी तरफ । मां-िपता कई तरह कì
आशंकाओं से भरे हòए थे । सोच रहे थे, "मुझे यह एक भारी दुघªटना मालूम होती थी ।
मालूम होता था िक अगर आशुतोष ने चोरी कì है तो उसका इतना दोष नहé है; बिÐक यह
हमारे ऊपर बड़ा भारी इÐजाम है । ब¸चे म¤ चोरी कì आदत भयावह हो सकती है । लेिकन
ब¸चे के िलए वैसी लाचारी उपिÖथत हो आयी, यह और भी कहé भयावह है । यह हमारी
आलोचना है । हम उस चोरी से बरी नहé हो सकते ।" इस तरह कहानी के अलग-अलग
पाý अपने-अपने ŀिĶकोण से इस घटना को सुलझाने म¤ लगे हòए थे । आशुतोष कì
मानिसक िÖथित यह थी िक उससे जो भी कहा जाता वह उसे ही Öवीकार कर लेता । पूछने
पर िक 'पाजेब तुमने छूÆनू को दी है न ?' उसने िसर िहला िदया और अपनी जान छुड़ाने कì
सोची पर अभी जान छूटनी कहां थी ? छुÆनू से पूछा गया तो वह आशुतोष से भी आगे
िनकला । आशुतोष के माता-िपता ने छुÆनू कì मां से पूछा तो उसने अÖवीकार जािहर िकया
। इस तरह पाजेब कì तÜतीश आगे बढ़ती रही । मामला आगे बढ़ता देख छुÆनू ने एक नई
कहानी गढ़ दी िक "पाजेब आशुतोष के हाथ म¤ म§ने देखी थी और वह पतंग वाले को दे आया
है । म§ने खूब देखी थी, वह चांदी कì थी ।"
पाजेब कì चोरी म¤ अब एक नया अिभयुĉ शािमल हो गया और वह था पतंग वाला । मुÆनी
कì मां ने अपने पूरे तंý का ÿयोग करके सूचना इकęी कì और जब शाम को पित दÉतर से
लौटे तो बताया िक "आशुतोष ने सब बतला िदया है । µयारह आने पैसे म¤ वह पाजेब, पतंग
वाले को दे दी है । पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे ह§ । पांच आने जो िदए वह छुÆनू
के पास ह§ । इस तरह र°ी-र°ी बात उसने कह दी है ।" पाजेब कì घटना अभी यहé समाĮ
नहé हòई । कशमकश आशुतोष और अÆय लोगŌ के बीच चलती रही । पाजेब कì इस घटना
से पूरा घर अÖत-ÓयÖत और सारे लोग परेशान । आशुतोष और छुÆनू, पाजेब न लेते हòए भी
समझ नहé पा रहे थे िक आिखर उनसे इस कदर पूछ-ताछ ³यŌ हो रही है । और पूछने पर
कुछ-न-कुछ कहना ही पड़ता है, सो वे सच बात कहने के बजाय भटकाते जा रहे थे । पता
नहé, शायद उÆह¤ ऐसा लग रहा था िक उनके सच को कोई Öवीकार नहé करेगा िक पाजेब
उन लोगŌ ने नहé ली है । अंततः पाजेब िमलती है पर कहानीकार िजस ढंग से पाजेब कì
गुÂथी को सुलझाता है, उसम¤ सब ठगे से रह जाते ह§ । अगली बार जब बुआ आई तो वही
पाजेब ढूंढने का ÿसंग चल रहा था और आशुतोष को एक Łपये देकर पतंगवाले से पाजेब
लाने कì जĥोजहद चल रही थी । आशुतोष को भेजकर जब िपताजी बुआ के पास बैठे, तब
बुआ ने बात बताते हòए बाÖकेट कì जेब म¤ से पाजेब िनकालकर सामने रख दी और बोली munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - पाजेब और इनाम
91 िक "उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ ही चली गई थी ।" इस तरह पाजेब कì खोज
पूरी होती है । जैन¤þ ने इस पूरी ÿिøया का वणªन बेहद चुटीले ढंग से िकया है ।
पाजेब कहानी बाल-मनोÓयवहार के िवĴेषण कì ŀिĶ से अÂयंत उÐलेखनीय कहानी है ।
िहंदी म¤ कम ही कहानीकार Óयवहार म¤ ढली हòई पाजेब सरीखी रचनाएँ िलख सके ह§ । जैन¤þ
ने इस कहानी म¤ आशुतोष और छुÆनू आिद पाýŌ के माÅयम से इस पूरी ÿिøया को छोटे-
छोटे संवादŌ के माÅयम से िजस तरह चुटीले अंदाज म¤ ढाला है, वह अपने आप म¤ अÂयंत
िविशĶ है । कहानी पढ़ते हòए आशुतोष के साथ ÿÂयेक पाठक कì सवाªिधक सहानुभूित
जुड़ती है । एक बालक िजसने वह कृÂय िकया ही नहé है, परंतु बार-बार उसे इस संदभª म¤
पूछताछ का सामना करना पड़ता है । तो ऐसे म¤ वह अपनी नकार के बावजूद यह समझा
पाने म¤ असफल रहता है िक पाजेब उसने नहé ली । इसके बाद वह िकस ढंग से पूरे
घटनाøम को अलग-अलग मोड़ देता रहता है और अंत म¤ जब वह पाजेब बुआ के पास
िमलती है, तो पाठक भी हतÿभ रह जाता है और आशुतोष का Óयवहार उसे आIJयªचिकत
कर देता है । िनिIJत łप से बाल-मनस को अिभÓयĉ करने कì ŀिĶ से यह अÂयंत
उÐलेखनीय कहानी है ।
८.२.१ इनाम कहानी : मूल संवेदना:
'इनाम' कहानी धनंजय के łप म¤, समÖया िवशेष के सामने एक ब¸चे कì सोच-समझ और
ÿितिøया को भली ÿकार से दशाªने वाली कहानी है । कहानी के क¤þ म¤ धनंजय है । धनंजय
के माता-िपता के बीच संदेह के कारण सब कुछ ठीक नहé है । इन िÖथितयŌ म¤ वातावरण
³लेषमय बना रहता है । धनंजय कì मां को उसके िपता का एक अÆय पाý, ÿिमला से
िमलना -जुलना जरा भी नहé भाता और इसी के चलते वह लगातार तनाव म¤ रहती ह§ । और
उनका Óयवहार संयत नहé होता । िजसका दुÕÿभाव धनंजय को सबसे ºयादा भोगना पड़ता
है । िकसी भी पåरवार म¤ इस तरह कì समÖयाएँ बेहद आम होती ह§ । कोई भी िववािहत ľी
अपने पित को िकसी दूसरी ľी के साथ बोलते-हंसते देखकर सह नहé पाती । परंतु यह
संदेह सदैव सही हो, ऐसा भी नहé है । कभी-कभी शक कì बुिनयाद पर Óयथª म¤ ही जीवन
तनावपूणª हो जाता है । परंतु ऐसी िÖथितयŌ के चलते सबसे बड़ा दंड पåरवार के छोटे ब¸चŌ
को भुगतना पड़ता है । समÖया उनकì समझ म¤ नहé आती, माता-िपता के अनावÔयक
िचड़िचड़े Óयवहार का कारण उÆह¤ समझ म¤ नहé आता । परंतु धनंजय के łप म¤ जैन¤þ ने
एक बेहद सुलझे हòए पाý कì सृिĶ कì है । सातवé ³लास म¤ अÓवल आने के बाद धनंजय
इनाम म¤ ÿिमला से उसके घर न आने कì बात कहता है, ³यŌिक वह जानता है िक समÖया
का कारण वही है । उă कम होने के बावजूद वह जानता है िक उसकì मां का लगातार तनाव
म¤ रहना और संयत Óयवहार न करना , िकस कारण से हो रहा है ? बालक उस पीड़ा से Öवयं
भी मुĉ होना चाहता है और अपने पåरवार को भी मुĉ करना चाहता है । जैन¤þ ने इस
कहानी म¤ धनंजय के माÅयम से ब¸चŌ के मनोÓयवहार को सफलतापूवªक अंिकत िकया है ।
८.२.२ इनाम कहानी का िवĴेषण:
जीवन कì छोटी-छोटी खुिशयाँ और दुख Óयĉ करने म¤ कथाकार जैन¤þ िसĦहÖत ह§ ।
उनकì कहािनयां पåरवार और पड़ोस कì Óयथा-कथाएँ ह§ । हमारे रोजमराª के जीवन म¤
घटने वाली तमाम घटनाएँ, िजÆह¤ जीने के हम आदी हो जाते ह§, जैन¤þ वहé से अपनी munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
92 कहािनयŌ के िवषय िनकाल लाते ह§ । पåरवार , ÿÂयेक सदÖय के एक-दूसरे से समायोजन का
नाम है । पåरवार के भीतर रहने वाले सभी सदÖय एक-दूसरे कì जłरतŌ और सुख-दुख के
सहभागी होते ह§, िजससे जीवन जीना बेहद आसान हो जाता है । पर कई बार छोटे-छोटे
शक और संदेह पåरवार के सुख को िछÆन-िभÆन कर देते ह§ । एक दूसरे के संबंध को
उदारता कì ŀिĶ से देखने कì आवÔयकता होती है । संकुिचत ŀिĶकोण कई बार पåरवार के
सुख-चैन को िछÆन-िभÆन करने का कारण बन जाता है । इनाम कहानी इसी ŀिĶ को सामने
रखकर िलखी गई कहानी ÿतीत होती है ।
सातवé क±ा म¤ अÓवल Öथान पर आने कì खुशी लेकर धनंजय घर वापस आता है और
आते ही मां से अपनी खुशी घोिषत करते हòए बताता है िक अÌमा म§ पास हो गया हóँ । अपने
रोजमराª के कामŌ म¤ ÓयÖत माँ उसकì बात को आए-गए तरीके से सुनकर िचंता Óयĉ करते
हòए उलाहना देती है, "कुछ खा ले सवेरे ही चला गया िबना कुछ खाए िपए सुना ही नहé हां
तो अब आया है ९:०० बजे ।" धनंजय के िलए यह बड़ी खुशी थी और वह यह खुशी अपने
िपता से भी बांटना चाहता था । पर िपता आज दÉतर कुछ जÐदी िनकल गए । धनंजय कì
मां इन खुिशयŌ म¤ खुश नहé है, ऐसा नहé था, पर उसके भीतर एक गहन उदासी है और इस
उदासी का ÿभाव पूरे पåरवार पर छाया हòआ है । धनंजय इसे भली-भांित महसूस करता है ।
उसकì मां कì उदासी का कारण ÿिमला है । मां को ÿिमला और धनंजय के िपता का
िमलना -जुलना अ¸छा नहé लगता । इस िमलने-जुलने से उसे अपनी गृहÖथी पर आँच आती
महसूस होती है । और यह खटक चौबीस घंटे मां के भीतर चलती रहती है । इसी कारण वह
हमेशा गुÖसे म¤ रहती है और धनंजय मां के इस िचड़िचड़े Óयवहार के कारण हमेशा सतकª
िÖथित म¤ रहता है । वैसे इस तरीके से कोई बात नहé कह पाता । िपता के साथ संबंधŌ म¤ वह
िजतनी सहजता महसूस करता है, उतनी मां से नहé । धनंजय कì उă बेपरवाह खेलने-
कूदने कì है , पर वह अपनी उă से कुछ ºयादा ही समझदार है और मां कì तकलीफ से
वािकफ है । वह चाहता है िक यह तकलीफ िजतनी जÐदी -से-जÐदी हो सके, दूर हो । घर के
कलहपूणª वातावरण ने उसके भीतर कì चंचलता को जैसे ±ीण कर िदया है और उसम¤
अजीब सी उă से बड़ी समझ पैदा हो गई है । मां भी धनंजय के Óयवहार से ऐसा ही महसूस
करती है, "यह लड़का उसकì समझ से बाहर हòआ जा रहा है । कभी लड़के जैसा रहता ही
नहé, मानो एकदम सयाना -बुजुगª हो । तब वह डर आती है, जैसे अपने पर पछतावा हो ।
और उस समय उस बुजुगª से बात छेड़ने का कोई उपाय भी नहé रह जाता । उसम¤ सहसा
मातृ-भावना उमड़ती है । पर उसे ÿकाशन का कोई अवकाश नहé िमल पाता । पåरणामतः
उठी सहानुभूित रोष बन आती है ।"
सातव¤ दज¥ म¤ अÓवल आना धनंजय के िलए एक बड़ी खुशी है और यह खुशी िपता के िलए
भी उतनी ही बड़ी है । िनिIJत łप से माँ भी बहòत खुश है परंतु उसकì संकुिचत सोच के
चलते जो एक उदासी उसने अपने चारŌ तरफ ओढ़ रखी है, यह खुशी उस उदासी म¤ कहé
समा गई है । धनंजय पास होने कì खुशी बांटने के िलए ÿिमला के पास जाना चाहता है, पर
मां उसे अनुमित नहé देती । मां जानती है िक यिद यह बाहर जाएगा तो ÿिमला के पास
जłर जाएगा । बालक िपताजी के कहे अनुसार अÓवल आने कì िमठाई सबको िखलाना
चाहता है, पर माँ कì अनुमित नहé है । िपता का नाम लेने पर माँ और िचढ़ती है और कहती
है, "िपताजी ने कहा था । आए बड़े िपताजी ! िमठाई िखलाएंगे ! घरवालŌ को पहले रोटी तो
िखला ल¤ । यŌ बस लुटाना आता है ! नहé, कोई नहé । बैठ यहé कोने म¤ और अपना काम munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - पाजेब और इनाम
93 देख ।" मां और िपता के ĬÆĬ म¤ धनंजय कì िÖथित कुछ ठीक नहé है । हमेशा पåरवार म¤
पित-पÂनी, दो पिहयŌ के समान होते ह§ । यिद यह संतुिलत होते ह§ तो पåरवार म¤ सबकुछ
ठीक िÖथित म¤ रहता है, परंतु इनके तालमेल म¤ गड़बड़ी आने पर पåरवार म¤ सब कुछ
बािधत होता है । इस बाधा का फकª आिखरकार सब पर पड़ता है । धनंजय भी इसका
अपवाद नहé था । घर के तनावपूणª वातावरण का ÿभाव उस पर भी पड़ रहा था । मां कì
िÖथित भी अजब थी, बेटे पर उसे गवª था पर िपता से उतनी ही िचढ़ । पता नहé, उसके
संदेह म¤ िकतनी स¸चाई थी । पर उस संदेह कì वजह से पåरवार का सुख-चैन िकस कदर
ÿभािवत होता है । यह कहानीकर ने भली-भांित िचिýत िकया है ।
भारतीय गृिहणी कì कमोबेश यही िÖथित है । घर गृहÖथी के तनाव अपनी जगह और शक
कì ÿवृि° कì वजह से पैदा हòए इस तरह के तनाव दूसरी तरफ और इनके बीच म¤ िपसती
वह गृिहणी । पित पर तो उसका वश नहé चलता पर अÆय दूसरŌ पर यह सारा तनाव बह-
बहकर िनकलता है । धनंजय बार-बार बाहर जाकर िमठाई िखलाने कì िजद करता है और
मां ÖपĶ łप से पूछती है िक वहé जा रहा था न, मतलब ÿिमला के पास और जब धनंजय
सच बोलता है तो खासी मरÌमत भी होती है । मां कì मानिसक दशा यह है िक, "सोचने लगी
िक यही उसका भाµय है । घर म¤ एक वह है और उसका काम । काम कì एक संगी है । एक
रोज इसी म¤ मर जाना है । बाकì तो सब बैरी ह§ । मुझे तो मौत आ जाए तो भला ! एक वह ह§
िक सवेरे छाता उठाया और चल िदए और शाम को आए िक सब िकया िमले । एक म§ कłं
और म§ ही मłँ । और मरने को म§, मौज करने को चाहे कोई दूसरी..... और एक यह है
कमब´त । मुझे तो िगनता ही नहé, बस सदा उनके कहने म¤ । घर ³या जेल है ? एक उसने
बांध रखा है । नहé तो जहां होती चली जाती, मगर यहां का मुंह न देखती, न दाना लेती न
पानी । पर यह छोकरा ऐसा बेहया है िक..." इस तरह मां के øोध का िशकार धनंजय होता
है बालक िनिIJत łप से घर कì असहज िÖथितयŌ को देखकर तनाव महसूस करता है शान
होती है िपता आते ह§ और थोड़ी देर बाद पीछे पीछे घर म¤ ÿिमला का भी आगमन होता है
ÿिमला िमठाई के साथ घर म¤ आती है । ÿिमला के िपता भी घर के वातावरण से पåरिचत ह§।
रोज-रोज के तनाव से पåरिचत ह§ । ÿिमला के आने पर उÆह¤ संकोच हो आता है और
धनंजय कì मां भी भीतर से एक-एक खबर लेने के ÿयास म¤ लगी रहती है । ÿिमला के पूछने
पर िक बता और ³या इनाम लेगा ? धनंजय उससे पूछता है, "मांगूंगा तो दोगी ?" ÿिमला के
आĵासन देने पर वह बोला, "देखो टालना मत । मेरा इनाम यह है िक इस घर म¤ तुम अब से
कभी न आना । तुम मुझे Èयार करती हो न ?" धनंजय कì इस मांग पर सब असहज हो जाते
ह§ । धनंजय अपने िपता से भी यही चाहता है िक वह ÿिमला से कभी न िमल¤ और इससे
पहले कì ÿिमला और धनंजय के िपता कुछ समझ पाते, यह बात सुनकर जैसे उसकì मां के
मन का सारा मैल धुल जाता है । िÖथित को संभालते हòए वह अपने भावŌ को छुपाते हòए
ÿिमला से कहती है िक "बड़े िदनŌ म¤ आयी हो । बैठो, तुम भी चखो न यह खुशी कì िमठाई !"
और इस तरह पåरवार पर छाया हòआ अवसाद छँट जाता है ।
इस तरह जैन¤þ ने 'इनाम' कहानी म¤, घर के नकाराÂमक वातावरण का एक ब¸चे कì
मनोदशा पर ³या असर पड़ता है, इसका साथªक िचýण िकया है । इनाम कहानी का िवषय,
हर घर, गली और पड़ोस का हो सकता है । जैन¤þ कì िविशĶ ता अपने समय म¤ इस बात को
लेकर उÐलेखनीय है िक उस दौर म¤ जब कहानी कì संवेदना समाज और Óयापक राÕůीय munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
94 उĥेÔयŌ के साथ जुड़ी हòई थी, जैन¤þ कì ŀिĶ ऐसे िवषयŌ कì ओर गयी जो Óयिĉ और
पåरवार कì ŀिĶ से बेहद महÂवपूणª थे । उनको सामने लाना भी सािहÂय कì ही िजÌमेदारी
थी । जैन¤þ ने िवषय नवीनता के कारण ऐसे िवषयŌ का चयन नहé िकया बिÐक उनकì
Öवाभािवक łिच इस ओर थी । Óयिĉ के मनोजगत का िवĴेषण उनका िÿय शगल था और
इसीिलए उÆहŌने अलग-अलग संवेदनाÂमक पहलुओं को उठाकर मनोवै²ािनक ŀिĶ से
उनका िवĴेषण सािहÂय म¤ उपिÖथत िकया । जैन¤þ के सृजन से, िहंदी सािहÂय को एक नई
धारा और िचंतन कì एक सवªथा नवीन ŀिĶ िमली ।
८.४ सारांश इस इकाई के अंतगªत जैन¤þ कì दो अÂयंत िविशĶ कहािनयŌ 'पाजेब' और 'इनाम' का
अÅययन िकया गया है । जैन¤þ कì खास łिच िविभÆन घटनाओं और समÖयाओं के
मनोवै²ािनक कारणŌ और ÿभावŌ को िचिýत करने म¤ रमती है । 'पाजेब' कहानी , पाजेब खो
जाने और उसके ढूंढने कì ÿिøया पर आधाåरत कहानी है । अपने सरल, Öफूतª हाÖय के
चलते यह कहानी अÂयंत Łिचकर बन जाती है । कहानी म¤ पाजेब के खोने और उसके
िमलने के बीच के घटनाøम के माÅयम से जैन¤þ ने बाल मनोिव²ान कì िविशĶ दशाओं का
उĤाटन िकया है ।
पाजेब खोई नहé थी बिÐक वह धोखे से अनायास ही बुआ के साथ वापस चली गई थी,
िजसे अगले हÉते आने पर बुआ साथ लेकर आती है और वापस कर देती है । परंतु इस
बीच पाजेब ढूंढने के øम म¤ आशुतोष, छुÆनू आिद पाýŌ के साथ जो कशमकश और
जĥोजहद चलती है, उससे बालकŌ कì िविशĶ मनोदशा को जैन¤þ ने िचिýत िकया है ।
पाजेब न िलए होने के बावजूद, इनकार िकए जाने के बावजूद, आशुतोष से बार-बार बहला -
फुसलाकर यह आúह िकया जाता है, िक पाजेब उसने ली है और वह बता दे िक वह पाजेब
उसने िकसे दे दी या उसका ³या िकया ? आशुतोष समझ नहé पाता िक वह इस बार-बार
के दबाव पर ³या उ°र दे । पहले तो वह इंकार करता है । िफर जब ºयादा पूछताछ होती है
तो वह छुÆनू का नाम ले लेता है । घर के सारे लोगŌ का Åयान छुÆनू कì ओर क¤िþत हो जाता
है । वहां भी वही दशा होती है । छुÆनू भी मनगढ़ंत तरीके से यहां-वहां के उ°र देकर
बहलाता रहता है । वाÖतव म¤ दोनŌ दोÖतŌ को ही नहé पता कì पाजेब कहां है । हैरानी और
परेशानी से बचने के िलए वे नए-नए तकª गढ़ते ह§ और िफर उÆहé म¤ फंसते चले जाते ह§ ।
अपने भोलेपन के कारण वे बेचारे अपनी बात समझा पाने म¤ अ±म रहते ह§ और अंत म¤ जब
पाजेब बुआ के पास िमलती है, तो माता िपता ठगे से खड़े रह जाते ह§ । ³या ÿितिøया द¤,
यह भी नहé समझ पाते ह§ । ब¸चŌ के इस िविचý Óयवहार को कहानी ने अÂयंत तकªसंगत
ढंग से िचिýत िकया है । ब¸चे ³या सोचते ह§ ? ³या समझते ह§ ? यह जान पाना बड़ा
मुिÔकल है । पर अपने सरल भावबोध से वे गलत कायŎ कì ओर ÿेåरत नहé होते । यह
कहानी एक िविशĶ िÖथित को बड़े ही सहज और Öफूितªपरक ढंग से िचिýत कर सकì है ।
'इनाम' कहानी धनंजय और पाåरवाåरक वातावरण पर आधाåरत कहानी है । पåरवार म¤ जो
समÖयाएँ होती ह§, उनका ÿभाव िकस तरह बालकŌ पर पड़ता है, इसका अ¸छा िचýण इस
कहानी म¤ िकया गया है । धनंजय एक अ¸छा बालक है । पढ़ने-िलखने म¤ भी काफì होिशयार
है । बेहद संयत है । माता-िपता दोनŌ से उसे काफì Öनेह िमलता है । परंतु अपने घर कì एक munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - पाजेब और इनाम
95 Óयथª कì समÖया के कारण उस पर भी Óयथª दुÕÿभाव पड़ता है । धनंजय कì मां को धनंजय
के िपता का ÿिमला के साथ उठना बैठना पसंद नहé है और न ही वह चाहती है िक ÿिमला
उसके घर आए । धनंजय कì मां का यह संदेह िकतना सही है, या गलत है, यह बात तो
कहानी म¤ उतनी ÖपĶ नहé है परंतु इस संदेह के कारण पåरवार का वातावरण िकस कदर
तनावमय और अवसादमय होता है, यह इस कहानी म¤ िचिýत है । और इस वातावरण का
ÿभाव घर के ÿÂयेक सदÖय पर पड़ता है ।
ब¸चे बेहद संवेदनशील होते ह§ । भले ही वे जािहर न करते हŌ, परंतु घर कì हर छोटी-बड़ी
बात को भाँप लेने म¤ वे स±म होते ह§ और उन पर इन समÖयाओं का सकाराÂमक या
नकाराÂमक ÿभाव भी पड़ता है । धनंजय भीतर-ही-भीतर इन िÖथितयŌ के कारण Óयिथत
रहता है । वह अपनी मां या िपताजी से कुछ भी नहé कहता । पर इस वातावरण के चलते
एक घुटन लगातार उसके भीतर बनी रहती है । सातवé क±ा म¤ अÓवल आने कì खुशी भी
इस वातावरण कì भ¤ट चढ़ रही होती है । इतनी छोटी उă म¤ होने के बावजूद धनंजय
समझता है िक कलह का कारण ³या है ? और बात¤ वह समझता है या नहé समझता , नहé
कह सकते, परंतु वह यह जानता है िक मां कì Óयथा का कारण ÿिमला है और वह िकसी भी
सूरत म¤ यह चाहता है िक मां और िपता दोनŌ का Èयार उसे बराबर से िमले । उनके ĬÆĬ
और संघषª का वह खाÂमा करना चाहता है । इतने छोटे ब¸चे म¤ ऐसी भावना होती ही है ।
उसके िलए दोनŌ ही आवÔयक होते ह§ । इसीिलए जब इनाम कì बारी आती है, और ÿिमला
उससे पूछती है, तो वह इनाम म¤ ÿिमला के घर न आने कì बात कहता है और यही अपे±ा
उसे अपने िपता से भी है िक वे ÿिमला से न िमल¤ । यīिप कहानी के अंत म¤ जैन¤þ अÂयंत
सुलझे हòए ढंग से कहानी को समापन कì ओर ले गए ह§, परंतु यह कहानी ऐसी समÖयाओं
के ÿित ब¸चŌ पर पड़ने वाले नकाराÂमक असर और ÿभाव को महÂवपूणª ढंग से िचिýत
करती है ।
८.५ उदाहरण Óया´या Óया´या-अंश १: म§ कुछ बोला नहé । मेरा मन जाने कैसे गंभीर ÿेम के भाव से आशुतोष के
ÿित उमड़ रहा था । मुझे ऐसा मालूम होता था िक ठीक इस समय आशुतोष को हम¤ अपनी
सहानुभूित से वंिचत नहé करना चािहए । बिÐक कुछ अितåरĉ Öनेह इस समय बालक को
िमलना चािहए । मुझे यह एक भारी दुघªटना मालूम होती थी । मालूम होता था िक अगर
आशुतोष ने चोरी कì है तो उसका इतना दोष नहé है; बिÐक यह हमारे ऊपर बड़ा भारी
इÐजाम है । ब¸चे म¤ चोरी कì आदत भयावह हो सकती है । लेिकन ब¸चे के िलए वैसी
लाचारी उपिÖथत हो आयी, यह और भी कहé भयावह है । यह हमारी आलोचना है । हम
उस चोरी से बरी नहé हो सकते ।
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì ÿिसĦ कहानी 'पाजेब' से िलया गया है ।
ÿसंग: 'पाजेब' कहानी एक पाजेब के खो जाने और िफर उसे खोजने कì ÿिøया से गुजरने
कì कहानी है । इस ÿिøया म¤ ब¸चŌ के मनोÓयवहार का अ¸छा िवĴेषण जैन¤þ के Ĭारा
िकया गया है । पाजेब खोजने के दौरान ही माता-िपता को अपने पुý आशुतोष पर संदेह
होता है िक, हो-न-हो यह पाजेब इसी के Ĭारा ले ली गई है । ऐसे म¤ वे उस छोटे बालक पर munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
96 øोिधत होने के बजाय इस सोच म¤ पड़ जाते ह§ िक यिद पाजेब इसने ली भी है, तो कहé-न-
कहé वे भी इसके िलए िजÌमेदार ह§ । इÆहé समÖत संदभŎ का उÐलेख इस उĦरण के
अंतगªत िकया गया है ।
Óया´या: कहानी 'पाजेब', पाजेब खो जाने कì घटना का एक मनोरंजक आ´यान है । पर
इस मनोरंजन के पीछे कहानी म¤ कई मािमªक Öथल ह§ । इÆहé म¤ से एक Öथल है िजसम¤
आशुतोष पर संदेह कì िÖथित पैदा हो जाती है । और भरसक ÿयास िकया जाता है िक
पाजेब के बारे म¤ वह कोई बात बता दे । परंतु समÖया यह थी िक पाजेब आशुतोष के Ĭारा
नहé ली गई थी और इसीिलए वह ठीक-ठीक कुछ बोल नहé रहा था । बिÐक िकंकतªÓयिवमूढ़
िÖथित म¤ वह पåरिÖथित को समझ ही नहé पा रहा था । कई बार उसे खुद पर øोध आता
या वह चुप हो जाता या िफर उससे अगर िकसी का नाम लेकर पूछा जाता िक ³या तुमने
फलां को पाजेब दे दी है, तो वह उसे भी Öवीकार कर लेता । उसकì िÖथित अजीब सी हो
गई थी । वह बहòत अनमना सा रहने लगा था । ऐसी िÖथित म¤ आशुतोष के िपता यह िवचार
करते ह§ िक पाजेब ले ली, यह तो ठीक है परंतु ऐसी पåरिÖथितयां कैसे पैदा हो गई िक उसे
पाजेब लेनी पड़ गई । इससे उÆह¤ Öवयं शिम«दगी महसूस होती है । वह इसके िलए अपने को
िजÌमेदार समझते ह§ । उÆह¤ लगता है िक हमारे पालन पोषण म¤ आिखर ऐसी ³या कमी रह
गई थी िक आशुतोष को ऐसा कदम उठाना पड़ गया । आशुतोष कì उă बहòत कम थी, ऐसे
म¤ उसके िपता को पाजेब खोने का अफसोस तो था पर उससे ºयादा अफसोस आशुतोष
कì िÖथित को देखकर हो रहा था । ब¸चे दुभाªवना से इस तरह के कृÂय नहé करते पर अपने
खेलकूद और चंचलता के चलते कभी-कभी ऐसा कर देते ह§ । पर यहां तो िÖथित िबÐकुल
अलग थी । अंत म¤ जब पाजेब के असली रहÖय का पता चलता है तो आशुतोष के िपता को
िनिIJत łप से अफसोस हòआ होगा, जो इतने िदन तक आशुतोष को संदेह के घेरे म¤ िलया
गया । उÆह¤ सहज ही उस बालक कì मानिसक िÖथित का अंदाजा हो गया होगा । पाजेब
कहानी म¤ जैन¤þ ने मु´य łप से आशुतोष के माÅयम से ही ब¸चŌ के मन का िवĴेषण
ÿÖतुत िकया है ।
Óया´या-अंश २: सोचने लगी िक यही उसका भाµय है । घर म¤ एक वह है और उसका काम।
काम ही एक संगी है । एक रोज इसी म¤ मर जाना है । बाकì तो सब बैरी ह§ । मुझे तो मौत आ
जाए तो भला ! एक वह ह§ िक सवेरे छाता उठाया और चल िदए और शाम को आए िक सब
िकया िमले । एक म§ कłँ और म§ ही मłँ । और मरने को म§, मौज करने को चाहे कोई
दूसरी........ और एक यह है कमब´त ! मुझे तो िगनता ही नहé, बस सदा उनके कहने म¤ ।
घर ³या जेल है ? एक उसने बांध रखा है । नहé तो जहाँ होती चली जाती, मगर यहाँ का
मुँह न देखती, न दाना लेती न पानी । पर यह छोकरा ऐसा बेहया है िक....
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì ÿिसĦ कहानी 'इनाम' से उĦृत है ।
ÿसंग: 'इनाम' कहानी का मु´य पाý धनंजय है । धनंजय कì मां घर के तनाव और
िजÌमेदाåरयŌ के कारण तंग रहती है और इस बीच धनंजय भी अपने संयत Öवभाव के
बावजूद कभी-कभी उनके तनाव का िशकार हो जाता है । ऐसे म¤ माँ सारी तकलीफ¤ एक-एक
करके सुनाती जाती है और धनंजय को कोसती जाती ह§ । ऐसे ही एक अवसर पर धनंजय
कì मां घर के कामकाज और िपता आिद पर øोिधत हो रही ह§ । munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - पाजेब और इनाम
97 Óया´या: इनाम कहानी एक ऐसे पåरवार कì कहानी है िजसम¤ माता-िपता के अितåरĉ एक
बालक धनंजय है । धनंजय पढ़ने िलखने म¤ अÂयंत ÿखर है । सातवé क±ा म¤ अÓवल आया
है और यह खुशखबरी वह सबसे पहले अपनी मां को सुनाता है । धनंजय के घर का
वातावरण कुछ ³लेषमय है । धनंजय कì मां अपने कुछ संदेहŌ के चलते तनाव म¤ रहती है
और इसका दुÕÿभाव धनंजय पर भी पड़ता है । धनंजय कì मां को ऐसा लगता है िक उसके
िपता ÿिमला को पसंद करते ह§ और इसके चलते उसे बुरा महसूस होता है । इन
पåरिÖथितयŌ म¤ वह तनाव महसूस करती है और इस तनाव का फल अंततः िचड़िचड़ाहट म¤
बदल जाता है । िजसका दुÕÿभाव धनंजय को सहन करना पड़ता है । पåरवार का ऐसा
वातावरण देखकर वह Öवयं भी अÆयमनÖक रहता है । खुलकर अपनी बात नहé कहता ।
िपता से वह ºयादा िनकटता महसूस करता है । इतनी कम उă म¤ ही वह मां कì परेशानी को
भलीभांित लि±त करता है । उसकì मां जब तनाव म¤ होती है तो वह घर-गृहÖती कì तमाम
िशकायतŌ के साथ-साथ और भी भला बुरा कहती है । यīिप धनंजय से उसे बेहद Öनेह है
और ऐसा लगता है जैसे धनंजय के कारण ही वह थमी हòई है । आवÔयक नहé िक यह संदेह
ठीक ही हो, परंतु जो भी हो, धनंजय इन िÖथितयŌ से बेहद ÿभािवत होता है । अंत म¤ यह
शक िनराधार ही िनकलता है । परंतु ऐसी िÖथितयŌ का सृजन करके जैन¤þ बाल मन पर
पड़ने वाले दुÕÿभावŌ के ÿित सचेत करते ह§ ।
८.६ वैकिÐपक ÿij १. धनंजय िकसे घर न आने के िलए कहता है ?
(क) ÿभा (ख) िवमला
(ग) कमला (घ) ÿिमला
२. धनंजय कì मां धनंजय को िकतने Łपए देती है ?
(क) २ (ख) ३
(ग) ४ (घ) ५
३. इनाम कहानी का मु´य पाý िनÌन म¤ से कौन है ?
(क) सुदशªना (ख) सुनैना
(ग) ÿिमला (घ) धनंजय
४. बुआ िकसके िलए पाजेब लेकर आई थी ?
(क) Łि³मन (ख) शीला
(ग) ÿभा (घ) मुÆनी

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
98 ५. आशुतोष ने बुआ से ³या मांगा ?
(क) आइसøìम (ख) बॉल
(ग) पतंग (घ) साइकल
६. खोई हòई पाजेब अंत म¤ िकसके पास िमलती है ?
(क) पतंगवाला (ख) ÿकाश
(ग) छुÆनू (घ) बुआ
७. सातवé क±ा म¤ कौन अÓवल Öथान पर आया था ?
(क) छुÆनू (ख) आशुतोष
(ग) ÿकाश (घ) धनंजय
८. आशुतोष को िकसके साथ पतंगवाले के यहां भेजा जाता है ?
(क) धनंजय (ख) बुआ
(ग) छुÆनू (घ) ÿकाश
८.७ लघु°रीय ÿij १. पाजेब कहानी का उĥेÔय ÖपĶ कìिजए ?
२. पाजेब कहानी का मूल मंतÓय ÖपĶ कìिजए ?
३. इनाम कहानी का मूल मंतÓय ÖपĶ कìिजए ?
४. इनाम कहानी का उĥेÔय ÖपĶ कìिजए ?
८.८ बोध ÿij १. पाजेब कहानी के आधार पर बालकŌ कì मनोवृि° का िवĴेषण कìिजए ?
२. पाजेब कहानी का सारांश अपने शÊदŌ म¤ िलिखए ?
३. इनाम कहानी के आधार पर धनंजय के चåरý का िवĴेषण कìिजए ?
४. इनाम कहानी कì मूल संवेदना का िवÖतृत वणªन कìिजए ?

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ
कहानी - जाĹवी और बाहòबली
इकाई कì łपरेखा
९.० इकाई का उĥेÔय
९.१ ÿÖतावना
९.२ जाĹवी
९.२.१ जाĹवी : मूल संवेदना
९.२.२ जाĹवी : िवĴेषण
९.३ बाहòबली
९.३.१ बाहòबली : मूल संवेदना
९.३.२ बाहòबली : िवĴेषण
९.४ सारांश
९.५ उदाहरण Óया´या
९.६ वैकिÐपक ÿij
९.७ लघु°रीय ÿij
९.८ बोध ÿij
९.० इकाई का उĥेÔय जैन¤þ कì कहािनयŌ पर आधाåरत इकाई-५ के अंतगªत जैन¤þ कì दो कहािनयŌ 'जाĹवी' और
'बाहòबली' का अÅययन िकया जाएगा । जाĹवी, ÿेम जैसे भाव पर आधाåरत कहानी है । ÿेम
और दांपÂय संबंधŌ कì जिटलताएँ और िवडÌबनाएँ जैन¤þ के िÿय िवषय रहे ह§ । जैन¤þ ने इन
िवषयŌ से संबंिधत जो कहािनयाँ िलखी ह§, उनम¤ उÆहŌने वाĻ सामािजक प± को देखने के
बजाय Óयिĉ के अंतमªन कì थाह को लेने का ÿयास िकया है । अपने इन भावŌ के संदभª म¤
Óयिĉ कì अपनी मन:िÖथित ³या होती है ? उसको अपनी कहािनयŌ म¤ उÆहŌने िचिýत
करने का ÿयास िकया है । जाĹवी म¤ ÿेम कì अिभÓयिĉ और पीर कì अĩुत अिभÓयंजना
उनके Ĭारा कì गई है । इसी ÿकार 'बाहòबली' कहानी िवचार-ÿधान कहानी है । जैन¤þ
कथाकार होने के साथ-साथ एक िचंतक भी थे । जीवन के संबंध म¤ एक िविशĶ ŀिĶ का
अनुसरण उनके पूरे कथा-सािहÂय म¤ िमलता है । बाहòबली कहानी मनुÕय के जीवन-ÿवाह
को एक िदशा सूिचत करने वाली कहानी है । अपनी िवचार ÿधानता के चलते यह कहानी
जैन¤þ कì Öवाभािवक Łिचपूणª संवेदना से अलग कहानी ठहरती है । इसके अÅययन से
जैन¤þ के कहानीकार łप का एक नया दशªन िमलता है ।
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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
100 ९.१ ÿÖतावना अभी तक आप िपछली चार इकाइयŌ म¤ जैन¤þ कì आठ कहािनयŌ का अÅययन कर चुके ह§ ।
ये सभी कहािनयाँ जीवन के अलग-अलग प±Ō को अिभÓयĉ करने वाली कहािनयाँ ह§ ।
बदलते समय संदभŎ को जैन¤þ ने अपनी कहािनयŌ के पाýŌ के Ĭारा अिभÓयिĉ दी है । यह
संदभª िजतना वैयिĉक जीवन को ÿभािवत करते ह§, उतना ही सामािजक जीवन को भी
आंदोिलत करते ह§ । जैन¤þ के समय म¤ इस तरह से िवषय संवेदना को ÿÖतुत करने कì
शिĉ एक अकेले उÆहé म¤ थी । उÆहŌने Óयिĉ को सवाªिधक महÂवपूणª माना । पåरवतªन को
ŀिĶगोचर करने के िलए Óयिĉ के भीतर िनिहत स¸चाईयŌ को उÆहŌने महÂवपूणª माना और
विजªत माने जाने वाले िवषयŌ को भी उÆहŌने िनतांत Óयिĉगत स¸चाइयŌ के łप म¤ अपनी
कहािनयŌ म¤ िचिýत िकया । इस अंितम इकाई म¤ जैन¤þ कì 'जाĹवी' और 'बाहòबली'
कहािनयाँ सिÌमिलत ह§ । दोनŌ ही कहािनयाँ िभÆन कलेवर कì कहािनयाँ ह§ । जाĹवी ÿेम के
एक नए łप को नई संवेदना के साथ ÿÖतुत करने वाली कहानी है, िजसम¤ जाĹवी के łप
म¤ ÿेम-पीर कì अिभÓयिĉ सवªथा नए łप के साथ उÆहŌने ÿÖतुत कì है । वहé दूसरी तरफ
बाहòबली कहानी म¤ उÆहŌने Óयापक जीवन-दशªन को समािवĶ िकया है ।
९.१ जाĹवी ९.१.१ जाĹवी : मूल संवेदना:
'ÿेम' मानव जीवन का सबसे कÐयाणकारी भाव है और इसका एक łप ľी-पुŁष संबंधŌ
को िनधाªåरत करने कì ŀिĶ से अÂयंत महÂवपूणª है । सामािजक शिĉयŌ और परंपराओं ने
इस łप के िलए कुछ िनयम आिद तय कर रखे ह§ और इन िनयमŌ कì अवहेलना पर पूरे
मानव इितहास म¤ दुÕपåरणामŌ कì अनेक कहािनयाँ भी देखने को िमलती ह§ । मानव सËयता
के आरंभ से ही यह िÖथित देखने को िमलती है और सËयता के िवकास के साथ इसके
अलग - अलग łप और पåरणाम भी देखने को िमलते ह§ । पर मूल म¤ ÿेम का भाव ही है । िहंदी
के आधुिनक कहानीकारŌ म¤ जैन¤þ ने अपने समय-संदभŎ के अनुłप इस भाव को लेकर कई
रचनाएँ िलखी ह§ । जाĹवी भी ऐसी ही एक कहानी है, िजसम¤ जैन¤þ ने जाĹवी के माÅयम से
ÿेम कì नैसिगªक अिभÓयिĉ को शÊदŌ म¤ बांधने का ÿयास िकया है ।
९.१.२ जाĹवी : िवĴेषण:
ÿेम और दांपÂय के संबंधŌ को नवीन यथाथªवादी ŀिĶ से देखने म¤ िसĦहÖत माने जाने वाले
कथाकार जैन¤þ कì कहानी 'जाĹवी' एक ऐसी ľी कì कहानी है, जो िवडंबनाÂमक
पåरिÖथितयŌ के साथ Öवयं म¤ अकेली है और यह कहानी उस अकेलेपन म¤ डूबी हòई जाĹवी
के अंतमªन कì टटोल करती हòई कहानी है । जैन¤þ कì संवेदना पर गोिवंद िम® िलखते ह§,
"जैन¤þ अपने को घर कì समÖयाओं तक सीिमत रखते ह§ तो बड़ी सामािजक, राजनीितक
समÖयाएँ उनसे छूट गई ह§ । उनके यहां िविवध खेमे के चåरý नहé, ब¸चे-बूढ़े तो करीब-
करीब नदारद ह§, ľी भी ºयादातर या पÂनी है या ÿेयसी है । बहन, ľी, मां के łप उनके
यहां नहé है ।" और ऐसा संभव इसिलए है, ³यŌिक साधारण åरÔते तो अपनी मयाªदा और
सामािजक माÆयताओं के अनुसार चल ही रहे थे । परंतु Óयिĉगत जीवन म¤ जो कई तरह के munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - जाĹवी और बाहòबली
101 ĬÆĬ उपिÖथत हो रहे थे, उनको अपनी आंतåरकता के साथ िचिýत करना, जैन¤þ इस
िजÌमेदारी को समझ रहे थे । इन िवषयŌ के ÿित लेखन म¤ एक åरÖक भी था, लेखकìय
अÖवीकायªता का, जो उÆहŌने उठाया । सवªथा नवीन ŀिĶ से देखने के कारण कहé-कहé
िवचार ÿधानता भी देखने को िमलती है । वे मानते थे िक मनुÕय के अंतर जगत म¤ घटने
वाला सÂय काफì िवशाल है और इसको िचिýत करने कì आवÔयकता भी है । यिद मनुÕय
के जीवन कì वाÖतिवक समÖयाओं को समझना है, तो उनके अंतर जगत म¤ उतरना ही
होगा । जाĹवी कहानी भी िľयŌ के अंतमªन को उस परंपरागत युग म¤ एक नई ŀिĶ से देखने
कì पहल है ।
अपने म¤ खोई सी रहने वाली जाĹवी के जीवन म¤ एक खालीपन है, िजसे वह पि±यŌ से
भरती है, िजसे वह अकेले म¤ गीतŌ को गा-गाकर भरती है । पर यह अकेलापन ³यŌ है ?
कहानी संकेत करती है िक जाĹवी पढ़ी-िलखी युवती है और िकसी युवक से ÿेम भी करती
है । कहानीकार ने कहानी कì संवेदना के अनुसार इस जानकारी को यहé तक सीिमत रखा
है । परंतु समाज म¤ तो ÿेम िनिषĦ है । और इसी के चलते शायद वह अपने म¤ िसमटकर रह
गई है । िकशोरावÖथा म¤ ÿेम जैसी ÿवृि° के दायरे म¤ आ जाना कोई खास बात नहé है, पर
समाज म¤ उसे िजस ŀिĶ से देखा जाता है, वह ŀिĶ यहां ÿijŌ के दायरे म¤ है । जाĹवी बेहद
ईमानदार है । वह अपने ÿेम को छुपाती नहé है, न ही वह इसके माÅयम से िकसी को धोखे
म¤ रखती । ऐसा संकेत िमलता है िक संभवतः सामािजक अवमानना के डर से उसके माता-
िपता भी इस पहलू पर उसका साथ नहé दे रहे । िजससे एक अजीब-सा रीतापन उसके
जीवन म¤ आ गया है । वह अपने मे खोयी रहती है । अकेलापन और कौए उसके साथी ह§ ।
यह सभी कुछ उसकì भंिगमाओं से िदखता है, "थोड़ी देर बाद उसने मानो जागकर अपने
आस-पास के जगत को देखा । इसी कì राह म¤ ³या मेरी ओर भी देखा ? देखा भी हो, पर
शायद म§ उसे नहé दीखा था । उसके देखने म¤ सचमुच कुछ दीखता ही था, यह म§ कह नहé
सकता । पर कुछ ही पल के अनंतर वह मानŌ वतªमान के ÿित, वाÖतिवकता के ÿित चेतन
हो आयी ।"
उसके जीवन म¤ सिÌमिलत हो गयी इस नई पåरिÖथित के कारण वह अपनी भावनाओं को
कौओं के माÅयम से Óयĉ करती है । उसके ÿेम कì पीर का वणªन करने के िलए कहानीकार
ने कौवे को उस सहारे के łप म¤ ÿÖतुत िकया है । वह इन पि±यŌ को भोजन कराती है ।
अपने खालीपन और सूनेपन को इनके माÅयम से काटने का ÿयास करती है और साथ म¤
एक गीत भी जाती जाती है, जो उसकì ÿेम-पीर का बयान करता है, "कागा चुन-चुन
खाइयो.... । दो नैना मत खाइयो ,मत खाइयो .... पीउ िमलन कì आस ।" जैन¤þ ने बेहद
भावुक और काÓयाÂमक लहजे म¤ जानवी के साथ इस िÖथित का वणªन िकया है यह कुछ-
कुछ जायसी काÓय कì कÐपना जैसा वणªन हो जाता है जानवी के इस गीत कì से उसकì
िवकलता का अंदाजा लगाया जा सकता है, "वह खुश है िक कौए आ गए ह§ और वे खा रहे
ह§। पर एक बात है िक ओ कौओ, जो तन चुन-चुनकर खा िलया जाएगा, उसको खा लेने म¤
मेरी अनुमित है । वह खा-खूकर तुम सब िनबटा देना । लेिकन ऐ मेरे भाई कौओ ! इन दो
नैनो को छोड़ देना । इÆह¤ कहé मत खा लेना । ³या तुम नहé जानते िक उन नैनŌ म¤ एक
आस बसी है जो पराये के बस है । वे नैना पीउ कì बाट म¤ ह§ । ऐ कौओ, वे मेरे नहé ह§, मेरे
तन के नहé है । वे पीउ कì आस को ब साये रखने के िलए ह§ । सो, उÆह¤ छोड़ देना ।" यह
भावनामय और काÓयमय शैली, जैन¤þ ने िवषय को संवेदनशीलता के साथ िचिýत करने के munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
102 िलए अपनाई है । परंतु संवेदना कुछ और है । जाĹवी का ÿेम उिचत-अनुिचत के ÿij पर
जैन¤þ के यहां िवचारणीय नहé है, वह मन कì एक Öवाभािवक वृि° के łप म¤ चचाª का िवषय
है ।
जैन¤þ ने इस कहानी म¤ जाĹवी के ÿेम कì पीर को पूरी िशĥत से अंिकत िकया है । संयोग से
पड़ोस म¤ रहने वाले पित-पÂनी कì नजर जाĹवी पर पड़ती है और वे अपने भतीजे बृजनंदन
से उसका िववाह कराना चाहते ह§ । पाåरवाåरक Öतर पर सारी बातचीत हो जाने के बाद सारे
लोग इस िववाह के िलए सहमत हो जाते ह§ । परंतु जाĹवी का ÿेम के ÿित समपªण भीतर-ही-
भीतर कहé उसे Óयिथत कर रहा था । संभवत वह अपने को इस योµय नहé पा रही थी िक
वह इस िववाह को Öवीकार कर ले । वह अपने माता-िपता कì इ¸छा कì अवहेलना भी
ÿÂय± łप से नहé करना चाह रही थी । िववाह को लेकर उस समय लड़िकयŌ कì जो
िÖथित थी, उसम¤ लड़िकयŌ से राय-बात करना, उनकì इ¸छा को जानना महÂवपूणª नहé
समझा जाता था ।
जाĹवी, ÿेम तो करती थी परंतु इस सामािजक दबाव कì अवहेलना वह संभवतः नहé कर
सकì । इसिलए उसने एक अÆय मागª िनकाला । उसके भीतर åरÔतो के ÿित सÌमान था ।
इसीिलए वह अपने होने वाले पित से सभी बात¤ कह देना चाहती थी । उसने बृजनंदन को
एक पý िलखा और यह कहा िक, "आप जब िववाह के िलए यहाँ पहòंच¤गे तो मुझे ÿÖतुत भी
पाएंगे । लेिकन मेरे िच° कì हालत इस समय ठीक नहé है और िववाह जैसे धािमªक अनुķान
कì पाýता मुझम¤ नहé है । एक अनुगता आपको िववाह Ĭारा िमलनी चािहए - वह जीवन-
संिगनी भी हो । वह म§ हóँ या हो सकती हóँ, इसम¤ मुझे बहòत संदेह है । िफर भी अगर आप
चाह¤, आपके माता-िपता चाह¤, तो ÿÖतुत म§ अवÔय हóँ । िववाह म¤ आप मुझे ल¤गे और
Öवीकार कर¤गे तो म§ अपने को दे ही दूँगी, आपके चरणŌ कì धूिल माथे से लगाऊंगी ।
आपकì कृपा मानूंगी । कृत² होऊँगी । पर िनवेदन है िक यिद आप मुझ पर से अपनी मांग
उठा ल¤गे, मुझे छोड़ द¤गे तो भी म§ कृत² होऊँगी । िनणªय आपके हाथ है । जो चाह¤, कर¤ ।"
उसके इस तरह पý िलख देने से उसे सामािजक अवमानना का सामना करना पड़ा । जािहर
सी बात है, āजनंदन के अिभभावकŌ ने िववाह तोड़ िदया और जैसा िक होता है, जाĹवी के
पूरे पåरवार को इस अवमानना का दंश सहना पड़ा । बृजनंदन कì चाची कहती है, "असल
बात जाननी है तो जाकर पूछो उसकì महतारी से । भली समिधन बनने चली थी । वह तो
मुझे पहले ही से दाल म¤ काला मालूम होता था । पर देखो न, कैसे सीधी-भोली बात¤ करती
थी । वह तो, देर ³या थी, सब हो ही चुका था । बस लगन-मुहóतª कì बात थी । राम-राम,
भीतर पेट म¤ कैसी कािलख रखे है, मुझे पता न था । चलो, आिखर परमाÂमा ने इºजत बचा
ली । वह लड़कì घर म¤ आ जाती तो मेरा मुँह अब िदखाने लायक रहता ?"
कलंिकत होने का सामािजक भाव दोनŌ ही प±Ō के िलए महÂवपूणª और सोचनीय होता है ।
िकसी भी घर-पåरवार म¤ ऐसी िÖथित उÂपÆन हो जाने पर बेशक लोगŌ से अÆय सुख और
दुखŌ म¤ मतलब हो या न हो, पर वह इन िÖथितयŌ म¤ बात¤ जłर बनाते ह§ और मोहÐले-
पड़ोस कì बातŌ म¤ िफर जो नहé होता, वह भी सिÌमिलत हो जाता है । यīिप यह सामािजक
आचरण, सामािजक िनयमŌ कì अवहेलना न हो, इस हेतु िकया जाता है । जाĹवी के संदभª
म¤ यिद इस ŀिĶ से िवचार िकया जाए तो इसम¤ कोई संदेह नहé है िक जैन¤þ ने उसे एक ऐसी
लड़कì के łप म¤ िचिýत िकया है, िजसके भीतर स¸चाई है । वह ÿेम करती है और उस ÿेम munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - जाĹवी और बाहòबली
103 को आÖथा से Öवीकार करती है, िनभाना चाहती है । इस ÿेम को लेकर वह अÆय åरÔतŌ के
साथ िकसी भी ÿकार का छल-कपट नहé करती बिÐक पूरी स¸चाई से अपनी सही वÖतु
िÖथित से सभी को अवगत कराती है । उसने कोई गलत काम नहé िकया पर ÿेम ऐसी
भावना है, िजस पर िकसी का वश नहé है । अंतमªन म¤ घिटत होने वाला यह भाव िनब«ध
होता है और जैन¤þ ऐसे ही िनब«ध भावŌ को ÿÖतुत करने म¤ िसĦहÖत माने जाते ह§ । वह इस
बात कì कतई परवाह नहé करते ह§ िक उनकì कही बात को िकस हद तक सब यथाथªपरक
ढंग से Öवीकार िकया जाएगा । वह तो अंतमªन के कुशल िचतेरे ह§ । और जैसा िक गोिवंद
िम® ने उनके संदभª म¤ िलखा भी है, उस अनुłप समाज के वाĻ प± को िचिýत करने के
बजाए उनकì łिच Óयिĉ अंतमªन कì िविभÆन भंिगमाओं को िचिýत करने म¤ रही है ।
जाĹवी का यह Óयवहार िनिIJत łप से िकसी को भी खटक सकता है । āजनंदन पý कì
भावना के अनुłप िववाह को लेकर सारी स¸चाई अपने अिभभावकŌ से कह देता है और
िववाह टूट भी जाता है । परंतु बृजनंदन आज कì युवा पीढ़ी का ÿितिनिधÂव कर रहा है, जो
इस स¸चाई कì कþ करना जानता है । िनिIJत łप से उसकì भावनाएं आहत होती ह§ ।
िववाह को लेकर सारे िवचार खंिडत हो चुके होते ह§ । बृजनंदन कì भावनाओं के संदभª म¤
कहानीकार िलखता है, "उसने ŀढ़ता के साथ कह िदया िक म§ यह शादी नहé कŁँगा ।
लेिकन उसने मुझसे अकेले म¤ यह भी कहा िक, चाचा जी म§ और िववाह कŁँगा ही नहé,
कŁँगा तो उसी से कŁँगा ।" परंतु कहानीकार ने बृजनंदन के इस कथन के माÅयम से यह
िदखाया है िक, जाĹवी कì स¸चाई से बृजनंदन अÂयंत ÿभािवत है और इसकì Öवीकारोिĉ
वह इस łप म¤ करता है िक या तो अब वह िववाह करेगा ही नहé और यिद करेगा तो इसी
लड़कì से । इस तरह जाĹवी कì स¸चाई को कहानीकार के Ĭारा सराहा गया है ।
अपनी सजªना के øम म¤ जैन¤þ ने पाýŌ कì ŀिĶ से अÂयंत øांितकारी पाýŌ का सृजन िकया
है । ÿेम और दांपÂय के संबंध म¤ उÆहŌने संवेदना को िजस िविवधłपी ढंग से आकार िदया
है, उससे ही जाĹवी, Łिकया, सुनीता और मृणाल जैसे पाý सामने िनकलकर आए ह§ ।
उनकì कहािनयŌ और उपÆयासŌ दोनŌ ही जगह यह बात हम¤ समान łप से देखने को
िमलती है । कहानी, उपÆयासŌ का अÅययन करते समय यह तÃय गौर करने लायक है िक
उनके ľी-पाý िÖथितयŌ के ĬंĬ और संघषª म¤ फंसते तो ह§ और उस अनुłप ÿवाह म¤ बह
भी जाते ह§, परंतु वे एक िववश िÖथित म¤ िदखाई देने वाले पाý ह§ । िकसी भी ÿकार का
मुखर िवþोह और िफर िवþोह के पIJात सम िÖथित को ÿाĮ कर लेने जैसी दशा, उनम¤
िदखाई नहé देती । यह सभी ऐसे पाý ह§, जो िÖथितयŌ म¤ फंसते ह§ और िफर िववश łप से
उन िÖथितयŌ के पåरणामŌ को भोगते िदखाई देते ह§ । मृणाल, Łिकया, जाĹवी आिद सभी
इसी ÿकृित के पाý ह§ । जाĹवी का ÿेम अधूरा है ³यŌिक वह पåरवार कì सीमा-रेखा को
लांघने का साहस नहé कर सकì । मृणाल और Łिकया इस सीमा-रेखा को लांघने का
दुÖसाहस करते ह§ तो उसका दुÕपåरणाम भी हम उÆह¤ भोगते हòए देख सकते ह§ । जैन¤þ ने
समाज कì इन िÖथितयŌ को िचिýत िकया है पर अपनी कहािनयŌ म¤ कहé भी वे सामािजक
शिĉयŌ कì हार दिशªत करते नहé िदखायी देते । इन पाýŌ म¤ इतनी िहÌमत तो है िक वह
अपने िकए को Öवीकार करते ह§ और उस पर आगे भी बढ़ते ह§ परंतु यह सभी सामािजक
शिĉ के सामने पराÖत ह§ । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
104 जाĹवी कहानी कì वÖतु को देखते हòए ÖपĶ łप से यह कहा जा सकता है िक जैन¤þ अपने
समय कì युवा पीढ़ी के अंतमªन को न िसफª टटोल रहे थे बिÐक उसका िचýण भी कर रहे थे
। इन बदलावŌ म¤ कहé मूÐयांकन करते नहé िदखाई देते । मूÐयांकन उनकì ÿवृि° रहा भी
नहé है । परंतु सामािजक माÆयताओं और मूÐयŌ म¤ िजस तरह से पåरवतªन आ रहा है,
उसको वह भली-भांित िचिýत कर देते ह§ । ÿेम जीवन कì सहज स¸चाई है और ऐसा नहé
िक िजस łप म¤ इसकì अिभÓयिĉ इस समय होती है, पुराने समय म¤ इससे अलग रही होगी
। ÿेम कì पीर का जैसा िचýण मÅयकालीन सािहÂय म¤ देखने को िमलता है वैसी गहराई तो
आज भी देखने को नहé िमलती । परंतु सामािजक वजªनाओं के चलते उसकì Öवीकारोिĉ
तब संभव नहé थी । आधुिनक काल म¤ जीवन को लेकर लगातार बदलती हòई ŀिĶ म¤ यह
संभव हòआ । जैन¤þ कì कहानी जाĹवी उस ŀिĶकोण को भी िदखा पाने म¤ स±म रही है ।
९.२ बाहòबली ९.२.१ बाहòबली : मूल संवेदना:
बाहòबली एक िवचार ÿधान कहानी है । एक अ¸छा कथाकार होने के साथ-साथ जैन¤þ एक
अ¸छे िचंतक भी थे । और अपने जीवन दशªन को लेकर भी उÆहŌने कई रचनाएं िलखी ह§ ।
बाहòबली ऐसी ही कहानी है । इसके माÅयम से जैन¤þ ने एक काÐपिनक कथा के सहारे कमª
कì मह°ा को िसĦ िकया है । अपनी िवचार-ÿधानता के कारण यह कहानी पाठकŌ का उस
łप म¤ मनोरंजन नहé करती परंतु इस कहानी म¤ मानव इितहास और िवकास को लेकर एक
ÖपĶ ŀिĶ देखने को िमलती है । कमª का दशªन भारतीय सािहÂय परंपरा म¤ सदा से ही
अिभÿेत रहा है । अलग-अलग कालखंडŌ म¤ जब मानव सËयता कुंिठत होती है, कोई-न-कोई
िवचार पुŁष कमª-दशªन के माÅयम से अपने समय कì मानवीय सËयता को ÿेरणा देने कì
कोिशश करता रहा है । इस कहानी म¤ जैन¤þ ने इितहास और परंपरा कì चचाª करते हòए इस
तÃय को भी महÂवपूणª ढंग से सामने रखा है । सÆयास का भारतीय जीवन परंपरा म¤ अÂयंत
महÂव रहा है परंतु यह सÆयास सभी िजÌमेदाåरयŌ से मुĉ होकर ®ेय और ÿेय रहा है ।
सÆयास और पलायन के फकª को भी इस कहानी ने सामने रखा है । बाहòबली वैचाåरक
आÖथाओं को नए कलेवर म¤ ÿÖतुत करने वाली कहानी है ।
९.२.२ बाहòबली : िवĴेषण:
सािहÂय जीवन और जगत से जुड़ी हòई स¸चाई को ÿÖतुत करने का सवाªिधक सशĉ
माÅयम है । ÿÂयेक सािहÂयकार अपने रचना-संदभŎ को िविभÆन िवधाओं म¤ गूँथकर कर
ÿÖतुत करता है । रचना-संदभŎ के बारे म¤ यह कहा जा सकता है िक ÿÂयेक सािहÂयकार कì
अिभŁिच यहां जीवन के अलग-अलग प±Ō म¤ रमती रही है । जैन¤þ कì Łिच जीवन के ऐसे
संदभŎ को टटोलने म¤ रही है जो िनतांत Óयिĉगत माने जाते रहे ह§ । सावªजिनक संदभŎ को
लेकर वे उतने उÂसुक कभी नहé रहे । इसीिलए वे अपने समय के अकेले ऐसे सािहÂयकार
ह§, जो Óयिĉ अंतमªन कì िविवध दशाओं और भावŌ से łबł होते और पाठकŌ को कराते
िदखाई देते ह§ । जैन¤þ के कथा लेखन म¤ ÿेम और दांपÂय के िविवध संदभª उनके िÿय िवषय
रहे ह§, िजÆह¤ उÆहŌने बदलते युगीन संदभŎ म¤ सवªथा नई ŀिĶ से पåरभािषत करने का ÿयास
िकया है । और समाज को इन िवषयŌ पर अपनी सोच को बदलने और सकाराÂमक munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - जाĹवी और बाहòबली
105 ŀिĶकोण िनिमªत करने म¤ समथª बनाया है । परंतु सदैव ऐसा ही नहé होता । वह भी िवषयांतर
करते ह§ । उनकì कई कहािनयाँ अÂयंत िवचार ÿधान कहािनयŌ के łप म¤ हमारे सामने
आती ह§, िजनम¤ वे इितहास और िविभÆन दाशªिनक प±Ō पर कहािनयŌ का सृजन कर िविशĶ
िवचार या सोच को आगे बढ़ाते िदखाई देते ह§ । कहानी 'बाहòबली' उनकì ऐसी ही एक
उÐलेखनीय रचना है ।
'बाहòबली' कहानी जीवन कì िकसी एक घटना या संदभª को िचिýत करने वाली कहानी नहé
है, बिÐक यह समú जीवन को सवªथा नई ŀिĶ से देखने का ÿयास है । भारतीय दाशªिनक
वांµमय, अनेक िवचारधाराओं को लेकर आगे बढ़ता है । सनातन, जैन-बौĦ, चावाªक, अĬैत
आिद दशªन और इनके साथ-साथ िविभÆन संÿदाय अलग-अलग थोड़े बहòत अंतर के साथ
एक ही िदशा कì ओर ले जाने वाले दशªन ह§ । भारतीय दशªन म¤ भगवतगीता का अÂयंत
िविशĶ Öथान है, जो कमª कì ÿेरणा देने कì ŀिĶ से सवाªिधक उÐलेखनीय úंथ है । 'बाहòबली'
कहानी कुछ इसी तरह के संदभŎ को ÿÖतुत करने वाली कहानी है । जैन¤þ के कथा लेखन
के बारे म¤ माना जाता है िक कई ÖथानŌ पर वे फ§टेसी रचते िदखाई देते ह§ । एक सरल
गīłप होते हòए भी, कहानी म¤ वे इस तरह कì िÖथितयŌ का सृजन कर देते ह§, जो
ÿतीकाÂमक ढंग से अपने मंतÓय को ÖपĶ करती ह§ । अमूमन कहािनयŌ म¤ इस तरह कì
िÖथितयाँ बहòत कम देखने को िमलती ह§ । यह तो किवता या िवचारपरक िनबंधŌ म¤ ही देखने
को िमलता है । पर जैन¤þ को इन िÖथितयŌ को कहानी म¤ ढालने कì कला भी आती है ।
बाहòबली इसी कला का साथªक पåरणाम है ।
कहानी का आरंभ जैनेÆþ मानव ÿजाित के इितहास को लेकर अपने िविशĶ ŀिĶकोण के
साथ करते ह§ और कहते ह§, "बहòत पहले कì बात कहते ह§ । तब दो युगŌ का संिधकाल था ।
भोगयुग के अÖत म¤ से कमªयुग फूट रहा था । भोगकाल म¤ जीवन माý भोग था । पाप-पुÁय
कì रेखा का उदय न हòआ था । कुछ िनिषĦ न था, न िवधेय अतः पाप असंभव था, पुÁय
अनावÔयक । जीवन बस रहना था ।........ उस युग के ितरोभाव म¤ से नवीन युग का
आिवभाªव हो रहा था । ÿकृित अपने दाि±Áय म¤ मानो कृपण होती लगती थी । उस समय
िववाह ढूँढ़ा गया । पåरवार बनने लगे और पåरवारŌ म¤ समाज । िनयम-कानून भी उठे ।
'चािहए' का ÿादुभाªव हòआ और मनुÕय को ²ात हòआ िक जीना रहना नहé है, जीना करना
है।" अपने इस एक कथन के Ĭारा जैसे जैन¤þ ने मानव जाित के समूचे इितहास को इन चंद
पंिĉयŌ म¤ रच िदया है । अपने आरंिभक युग म¤ मनुÕय को जब िकसी ÿकार का ²ान नहé
था। न उसे आग का ²ान था, न पिहए कì कोई जानकारी थी, न वह खेती-बाड़ी और
पशुपालन के संदभª म¤ ही कुछ जानता था । तब उसका जीवन एक यायावर का जीवन था ।
इधर-उधर घूमना ही उसकì िदनचयाª थी । िशकार और ÿाकृितक ąोतŌ से ÿाĮ भोºय-
पदाथŎ से ही वह अपना जीवन-यापन करता था । िकसी भी ÿकार कì सामािजक चेतना
उसम¤ नहé थी । भले ही वह समूहŌ म¤ रहता रहा हो, पर िववाह आिद संÖथा का कोई
अिÖतÂव नहé था । साथ रहने कì जłरत भी उसे जीवन आÂमर±ा को लेकर पड़ी होगी
और उसने अपने सामािजक जीवन कì इस पहली अिनवायª शतª को पूरा िकया होगा । धीरे-
धीरे समय के साथ चलते-चलते उसम¤ नए िवचारतंतु पैदा हòए हŌगे । आवÔयकताओं ने उसे
सामािजक संगठन को लेकर ÿेåरत िकया होगा और तÂपIJात समाज और
आवÔयकतानुसार िववाह जैसी संÖथाओं का गठन हòआ होगा । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
106 उस ÿागैितहािसक काल म¤ 'चािहए' का ÿij मौजूद नहé रहा होगा । अÂयंत सूàमŀिĶ से
जैन¤þ ने इस ÿij को भी सामने रखा है । समाज म¤ लूट, दबंगई आिद ने 'चािहए' के ÿij को
जÆम िदया होगा । उिचत और अनुिचत पर िवचार आरंभ हòआ होगा । इस 'चािहए' का संघषª
ही पूरे मानव इितहास म¤ िदखाई देता है । यह मनुÕय कì अपनी Öवाभािवक वृि° से संभव
होता है । िनयम बनते ह§ और मानव कÐयाण के िलए बनते ह§ । उन पर चलना ही चािहए ।
यही सही िÖथित है । परंतु ÿÂयेक Óयिĉ इस ÿवृि° का नहé होता । उ¸छृंखलता के कारण
तमाम Æयाियक िवधान भी बने हŌगे । पंचायत¤ इÆहé का आरंिभक łप ह§ । गांव Æयाय के िलए
इÆहé पर िनभªर रहते थे । िवकास कì िविभÆन दशाओं को ÿाĮ करने कì जĥोजहद म¤ ही
मनुÕय आगे बढ़ा होगा । खेती-बाड़ी, पशुपालन आिद का ²ान उसने धीरे-धीरे िवकिसत
िकया होगा । अब उसकì िÖथित यह थी िक वह ÿकृित से संचािलत नहé हो रहा था बिÐक
ÿकृित को अपने अनुłप संचािलत करने का ÿयास कर रहा था । यहé कमª कì िÖथित पैदा
होती है । जैन¤þ ने यह ÖपĶ िकया है िक, "भोग से अिधक जीवन कमª है और ÿकृित को
ºयŌ-का-ÂयŌ लेकर बैठने से नहé चलेगा । कुछ उस पर संशोधन, पåरवधªन, कुछ उस पर
अपनी इ¸छा का आरोपण भी आवÔयक है । बीज उगाना होगा, कपड़े बनाने हŌगे, जीवन
संचालन के िलए िनयम िÖथर करने हŌगे और जीवन-संवृिĦ के िनिम° उपादानŌ का भी
िनमाªण और संúह कर लेना होगा । अकेला Óयिĉ अपूणª है, अ±म है, असÂय है । सहयोग
Öथािपत करके पåरवार, नगर, समाज बनाकर पूणªता, ±मता और सÂयता को पाना होगा ।"
बाहòबली कहानी म¤ तीन पाý ह§ - आिदनाथ भरत और बाहòबली । आिदनाथ समाज के Ĭारा
Öवे¸छा से Öवीकार िकए गए ÿधान ह§ । भरत और बाहòबली उनके पुý ह§ । मानव समाज के
Ĭारा िनिमªत पहले राºय के राजा आिदनाथ हòए । इितहास कì अपनी तरह से Óया´या करते
हòए जैन¤þ िलखते ह§, "तब Óयिĉ ÓयिĶ-स°ा से समिĶ-िसिĦ कì ओर बढ़ चला था । राजा
जैसी वÖतु कì आवÔयकता हो चली थी । पर राजा जो राजÂव कì संÖथा पर न खड़ा हो,
ÿजा कì माÆयता पर खड़ा हो । यह तो पीछे से हòआ िक राजÂव कì संÖथा बनी और िश±ा
और Æयाय िवभाग-łप म¤ शासन से पृथक हòए । नगर बन चले थे और जीवन-यापन िनतांत
Öवाभािवक कमª न रह गया था । उसके िलए उīम कì आवÔयकता थी ।" इस तरह मनुÕय
यायावर मुþा से बाहर िनकलकर सामािजक हòआ और तÂपIJात आवÔयकता के अनुसार
िवकास कì नई-नई िÖथितयाँ बनने लगé । एक समय के बाद आिदनाथ ने अवÖथा के चौथे
खंड म¤ अपने पुýŌ को बुलाकर यह इ¸छा जािहर कì िक वे दी±ा लेना चाहते ह§ । अब
पदभार तुम संभालो । बड़े पुý भरत ने स°ा संभाली और िपता से भी आगे बढ़कर पृÃवी के
छह खंडŌ पर िवजय Öथािपत कì तथा भांित-भांित के उपहार लेकर नगर लौटा । साथ म¤
शासन चø था, जो नगर म¤ ÿिवĶ नहé हो रहा था । कारण िक भरत का भाई बाहòबली
अिविजत łप म¤ उपिÖथत था और िवजय पूणª नहé हòई थी । भरत और बाहòबली के संघषª
के बाद िवजयी बाहòबली ने सÌमानपूवªक स°ा भरत को सŏप दी और Öवयं कैवÐय ÿािĮ के
िलए तपÖयारत हो गए । भरत राजकाज म¤ संलµन हो गए और बाहòबली तपÖया म¤ लीन हो
गए ।
लंबे समय के पIJात भरत ने ®ी आिदनाथ से दी±ा लेने कì अनुमित मांगी । अनुमित िमलने
पर भरत ने दी±ा úहण कì और कैवÐय ÿाĮ िकया । वहé दूसरी तरफ लंबे समय से
तपÖयारत बाहòबली कैवÐय ÿािĮ नहé कर सके । सभी को आIJयª था । परंतु कहानीकार
का मंतÓय इस पूरे ÿसंग म¤ यह िदखाना था िक सÆयास कì िÖथित कमª के बाद है । कमª से munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - जाĹवी और बाहòबली
107 पहले का संÆयास भी फलीभूत नहé होता । भरत ने मनुÕय होने के सभी धमª िनभाये ।
युवावÖथा म¤ उÆहŌने समाज को अपना अहम योगदान िदया । सब इ¸छाएं पूणª होने के पIJात
उÆह¤ कैवÐय ÿाĮ हòआ । वहé बाहòबली ÿÂय± कमª से दूर तपÖयारत थे । जीवन का वह मूल
उÆह¤ पता नहé था, जो भरत जानते थे । यīिप इसके बाद जैन¤þ ने कहानी को थोड़ा दूłह
बना िदया है । और पाठक Ăिमत हो जाता है । परंतु इतना तो िनिIJत है िक इस सभी कायª
Óयापार और ÿसंगŌ के माÅयम से जैन¤þ जीवन को øमानुसार Óयतीत करने के प±धर ह§ ।
सÆयास िनिIJत łप से जीवन का अिभÿेत है, परंतु इसका øम भी िनिIJत है और कैवÐय
ÿािĮ तभी संभव है, जब मनुÕय अपने कमŎ से िनवृि° पा ले । इस तरह जैन¤þ ने अपने
वैचाåरक सरोकारŌ को इस कहानी म¤ आकार िदया है ।
९.४ सारांश इस इकाई के अंतगªत जैन¤þ कì दो कहािनयŌ का अÅययन िकया गया है । दोनŌ ही कहािनयाँ
जीवन के अलग-अलग प±Ō को क¤þ म¤ रखकर िनिमªत कì गई ह§ । जाĹवी कहानी जहां
जैन¤þ के िÿय िवषय, ÿेम और दांपÂय के सूýŌ को आधार बनाकर िलखी गई है, वहé
बाहòबली कहानी कì रचना जैन¤þ ने अपने वैचाåरक सरोकारŌ को ÖपĶ करने के िलए कì है ।
जाĹवी, िहÆदी कहािनयŌ म¤ रिचत पाýŌ म¤ एक िविशĶ पाý है । उससे अपने समय को
अिभÓयĉ करने म¤ जैन¤þ को काफì मदद िमली है । जैन¤þ ने जाĹवी के łप म¤ एक ऐसी
लड़कì का िचýण िकया है, जो एक तरफ तो अपने समय के दबावŌ का सामना कर रही है,
वहé दूसरी तरफ मानवीय सहज भाव, ÿेम के वशीभूत भी है । उसका ÿेम, िनमªल और
Öव¸छ ÿेम है । उस ÿेम को पाने के िलए वह इ¸छुक है परंतु िकसी भी ÿकार कì सामािजक
अवमानना उसके Ĭारा नहé कì जाती है । उसके भीतर खालीपन है । ÿेम को लेकर एक
अĩुत पीर है । परंतु वह िवþोही नहé है । माता-िपता कì इ¸छा अनुसार िववाह तय िकए
जाने पर वह िववाह से भी पूणª नकार नहé करती । वह åरÔतŌ को लेकर बेहद ईमानदार है
और बृजनंदन से सारी स¸चाई वह बयान करती है । अंततः िववाह टूट जाता है । िजसके
िलए वह मानिसक łप से तैयार भी है । वह अपने अपूणª ÿेम के सहारे जीवन Óयतीत कर
रही है । जाĹवी कहानी के माÅयम से जैन¤þ ने ÿेम कì समयानुकूल अिभÓयिĉ कì है । जैन¤þ
ÿेम और दांपÂय के संदभª म¤ अपने समय संदभŎ को कहािनयŌ और उपÆयासŌ के माÅयम से
अिभÓयĉ करने कì ŀिĶ से अपने समय के सवाªिधक महÂवपूणª लेखकŌ म¤ से एक रहे ह§ ।
यह अपने समय कì एक बदलती हòई स¸चाई है, िजसका अंकन इस कहानी म¤ हòआ है ।
बाहòबली कहानी जैन¤þ के वैचाåरक सरोकारŌ को ÖपĶ करने कì ŀिĶ से महÂवपूणª कहानी है।
जैन¤þ का भाव बोध िजस समय िवकिसत हòआ, वह राÕůीय आंदोलन का सबसे आøामक
दौर था । Öवयं जैन¤þ ऐसी आंदोलनकारी गितिविधयŌ से काफì समय तक जुड़े रहे और
तÂपIJात वे लेखन कì ओर मुड़े । उस दौर म¤ जन-जागरण के अĩुत ÿयास तÂकालीन
नेतृÂव के Ĭारा िकए जा रहे थे । उस समय के भारतीय समाज से कई तरह कì अपे±ाएं थी ।
वह समय बैठने का, खुद को कुंिठत करने का समय नहé था बिÐक कमª ÿेरणा के वशीभूत
रहकर कमª िवधान का समय था । इस कहानी म¤ जैन¤þ ने मानव इितहास के कुछ महÂवपूणª
ÿijŌ पर भी साथªक तरीके से िवचार िकया है । मानव इितहास को लेकर अिभÓयĉ िकए गए
उनके िवचार तकª-िसĦ और ÿामािणक ह§ । सवªथा नवीन बोध और वैचाåरक सरोकारŌ को
लेकर िलखी गई यह कहानी जैन¤þ के एक अलग ही भाव बोध और अंदाज को ÿÖतुत करती munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
108 है । यīिप यह कहानी अंत म¤ अपनी दुłहता के कारण पाठकŌ को भटकाती भी है, िजसका
कारण जैन¤þ का जिटल िशÐप है । जैन¤þ अपनी बात को अÆय कहानीकारŌ कì तरह सहज
अंदाज म¤ नहé कहते बिÐक उनका नजåरया कुछ ÿतीकाÂमक होता है । िजसके चलते यह
कहानी कुछ दुŁह हो गई है । परंतु जैन¤þ के रचना सरोकारŌ कì ŀिĶ से यह भी जैन¤þ के
िनतांत िभÆन प± को सामने रखती है । जैनेÆþ के एक नये łप से पåरिचत कराती है ।
९.५ उदाहरण Óया´या Óया´या-अंश १: आप जब िववाह के िलए यहाँ पहòंच¤गे तो मुझे ÿÖतुत भी पाएंगे । लेिकन
मेरे िच° कì हालत इस समय ठीक नहé है और िववाह जैसे धािमªक अनुķान कì पाýता
मुझम¤ नहé है । एक अनुगता आपको िववाह Ĭारा िमलनी चािहए - वह जीवन-संिगनी भी हो ।
वह म§ हóँ या हो सकती हóँ, इसम¤ मुझे बहòत संदेह है । िफर भी अगर आप चाह¤, आपके माता-
िपता चाह¤ तो ÿÖतुत म§ अवÔय हóँ । िववाह म¤ आप मुझे ल¤गे और Öवीकार कर¤गे तो म§ अपने
को दे ही दूँगी, आपके चरणŌ क धूिल माथे से लगाऊंगी । आपकì कृपा मानूंगी । कृत²
होऊँगी । पर िनवेदन है िक यिद आप मुझ पर से अपनी मांग उठा ल¤गे मुझे छोड़ द¤गे तो भी
म§ कृत² होऊँगी । िनणªय आपके हाथ है । जो चाह¤ कर¤ ।
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì कहानी जाĹवी से उĦृत है ।
ÿसंग: जाĹवी का चåरý कहानी म¤ अपने ÿेम को समिपªत है । परंतु माता-िपता कì इ¸छा से
बृजनंदन के साथ िववाह तय हो जाने के पIJात जाĹवी संभवत अपने अतीत को छुपाना
नहé चाहती और इसीिलए वह एक पý के Ĭारा बृजनंदन से इस तरह कì याचना करती है ।
यह घटनाøम åरÔतो के ÿित जाĹवी के चåरý कì ईमानदारी को संकेितत करता है ।
Óया´या: भारतीय समाज म¤ परंपराओं ने मनुÕय के जीवन को एक मागª पर सुिनिIJत कर
रखा है और इस øम पर चलते हòए ही समाज अपने जीवन को साथªक करता है । युवा होने
के पIJात िववाह एक अिनवायªता है । भारतीय समाज म¤ िववाह से पहले ÿेम कì कोई
अवधारणा नहé है । जैन¤þ ने इस कहानी म¤ जाĹवी के łप म¤ एक ऐसे पाý का िचýण िकया
है, जो िववाह से पहले िकसी युवक के ÿेम म¤ अिभभूत है । उसका ÿेम िनIJल और
िनÕकलंक है । परंतु कहानी यह संकेत करती है िक ÿेम उसको ÿाÈय नहé है और जाĹवी
ÿेम कì पीर म¤ तĮ है । समय के साथ उसका िववाह सुिनिIJत होता है । अपने भारतीय
संÖकारŌ के अनुłप वह अपने िववाह से इंकार नहé कर पाती परंतु åरÔतो के ÿित उसम¤
गहरी ईमानदारी है । िजसके चलते वह बृजनंदन को िववाह से पहले ही सारी बात¤ बता देना
चाहती है । इस हेतु वह एक पý िलखती है और बृजनंदन से याचना करती है िक िववाह से
उसे कोई परेशानी नहé है, यिद āजनंदन उसे Öवीकार करेगा तो वह भी पूरी आÖथा से
āजनंदन को Öवीकार करेगी और यिद स¸चाई जानने के बाद āजनंदन िववाह तोड़ देता है,
तो भी उसे कोई उû नहé होगा । यīिप पुŁष - स°ाÂमक समाज म¤ यह स¸चाई काफì
कड़वी होती है और अंततः āजनंदन भी इस िववाह को Öवीकार नहé कर पाता । परंतु
āजनंदन के मन म¤ कहé न कहé जाĹवी के िलए अÂयंत सÌमान का भाव भी है और यह
सÌमान का भाव उसके भीतर उसकì ईमानदारी के कारण पैदा होता है । िववाह को लेकर
उसकì धारणा थोड़ी बदल जाती है । वह अपने चाचा से कहता भी है िक वह अब िववाह munotes.in

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जैनेÆþ कì सवª®ेķ कहािनयाँ कहानी - जाĹवी और बाहòबली
109 नहé करना चाहता और यिद करना ही पड़ेगा तो वह जाĹवी से ही िववाह करना पसंद
करेगा। यह पूरा ÿसंग समाज म¤ बदलती हòई पुŁष स°ाÂमक सोच का संकेितत करता है ।
िवशेष: इस उĦरण म¤ जैन¤þ ने बदलते हòए सामािजक संदभŎ का िचýण िकया है ।
Óया´या-अंश २: बहòत पहले कì बात कहते ह§ । तब दो युगŌ का संिधकाल था । भोगयुग के
अÖत म¤ से कमªयुग फूट रहा था । भोगकाल म¤ जीवन माý भोग था । पाप-पुÁय कì रेखा का
उदय न हòआ था । कुछ िनिषĦ न था, न िवधेय अतः पाप असंभव था, पुÁय अनावÔयक ।
जीवन बस रहना था ।...... उस युग के ितरोभाव म¤ से नवीन युग का आिवभाªव हो रहा था ।
ÿकृित अपने दाि±Áय म¤ मानो कृपण होती लगती थी । उस समय िववाह ढूँढ़ा गया । पåरवार
बनने लगे और पåरवारŌ म¤ समाज । िनयम-कानून भी उठे । 'चािहए' का ÿादुभाªव हòआ और
मनुÕय को ²ात हòआ िक जीना रहना नहé है, जीना करना है ।
संदभª: ÿÖतुत उĦरण जैन¤þ कì िवचार ÿधान कहानी बाहòबली से उĦृत है ।
ÿसंग: कहानी के संदभª को िनिमªत करते हòए यहां जैन¤þ मानव इितहास के िवकास को ÖपĶ
कर रहे ह§ । िकस ÿकार मानव सËयता यायावर जीवन को छोड़कर अपने जीवन को
िनयिमत करने कì ओर बढ़ी थी, िकस ÿकार समाज जैसी संÖथा का गठन हòआ और जीवन
को िनयिमत करने के िलए िववाह संÖथा आिद का िवकास हòआ, िकस ÿकार मÂÖय Æयाय
को समाĮ करने के िलए िनयमŌ और कानूनŌ का गठन हòआ । इस पåर¸छेद म¤ जैन¤þ ने
मानवता के Öवाभािवक िवकास को लि±त िकया है ।
Óया´या: मानव जÆम और िवकास के संदभª म¤ डािवªन का िवकासवादी िसĦांत सवाªिधक
माÆयता ÿाĮ िसĦांत है । मानव के इितहास म¤ आवÔयकताओं के कारण िविभÆन ÿकार कì
संÖथाओं, िनयमŌ और कानूनŌ का िवकास हòआ है । आरंभ म¤ मनुÕय यायावर जीवन जीता
था, इधर-उधर भटकता था और अपने जीवन यापन के िलए पूरी तरह से ÿकृित पर िनभªर
था । ÿकृित से जो सहज łप से उसे ÿाĮ हो जाता था, उसी म¤ वह अपना जीवन यापन
करता था । परंतु जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, ąोतŌ को लेकर आपस म¤ संघषª भी बढ़ने लगा
और जीवन को िनयिमत करने कì आवÔयकता सामने आयी । इसी आवÔयकता के चलते
मनुÕय ने समूहŌ का गठन िकया । िजÆहŌने बढ़ते-बढ़ते बड़े समाजŌ का łप धारण कर िलया।
इन समाजŌ के गठन के पIJात सामािजक जीवन को िनयिमत करने के िलए िववाह आिद
संÖथाएं बनé । कुछ मनुÕयŌ कì उ¸छृंखलता के चलते जब-तब समाज म¤ अशांित का
वातावरण उÂपÆन होता रहता था और इसी के चलते िनयम-कानून आिद का गठन हòआ ।
úामीण समाज म¤ पंचायत जैसी संÖथाएं इस आरंिभक łप को ही ÿकट करती ह§, जहां
समूह के ही कुछ बुिĦमान और ईमानदार लोग Æयाय देने का कायª करते थे । इसी के साथ
मानव जीवन म¤ 'चािहए' के ÿij का भी ÿादुभाªव हòआ अथाªत मनुÕय के िलए ³या करना
ठीक है और ³या िनिषĦ है, यह भी देखा और परखा गया । मानव समाज ने िमलकर जो
िनयम बनाए, उन सभी का पालन अिनवायª łप से 'चािहए' के अंतगªत था । इससे िवचलन,
अपराध कì ®ेणी म¤ रखा गया । इस ÿकार जैन¤þ मानवता के øमबĦ िवकास पर एक
Öवतंý ŀिĶकोण से िवचार करते ह§ । इससे इितहास के संबंध म¤ उनकì िविशĶ चेतना का
पता लगता है ।
िवशेष: इस उĦरण के माÅयम से जैन¤þ कì िविशĶ इितहास ŀिĶ का पता चलता है । munotes.in

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िवशेष अÅययन : जेन¤þ
110 ९.६ वैकिÐपक ÿij १. जाĹवी का िववाह िकसके साथ िनिIJत होता है ?
(क) आिदनाथ (ख) बाहòबली (ग) भरत (घ) āजनंदन
२. जाĹवी छत पर िकÆह¤ भोजन के िलए आमंिýत करती थी ?
(क) गौरैया (ख) मोर (ग) कबूतर (घ) कौए
३. āजनंदन अंततः िकसके साथ िववाह करना चाहता है ?
(क) सुनीता (ख) कÐयाणी (ग) मृणाल (घ) जाĹवी
४. भरत के िपता का ³या नाम है ?
(क) जयराज (ख) āजनंदन (ग) सुकेश (घ) आिदनाथ
५. बाहòबली के भाई का ³या नाम है ?
(क) जयराज (ख) āजनंदन (ग) आिदनाथ (घ) भरत
६. कैवÐय ÿाĮ करने के िलए कौन तपÖयारत था ?
(क) जयराज (ख) āजनंदन (ग) जाĹवी (घ) बाहòबली
९. ७ लघु°रीय ÿij १. िनÌनिलिखत पर िटÈपिणयाँ िलिखए ?
(क) बाहòबली (ख) जाĹवी (ग) बृजनंदन (घ) भरत
२. जाĹवी कहानी कì मूल संवेदना
३. बाहòबली कहानी का उĥेÔय
९.८ बोध ÿij १. जाĹवी कहानी के मूल-मंतÓय को िवÖतार से ÖपĶ कìिजए ?
२. जाĹवी कहानी का सारांश अपने शÊदŌ म¤ िलिखए ?
३. जाĹवी के चåरý का सिवÖतार िवĴेषण कìिजए ?
४. जाĹवी कहानी अपने समय-संदभŎ को ÖपĶ करने म¤ कहाँ तक स±म है ।' कथन का
िवĴेषण कìिजए ?
५. बाहòबली कहानी के माÅयम से जैन¤þ के वैचाåरक सरोकारŌ को ÖपĶ कìिजए ?
६. बाहòबली कहानी कì सोĥेÔयता पर एक िनबंध िलिखए ?
७. बाहòबली कहानी का सारांश अपने शÊदŌ म¤ िलिखए ?
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